रत्नहरि की भक्ति (शोध पत्र)

प्रोफेसर (डॉ.) हरदीप सिंह

- हरदीप सिंह

राम भक्ति बिन मुक्ति न भाई। 
भुजा उठाइ कहउ सहुँ खाई।


"राम भक्ति बिन मुक्ति न भाई। भुजा उठाइ कहउ सहुँ खाई।" की घोषणा करने वाले रत्नहरि रीतिकाल के वह अल्पज्ञात भक्त कवि हैं जिन्होंने 32 भक्तिपरक ग्रंथों की रचना रच कर न केवल रीतिकाल को समृद्ध किया है बल्कि हिंदी साहित्य को वह गौरव प्रदान किया है जो अब तक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वालों की निगाह में शायद इसलिए नहीं आ पाया क्योंकि अति सम्पन्न ब्रजभाषा में रचित यह भक्तिकाव्य गुरुमुखी लिपि में था। प्रस्तुत शोध पत्र में रत्नहरि की भक्ति भावना से हिंदी जगत को परिचित कराने का एक प्रयास भर है। यह रीतिकाल की भाव-शून्यता के मिथ को तोड़ता है।

‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में मनीषियों में वैचारिक मतभेद है। भक्ति शब्द की व्याख्या दो रूपों में की गयी है। भज धातु से ‘भज् सेवायाम्’ में पाणिनी सूत्र ‘स्त्रियाँक्तिन:’ प्रत्यय का प्रयोग किया गया है अर्थात् भजन-पूजन आदि भावों से युक्त। नगेन्द्रनाथ वसु ने हिंदी विश्वकोश में भक्ति के 18 अर्थों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार ‘भज्-क्तिन्’ से भक्ति शब्द का निर्माण हुआ। कुछ अन्य विद्वानों ने ‘भक्ति’ की व्युत्पत्ति ‘भञ्ज’ धातु से मानी है। ‘भञ्ज’ का अभिप्राय टूटने से है। जब तक आत्मा और परमात्मा की विलगता न हो, तब तक भक्ति की स्थिति हो ही नहीं सकती। संस्कृत में भज् धातु से दो शब्दों का निर्माण होता है (1) भक्ति, (2) भाग।

इन दोनों शब्दों में प्रत्यय की, भिन्नता है: ‘भजनं भक्तिः’, ‘भज्यते बनया सति भक्तिः’, भजन्ति अनया इति भक्तिः’। साहित्य में कहीं-कहीं भाग के अर्थ में भी भक्ति शब्द का प्रयोग मिलता है।1 भक्ति शब्द में भज धातु का अधिक समीचीन अर्थ है शरण में जाना या भाग लेना। भक्त भगवान के कार्य को आगे बढ़ाना चाहता है, उसके रस, ज्ञान और कृति में भाग लेना चाहता है, इसीलिये वह भगवान की शरण में जा कर सेवक रूप में अपनी स्थिति बनाये रखना चाहता है और मुक्ति की कामना नहीं करता।2

भक्ति-ग्रंथों में ‘भक्ति’ की अनेक परिभाषाएँ एवं लक्षण दिये गये हैं एवं उनकी विशद व्याख्या भी प्रस्तुत की गयी है। इनमें से श्रीमद्भागवत, गीता, नारदभक्तिसूत्र शाण्डिल्य भक्ति सूत्र, उज्ज्वल नीलमणि, हरिभक्तिरसामृत सिंधु, एवं भक्तिरसायन प्रमुख ग्रंथ है। भागवत में व्यास ने प्रतिपादित किया है कि वेदविहित कर्म में लगे हुए जनों की भगवान के प्रति अनन्यभावपूर्वक स्वाभाविक सात्विक प्रवृत्ति का नाम ‘भक्ति’ है।3 सर्वातरयामी भगवान् के गुणश्रवण मात्रा से ही उनके प्रति अविच्छिन्न मनोगति को भक्ति कहते है।4 भागवतकार का स्पष्ट तात्पर्य यह है कि भक्ति की वास्तविक सत्ता मानसिक स्थिति में है, बाह्य विधान तो साधनमात्र है।

श्रीमद्भागवत में कृष्ण के प्रति निष्काम भाव से निरन्तर बनी रहने वाली भक्ति को ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया गया है।5 गीता में भी कहा गया है कि ‘मन्मना भव’ अर्थात् मन को मुझ में लगा।6 शांडिल्प के अनुसार, ‘सा-पुरानुरक्तिरीश्वरे’ अर्थात् भक्ति ईश्वर के प्रति परम अनुरागरूपा है।7 नारद भक्ति सूत्र में वह प्रेममय अमृतरूपा है जो मानव को तृप्त अनासक्त तथा मुक्त कर देती है।8 शांडिल्प की ‘पुरानुरक्ति’ का ही पर्याय है। रूपगोस्वामी ने कहा है कि उत्तमा भक्ति कृष्ण का

वह अनुशीलन है जो अनुकूलता से युक्त तथा अन्याभिलाष और ज्ञान-कर्म आदि से मुक्त हो।9 मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति की परिभाषा करते हुए कहा है कि भगवद्धर्म के कारण द्रुत चित्त की सर्वेश के प्रति धारावाहिक वृत्ति को भक्ति कहते हैं।10 इसमें उन्होंने चित्त की द्रुति पर विशेष बल दिया है। द्रुत होने पर चित्त भगवान की आकारता धारण कर लेता है अर्थात् भगवन्मय हो जाता है। यही भाव भक्ति है।11 वस्तुतः ईश्वर-विषयक अनुरक्ति ही भक्ति है। निर्गुण ब्रह्म को भावुक भक्त

अपनी कल्पना से सगुण और साकार रूप प्रस्तुत करता है और आत्म-तृप्ति के निमित्त उसी का भावन करता है। भगवान के रूप का अनन्य भाव से भावन ही भक्ति आचार्य शुक्ल के अनुसार, भक्ति में किसी ऐसे सान्निध्य की प्रवृत्ति होती है जिसके द्वारा हमारी महत्व के अनुकूल गति का प्रसार और प्रतिकूल गति का संकोच होता है।13

भक्ति-सिद्धांत का निरूपण करने वाले ग्रंथों में भक्त की मानसिकता पर विशेष बल दिया गया है। ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न चित्त वाला पुरुष न तो शोक करता है न आकांक्षा करता है और सब भूतों में समभाव रखता हुआ भगवान की पराभक्ति को प्राप्त होता है।14 भगवान के साथ भक्त का तादात्म्य ही भक्ति है। गीता के अनुसार ‘जो भक्त मुझे प्रेम से भजते है, वे मुझ में और मैं उनमें प्रकट होता हूं।’15 भक्ति का स्वरूप औदात्यमूलक और परिणति में मांगलिक है। अतः भगवद् भक्ति से दुष्ट भी साधु और धर्मात्मा हो जाता है।16 और स्त्री, वैश्य, शूद्र आदि पाययोनि वाले भी परमगति को पाते है।17 भावयोग की चरम अवस्था में भक्त भी भगवत्स्वरूप हो जाता है।18 इस प्रकार भक्ति के साक्षात्कार की पुनीत प्रक्रिया है। भगवत्स्वरूप महत् की उपासना और भावना से उपासक के आत्मनिहित महत् का-आत्मा के शुद्ध-बुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार होता है। इस प्रकार परमात्म साक्षात्कार के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार भी हो जाता है।19

वैष्णव आचार्यों ने भक्ति के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए भक्ति को ज्ञान से उच्चतर पद पर प्रतिष्ठित किया है। रामानुजाचार्य के अनुसार तैलधारा सदृश अविच्छिन मनोनिवेश ही भक्ति का स्वरूप है।20 रामानंद के अनुसार, ‘मानस का नियमन करके अनन्य भाव से भगवत्परायण होकर की गयी उपाधि-निर्युक्त परमात्मसेवा ‘भक्ति’ है।21 माधव ने ज्ञान को मुक्ति के लिये आवश्यक तो माना है, किंतु उनके अनुसार मुक्ति प्राप्ति का अंतिम साधन भगवान् के माहात्म्य-ज्ञान से उद्भुत परमानुरक्ति अथवा भक्ति ही है।22 वस्तुतः भक्ति ही ज्ञान, वैराग्य, धर्म आदि उच्च उपलब्धियों का सार और आधार है। धर्म की चरम सिद्धि भक्त द्वारा भगवान को संतुष्ट करना ही है।23 मनोविज्ञान की दृष्टि से भक्ति को ‘काम’ की उन्नत अवस्था माना गया है। भक्तिभाव के मूल में मनुष्य की कामवृत्ति, सर्वसत्य और सर्वाधिक आनंदप्रदायक पदार्थ के अन्वेषण की प्रवृत्ति, आत्मनिष्ठा एवं आत्मरक्षण की प्रवृत्ति एवं असफल दाम्पत्य-जीवन के कारण अभुक्त काम-वासना की प्रवृत्ति पे्रेरक तत्वों के रूप में काम करने वाली है।24 काम का उन्नयन दाम्पत्य-आनन्द का स्वरूप है तथा दाम्पत्य प्रेम और ईश्वर प्रेम की मनोदशाएँ समान हैं। काम के उन्नयन का व्यावहारिक रूप दाम्पत्य-प्रेम तथा आदर्श रूप ईश्वर-प्रेम है।25 दाम्पत्य-भाव का आध्यात्मिक स्वरूप ही मधुर भक्ति रस का उत्स है।26

भक्ति के भेद
भक्ति निरूपक ग्रंथों में विभिन्न दृष्टियों से भक्ति का वर्गीकरण किया गया है। भागवतकार ने भक्ति के साधन, साध्य, साधक आदि की दृष्टि से उसके त्रिधा, चतुर्धा और पंचधा आदि भेदों की चर्चा की है। भागवतपुराण के आधार पर बोपदेव ने भक्ति के 18 प्रकारों का वर्णन किया है।27 रूपगोस्वामी ने भक्ति के 12 भेदों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है।28 नारायण तीर्थ ने भक्ति के 17 भेदों का उल्लेख किया है।29 उदयभानु सिंह ने उक्त शास्त्रीय आधार पर भक्ति का नवधा भक्ति, निर्गुण भक्ति (अभेद भक्ति) और सगुण भक्ति (भेद-भक्ति), साध्यरूपा (मुख्या) और साधन रूपा (गौणी), शुद्धा भक्ति और मिश्रिता भक्ति, सकाम, कैवल्यकाम और भक्तिमात्र काम भक्ति, दृष्टमात्रफला, अदृष्टमात्रफला और मिश्रिता भक्ति, निर्गुणा, सात्विकी, राजसी और तामसी भक्ति, स्पर्शजा, शब्दजा, रूप जा, रसजा, गंधजा और समुचित विषयजा भक्ति नामक भेदों के आधार पर गंभीर एवं पांडित्यपूर्ण विवेचन किया है।30 किंतु विवेचन की सुविधा के लिये हम भक्ति के दो मुख्य भेद-वैधी और रागानुगा-स्वीकार कर सकते हैं। वैधी भक्ति वह धारा है जो अपने दोनों किनारों से बंधी रहती है पर रागानुगा वह बाढ़ है जो किनारो का बंधन तो मानती नहीं, सामने जो कुछ पड़ जाए उसे भी बहा ले जाती है।31 वैधी-भक्ति में शास्त्रीय नियमों के पालन का विशेष महत्व रहता है, इसमें कर्म प्राधान्य है, इसे मर्यादामार्ग भी कहते है, गौणी भक्ति और नवधा-भक्ति भी इसी में अंतर्युक्त हैं। इसके विपरीत रागमयी भक्ति में विधि-विधान का स्वतः ही त्याग हो जाता है। इसमें भक्त अपने आंतरिक भाव से प्रेरित होकर भगवान के साथ संबंध जोड़ता है। वस्तुतः यह रागमयी भक्ति ही हृदय की साधना है। यहाँ हृदय में ही हृदय के द्वारा हृदयेश्वर की रागमयी उपासना होती है। स्पष्ट शब्दों में यों कह सकते हैं कि भक्त के हृदय में भगवान के लिये भगवान के हृदय में भक्त के लिये जो स्वाभाविक गाढ़ तृष्णा होती है वही है रागमयी भक्ति।’32 यह रागानुगा भक्ति दो प्रकार की होती है - कामरूपा और सम्बन्धरूपा।

काम से प्रेरित भक्ति कामरूपा है। ‘रामरहस्य’ में कौशल्या के महल में काम करने वाली युवतियों की भक्ति इसी प्रकार की है। सम्बन्धरूपा भक्ति के अंतर्गत शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य भाव से की जाने वाली भक्ति आती है। ‘रामललामगीत’ में हनुमान, भरत आदि की भक्ति दास्य भाव की, सुग्रीव, निषादराज गुह आदि की भक्ति सख्य भाव की है। ‘रामरहस्य’ में राम-सीता की प्रणय लीला का चित्रण करके रत्नहरि ने माधुर्य भाव की भक्ति का परिचय दिया है। दशरथ, कौशल्या, रत्नालका आदि की भक्ति वात्सल्य भाव की है।

