बेवकूफी का सौंदर्य: सौंदर्य एक लेखनी का

पुस्तक 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य'; लेखक: अनूप शुक्ल; समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य
लेखक: अनूप शुक्ल
विधा: व्यंग्य
प्रकाशक: रुझान पब्लिकेशंस, जयपुर, राजस्थान
संस्करण: पेपरबैक, 126 पृष्ठ
मुद्रित मूल्य: 150 रुपये
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सोचते हैं कोई बहुत बड़ी बेवकूफ़ी की बात कह डालें लेकिन फिर आलस्य हावी हो जाता है।  इस चक्कर में दूसरे बाजी मार ले जाते हैं- अनूप शुक्ला ’फुरसतिया’

और यहाँ से शुरुवात करते हैं व्यंग्य शिरोमणि अपनी बेवकूफियों को निहारने का क्रम और सिर्फ निहारना भर हो तो भी समझे, उसमें सौंदर्य तलाशना। फिर अपनी अनेकानेक विकट बेवकूफियों में जो भी बेवकूफियाँ उन्हें सुन्दर लगीं। उन्हें एक साथ नथ्थी किया और चला दिया सरकारी फाईल नुमा माहौल।  मेरी पसंद। मेरे मन की बात टाईप, मोटी सी फाईल। बन गई किताब। रुझान प्रकाशन ने इनकी बेवकूफी को तस्सली से आभासा। फिर पहचाना, और पुस्तकारुप दे दिया, नाम दिया ’बेवकूफी का सौंदर्य’।

अपने आपको व्यंग्य शिरोमणि मान लेना और अपनी बेवकूफियों में सौंदर्य तलाश लेने का दिव्य हुनर ही अनूप शुक्ला को फुरसतिया बनाता है, ज्यादा लोग उनको फुरसतिया के नाम से ही जानते हैं। आजकल तो वो यूँ कट्टा कानपुरी के नाम से भी शेरो शायरी का कट्टा दाग रहे हैं यूँ तो।
वो कौव्वे को भी कोयल की आवाज सिखाने का हुनर रखता है,
अजब सा शख्स है वो, बातों को बात बनाने का हुनर रखता है।

ठेठ कनपुरिया व्यक्तित्व, अल्हड़ और खिलंदिड़ा अंदाज। लेखन में, देखन में, बोलन में, मिलन में। वाकई कुछ तो है उसमें जो मिल कर सबको अपना बना लेता है।  कभी एकदम संवेदनशील लेखन। कभी दिल को छूकर रुला देने का हुनर। कभी साइकिल यात्रा पर ले जाने वाला ओजस्वी युवा। तो कभी वही हँसी मजाक।

जमाना गुजरा उनको जानते पहचानते।  एक दफा उनके घर जाना भी हुआ। परिवार से मिलना भी हुआ। वह भी आये हमसे मिलने। फिर बेटे की शादी में शिरकत भी की उन्होंने हमारे, मगर जितना उनको जानते चलते गये, उतना ही उनके मुरीद होते चले गये। एक संवेदनशील व्यक्तित्व, जिसकी बात का अंदाज ही व्यंगिया है।

वाकया याद आता है कि वह कानपुर से जबलपुर मेरे बेटे की शादी में शिरकत करने आ रहे थे। हमने फोन से जानना चाहा कि ट्रेन कहाँ तक पहुँची है। किस डिब्बे में हैं ताकि उन्हें लिवाने जाने का इन्तजाम किया जा सके। जो कोच आदि की उन्होंने जानकारी दी, उसी में मेरे मामा भी लखनऊ से आ रहे थे शादी में। मैने कहा कि अरे वाह, आप तो उसी डिब्बे में है जिसमें मामा है। साथ हो लिजिये। एक ही गाड़ी आप दोनों को ले आयेगी। कहने लगे कि हम खुद ही आ जायेंगे। मामा के चक्कर में न डालो हमें। कहीं अंदर ही न करवा दें।

