श्री के के वर्मा का दामाद (कहानी)

रिया शर्मा

रिया शर्मा

कथा-कहानी



"रवि...  तुम ये तीनों फाइल निबटा कर ही घर जाना। ये कल सुबह की मीटिंग की बेहद जरूरी फाइल हैं।"

अपने केबिन से निकलते हुए श्री के के वर्मा ने रवि को कड़क स्वर में आदेश दिया और उसकी तरफ से बिना कुछ सुने ही ऑफिस से बाहर निकल गए। वर्मा जानते थे लड़के में इतना साहस नही है कि वह उनकी बात की अवहेलना करे। रवि ने फाइल में डूबा हुआ अपना सर ऊपर उठाया। दीवार घड़ी शाम के सात बजे का समय दिखा रही थी। ऑफिस के अन्य मुलाजिम लगभग जा चुके थे। चपरासी आकर तीनों फाइल उसकी टेबिल पर ऐसे रख देता है मानो उसके लिए कोई ईनाम लाया हो। 'मतलब और दो घंटे यहीं पर काम करते हुए बैठना पड़ेगा?' एक थकी हुई ऊंसांस लेता हुआ वह खिन्नता से भर उठा।

ऑफिस में सभी उसके शांत स्वभाव और काम के प्रति लगन को देखते हुए उसे बेहद पसंद करते थे। कुछ सात महीने पहले तक यही वर्मा भी उससे आपार स्नेह दर्शाते हुए कहा करते थे। "रवि तुम मेरे लिए पुत्र स्वरूप हो। तुम में मुझे समीर दिखता है। कभी किसी भी तरह की परेशानी हो बेटा तो निस्संकोच कहना।"

के के वर्मा यानि कमल कांत वर्मा। कंपनी के मैनेजिंग डायरैक्टर। वर्ष भर पहले जब रवि इस कंपनी में आया था तभी उसे बता दिया गया था कि वर्मा एक दंभी और बेईमान व्यक्ति है। उसके उल्टे-सीधे कामों से बच के रहना। उसकी दो सुंदर परन्तु नकचढ़ी और अशिष्ट बेटियाँ हैं। उनकी उम्र चौबीस और छब्बीस वर्ष है। बेटियों ने अहंकारी और अक्खड़ पिता से विरासत में ऐशो आराम के साथ-साथ उनके यही कुछ गुण भी ले लिए थे। लड़कियों से बड़ा एक बेटा समीर था जो चार वर्ष पहले एक दिन दोस्तों के साथ बाइक रेस लगाता हुआ अपनी ज़िंदगी की रेस हार गया था। अक्सर योग्य वरों की तलाश में वर्मा की नज़र जवान और होनहार लड़कों पर डोलती रहती थी। जब से रवि इस कंपनी में आया था तब से वर्मा को लगने लगा था, कमसकम किसी एक बेटी के लिए उनकी वर की तलाश अब पूरी हो गई।

 रवि पिछले वर्ष ही इंदौर से दिल्ली आया था। एम ए, एम बी ए की डिग्रियाँ और बेरोजगारी के दिनों के कड़वे अनुभव साथ लाया था। माँ के लाख मना करने के बावजूद भी वह घर का इकलौता चिराग रोजगार तलाशता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा था। पिता के रोज-रोज़ के ताने और आरोप उसे दिल्ली तक धकियाने के लिए बहुत थे। आए दिन दोनों में जिरह और सवाल -जवाबों का सिलसिला नियम से चलता था। वह उनके सामने अपना जितना भी सच्चा और ईमानदार पक्ष रखता पिता उसे ख़ारिज करके उसे अपमानित करने का एक भी मौक़ा नहीं छोड़ते थे। हमउम्र ताउजी के बच्चों की देखा-देखी वह भी पिता को चाचा ही कहता था।

"चाचा आज भी दो जगहों पर आवेदन कर के आया हूँ। और कल बारह बजे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया है।" उस दिन उसने हताशा से भरी आवाज में कहा था।