रत्नहरि की भक्ति
रीतिकाल के विलासी वातावरण में रत्नहरि की काव्य-रचना का लक्ष्य केवल ‘रघुपति प्रीति’ है। उन्होंने सिंहनाद करते हुए घोषित किया :

काव्य दोख गुन अलंकृति, छंद बंद रस रीति।
बरन बिबेक न एक मुहि, केवल रघुपति प्रीति।।33

यह प्रेम ही भगवान को वश में करने का वशीकरण मंत्र है।

मुनिवर प्रेम विवस रघुराई। यहि सब बेद पुराननि गाई।
हरिबस करन मंत्र मन माना। प्रेम समान न आन बखाना।।34

प्रेम से विवश होकर ही भगवान रत्नालका के पुत्र के रूप में जन्म लेते हैं

प्रेम प्रधान पुरान श्रुति, बरनत सब सुख धाम।
प्रेम विवस रत्नालका, सुवन बने घनस्याम।।35

भगवान के प्रति यह राग अथवा प्रेम चार मुख्य भावों में व्यक्त होता है काम, सख्य, वात्सल्य और दास्य। कौशल्या के महल में रहने वाली युवतियों ने काम-भाव से, बालसहचरों ने सख्य-भाव से, दशरथ-कौशल्या व रत्नालका ने वात्सल्य भाव से तथा हनुमान-रत्नहरि आदि ने दास्यभाव से रामभक्ति को प्राप्त किया है। विभिन्न प्रकार के रागात्मक संबंधों द्वारा भक्त और भगवान का सान्निध्य भक्ति भाव को दृढ़ एवं पुष्ट बनाता है। उदयभानुसिंह ने रति के साथ भय और वैर (द्वेष) को भी राग का ही रूप माना है।36 वास्तव में प्रीति की अवस्था में भी वह व्यक्ति मन में रहता है जिसके साथ प्रीति होती है और भय और वैर जिस व्यक्ति से होता है वह भी याद रहता है। इस प्रकार याद तो बनी ही रहती है। यह याद या स्मृति ही भक्ति का आधार है। ‘भयं’ कहने का तात्पर्य भयरति है। भयदीप्तिकारक भाव है और भक्ति के लिये चित्तदुरति अनिवार्य है। जहाँ दु्रति नहीं वहाँ भक्ति नहीं हो सकती है।’37

अतएव रत्नहरि के रामविरोधी-पात्र जिनके मन में राम के प्रति भक्तिभाव तो है परंतु वे राम के विरूद्ध पदन्यास करने के कारण उनसे भयभीत भी है, इसी श्रेणी में रखे जाएंगे। उदाहरण के लिये, राम के प्रतिकूल आचरण करने वाले मारीच38 और बालि39 के मन में राम के प्रति रागात्मक भाव भी है। उनका यह भाव भक्ति का आदर्श रूप न होने पर भी भक्ति पद की प्राप्ति में सहायक है।40 अंतिम समय में उनका चित्त रजस्तमोगुण से मुक्त होकर पूर्णता दु्रत हो गया है। भगवान विष्णु में द्वेष-भाव से किया गया मंथरा रावण का मनोनिवेश ‘वैर’ है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, ‘भागवत’ के नारद जी का यह मत है कि जितनी तन्मयता वैरानुबंध के द्वारा हो सकती है, उतनी भक्तियोग के द्वारा नहीं।41

रत्नहरि ने वैर भाव से की गयी भक्ति को भी मान्यता दी है :

जब मघवा (इन्‍द्र) मंथरा मारी। लागी बज्र चोट अति मारी।
तब ते बैर भाव जिय धरिकै। लगी करिनि सुनरन हरि परिकै।
सो सुमिरन सब सल सिरावन। तिहिं प्रभाव पायो पद पावन।
सुनी कूबरी कहूँ कहानी। हरि अवतरहिं अवध रजधानी।
देवकाज हित धर नर रूपा। राम नाम अभिराम अनूपा।
मैं हूं तहाँ चलि बसौ विधाता। करौं बिछन दारुन दुख दाता।
यौं निसदिन चितवति चितचंडी। निज तन तज्यो परम पाखंडी।
प्रभु सुमिरन प्रभाव पतहि पावा। अवध निवास सुवास सुहावा।
... ... ...
कुबरी अचि जइहे हरिधामा। बैर सुभाव भजे जिहि रामा।42

स्पष्ट है कि रत्नहरि की भक्ति का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उन्होंने भक्ति को सरल-मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया है और इस प्रकार जन-साधारण के लिये, चाहे कोई कैसी ही वृत्ति और भाव वाला हो, भक्ति का द्वार खोल दिया है लेकिन राम-भक्ति का सर्वाधिक ठोस साधन प्रेम ही है इस प्रेम के माध्यम से ही रत्नहरि राम-भक्ति का प्रतिपादन करते हैं :

रामचरन पंकज मन जासू। भुक्ति मुकति संदेह न तासु।
ब्रत तप दान महा मख नेमा। संजम सकल विकल बिन प्रेमा।
जो रघुबर पद प्रीति न पाई। नाक निवासु निपट दुखदाई।
राम भक्ति कर सुनहु प्रभावा। जिहि बिन कुसल न कोऊ पावा।
जौ जल में जनम नवनीता। सिकता स्रवै सनेह सप्रीता।
राम भक्ति बिन मुक्ति न भाई। भुजा उठाइ कहउ सहुँ खाई।44

‘यद्यपि काम, क्रोध, भय, स्नेह, ऐक्य, सौहार्द या अन्य किसी भी भाव से भगवान में किया गया मनोनिवेश तन्मयताकारक होने के कारण मोक्षप्रद है, तथापि द्वेषात्मक क्रोध, भात्र्सथ आदि भावों को भक्ति के अंतर्गत रखना तर्कसंगत नहीं है।45 ‘भक्ति में भगवान के प्रति इन भावों को रखना असंभव है।’46 भक्ति एवं द्वेष स्वरूपतः एवं लिंगतः भिन्न है। ‘भक्ति’ तो द्रुत चित्त की भगवदाकारता का नाम है। ‘भय’ और ‘क्रोध’ में क्षति होती है, वहाँ दु्रति असंभव है। अतएव इस प्रकार का तात्विक विरोध होने से उसे भक्ति की कोटि में नहीं रखा जा सकता। दोनों की मुक्ति-दशा में भी भेद है। भक्त का प्राप्य भक्ति है और भगवान् उसे अपनी अनपायिनी भक्ति देते हैं, किंतु भगवद्द्वेषी का प्राप्य भक्ति नहीं है। इसलिये उसे मुक्ति मिलती है।’47

अंत में यह कहा जा सकता है कि भक्ति का अर्थ विस्तार चाहे जितना मर्ज़ी किया जाए किन्तु रावण, मंथरादि को राम भक्तों की पंक्ति में खड़ा करना कुछ जंचता नहीं है। यह भक्तों के भाव की अतिशयता है। उन्होंने भगवान का गौरव-प्रदर्शित करने के लिये इतनी उदारता दिखायी है।

उपास्य का स्वरूप
कवि और दार्शनिक दोनों ही मंगलमयी भावना से अनुप्राणित होकर जीवन की समीक्षा का चित्र प्रस्तुत करते हैं। काव्य में सर्वभूतमय भगवान के विश्वव्यापक रूप की तथा दर्शन में उसके सत्य रूप की अभिव्यंजना पर अधिक बल दिया गया है।48 रत्नहरि के राम काव्य में दोनों का समन्वय हैं उनके शील-शक्ति-सौन्दर्य से सम्पन्न राम परमार्थ रूप भी है और सीता के साथ विवाहोपरांत नित्य विहार करने वाले भी। उनके काव्य में स्वतंत्र रूप से तत्वविमर्श नहीं हुआ है। ब्रह्म के स्वरूप का उद्घाटन उन्होंने कुछ स्तुतियों के माध्यम से अवश्य किया है। रत्नहरि मूलतः भक्त थे। उनके काव्य का लक्ष्य राम-भक्ति की सरसता को प्रतिस्थापित करना है। लेकिन अपने ‘राम-काव्य’ में रत्नहरि ने भक्ति का दार्शनिक-निरूपण नहीं किया, जैसा कि तुलसी ने रामचरितमानस में नवधा भक्ति का किया है।

रामानुज के ब्रह्म की भांति49 रत्नहरि के राम भी सगुण है। उनके गुण अमित है।50 वे स्वभावतः करुणामय हैं। दीनदयालु, दीनबंधु,51 अनाथनाथ और अशरण-शरण हैं।52 शरणागतों के पालक और भक्त वत्सल हैं।53 वे इतने भाववल्लभ तथा भावग्राहक हैं कि भक्त की प्रीति पहचान कर सहज ही रीझ जाते हैं। 

श्रुतियों और पुराणों में अनेक स्थलों पर भगवान के विराट रूप का वर्णन किया गया है। ऋग्वेद के नारायण ऋषि ने भगवान के विराट रूप का उल्लेख करते हुए बतलाया है कि वह पुरुष सर्वप्राणि समष्टि रूप ब्रह्माण्ड देह है। सहस्रशीर्ष, सहस्राक्ष और सहस्रपाद है। वह विश्व व्यापक और विश्व से दश अंगुल अधिक है। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त प्राणियों के अनन्त शिर, नेत्र एवं पाद उसी के है और वह ब्रह्माण्ड रूप होकर भी इस ब्रह्माण्ड के बाहर भी अवस्थित है। भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् जगत् वह पुरुष ही हैं यह समस्त विश्व उसका एक पाद (लेशमात्र) है।

चतुर्वर्ण, देवता, तथा विभिन्न उसी के रूप हैं। इनकी उत्पत्ति उसी से हुई है। उसके मुख से ब्राह्मण, इंद्र तथा अग्नि, भुजाओं से क्षत्रिय, उरुओं से वैश्य, चरणों से शूद्र तथा भूमि, मन से चन्द्रमा, चक्षुओं से सूर्य, प्राण से वायु, नाभि से अंतरिक्ष, शिर से द्यौः, श्रोत्र से दिशाएँ तथा इसी प्रकार अन्य लोकों की उत्पत्ति हुई है।’54 ‘अध्यात्म-रामायण’ में कबंध ने राम के विराट वपु का कथन किया है।55 ‘रामचरितमानस’ में भी राम के विराट रूप का वर्णन किया गया है।56 रत्नहरि ने ‘रामललामगीत’ में ब्रह्मा के द्वारा और ‘रामरहस्य’ में अनेक स्तुतियों के द्वारा राम के विराट रूप का निरुपण किया है, जिसका उत्तमर्ण उपर्युक्त ग्रंथ ही है। राम तीनों लोकों के कारण (हेतु) है, कर्ता, पालक और संहर्ता है।57 वे सत्यस्वरूप और सदा विजयी हैं। विष्णु और कृष्ण भी उन्हीं के भय-भंजक और जनरंजक रूप हैं।58 रत्नहरि के राम का विराट रूप इस प्रकार है :

(1) सहस्र श्रृंग सत जीह महरखम निगम रूप सुप्रकासा।
सिद्ध साध्य गो विप्र आदि सब मध्य अनादि निवासा।।

तुम ही जाय प्रनव रव तुम ही वषटकार तव रूपा।
आदि अंत तुमरी न लह्यो तुम अद्भुत अमल अनूपा।।

धरनि गगन दस दिस परिपूरन सहस चरन चखु सीसा।
सृष्टि समय सब सृष्टि सवारन प्रलय प्रलय कर दीसा।।

हौ तब हृदय हृदीस राम तव जीह सारदा देवी।
त्रिदस तोनतनु रोम तिहारे स्वासश्रुती सुर सेवी।।

निभिख निसा उनमेख सुदि न नहि नि भुवन तुम बिन देखा।
जड़ औ जागत जु जगत जहाँ लो सो तव तनु अवरेखा।59

(2) जगहित हेतु नाथ तव लीला। जानत सदा संत सुभ लीला।
मुख तव बिप्र भुजा भू-पाला। उस बैस पग सूद्र सुचाला।। 60