अरे , हमने बताया कि पुलिस वाले मामा नहीं हैं। हमारे मामा हैं। तब कहें, ओके, आप कह रहे हो तो आ जावेंगे उनके साथ। यह वाकिया पूरे विवाह समारोह में छाया रहा, और वैसे ही मित्र फुरसतिया भी छाये रहे।
भूमिका में यह सब सिर्फ बताने को कि किस व्यक्तित्व के लेखन की बात हो रही है। अब बात करें उनकी किताब  ’बेवकूफी का सौंदर्य’ की। किताब की भूमिका, व्यंग्य के सुपर स्टार, आइटम मैन एवं चीयर बालक ’आलोक पुराणिक’ ने लिखी है। उनके सिवाय यूँ भी और किसी के बस का न था फुरसतिया को समेटना एक भूमिका के माध्यम से।

हालांकि आलोक पुराणिक ने भी इस भूमिका को लिखने के बाद कलम की निब तोड़ दी। मानो कोई जज किसी को फाँसी की सजा सुनाने के बाद उस कलम से अपने नाता तोड़ लेता है कि हे प्रभु, अब आगे से ऐसा काम न करवाना। ऐसी इबारत न दर्ज करवाना।
[सम्पादकीय नोट: बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य की पहली समीक्षा सेतु के दिसम्बर 2016 अंक में प्रकाशित हो चुकी है।]
मगर यह महज एक रिवाज मात्र है। अगली बार फिर वही जज फाँसी की सजा सुनाता है। और दूसरी वाली कलम जिससे अब की सजा सुनाई। उसकी निब तोड़ डालता है। जज अपना काम करता चलता है। दुर्भाग्य तो उस कलम का है जिसकी निब टूटती है। उसका दर्द कौन देख पाता है? उसे अहसासने वाला मैं। जब अपना व्यंग्य संग्रह लाऊँगा तो आलोक को उनकी पुरानी कलम में नई निब लगा कर दूँगा। कि यूँ न बच कर जा पाओगे। उनकी लिखी थी तो अब हमारी लिखो।

’बेवकूफी का सौंदर्य’ यूँ है तो एक व्यंग्य का संग्रह। मगर आप जब इसे पढ़ेंगे, तो पायेंगे अपने आस पास का फैला वो यथार्थ।  जिसे आप देखते तो थे मगर उसे उस नजर से देखना चूक गये थे जिस नजर से अनूप शुक्ला उसे देखते हैं। आप अचरज में पड़ जायेंगे। अरे, इसे ऐसे भी सोच सकते हैं क्या, और फिर पढ़ कर कहेंगे कि हाँ, सोच तो सकते थे। एक होती है मुस्कान। आप देखते हैं मुस्कान और फुरसतिया देखते हैं उसी में कोलगेटिया मुस्कान। जिसमें दिखे दाँत ज्यादा सफेद। छोटी छोटी से बातें। मगर अंदाज जुदा जुदा।

फुरसतिया के चटकारे लेने का अंदाज देखें,  दफ़्तर में हमारे एक सहकर्मी हैं। एक ही दफ़्तर में होने के बावजूद वे हमारे मित्र हैं। हा हा! इतनी गहराई। सच मगर कब सोच पाते हैं इस तरह हम। बहुत महीन आंकलन हर छोटी छोटी बातों का।

एक रुपये बीस पैसे का एक पन्ना व्यंग्य, इत्ते में क्या आता है आज की महंगाई के इस दौर में। तब यह डील तो गज़ब कहलाई। 125 पन्ने की मन बहलाती, दिल सहलाती। आँख खुलवाती। बार बार कचोटती, यह बेवकूफी का सौंदर्य वाली किताब मात्र 150 रुपये में। धन्यवाद करेंगे आप रुझान प्रकाशन का, जिसने इसे छापा। हालांकि धन्यवाद तो उनका फुरसतिया भी कर रहे हैं जो अक्सर रजाई ओढ कर इस सोच में ठंड में सिहर जाते हैं कि क्यूँ उन्होंने छापा? ऐसा क्या दिख गया उनको मेरे लेखन में?

ब्लॉगजगत के एक स्वयंभू मठाधीश का उसी जगत के एक और स्वयंभू मठाधीश के लिए यह कहना कि उनकी किताब ’बेवकूफी का सौंदर्य’ जरुर खरीद कर पढो। यहाँ से एक नया हैल्दी अध्याय शुरु करता है।

1 comment :

  1. बढ़िया समीक्षा अब तो देखना पड़ेगा बेवकूफी का सौंदर्य

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