रत्नहरि ने विशिष्टाद्वैतवाद61 के सिद्धांत के आधार पर भी राम का स्वरूप वर्णित किया है। राम शिव, ब्रह्मा और सारे जगत् के आदि कारण है। जागरण, स्वप्न और निद्रा में दिखायी देने वाले रूप से भिन्न है। सारे संसार को गति देने वाले है। सबके शरीर की ज्योति उन्हीं के कारण है। वह सब में होते हुए भी सबसे भिन्न है। राम को भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न तरीकों से याद करते हैं। कोई जगत का कारण मानकर उनकी पूजा करते हैं, तो कोई ज्योति रूप मानकर। कोई निराकार मानकर उपासना करते है तो कोई संसार के दुख-दर्द दूर करने वाले ईश्वर के अवतार के रूप में पूछते हैं। कोई उन्हें आनन्दस्वरूप मानकर निर्मल, निश्चल और अनुपम कहता है तो कोई उन्हें ज्ञानमय मानता है। किंतु एक बात तय है कि जो भी राम को जिस रूप में याद करता है, वे भी उसी रूप में संतुष्ट करते हैं।62 राम समूचे विश्व को प्रकाशित करने वाले, जगत की स्थापना, रक्षा आदि कर्म करने वाले विष्णु-ब्रह्मा और शंकर-तीनों रूप रखने वाले है, माया के अनुरूप सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों को धारण करने वाले हैं।63 जिस प्रकार स्फटिक पत्थर में अलग-अलग नीले रंगों की प्रतीति होती है और जल में उत्पन्न होने वाली लहरें अलग-अलग दिखायी देती है लेकिन उनका मूल रूप एक ही होता है उसी प्रकार राम का स्वरूप एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त होता है।64 वे अज्ञेय होते भी भक्तों के लिये ज्ञेय हैं, पुराण पुरुष होते हुए भी जरा आदि से मुक्त हैं, सब लोगों का कारण होते हुए भी राम उनके लिये अज्ञात हैं, सर्वगम्य होते भी सब पदार्थों से मुक्त हैं।65 वे स्वयं प्रकाशमान, स्वयंभू और अणु से भी सूक्ष्म है। वे सब प्राणियों में नित्य निवास करते हुए भी लेप-क्षेप से न्यारे है। वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते है। निरीह होते हुए भी सब शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।66 जिस प्रकार नदियाँ सागर में जाकर समाती हैं उसी प्रकार समस्त आगम आदि राम का ही गुणगान करते हैं। राम सबके मुक्ति-मुक्ति दाता हैं।67 स्पष्ट है कि रत्नहरि की ब्रह्म-विषयक धारणा विशिष्टाद्वैतवाद के सिद्धांत पर आधारित है।

भगवान् राम के निवास स्थान ये हैं वैकुण्ठ, विष्णुपुरी, परमधाम ब्रह्मलोक, गोलोक और अयोध्या आदि :

जो तब धाम दिव्य श्रुति गावा। जहाँ नित्य तव रमण सुहावा।
चार चरन तव बरनत बेदा। तिनिकरि बहुरि बखानत भेदा।
एक मांही सब जगत बिलासा। होइ रहै पुनि पावै नासा।
जे दुरजन तव भजन मिहीना। ते तहीं बसै सदा दुख दीना।
तीन चरन तव सब सुख बाने। विगत बिकार निसुध बखाने।
सोई तव दिव्य धाम मन हरना। नाम त्रिपाद अमृत श्रुति बरना।
बिस्तु परम पद पुनि परधामा। परम व्योम प्रभुपद अभि रामा।
ब्रह्मलोक वैकुण्ठ सनातन। अप्राकृत पद पदम पुरातन।
नित्य नाक निज धाम असोका। स्वरग अनंतधाम गोलोक।
अपर अयोध्या आदि खुलए। ए तव धाम नाम श्रुति गाए।68

जब-जब इस धरती पर धर्म की ग्लानि होती है तब-तब अधर्म का विनाश करने के लिये भगवान को अवतरित होना पड़ता है। रत्नहरि के रामकाव्य के अनुसार भगवान विष्णु पृथ्वी पर से पापों का भार उतारने के लिये अवतरित होते हैं। विष्णु राम के रूप में, शेषनाग लक्ष्मण के रूप में, सुदर्शनचक्र व शंख-शत्रुघ्न व भरत के रूप में अयोध्या में राजा दशरथ के घर जन्म लेते है। उनके कार्य में सहयोगी बनने के लिये लक्ष्मी भी सीता के रूप में अवतरित होती है।69 अवतार का प्रधान प्रयोजन साधुजन, ऋषिमुनि, गो, ब्राह्मण, पृथ्वी तथा देवताओं आदि का परित्राण करना ही है। असुरों और अधर्मियों का विनाश एक प्रकार से उपर्युक्त कारण का भी कारण है, क्योंकि असज्जनों के ही परिपीड़न से त्रस्त सज्जनों का उद्धार करने के लिये भगवान को अवतार लेना पड़ता है।70 इस प्रयोजन के अतिरिक्त भगवान के अवतरण का एक अन्य प्रयोजन है लीला करना। भक्तों को भक्तिरस का फल देने के लिये भगवान लीला करते हैं।71 भगवान दुष्टों का दलन भी करते हैं और अपनी रसमयी लीला के
द्वारा भक्तों को आनन्दित भी करते हैं। वे लीला ही लीला में कागभुशुण्डि एवं उन जैसे भक्तों को परमपद की प्राप्ति कराते हैं72 और लीला के द्वारा ही युवतियों को देव दुर्लभ रस प्रदान करते हैं।73 इस प्रकार रत्नहरि के राम भगवान् विष्णु का अवतार हैं। राम के साथ-साथ रत्नहरि ने भरत, व शत्रुघ्न की स्तुति भी की है।


राम और कृष्ण का ऐक्य
रत्नहरि ने राम और कृष्ण को एक माना है। विष्णु ही त्रेतायुग में राम के रूप में अवतरित होते हैं और वही द्वापर युग में कृष्ण के रूप में जन्म लेते है। इसका प्रतिपादन ‘रामरहस्य’ में वीर सिंह व रत्नालका के प्रसंग में हुआ है। रत्नालका राम को पुत्र के रूप में पाने की प्रबल इच्छा के कारण अपने पति वीर सिंह के साथ ग्यारह वर्ष तक कठोर तपस्या करती है। इस दम्पति की तपस्या और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान राम उन्हें वरदान देते हैं कि वे द्वापर युग में उनके घर कृष्ण के रूप में जन्म लेंगे।76 वास्तव में राम और कृष्ण में भेद रत्नहरि को स्वीकार्य नहीं है।77 जिस प्रभु को कौशल्या जन्म देती है वही यशोदा को भी वत्सल सुख देने के निमित्त बनते है।78 सीता और राधा को वरने वाले,79 धनुष तोड़ने वाले और पर्वत धारण करने वाले, अयोध्या और ब्रज छोड़कर जाने वाले, बाली और कंस का वध करने वाले, सुग्रीव और उग्रसेन को अपना मित्र बनाने वाले, त्रोता में अंगद को दूत बनाकर भेजने वाले और पाण्डवों के दूत स्वयं बनने वाले भगवान एक ही है। राम कृष्ण है और कृष्ण राम है। दोनों के भजन से व्यक्ति संसार से तर जाता है।80


क्रिसन सरूप बंक बपुधारी। रघुबर रमे रसिक रसभारी।
एकादस संबत सुख सेतु। बसे नंद ब्रिज रघुकुल केतु।
जो रघुनंद सोई नंदनंदा। उभै भेद भाखत मति मंदा।
ज्यों रघुनंदन चरित अनंता। तैसेई तासु सराहत संता।
अवध मधुपुरी अस थल भेदा। चरत समान बखानत बेदा।
जन्यो जु इत कौसल्या रानी। जसमत सूत उत सोई सुखखानी।
इति ताड़का बधी बार बाना। उत पुनि पीए पूतना प्राना।
इति मारीच सुभुज संघारे। उत बक अघ अघ ओघ उधारे।
इत मुनि पतिनी परस पग तारी। उत पुलिंद नंदिनि निसतारी।
(रामरहस्य अध्याय 30, पद, 17)

दोहिरा
जाइ जनकपुर जनक जाइति ब्याही बार जोरि।
उहाँ बरी बृखभानुजा मनमथ मान मरोरि।।

(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 18)

चौपई –
इति धनि धूर जटी धनु तोरा। उधर धराधरि धरयो कठोरा।
इत सिय संग सरस रस रातो। उत बृज बधू मोद मद मातो।
इति मृगया मिसि अधम उधारे। उति बृखभादि बृजजन तम तारे।
इत तज भवन गमन वन कीना। उत तजि ब्रज मधुपुरि मन दीना।
केवट कुल कलंक इत काटे। उत मलीन माली मल डाटे।
इत बिराध बस बिबुध बिकासे। उत हनि रजक असुर गन त्रासे।
इति अति रूचि भीलनि फल खाए। उत चेरी चंदन चरचाए।
इत सबरी सब रीति सवारी। उत उबरी कुबरी कुलकानी।
इत कृत सपत ताल तरु खंडन। उत कृत कृतुको दंड बिहंडन।
इत प्रभ बध्यो बालि बलवंता। उत किय कुमति कंस करि अंता।
इत सुकंठ किय कपि कुलकेतु। उग्रसेन उत कृत सुख सेतु।
इत सियहित हनुमंत पठावा। करि प्रबोध पुनि प्रभू पहि आवा।
(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 19)

दोहिरा –
उत उद्धव पठयो प्रभु, दै प्रिय प्रेम संदेस।
दै लै आयो घोख लै, समाचार सुभ बेस।।
(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 20 )

चौपई –
इत प्रभु दच्छन उदधि पधारे। उत पियोधि पच्छम पग धारे।
कियो इधर अरि अनुज अदीना। उत कुचील दारिद दल दीना।
इत प्रभु सजयो सरितपति सेतु। उत प्रियपुरी करी कुल हेतु।
बाली तनै इत दूत पठावा। निज प्रताप अरिपुर प्रगटावा।
पांडव दूत भए उत आपू। बिदित बिरंचि प्रपंच प्रतापू।
इत दससीस सदल संहारा। उत कौरवकुल कंटक टारा।
थप्यो बिभीखन इत अवधेसा। उत प्रिय पांडव करे नरेसा।
इत सिय सहित सदन निज आए। उत महि तजि निज धाम सिधाए।
उभै ओर भज्यो भू भारा। संसृत समन सुजस बिसतारा।
लीला जुगल समत्व सुहावन। पढ़त सुनत पावै पद पावन।
गंग जमुन संगम सुभ जैसें। जुग लीला संगम यहि तैसे।
रघुपति कृसन कृसन रघुवीरा। उभै भजन भंजन भवनीरा।
(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 21)

छंद –
भवभीर भंजन राम कृसन, चरित्र मित्र सुनहु सदा।
रतनालका इतिहास भल भाख्यो, भयो जिहि बिधि सदा।।
सुनि गाई समल सिराइ नर प्रभु पाइ पंकज पाइहै।
संसार जम जंजार जुत कू पार पार पराइहै।।
(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 22 )

सोरठा –
लख भव गहन गंभीर कलि दवारि दह दिसि दह्यो।
राम कृसन गुन नीर मगन रतनहरि नहि जरै।।
(रामरहस्य, अध्याय 30, छंद 23 )

वैधी भक्ति
नवधा भक्ति
श्रवण सगुण अथवा निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादिक/प्रतिपादक शब्द का कान द्वारा ग्रहण और बोध श्रवण कहलाता है।81 ज्ञान साधन के रूप में किया गया श्रवण चिंतनात्मक होता है। भक्ति विषयक श्रवण भावात्मक है। सगुणोपासक भक्त के लिये भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला और धाम का श्रवण ही ‘श्रवण’ है।82 रत्नहरि के राम-काव्य में पग-पग पर राम के नाम, रूप और गुण की महिमा गायी गयी है। रामकथा का श्रवण कलिमलनाशक, सकलमनोरथ साधक, भयहारी, और भक्तिदायक है।83 इसके श्रवण मात्र से ही परम पद की प्राप्ति हो जाती है।

रामललाम ललामगीत यह हरिललाम गुन गायो।
जिहि जिय भायो सुन्यो सुनायो तिंह सियपति पद पायो।।84

राम कथा का एक-एक अक्षर पापों के पहाड़ का ध्वसन करने वाला हैः
सौनक पूछत प्रेम सों, पुनि प्रभु कथा प्रचार।
इक इक अछर जासु पवि, पाप पहार विदार।।85

इतना ही नहीं राम-कथा समग्र श्रुतियों का गंभीर रहस्य अपने में समाए है, यह परम पुनीत, अमृत से भी अधिक मीठी86 और संजीवनी बूटी के समान प्रभावकारी है।87 इसलिये इसका श्रवण करने से राम के चरणों में प्रीति बढ़ती है। ऐसी राम कथा के लिये रत्नहरि ने ‘राम रहस्य’ में सूत-सौनक संवाद की योजना की है और ‘रामललामगीत’ में प्रत्येक काण्ड के अंत में कथा के श्रवण के माहात्म्य की प्रतिष्ठा
की है।
कीर्तन - सगुण अथवा निर्गुण भगवान के बोधक शब्द का उच्चारण ‘कीर्तन’ है।88 रत्नहरि के राम काव्य में राम-कथा के कीर्तन को भी विशेष महत्व दिया गया है। राम के गुण, नाम, लीला, धाम के विषय में पढ़ने से धन, मति, सुत, आदि सब सुख प्राप्त होते हैं, पुण्य और कीर्ति मिलती है, दुःख और दोष मिट जाते हैं, प्रभु के चरणों में प्रीति बढ़ती है और परम पद की प्राप्ति होती है।89 शिव और ब्रह्मा आदि देवता, सनकादि मुनिजन, और अनेक जोगी ये सब राम का ही कीर्तन करते है।90 गुणातीत प्रभु के गुणगान से समस्त पाप नष्ट हो जाते है।91 और परम आनंद की प्राप्ति होती है क्योंकि राम का चरित सुधा के समान है।92 इसके विपरीत मनुष्य जन्म पाकर भी प्रभु का गुणगान न करने वाले मूर्ख हैं :

(1) मानुख जनम पाइ जन जोई। राम न भजै मंदमति सोई
वंचित कियो बिघाता बौरा। रामहि तजै मजै जो औरा।93

(2) जीहि पाई जिनि राम न गाए। वृथा जनम जग जीवन जाए।
ते मति मंद मुकति सो पाना। पाइन भए अरूढ़ अजाना।94

जबकि सवेरे-सवेरे उठकर भगवान का भजन करने वाले सहज ही संसार से
पार हो जाते हैं जैसे कि सूर्य उदय होने के साथ अंधकार नष्ट हो गया हो :

भोरहिु भगवत भजन जन, करि पावत भव पार।
तरै तुरत तम ज्यों, तरु न तमारि निहारि।। 95

इस कीर्तन में भी सबसे बड़ा जाप ‘राम नाम’ का है, जो सब श्रुतियों का सार है, मन की आंख खोलने वाला है, नित्य ‘राम-राम’ जपने वालों को मुक्ति और मुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। नित्य राम का जाप करने वाला व्यक्ति संसार के सब प्राणियों से श्रेष्ठ होता है। राम-नाम जपने से ही कलियुग के विषय-विकारों में गढ़े हुए, नीच मनुष्यों का उद्धार हो जाता है। निगम, आगम और पुराणों में भी ‘राम-नाम’ की सर्वोच्चता सिद्ध है।96

राम का नाम करोड़ों पापों को नष्ट करने वाला है। सीता-राम-नाम जपने से ही गणिका, गज, गीध, व व्याव पापों के घेरे से मुक्त हो गये। वाल्मीकि जैसे तो ‘राम’ का उल्टा नाम लेने से ही परमधाम को चले गए, इसलिये रत्नहरि अपने मन को भी राम-नाम जपने के लिये समझाते है।

सीता पति दसरथ सुत जप रे मन मेरे।
कोटि कोटि जनमन के पाप कटै तेरे।
गनिक गज गीध व्याध पापन के घेरे।
सीता राम नाम सेत पाप किये बेरे।
उलटा नाम लेत बाल्मीक से लुटेरे।
सीता राम परमधाम जाइ किए डेरे।
कूर कुटिल कपटी हम सारखे घनेरे।
रतनहरि राम कहत काटे भव बेरे।97

स्मरण - भगवान के नाम, रूप, गुण और लीला की स्मृति ‘स्मरण’ भक्ति है।98 रत्नहरि भी राम भक्ति में राम के ध्यान की प्रतिष्ठा करते हैं :

सुनि पुनि ध्यान सकल सुति सारा। जिहि कर नर पावत भव पारा।
अवध नगर सब भांति सुहावा। तिहि मधि मनि मंडप मन भावा।
तिंहि कल कलप बिटपि भल भ्राजा। तिंहितर रतन सिंघासन राजा ड्ड
तिंहि मधि वसुदल कमल अनूपा। बिबिध रतन रजित रुचि रुपा।
तहं निज जननि गोद गत रामा। इंद्र नील मनि सुंदर स्यामा।
मृदुल मंजु मूरति मन मोहन। दामिनी बरन बसन सुभ सोहन।
भाल सुढाल बिसाल बिलोचन। झलकत अलिक तिलक गोरोचन।
चिवुक सुबक सुंदर श्रुति नासा। सूर सहस सत सरिस प्रकासा।
मंद मंद मुसकानि मृदु, मरदति मनमश मान।
मुकरगंड मंडित प्रभा, मुकुलित मोद महान ड्ड
रतन करीट कलित कमनीया। कंठ-कंठ भूखन रमनीया।
कुंडल लोल कपोलन झलकैं। मुक्त माल कौ सुभ छब छलकें।
कर कंकन किंकनि सुहाई। कल के चूर भूरि छवि छाई।
उर श्री बतस सुभग श्री सावा। बाहु बच्छ बलि बिसद बिसाला।
मनि मंजीर मंजु मन मोहन। हाटक कटक लटक जीय जोहन।
चरन सरोज सने सुभ सोभा। नखर नवल अवली मन लोभा।
यहि प्रभु ध्यान सकल सुख रासी। कलिमय कोट कलन कल कासी।99
राम के चरणों का एक बार स्मरण करने से ही मनुष्य भव-सागर से पार हो
जाता है :

एकहुं बार कबहुं जिन ध्याए। संसृति सिंधु पार तिनि पाए।100

इस प्रकार रत्नहरि ने ‘भागवत’ व ‘मुक्ताफल’ की भांति ही श्रवण, कीर्तन के साथ ‘स्मरण’ का निरुपण भी किया है। भक्ति एक मानसिक स्थिति है, अतएव उसके उपर्युक्त कायिक अंगों (रूपों) के साथ स्मरण का योग भी अपेक्षित है। अतः भागवत के अनेक अध्यायों में इन तीनों का साथ-साथ उल्लेख किया गया है।101 जब रत्नहरि राम-कथा की महिमा का वर्णन करते हैं, तब उसमें श्रवण, कीर्तन और स्मरण तीनों का ही भाव अंतर्निहित रहता है।

पादसेवन - जीव गोस्वामी ने कहा है कि पादसेवन में ‘पाद’ शब्द का प्रयोग केवल भक्तिवश हुआ है। देश, काल आदि के अनुसार की गयी भगवान् की परिचर्या ‘सेवा’ है। भगवान की मूर्ति का दर्शन, स्पर्श, परिक्रमा, मंदिर गमन, तीर्थ स्थान आदि भी पाद-सेवा के अंतर्गत ही आते है।102 रत्नहरि ने भगवान राम, उनकी प्रतिमा, अन्य देवताओं, पार्षदों, भक्तों, गुरु आदि की सेवा का अनेकशः वर्णन किया है। रत्नहरि ने स्वयं ब्रज, अयोध्या, चित्रकूट आदि अनेक तीर्थों की यात्रा की थी। स्वयं राम अपने अनुजों सहित, अपनी-अपनी पत्नियों के साथ तीर्थाटन करते हैं।103 लक्ष्मण-उर्मिला संवाद के द्वारा रत्नहरि ने अयोध्या के तीर्थों की महिमा का गान किया है :

सरजू तीर तीरथ बर जेई। सुनि सुंदरि बरनौ तुहि तेई।
सहसधार तीरथ अति पावन। यहि तुमरे सममुख जु सुहावन।
तिहिं ते पच्छिम ओर सुनैना। राम राज तीरथ सुख दैना।
उभै मध्य अघमोचन नामा। बिदित सुतनु तीरथ अभिरामा।
पूरब दिसि तीरथ जु सुहावा। तीरथ कोटि अधिक श्रुतिगावा।
स्वरग द्वार जिहि नाम बखाना। जहं नित मज्जन मम मन ठाना।
सुमुखी सदा सरजू सरि मांही। सेस रूप हौं बसौं जहाँ ही।104

इन तीर्थों में नित्य स्नान करने से व्यक्ति को परमधर्म की प्राप्ति होती है।105 रामनवमी’ के दिन पांच पापियों द्वारा अयोध्या के तीर्थ स्थानों की यात्रा करने व सरयू नदी में स्नान करने से उनके महापाप नष्ट हो जाते हैं।106 सरयू में नहाने से देवता भी पवित्र हो जाते हैं107 क्योंकि उसका संबंध राम से है।

अर्चन - विधि विहित पूजा को अर्चन कहते है।108 ‘अर्चन’ शब्द प्रतिमापूजन का समशील है। प्रतिमा आदि पर पुष्प आदि अर्पित करने का व्यापार, जो भगवत्प्रीति का हेतु होता है, अर्चन कहलाता है।109 रत्नहरि ने स्वयं राम से शिव की विधिवत पूजा करायी है और शिव भी राम की अलौकिक महिमा का गान करते हैं।110

वंदन - पूजा के बहिर्भूत नमस्कार को वंदन कहते है, यह नमस्कार गुरू, शालग्राम, प्रतिमा, भगवान और भगवद भक्तों को किया जाता है।111 ‘वंदन’ का अर्थ स्तुति भी है।112

रत्नहरि के मुख्य वंदनीय राम है। परंतु उनके द्वारा किये गए ‘वंदना’ का क्षेत्र बहुत व्यापक है। अपने ग्रंथों के आरंभ में रत्नहरि ने गणेश, राम, और सिख धर्मानुसार ‘एक ओंकार’ की वंदना की है। ‘रामरहस्य’ के आरंभ में उन्होंने गुरू नानक,113 गुरू ब्रह्म अचल,114 अयोध्या,115 गुरू जयगोपाल,116 और श्री राम की वंदना117 की है। ‘रामरहस्य’ में अनेक स्तुतियाँ भी ग्रंथित हुई हैं। इनमें मुख्य इस प्रकार है ब्रह्मा शंकर आदि देवताओं द्वारा अयोध्या में आकर राम की स्तुति,118 दशरथ द्वारा सरयू की स्तुति,119 यमराज के द्वारा अयोध्या की स्तुति,120 दशरथ द्वारा सरयू की
स्तुति,121 राम द्वारा महिख का उद्धार करने पर महिख द्वारा राम की स्तुति,122 आदि। इनमें भक्ति और काव्य की सरस त्रिवेणी आपूर है। इतना ही नहीं रत्नहरि ने तुलसी की भांति राम से शंकर की वंदना भी करवायी है।123 राम अयोध्या की वंदना करते हैं :

वंदनीय यह नृपति नंदिनी, वन्दो धरि धर माथा।
यौं कहि किय बंदन रघुनंदन, जनक सुनंदिनी साथा।। 124

दास्य-भक्ति भगवान स्वामी है, मैं उनका सेवक हूं अनन्य भाव की इस अटल मति को दास्य कहते हैं।125 रत्नहरि की भक्ति में दास्य-भाव भी परिलक्षित होता है। अयोध्या के निवासी इसी भाव से राम वन गमन के समय उनके पीछे-पीछे जाते हैं।126 निषाद को राम अपना मित्र मानते है किंतु निषादराज स्वयं को उनका दास ही स्वीकार करते हैं :
पुनि धरि धरि वीर रघुपति प्रति अतिहित विनै बखानी।
यह सब राज समाज साज रघुराज रावरो जानी।।
बिबिध विलास हुलास हास रस रास करहु मन भाए।
हम सब दास खवास खास सुखरास लेहु अपनाए।। 127

भरत अपने को राम का बिना दाम का दास कहते हैं।128 सुमित्रा लक्ष्मण को
दास्य भाव से राम की सेवा करने की ही शिक्षा देती है।129 शंकर जी भी राम के दास भक्त हैं :

सदा करहु मम मनसि निवासा। प्रभु मुहि जानि परम निज दासा।130
इसके अतिरिक्त केवट,131 जटायु132 और हनुमान133 की भक्ति भी दास्य भाव की है। स्वयं रत्नहरि राम के चरणों के दास ही बने रहना चाहते हैं :

रघुबर चरन सरन सुख दाइक क्यों न गहे मन मेरे।
जनम जनम के संचित सगरे पाप बिनासहि तेरे।
जिन चरनन की सरन लियें ते उधरे पतित घेरे।
अजामिल गनिका गज गीधन हरिपुर कीए बसेरे।
जिन चरनन की रेनु परसि मुनि पतनी तरी सवेरे।
भीलू भालू बानर रजनीचर काटि गए भव बेरे।
कोटि कलंक कटे कुमतिन के जिन चरन के हेरे।
रतनहरी यह जान भए हम इन चरनन के चेरे।134

रत्नहरि ने राम के अतिरिक्त सीता जी से भी दास्य भक्ति की कामना की है :

रत्नहरि कहा बखानिए बरनहूं न बोलि जानै
चरन सरन मात मोहि राखो जन जानै।। 135

सख्य - रत्नहरि ने भक्त और भगवान् के जिन संबंधों की कल्पना की है ‘सख्य’ भी उनमें से एक है। सख्यभक्ति स्वरूपतः रागानुगा है। अतः इसके विधि मार्ग अनपेक्षित है।136 इसमें बंधुभाव की प्रधानता है। भक्त की यह भावना विश्वास का ही परिणति है। राम ने सुग्रीव के साथ मित्रता की137 सुग्रीव राम को मित्र के रूप में प्राप्त करके अपने भाग्य की सराहना करते हैं।138 सख्य के दो प्रकार हैं मित्रवृत्ति और विश्वास।139 जहाँ भक्त के बंधुवत् व्यवहार की चर्चा की गयी हो वहाँ मित्रवृत्ति-सख्य मानना चाहिये। रत्नहरि के राम काव्य में राम के अधिकांश सखाओं का व्यवहार दासवत् है, इसलिये उसमें इस प्रकार की सख्य भक्ति का निरूपण अपेक्षाकृत कम है। ‘रामरहस्य’ में राम के सखाओं का निरूपण मित्रवृत्ति का, उदाहरण माना जा सकता है।140 इसमें राम अपने भाइयों के साथ और भाइयों का राम के साथ व्यवहार भी सखा के समान ही रहता है। चारों भाई मिलकर गेंद से खेलते है,141 उनमें गेंद को पकड़ने की होड़ लगती है।142 सरयू नदी के किनारे लक्ष्य-बेध के लिये इकट्ठे जाते हैं और वहाँ पर लक्ष्य बेधन का अभ्यास करते हैं।143 अपने भाइयों और सखाओं के साथ आखेट के लिये जाते हैं।144 रत्नहरि ने भगवान् के प्रति अपने भक्ति-भाव का सखा की भांति अनौपचारिक ढंग से निवेदन भी किया है। ‘रामललामगीत’ में तुलसी की मर्यादा पद्धति का अनुकरण करने वाले रत्नहरि ‘विनय बारही’ व ‘रघुवर पदरत्नावली’ में सूर की भांति भगवान् के साथ खुलकर तकरार करते हैं :

(1) प्रभु हौ बारहिबार पुकारयो।
मेरी अरज न सुनी अरजमति कहा बिचार बिचारयो।
दीन दीनता दरन नाम धरि मम दीनता न दारी।
हों ही दीनन दीन दया निधि के प्रभु ही प्रनहारी।
याको निरनै कौन करैगो कहिये क्यों न जनाई।
जौं कहिहौं कोऊ और रतनहरि तों आपहि पै आई।145

(2) मेरी बेर हेरि राम देर क्यों करी। बेर बेर टेर रह्यो कान न धरी।
जल बूडत बारन की आप दाहरी। सू आक पढाए नाथ गनिका उधारी।
द्रोपदी पुकारी जब दीन बंधु हरी। द्वारिका तें दौरि नाथ हाथ दे उबरी।
पल में प्रहलाद हेत प्रकटे नरहरी। गौतम की धरनि तुमरे चरन लगीतरी।
वानर खल भील तरत ढील न परी। द्वार परयो तरयो किंउ न दीन रतहरी।। 146

कहीं-कहीं तो भाव की उन्मुक्तता की सुंदर निदर्शना हुई है :

प्रान प्यारे यार हमारे दसरथ राज दुलारे कबी आरे।
चंद उजियारे रूप तिहारे नैन हमारे होइ रहे तारे रतनहरि बलिहारे बारे।। 147

कार्पण्यम्
अपनी अभिव्यक्ति में रत्नहरि ने अत्यन्त दैन्य का प्रदर्शन किया है। उनका यह दैन्य ही भक्ति को रसिकता की सीमा का उल्लंघन करने से रोकने में अंकुश का कार्य करता है। रत्नहरि का दैन्य उनकी ‘विनय बारही’ और ‘रघुवर पद रत्नावली’ में मुख्य रूप से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें अपने उद्धार के लिये जप, तप, व्रत, तीर्थ, ज्ञान, ध्यान, पुराण और वेद पर भरोसा नहीं है, बल्कि राम ही उन्हें पतित से पावन बना सकते हैं।148 इसलिये वे अत्यन्त विनय के साथ अपने को काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से रहित करने के लिये राम की करुण-दृष्टि की प्रतीक्षा करते हैं।149 इस संसार के दुःखों से छुटकारा पाने के लिये उन्हें राम के सहारे की ही चाह है।150 अपनी अशांत, विषय विकारों में फंसी हुई स्थिति और दुर्दशा से बचने के लिये राम से ही निवेदन करते हैं।151

आत्म निवेदन
वैष्णवाचार्यों ने आत्मनिवेदन, शरणागति, प्रपत्ति और न्यास शब्दों का व्यवहार समान अर्थों के रूप में किया है। भक्ति शास्त्र के आचार्यों ने शरणागति के छः भेद स्वीकार किए हैं (1) आनुकूल्यस्य संकल्पः (2) प्रातिकूलस्थ वर्जनम् (3) रक्षिष्यतीति विश्वासः (4) गोप्तृत्वे वरणम् 卌 आत्मनिक्षेपः (6) कार्पण्य। रत्नहरि के ‘राम-काव्य’ में आत्मनिवेदन के उपर्युक्त सभी रूप मिल जाते हैं। रत्नहरि अपने मन को समझाते हैं कि हे मन, काम, क्रोध, मद आदि विकार मोहने वाले है, इनमें ही सारी आयु बिता कर अंत में दुख मिलता है। इसलिये अब समय को पहचान कर स्थिर मन से राम की शरण में ही लग जाओ, उन्हीं के अनुकूल रहो।152 इस अनुकूल संकल्प के साथ ही रत्नहरि ने भगवान के प्रतिकूल की वर्जना की है। सीता रावण को राम से विमुखता छोड़ने को कहती है।153 हनुमान154 और विभीषण155 भी रावण को समझाते है कि राम की प्रतिकूलता छोड़ दे। स्वयं रत्नहरि जब राम के प्रति अपनी अनन्य और एकनिष्ठ भक्ति प्रदर्शित करते हैं तो उसमें भी राम की प्रतिकूलता की वर्जना स्वतः ही समायी हुई होती हैः

रघुबर तुमरेई दास कहाऊँ।
तुमरोई नाम जपों निस बासर तुमरोई गुन गाऊँ।
तुम ही मेरे प्रान जीवन धन तुम तज अनत न जाऊँ।
तुमरेई चरन कमल को मधुकर रतनहरी सुबपाऊँ।। 156
भगवान में रक्षक के रूप में विश्वास और उनका रक्षक के रूप में वरण भी रत्नहरि के काव्य में अभिव्यक्त हुआ है। दण्डक वन के ऋषि157 और बैखानस आदि ऋषियों की भक्ति इसी भाव की है।158 कौए का रूप धारण करके सीता के तन पर चोंच मारने वाला जयंत159 और लंका पार करने से पूर्व अपनी उद्दण्डता दिखाने वाला सागर160 भी अपनी रक्षा के लिये अंततः राम से ही विनय करते हैं। राम की शरण में जाने पर ही राम उनकी रक्षा करते हैं। रत्नहरि अपने पापों के खंडन के लिये राम से विनय करते हैं।161 इस प्रकार भगवान का रक्षक का रूप में वरण करने के पश्चात रत्नहरि स्वयं को भगवान के चरणों में न्यस्त करते हुए भगवान राम को ही अपना सर्वस्व स्वीकार कर लेते हैंः

काहू के धान बाम सेवक सुखदाई।
सुत बित्त परिवार मेरे सरबस रघुराई।। 162

वास्तव में रत्नहरि के विनय संबंधी पदों में विशेष मार्मिकता है। उनकी राम के प्रति उत्कट भक्ति भावना और अपने उद्धार के लिये हृदय की व्याकुलता और आतुरता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उनका यह आत्मनिवेदन और दैन्य तुलसी से मिलता है। किंतु काव्य की जो रमणीयता, भक्तिरस का जो प्रवाह, कला की जो मर्मस्पर्शिता, तुलसी की दीनता ‘विनय पत्रिका’ में है, वह रत्नहरि की ‘विनय बारही’ में नहीं है। इसका कारण संभवतया तुलसी के दैन्य निरूपण की विशदता है। ‘रत्नहरि’ की ‘विनय-बारही’ में कुल 12 पद है। जो दैन्य निवेदन में भक्त की हीनता, असमर्थता, पाप आदि पर विशेष बल देने के साथ-साथ भगवान की महिमा को भी समान रूप से अभिव्यक्त करते हैं। किंतु चाहे रत्नहरि की ‘विनय’ व ‘दैन्य’ चाहे तुलसी के समान विशद और व्यापक नहीं है, किंतु जहाँ कहीं भी उन्होंने आत्मनिवेदन और दैन्य की अभिव्यक्ति की है, वह तुलसी के समान ही मर्मस्पर्शी और प्रभावोत्पादक है।

रागानुगा भक्ति - माधुर्यभाव
ईश्वर के साथ प्रेम किसी न किसी संबंध के आधार पर किया जाता है। भक्तिशास्त्र के आचार्यों ने यह संबंध पाँच प्रकार का माना है शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य और माधुर्य। रत्नहरि की भक्ति में माधुर्य भाव को विशेष स्थान प्राप्त है। राम सीता की प्रणय लीलाओं का वर्णन वे तन्मयता के साथ करते हैं। उन्होंने राम-सीता के वनविहार, प्रणयवार्ता, हिंडोरा, वर्षां में प्रेम-लीला, जल-केलि, होली, वसंत, दीपमात्कोत्सव और सीता की मानलीला का चित्रण बड़े रसपूर्ण ढंग से किया है, जिनके कतिपय उदाहरण निम्नलिखित हैं :


वन-विहार
निरखि जनकजा हिय हुलसानी। सुमन च्यन मनसा मन आनी।
सियमुख सरसिज सौरभ पाई। भ्रमर भीर भुंकारति धाई।
सनमुख मुख रसिली मुखभाला। निरखि भजी भै भीत बिसाला।
लगी धाई रघुनाइक अंका। भुजनि भजावत भंवर ससंका।
रामहिं मिलति लसी इम बाला। कनिक लता जिम लगी तमाला।
प्रियहिं लगाई हिये सुखकंदा। बोले बिहसि रसिक रघुनंदा।
मिलति आपहि मोहि बलिहारी। दियो आज परमानंद प्यारी।
सुनि पिय व्यंग बचन बरबदनी। बिहसि मंद कुंद कल रदनी।
तब प्रसून भूखन मन भाए। बिहसि सप्रेम प्रियहि पहिराए।
इहि बिधि होत बिनोद बिलासा। भागिरि असत दिनेस निवासा।163
सीता-मान-लीला

बैठी कुंज कोन कहूँ जाईं। चिंता चकित सखिन लख पाई।
सखि सब सोच मगन ह्वै गई। रघुपति प्रिया कुपित क्यों भई।
सोचि मलिन मुख नलिन निहारी। प्रिय सहचरिन भयो भै भारी।
चितवहिं चकित चतुर चहुं पासा। करि न सकहिं कछु बचन बिलासा।
बीरी दई बनाई न खाई। मधुर हसनि हेरनि बिसराई।
हास बिलास बिबिध बिधिबैना। सुनति न हंसति नलिन नव नैना।
करि बहु जतन जुवतिजन थाकी। करि दृग तरलित तदपि न ताकी।164

हिंडोरा
तब सुभगदि सखिन मन भाए। हरिखिहिं डोरे राम चढ़ाए।
पुनि प्रिय अंक बंक मृगनैनी। अरपि सिय सकुचित पिकबैनी।
मिलि दम्पति उपमा इम उमड़ी। जनु मिलि छटा घटा घन घुमड़ी।
सो छबि निरखि सखिन तृन तोरे। कोटिक मनमथि मान मरोरे ड्ड165

वर्षा में प्रेम-प्रसंग
भीजति प्रियहिं निरखि अवधेसा। निज पट ओट करत रसिकेसा।
सिय पुनि निज छादन छबिसदना। हसि सप्रेम पोंछति पिय बदना।
पुनि पुनि पोंछि अमोल कपोलनि। सुरझावति लट कुंडल लोलनि।
इहिं मिस परसि परसि प्रिय अंगा। करति कलोल लोल पिय संगा।
कबहुं बिहसि पिय बदन विलोकति। करि पट ओट बूंद बल रोकति।
प्रभु अपि हसि निज पंकज पानी। पौछत सिय मुख पंकज पानी।
... ... ...
बार बार निरखत रघुराई। सुमुखि सुमुख सुखमा सुखदाई।
सारी सुरंग सुतन लपटानी। रही न अखिल अंग छबि छानी।
असित अलिक तजि निज कुटिलाई। मिली अमंद उरोजनि आई।
तिनि मग परत बूंद बर नारी। जतु मुकता उगलित अहिनारी।
अंग अंग सोभा सरसानी। निरखत राम रसिक रस मानी।166


दीपमालकोत्सव
पुनि जानकी संग तजि ब्रीड़ा। लगे करन कल कैतव क्रीड़ा।
खेलि खेलि खिलि खिलि रसरीति। हारे राम जनकजा जीती।
तब रघुबंस हंस हसि बानी। बोले विनय प्रनभ रस सानी।
तुम जीत्यो मुहि महिप दुलारी। चाहहु जु दाउ देऊं सोइ प्यारी।
सुनि पिय बचन बिनय मृग लोचनि। बोली बिहसि रहिसि रसरोचिनि।
जो मुहि देउ सु दाउ दयाला। मनबांछित ले हों नृपालाला।
प्रभु मुख कमल मधुर मधु पाना। करौं यथा रुचि यहि मन माना।167

होली
सिय रघुबर खेलत रंग होरी। मलि गुलाल गालनि दुहु ओरी।
खेलति बढ़ी परस्पर रारी। इति रघुबर उत जनक दुलारी।
तब रघुबीर बिहसि बर जोरी। सिय सहचरी सगल रंग बोरी।
सिय कर कमल कनिक पिचकारी। गहि भिजये रघुबंस बिहारी।
तब दुति दौरि रसिक रघुराई। बरबस नहीं जनकनिप जाई।
रंग कुंड गहिरे गहि बोरी। बिहसे कहि हो हो हो होरी।168

जल केलि
जल कल केलि करन रघुराई। प्रविसे सखि समाज सुखदाई।
सोहति सियहिं दिये गलबहियाँ। रति रति रमन मनहु महि महियाँ।
सखि समूह सोहति चहुं पासा। करति बिबिध बिधि बारि बिलासा।
तिन मिलि राम करत कललीला। ज्यों गजराज गजीगन मीला।
इन्द्र नीलमनि सुंदर स्यामा। नवल नलिन लोइन अभिरामा।
सिंचहिं सलिल सकल मिलि मिलिकै। करि कनि कैलि कामिनि खिलि कैं।169

बसंत
नवल बसंत निरखि श्री जानकी राम रूप रस सों सरसानी।
नितप्रति नव अनुराग लत। रघुनाथ कलपतरु सों लपटानी।
कह्यो न परत रस रूप दुहन के बरनि बरनि सारद सकुचानी।
रतनहरी यह सुंदर जोरी सदा रहों मेरे हिय मंडरानी।170

उपर्युक्त उद्धरणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रत्नहरि के रामकाव्य में माधुर्य भक्ति चरम रूप में प्रस्फुटित हुई है। रत्नहरि ने अपने रसिक होने के विषय में स्वयं लिखा है
जानि कठिन कलिकाल, कुटिल कुतरक कुचाल कृत।
रामरहस्य, रसाल, रसिक रतनहरि रम रहे।। 171

रत्नहरि के माधुर्य की रसिक साधना ‘रसिक-सम्प्रदाय’ से इस रूप में भिन्न है कि उन्होंने कहीं भी रसिकता के नाम पर अश्लीलता का प्रदर्शन नहीं किया है। राम-सीता की प्रणय लीलाएँ वासनात्मक नहीं है अपितु रसिक भक्तों के आकर्षण का केन्द्र हैं। इसीलिये ऐसे प्रसंगों के अंत में राम-भक्ति से हीन व्यक्तियों के लिये इन्हें पढ़ना अथवा सुनना वर्जित किया गया है।

3.2.6. कामानुगा भक्ति
रत्नहरि ने कामानुगा-भक्ति का निरूपण ‘रामरहस्य’ में किया है। कौशल्य के महल में काम करने वाली दासियाँ भी अपना मन और नैन राम के रूप-सागर के समक्ष हार बैठी हैं। उन्हें इस बात की शिकायत है कि राम सुबह होते ही अपना धनुष-बाण उठाकर अपने सखाओं के साध नदी के किनारे खेलने चले जाते हैं, इस कारण उन्हें राम के संसर्ग का लीला-रस नहीं मिलता। राम से केलि करने के लिये उन्हें रोकना आवश्यक है और राम को रोकने के लिये वे धनुष उठाकर छिपा देती है। प्रातः उठकर शृंगार आदि करने के अनन्तर राम धनुष उठाकर लाने के लिये लक्ष्मण को भेजते हैं। किंतु धनुष हो, तब तो मिले।172 सखियों की प्रीति को राम समझ जाते हैं और उनके मन की बात पूरी करने के लिये अनजान बनकर धनुष ढूंढ़ने का नाटक करते हैं :

सुनत सुमित्रा, सुत बचन, बिहसे राम-सुजान।
चैन दैन जुवति जननि, भए सुजान अजान।। 173

युवतियों की प्रीति की तीव्रता देखकर राम उन्हें लीला सुख देते हैं

बिहसित लखी सखी इक स्यामा। दौर गही इम कहि धन स्यामा।
तै निखंग धनु धरे दुराई। खोजत चतुर चोरटी पाई।
तासु गहन लखि सकल परानी। हसि हसि बात करती मनमानी।
जो प्रभु गही कही तिन प्यारे। मैं न लखे धनुबान तिहारे।
झूठेहिं मोहि दोस जिनि देहू। जिनि हरि धरे तिनहिं गहि लेहू।174

इसी प्रकार अन्य सखियों से भी पूछते हैं पर वे धनुष का पता नहीं बताती
और राम के साथ छेड़-छाड़ का आनन्द लेती हैं। लेकिन कुछ चतुर युवतियाँ इससे
भी आगे बढ़ जाती है :

रघुबर मम भृकुटि धनु लेखा। ईछन तीछ न बान बिसेखा।
इनसन करहु केलि तुम प्यारे। सुनि तिहिं तजि प्रभु अनत पधारे।
पुनि हसि गहि अपर नव नारी। श्रीफल पीन पयोधर वारी।
कहयो तांहि सम दै धनु बाना। सो हसि बोली सुनहु सुजाना।
धनुख बान जानहु तव नाहीं। कंदुक जुग कंचुकि मम मांही।
केलि करहु तिन सन मन मानी। करि हौं कहाँ कठिन धनु तानी।
सुनि तिहिं बैन मैन रस साना। तिहि तजि तुरत भगे भगवाना।175

इतना ही नहीं काम से जली छाती को शीतलता पहुँचाने के लिये एक युवती राम को सूने सदन में ले जाकर आलिंगन और चुंबन करती है:

सुनि प्रभु बचन बदन बरबारी। बोली बिहसि मदन मतवारी।
भीतर भवन चलहु मम संगा। जह धरे असि धनुख निखंगा।
यौ करि चतुर चेरि चतुराई। जगमोहन मोहन लिए लाई।
ले गई सून सदन मदमाती। मनसिज जरी छुडावन छाती।
तहं भामिनि भेटे धरि अंका। कियो बदन चूमन बिन संका।176

इस प्रकार सभी युवतियाँ राम के साथ अपनी मनचाही क्रीड़ा करती हैं। और राम भी उनकी प्रीति परख कर अनजान बने वैसा ही नाटक करते हैं। हर युवती से वे ठगे जाते है, इनसे उनके भोलेपन की झलक मिलती है, वे सूरदास के कृष्ण की तरह केलि-क्रीड़ा में स्वयं हिस्सा नहीं लेते, जो कुछ भी करती हैं, युवतियाँ ही करती हैं। राम तो बस प्रीति की रीति निभाने के लिये अनजान से बन कर उन्हें अपने साथ क्रीड़ा करने का सुख देते हैं। वे उनके प्रेम के वशीभूत हैं। इस कामानुगा भक्ति द्वारा रत्नहरि ने यह सिद्ध किया है कि जो भगवान मुनियों के बहुत प्रयास करने पर भी ध्यान में नहीं आता, उसे इन युवतियों ने इस प्रकार नाच नचा दिया। यह प्रसंग ‘रसखान’ की गोपियों से भी मिलता है, जो कृष्ण को छछिया भरि छाछ पे नाच नचाती हैं। ‘इस प्रकार जिस प्रभु को शंकर और ब्रह्मा मौन रहकर ध्यान में लाते हैं, उसे ही सखियों ने खेल-खिलौना’ बना लिया क्योंकि प्रेम के आगे राम विवश हो जाते है: वेद और पुराणों में भी प्रेम की महिमा का गान है, प्रेम हरि-वशीकरण मंत्र है।177 इसीलिये कौशल्या के महल की युवतियाँ राम के साथ मनमानी करने में सफल रहीं। रत्नहरि के आराध्य राम हैं जो विष्णु का अवतार हैं। वे शील, शक्ति और सौंदर्य से सम्पन्न हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उनके राम काव्य में शांता भक्ति, दास्य भक्ति, साख्य भक्ति, वात्सल्य भक्ति और मधुरा भक्ति आदि भक्ति के सब रूप मिल जाते हैं। उन्होंने अपने-अपने काव्य में राम-सीता की प्रणय लीलाओं के चित्रण के माध्यम से अपना भक्ति भाव व्यक्त किया है। उनकी भक्ति का यह रूप रसिक सम्प्रदाय और कृष्ण भक्ति कवियों की रागानुगा भक्ति से प्रभावित जान पड़ता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची
1. डॉ उषापुरी विद्यावाचस्पति, भारतीय मिथक कोश, पृ. 31
2. डॉ उदयभानु सिंह, तुलसी दर्शन मीमांसा, पृ. 259
3. भागवतपुराण, 3/25/32
4. भागवतपुराण, 3/29/11-12
5. श्रीमद् भागवत, 1/2/6
6. गीता, 18/65
7. शांडिल्य भक्तिसूत्र, 1/1/2
8. नारद भक्तिसूत्र, 1 से 6
9. हरिभक्तिरसामृतसिंधु, 1/1/11
10. भक्ति रसायन, 1/3
11. भक्तिरसायन, 2/57
12. डॉ वर्मा,हरिश्चचन्द्र, तुलसी साहित्य में नीति, भक्ति और दर्शन, पृ. 76
13. डॉ शुक्ल,रामचन्द्र, चिंतामणि (पहला भाग), पृ. 27
14. गीता, 18/54
15. ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ड्ड-गीता, 9/29
16. गीता, 9/30-31
17. वही., 9/32
18. वही., 9/34
19. डॉ वर्मा,हरिश्चन्द्र, तुलसी-साहित्य में नीति, भक्ति और दर्शन, पृ. 77
20. डॉ सिंह, उदयभानु, तुलसी-दर्शन-मीमांसा, पृ. 263
21. वही, पृ. 263
22. वही
23. भागवत पुराण, 4/29/44, 6/3/22
24. चैधरी, रामस्वरूप ‘अभिनव’, मधुररस-स्वरूप और विकास, भाग-1, पृ. 112
25. वही., भाग-1, पृ. 112
26. वही. पृ. 112
27. बोपदेव, मुक्ताफल, पृ. 83-90
28. रूपगोस्वामी, हरिभक्ति रसामृत सिंधु, 1/2-4
29. नारायणतीर्थ, भक्ति चन्द्रिका, पृ. 148-153
30. सिंह,उदयभानु, तुलसी दर्शन मीमांसा, पृ. 274 से 282 तक
31. द्विवेदी, हजारीप्रसाद, सूर साहित्य, पृ. 30
32. मिश्र, भुवनेश्वरप्रसाद, रामभक्ति में मधुर उपासना, पृ. 2
33. रामरहस्य, अध्याय-1 छंद सं. 8
34. वही, अध्याय-40, छंद सं. 12
35. वही, अध्याय-29, छंद सं. 11
36. सिंह, उदयभानु, तुलसीदर्शन मीमांसा, पृ. 294
37. वही, तुलसीदर्शन मीमांसा, पृ. 294
38. असुर अधम कर अधम मरन तें वर रघुवर कर मरना।
यहि विचार करि कह्यो कूर सों जो तुम कहो सु करना।।
रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, विश्राम तीन, पद सं. 23
और देखिये, रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, तृतीय विश्राम, पद सं. 11, 18, 19
39. निरषि मधुर मूरति रघुघुर की उर की बिथा बिसारी।
रामललामगीत, किष्किंधाकाण्ड, विश्राम प्रथम पद सं. 39
40. रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, तृतीय विश्राम, पद सं. 32, किष्किंधाकाण्ड, प्रथम
विश्राम, पद-41
41. यथा वैरानुबंधेन भत्र्यस्तान्मयतामियात्।
न तथा भक्तियोगेन इति से निश्चिता मतिः ड्डभागवतपुराण, 7/1/26
42. रामरहस्य, अध्याय-15, छंद सं. 2
43. वही, अध्याय-15, छंद सं. 3
44. वही, अध्याय-15, छंद सं. 5
45. उदयभानुसिंह, तुलसी-दर्शन मीमांसा, पृ. 295
46. द्वेषादयस्तु नैवम्।-नारदभक्ति सूत्र 02/1/19
47. उदयभानु सिंह, तुलसी दर्शनमीमांसा, पृ. 295-296
48. वही, पृ. 26
49. रामानुज, ब्रह्मसूत्र पर रामानुज भाष्य, 1/1/21 व 1/2/12
50.
51. तव शरनागत पाल लाल दशरथ के दीन दयाला। रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम-5
पद-34
52. सरन सरन लायक सुखदायक गायक संत महंता। रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राय
13, पद-37
53. तुम प्रभु भक्त व छल भगवाना, रामरहस्य, 42/10
54. ऋग्वेद, 10/90/2-14
55. अध्यात्मरामायण, 3/9/31 से 45 तक
56. रामचरितमानस, 6/14, 15
57. तुम सब लोक लोकपति करता परिपालक संहरता।
नारायन नर देव देवमनि रमा रमनि मनि भरता।।
चक्र धरन विभु धरा धन वर भूत भाति अरिजेता।
अच्छर ब्रह्म सत्य सब काल अकाल अजित अतिवेता।।
- रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम तेरह, पद सं. 35
58. विस्वकसेन अरि षंउन चंड चतुरभुज धारी।
धर्म धारि असि धनु सारंग धर हृषी केस बनबारी।।
विष्णु कृष्ण पुरुषोत्तम पुरुष पुनीत भीत भय भंजन।
सेनानी ग्रामनी छया दम ग्यान दानि जन रंजन।।
- रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम तेरह, पद सं. 36
59. रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम तेरह, पद सं. 37, 38, 39
60. रामरहस्य, अध्याय-42, छंद सं. 10
61. विशिष्टा द्वैतवाद के कई अर्थ प्रचलित हैं। (क) दो विशिष्टों का अद्वैत (तादात्म्य
अभेद), स्थूल चेतनता तथा अचेतनता से विशिष्ट जीव और सूक्ष्म चेतनता तथा
अचेतनता से विशिष्ट परमात्मा की एकता ही विशिष्टाद्वैतवाद है। या यों कहिए कि
ब्रह्म के दो रूप है, कारण ब्रह्म और कार्य ब्रह्मा, कारण ब्रह्म सूक्ष्म चित् और अचित् से विशिष्ट है। कार्यब्रह्म (जीवों सहित समस्त जगत्) स्थूल चित् तथा अचित् से विशिष्ट है। दोनों का, कारणब्रह्म और कार्यब्रह्म का, एकमेक विशिष्टाद्वैतवाद है। (ख) उपर्युक्त अर्थ को न मानते हुए कुछ लोग विशिष्टाद्वैत का अर्थ द्वैत से विशिष्ट अद्वैत से लेते हैं। द्वैत का अर्थ चित् और अचित् है। अद्वैत का अर्थ है अन्यर्यामी परमात्मा, द्वैत नियाम्य है और अद्वैत नियामक।
-हिंदी साहित्य कोश, भाग-1, पृ. 722 (विस्तार के लिये देखिये-बलदेव उपाध्याय, भारतीय दर्शन, पृ. 392-428, सतीश चटोपाध्याय, भारतीय दर्शन, पृ. 428-444, पीताम्बर दत्त बड़ वाल, अनु. परशुराम चतुर्वेदी, संपादक-भागीरथ मिश्र। पृ. 198)

62. रामरहस्य, अध्याय-26, छंद सं. 9
63. वही, अध्याय-12, छंद सं. 9/1
64. वही, अध्याय-12, छंद सं., 9/2
65. वही, अध्याय-12, छंद सं. 9/3, 4
66. वही, अध्याय-12, छंद सं., 9/5/6
67. वही, अध्याय 12, छंद सं. 9/9,10
68. वही, अध्याय-26, छंद सं. 11
69. भंजन हेत भूरि भू धारा। पति समेत लै हौ अवतारा।
अवधपुरी दसरथ नृपधामा। सरजू नीर तीर अभिरामा।
अवतरि है मम पति जगतेसा। सेस सुदरसन संख समेता।
राम लखन रिपुसूदन नामा। वहुरि भरत भूख न भू भाभा।
हौ पुनि जनम जगति तें जाई। ह्वै से सक्ति सुखदाई।
संख पंचजन पतनि पुनीता। नाम माण्डवी मुनिगन गीता।
सक्ति सुदरसन सुमुखी सयानी। श्रुति वीरति कीरति जग जानी।
ए दोऊ जगति जनभि है जाई। कुस धुज भवन भव्य भव पाई।
ए अनिमादि सिद्धि सुखसानी। ह्वै है मम सहचरी सयानी।
- राम रहस्य, अध्याय-50, छंद-6
सुनि देवन की अरजि अयोध्या में अवतार लिये।
दसरथ घर श्री राम भरत लक्ष्मन सत्रुधन जिये। रघुबर लीला, पद सं. 2
नाथ स्वप्न में कबहुक सामहि। बिस्न रूप देखौं घनस्यामहिं।
गरूडारूढ़ सुमग भुज चारी। गदा चक्र पंकज दर धारी।
सुनि यहि बचन सुमित्रा रानी। बोली बहुर बिनै जुत बानी।
ऐसेई में देखों निज छौना। सेस रारूप सहस सिर लौना।
पुत्र सत्रुघन सुदरसन रूपा। सहस सूर सम ओज अनूपा।
यहि संसै मेरो उर स्वामी। हरहु नाथ तव चरन नमांमी।
यहि सुनि कैकय नंदिनी, बोली बचन अनूप।
नाथ निहारौ स्वप्न मैं, निज सुत संख सरूप।।
- रामरहस्य, अ-2, छंद 2-3
राम ब्रह्म घन आनन्द रूपा। छितिभर हरन धरयो नर रूपा।
रामरहस्य, अध्याय-2, छंद 4


70. सुनि बिधि विनय प्रनय रस सानी भई ब्रह्म बर बानी।
तुमहित धरनि धनुरधर नरवपु धरि करिहौ दरहानि।।
- रामललामगीत, बालकाण्ड, प्रथम विश्राम, पद-1
-
भू को भूरि भार हरबेको हर आदि सुर
गावत में ऊंचे सुर प्रभु को सुजस जस।
मुनि सरबेस कही मुनि सरबेसन सों
हनि हो हरख हर हनि रकू सरबस।
जैसे कहि सुरन कों सुरन करन हित
अरिन सों अरिनर बपु बने नृप बस।
दैवे को बधाई धाई आई तिय तजि बास।
हेरि सिसु रतन हरखि बरैं बास बस।
जानकी जीवन यमक पचीसी, छंद-1
ब्रह्मादिक बिनती करी हरन हेत भू भार।
सुनि सरनागत सुखद प्रभु लियो अवतार ड्ड
- रघुवर पर रत्नावली, बालकांड, छंद सं. 1
71. रघुवर लीला, पद सं. 1
72. रामरहस्य, अध्याय-41 व 42
73. रामरहस्य, अध्याय-40
74. राजकुमार नमो नमो, नमो भरत भवतार।
नमो नमो रघुबंसबीर, सत्य सरीर उदार।।
- रामरहस्य, अध्याय-46, छंद 14
75. रामरहस्य, अध्याय-47, छंद-12
76. बीते एकादस बरस, इन जब तब रघुबीर।
दरसन दे दसरथ कुवर, बोले बचन गंभीर ड्ड
मैं तूठ्यो तुमार तप देखी। बरहु बरज बर उर अबरेखी।
सुनि प्रभु वचन सुधा जनु सींचे। गद गद गिरा भाव भर भींचे।
एकादस सम्बत तप तीखन। करयो जु हम प्रभु अंबुज ईखन।
तावत काल बसहु मम धामा। सुत सरूप सुंदर घनस्यामा।

तहाँ परंतु तत्व तव जोई। तिहिं बिग्यान हमहिं नहि होई।
कहि प्रभु तथा भवतु मो रूपा। ह्वै है तब भावन अनुरूपा।
सुत स्नेह सज्जित मो माहीं। जे हो जरा जनम जहं नाहीं।
द्वापर अंत सुभग सुत तोरा। ह्वै हों बचन सत्य सब मोरा।
तब लग वसहु बिधि लोका। जहाँ सकल सुख बिसद बिसोका।
यौ कहि प्रभु भए अंतरधाना। सुनि दंपति दुख दूर दुराना।
- रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 14, 15
77. तिनके गृह प्रभु द्वापर अंता। आवरभाव भए भगवंता।
निज वरदान जान जगदीसा। बहुरि बचन बिरंच बखसीसा।
तजि निज भात पितहि परमेसा। नंद निवास बसे बरदेसा।
कृष्ण सरूप बंक बपु धारी। रघुबर रमे रसिक बरधारी।
एकादस संबत सुख सेतू। बसे नंद ब्रज रघुकुल केतू।
जो रघुनंद सोई नंद नंदा। उभै भेद भाखत मति मंदा।
- रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 17

78. जन्यो जु इत कौसल्या रानी। जसमत सुत उत सोई सुख खानी।
- रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 17
79. जाइ जनकपुर जनकजा, इति व्याहि बरजोरि।
ऊहाँ बरी बृख भानुजा, मनमथ मान मरोरि।।
- रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 18
80. इति धरि धूरि जटी धनु तोरा। उधर धराधर धरयो कटोरा।
इत सिय संग सरस रस रातो। उत ब्रज वधू मोद मद मातो।
इति श्रृगया भिसि अधम उधरे। उति बृख्भादि बृजनि तम तारे।
इत तजि भवन गवन वन कीना। उत तजि ब्रज मधुपुरि मन दीना।
केवट कुल कलंक इत काटे। उत मलीन मालीभल डाटे।
इत बिराध वध बिबुध बिकासे। उत हनि रजक असुरगन त्रासे।
इत अति रुचि भीलनि फल खाए। उत चेरी चंदन चरचाए।
इत सबरी सबरीति सबारी। उत उबरी कुबरी कुल कारी।
इत कृत सपत ताल तरु खंडन। उत कृत कृतुकोदंउ बिहंउन।
इत प्रभु बध्यो बालि बलबंता। उत किय कुमति कंस करि अंता।
इत सुकंट किय कपि कुल के तू। उग्रसेन उतकृत सुख सेतू।
इति सियहित हनुमंत पावा। करि प्रबोध पुनि प्रभु पहि आवा।
( - रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 19)

उत उधव पटयो प्रभू, दै प्रिय प्रेम संदेस।
दै लै आयो घोख कै, समाचार सुभ बेस।।
( - रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं.20)

बालि तनै इत दूत पावा। निज प्रताप अरिपुर प्रगटावा।
पांडव दूत भए उत आपू। बिदित बिरंचि प्रपंच प्रतापू।
इत दस सीस सदल संहारा। उत कौरव कुल कंटक टारा।
थप्यो बिभीखन इत अबधेसा। उत प्रिय पांडव करे नरेसा।
इत सिय सहित सदन निज आए। उत महि तज निज धाम सिधाए।
उभै ओर भंज्यो भू भारा। संसृत समन सुजस बिसतारा।
लीला जुगल समत्व सुहावन। पढ़त सुनत पावै पढ़ पावन।
गंग जमुन संगम सुभ जैसे। जुग लीला संगम यहि तैसे।
रघुपति कृस्न कृस्न रघुबीरा, उभै भजन भंजन भव भीरा।
रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 21
81. भक्ति चन्द्रिका, पृ. 148
82. डाॅ. उदयभानु सिंह, तुलसी दर्शन मीमांसा, पृ. 299
83. (क) यहि प्रभु चरित सरित अति हितकृत हरत सकल कलिदोषा।
करत मनोरथ पूरन तूरन धरत धरम धन मोखा।।
भरति भक्ति हियभक्ति भगवती दरति भ्रमद भव भारी।
ढरति रास सुखधाम स्यामधन करति पान बनबारी।।
- रामललामगीत, बालकाण्ड, विश्राम चार, पद सं. 33
(ख) वेदनवरनी दर दुख दरनी सब बिध सभ शुभ करनी।
भगवत भक्त भक्ति उर भरनी सुधा सरस रस धरनी।
- रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, विश्रामद्वितीय, पद सं. 68
(ग) अय किसकिंधाकांड कथा कलि कलुष कदन किन करनी।
कर कस कर कुल कमल कुंवर की कहौं कृपा कृत करनी।।
- रामललामगीत, किष्किंधाकाण्ड, विश्राम प्रथम, पृ. 1
और देखिये, किष्किंधाकांड, विश्राम तृतीय, पद सं. 39, सुंदरकांड, विश्रामप्रथम, पृ. 1
84. रामललामगीत, उत्तरकाण्ड, नवमविश्राम, पद सं. 26
अध्याय-35, छंद सं. 15, अध्याय-28, छंद सं. 1, 12
85. रामरहस्य, अध्याय-3, छंद सं. 1
86. सुनहु मुनीस कथा प्रभु केरी। सब ऋतु सार रहस्य धनेरी।
परमपुनीत अभी ते मीटी। पीबत करति सकल सुक सीढ़ी।
-रामरहस्य, अध्याय-24, छंद सं. 2
87. ताते रसिक सजीवनी मूरी। राजकुमार कथा कहु रूरी।
- रामरहस्य, अध्याय-16, छंद-2
88. भक्ति चंद्रिका, पृ. 148
89. वित्तहीन बित मतिहीन मति सुत हीन सुत गावै पढ़ै।
नर लोक सब सुख पाई पूजित पुन्य कलकीरति बढै।
प्रभु पाइ पंकज प्रेम पूरन पाइ दारुन दुखद है।
पुनि अंत राम प्रसादि तें प्रभु परम पद पावन लहै।
- रामरहस्य, अध्याय-22, छंद-9-दीह

दोख दुख दीन, दुरत दाव दारुन दहयो।
पढ़ै प्रेम पन पीन, पाव परम प्रमोद जन ड्ड रामरहस्य, अध्याय-22, छंद-10 और
देखिये-रामरहस्य, अध्याय-26, छंद सं. 3, अध्याय-22, छंद सं. 8 रामललामगीत,
युद्धकाण्ड, विश्राम सोलह, पद सं. 24, 25, 26

90. सिव बिरंच आदि सुर ब्राता। सनकादिक मुनि जन गन ग्याता।
सहस मुखादि पारखद बृंदा। कमला आदि बिभूति अनिंदा।
मन ते आदि मनुज जग जाने। जोगीजोगि ध्यान उरझाने।
ए सब सदा भजहिं श्री रामहिं। सुख सरूप सुंदर घन स्यामहिं।
- रामरहस्य, अध्याय-4, छंद सं. 9
91. गुणातीत प्रभु गुणगन गावन। कहत सुनत सब समल सिरावन।
- रामरहस्य, अध्याय-30, छंद सं. 4
92. रामरहस्य, अध्याय-37, छंद सं. 23
93. वही, अध्याय-31, छंद सं. 2
94. वही, अध्याय-36, छंद सं. 2
95. वही, अध्याय-17, छंद सं. 11
96. बहुरि परम जप कहों सुतीछन। जाइ जपत उधरै उर ईछन।
श्री रामेति परम जप जानहु। सब श्रुति सार सार मन भानहु।
जे श्री राम राम नित कहहीं। ते नर मुक्ति मुक्ति दोऊ लहहीं।
तासु समान आन जन नांही। निस दिनि राम नाम जिय जांही।
राम जपत उधरे नर नीचा। गडे बड़े जे कलिमल कीचा।
राम नाम सम जपजग नांही। आगम निगम पुरान कहाँही।
- रामरहस्य, अध्याय-32, छंद-सं. 11
97. रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकांड, पद सं. 39
98. भक्तिचन्द्रिका, पृ. 148
99. रामरहस्य, अध्याय-32, छंद सं. 11, 12, 13
100. वही, अध्याय-26, छंद सं. 13
101. भागवत पुराण, 2/8/4, 8/12/46, 11/14/26
102. जीवगोस्वामी, भागवत संदर्भ, षट्संदर्भ, पृ. 623-624
103. अध्याय 65, छंद सं. 1 से छंद सं. 10 तक
104. अध्याय 65, छंद सं. 11
105. पर धरम पद जान, यहि तीरथ इसनान नित।
इहि बिधि कह सुजान, लगे तीर जब जान सब।।
-- रामरहस्य, अध्याय-65, छंद सं. 15
106. वही., अध्याय-33, 34, 35
107. वही., अध्याय-20, छंद सं. 9
108. जीवगोस्वामी, षट्संदर्भ, पृ. 541
109. नारायणतीर्थ, भक्तिचन्द्रिका, पृ. 148
110. तब नागर नर नारि सुहाए। पाबन पारबती सर नाए।
सानुज राम जनक नृप जाई। सादर सखिन समेत अबाई।
..........................................
पुनि ले सुरभि सरोज सुहाए। सादर संकर सीस चढ़ाए

प्रेम पुलक पूजन परम, करि गिर सुता समेत।
पुनि प्रनम्य गमने नि ल, निज निज नवलनिकेत।।
रामरहस्य, अध्याय-66, छंद सं. 5, 6, और देखिये छंद 7, 8, 9
111. नारायणतीर्थ, भक्तिचन्द्रिका, पृ. 148
112. जीवगोस्वामी, मुक्ताफ, 7/88
113. रामरहस्य, अध्याय-1, छंद सं. 1
114. वही. छंद सं. 3
115. वही, छंद सं. 4
116. वही. छंद सं. 5
117. वही. छंद सं. 6
118. वही, अध्याय-22, छंद सं. 5
119. वही, अध्याय-23, छंद सं. 4, 7
120. वही, अध्याय-35, छंद सं. 9
121. वही, अध्याय-37, छंद सं. 2
122. वही, अध्याय-41, छंद सं. 4
123. वही, अध्याय-66, छंद सं. 9
124. रामललमागीत, युद्धकांड, विश्राम चैदह, पद सं. 36
125. जीवगोस्वामी, षट्संदर्भ, पृ. सं. 644
126. रामललामगीत, अयोध्याकाण्ड, विश्राम पांच, पद सं. 8
127. वही, अयोध्याकाण्ड, विश्राम-पांच, पद सं. 28
128. गुरुबर धर्म धर्म उपदेशन तुम अधर्म किम भाष्यो।
दास राम को खास जास को राज आज अभिला ो।
कर कस कर कुल जसकर तसकर रघुबर राज हरै जो।
दसरथ सुअन भुवन कुल कीरति कुमति कुकाज करे को।।
मात कुमात कुमति तें कुमति जु कियो न सो मत मेरो।
राम काम अभिराम स्याम को बिना दाम को चेरो।।
- रामललामगीत, अयोध्याकाण्ड, विश्राम नवम, पद सं. 5, 6
129. रघुबर किंकर करन हेत कुल केतु जन्यो मैं तोको।
भपि रघु केतु समेत हेतु हित होयगो मोको।।
सुन सुत वाद विवाद विखाद प्रमाद सकल तजि दीजो।
रघुवर चरन कमल किंकर ह्वै कल किंकरता कीजो।।
- रामललामगीत, अयोध्याकाण्ड, विश्राम चार, पद सं. 25
130. रामरहस्य, अध्याय-66, छंद सं. 9
131. रामललामगीत, अयोध्याकाण्ड, विश्राम पांच, पद सं. 41, 42
132. वही, अरण्यकाण्ड, विश्राम द्वितीय, पद सं. 11, 12, 13
133. (क) हों रघुबीर धीर धुर धरको दास खास हनुमाना।
- रामललामगीत, सुंदरकाण्ड, विश्राम चार, पद सं. 8

(ख) तव पद पंकज परम प्रेम प्रभु प्रतिपद पूरन पाऊँ।
तहंहि मनहि मधुकर इव करि हरि परिहरि अनत न जाऊँ।।
- रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम सोलह, पद सं. 15
134. रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 35
135. वही, उत्तरकाण्ड, पद सं. 36
136. जीव गोस्वामी, हरिभक्ति रसामृत सिंधु, 1/2/37
137. ल्याय मरुत सुत अति उत्कण्ठित कण्ठ सुकण्ठ मिलाए।
करि पावक पद परस परसपर प्रेम प्रीति मतियाए।।
पुनि निज निज दुख दसह सुनाए जिह बिध जब जहाँ पाए।
बहुरि दुहुनि दुख दहन दुहुन के दहन हुहन बिध गाये।।
- रामललामगीत, किष्किंधाकांड, विश्राम प्रथम, पद सं. 13
138. तब सुग्रीव अमीव विबर्जित अर्जित पुन्य प्रधाम।
निज वड भाग सराहे पाए रघुमणि भीत महाना।।
रामललामगीत, किष्किंधाकाण्ड, विश्राम प्रथम, पद सं. 21
139. नारायण तीर्थ, भक्ति चन्द्रिका, सूत्रा सं. 2/2/7
140. प्रभु समीप संतत सब लहहीं। लीला ललित बलित सुख लहहीं।
तिन महुं जे प्रधानगन गाए। तिनके नाम सुनहु मन भाए।
पृथम प्रतापी सखा सुजाना। सत्रुसमन पुनि प्रेम प्रधाना।
पुनि प्रताप मुख प्रभु सुखदाई। अपर युधिस्टर सहज सुहाई।
सुस्ट रूप जै बिजै सुकरमा। दीरघ बाहू सुकण्ठ सुधरमा।
सुस्ट सिरा अति विक्रमि सीला। चारु चन्द्र रिपुवार सुसीला।
हरिदस्वादि सनेह सुहाए। सखा सहस रघुबर मन भाए।
सबकै राम चरन अति प्रीति। अवधनाथ अभिनंदन रीति।
- रामरहस्य, अध्याय-38, छंद सं. 2
141. रामरहस्य, अध्याय-38, छंद सं. 3, 4
142. वही, अध्याय-38, छंद सं. 5
143. वही, अध्याय-39, छंद सं. 1, 2, 3, 4
144. वही, अध्याय-42
145. विनय बारही, पद सं. 10
146. रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 62
147. वही, उत्तरकाण्ड, पद सं. 55
148. रघुवर तुमने चरन की आसा।
जप तप ब्रत तीरथ नहिं कोऊ जोग न जग्य उवासा।
ग्यान न ध्यान पुरान बेद बिधि नहि बर बुधि बिलासा।
पतित पावन सुनि बिरद तिहारो रतन हरिभए दासा।।
- रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 53

149. रघुवर कब मुहि अपनो करोगे।
काम क्रोध मद लोभ मोह की लहिरैं मन तें हरोगे।
चंचल चित चलिजात चहूं चक निज चरनन में धरौंगे।
रतनहरी निज दास दास पै कबि करि करुना टरोगे।।
-- रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 58
150. कृपा कर करीओ अपनो राम।
मो में कोऊ न गुन गुननिधि जाते रिझवों अभिराम।
धरम न गयान न धजान रावरो नहिं जोग को जोग।
फिरों भूरि भटकत भव सागर ग्रसयो ग्राह दुख रोग।
तातें तुमै पुकारत आरत जानि पानि निज देहु।
आरत हरन बिरद अपनो रघुरतन हरे लखु लेहु।।
- विनय बारही, पंद सं. 11
151. रघुराज तुमहि किम पावों। नहिं कोऊ कल करम कमावऊँ।
दिन रैन मैन मतवारो। कटु कोह मोह मन कारो।
लटु लोभ लाग ललचाऊँ। करि कोरि अधन न अधाऊँ।
निरदई दई को मारयो। तुहि निस वासर बिसारयो।
इन्द्रिय जु उठाई गीर। तिन हरें धरम चय चीर।
मन मैन ने दुख दीनो। तब साम रतनहरि लीनो।
तुम कृपा कटाछन देखो। दुरदसा दास की देखो।
- विनयबारही, पद सं. 8
152. रे मन समय समझ अब अपनो।
काम क्रोध मदद मोहत जन दिन रजनी राम जप जपनो।
अंग अंग गति तंग होत औ रंग नंग तन कपनो।
बैस बीत गयी ऐस ऐस में ऐहे पाछे तपनो।
ताते तज अब आसपास ओ आसपास लख सपनौ।
अवध रत्नहरि सरन रतन गहु ह्वै है थिर थल थपनो।
- विनयबारही, छंद सं. 1
153. प्रभु सरनागत भर सकल जग तब सरनागत ह्वै है।
प्रभु सरनागत भए बिना प्रभु सर सरनागति पैहै।।
- रामललामगीत, सुंदरकाण्ड, विश्राम तृतीय, पद सं. 4
154. रामललामगीत, सुंदरकाण्ड, विश्राम पांच, पद सं. 7 से 11
155. वही, विश्राम प्रथम, पद सं. 25 से 32
156. रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 61
157. पुनि पर विनय प्रनय बहु कीनी सरन सार महि लीनी।
उभय और रछकता अपनी प्रभुहिं समरपन कीनी।
- रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, विश्राम प्रथम, पद सं. 15
158. हम अति आरत असुर बिदारित आए ओट तिहारी।
आरति हारि सुविरद विचारि हमारी करो रखवारी।।
- रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, विश्राम प्रथम, पद सं. 25
159. रामललामगीत, अरण्यकाण्ड, विश्राम प्रथम, पद सं. 7
160. तब ताकी धनु सरन जब रह्यो मरन नहि बाकी।
सिंधु सरिस की यहि गति बांकी और कहों कहु काकी ड्ड
जब करि जोर विनय कछु कीनी रघुबर रिस तजि दीनी।
करुना खानि सरन सुखदानि सुबानि जानि हम लीनी ड्ड
- रामललामगीत, युद्धकाण्ड, विश्राम द्वितीय, पद सं. 33
161. दसरथ नंदन जग बंदन महाराज राज मेरे।
अवध नाथ दिनकर कुल मंडिन खंडन पाप नेरे।
तारन तरन हरन सब दूखन भूखन भूपन केरे।
जानकी बर सुंदर सुख मंदर रतनहरी चरनन के चेरे ड्ड
- रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकांड, पद सं. 63
162. रघुवर पद रत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 36
163. रामरहस्य, अध्याय-68, छंद सं. 8
164. वही, अध्याय-72, छंद सं. 4
165. वही, अध्याय-73, छंद सं. 4
166. वही, अध्याय-73, छंद सं. 8
167. वही, अध्याय-74, छंद सं. 2
168. वही, अध्याय-75, छंद सं. 6
169. वही, अध्याय-76, छंद सं. 11
170. रघुवरपदरत्नावली, उत्तरकाण्ड, पद सं. 4
171. रामरहस्य, अध्याय-3, छंद सं. 13
172. वही, अध्याय-40, छंद सं. 1 से 4 तक।
173. वही, अध्याय-40, छंद सं. 5
174. वही, वही- छंद सं. 6
175. वही, अध्याय, 40, छंद सं. 8
176. वही, अध्याय-40, छंद सं. 10
177. रामरहस्य, अध्याय-40, छंद सं. 12
मुनि जन गन जो ध्यान न पावा। सो जुवतिनि इहि भांति नचावा।
सिव बिरंचि ध्यावत धरि मौना। कियो सखिन सो खेल खिलौना।
मुनिवर प्रेम बिबस रघुराई। यहि सब वेद पुराननि गाई।
हरि बस करन मंत्र मन माना। प्रेम समान व आन बखाना।

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