"बरखुरदार झूठ ऐसा बोला करो जिसके पैर हों। यही सब सुनते हुए जब मैं ऊपर चला जाऊँगा तब होगा तुम्हारा ये राग खत्म।" विचलित पिता खिन्न होकर रूखे स्वर में बोले थे।

"एक पद के लिए न जाने कितने ही दावेदार होते हैं। ऐसे में थोड़ा मुश्किल हो जाता हैं। परन्तु जल्द ही सब ठीक हो जाएगा।" अपराध भाव से वह फिर बोला।

"खामख्वाह इतना रुपया खर्च करके इनको एम बी ए कराया। अब साहबजादे के रोज नए बहाने सुनों।" पिता मई माह के चटक धूप वाले अति गर्म दिन में अपनी जुबान से वातावरण में कसैलापन और घोल देते थे। घर के माहौल में घुटन भर जाती थी। एक तो सर पर तपती धूप में रोज -रोज़ का सड़कों की खाक छानना, फिर घर आकर यही सब सुनना। रोज की मिचमिच से उसका मन क्लांत होने लगा था। माँ कई बार पिता को समझाती थी।

"मिश्रा जी बेटे से थोड़ा नम्रता से बात किया करो। जवान खून जल्दी उबाल खा जाता है। कल कुछ ऊँच-नीच कर दिया तो बैठे रहना फिर अपनी किस्मत का रोना लेकर। भाग-दौड़ कर रहा है न फिर उसे घर आते ही क्यों काट खाने को दौड़ते हो?"

परन्तु चिंतित पिता जानते थे। दो वर्ष बाद वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे। तब तक छब्बीस वर्ष पार कर चुका उनका यह बेटा एक अच्छी सी नौकरी पाकर अपनी घर गृहस्थी बसा लेता तो वे भी निश्चिंत हो जाते। उन्हें एक संतुष्टि रहती कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा दी। ऐसा नहीं था कि उन्हें अपने एकमात्र पुत्र से प्रेम नहीं था वरन अतिरिक्त प्रेम ही इन सारी चिंताओं, रूखेपन और परेशानियों का सबब था। अपनी सरकारी नौकरी में क्लर्क के पद पर रहकर उन्होंने बहुत ईमानदारी और मेहनत से इंदौर में किसी भी तरह ये दो कमरों का मकान बना लिया था। बेटे को लेकर अनंत सोचों में डूबे पिता अंदर ही अंदर उसके सुखद भविष्य को लेकर चिंतित और भयभीत रहते थे परन्तु बाहर से उसके साथ रूखा व्यवहार कर बैठते थे। इसी छींटाकशी में दिन कटते रहे।

पिछले वर्ष रवि को जब दिल्ली की इस प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र मिला तब कहीं जाकर पिता और पुत्र के रोज-रोज के इन अप्रिय संवादों को विराम मिला। उसने बिना देर किए तुरंत जाना तय किया। शुरू में माँ और पिता भी उसके साथ दिल्ली आए थे। कुछ जान पहचान वालों की मदद से वहीं ऑफिस  के पास ही उसके लिए कमरा देखा गया। रसोई और घर की सामान्य जरूरतों का सामान रख कर माँ ने घर को व्यवस्थित कर दिया था।

पिता और उसके बीच वैचारिक मतभेद और मनभेद के रहते ज्यादा समय अबोल ही रहा था। वापस जाते समय वे उसे हिदायदों का थैला थमा गए। "देखो रवि, खूब मन लगा कर काम करना। एक रोटी कम खा लेना परन्तु खुद्दारी और ईमानदारी से जीना। पैसे के लिए और जिस बात के लिए मन न माने उसके लिए कदापि बिकना मत... अगर ऐसा कुछ कर बैठो तो उधर आकर हमें मुँह दिखाने की हिम्मत मत करना... आई बात समझ में?"

रवि पूरे मन और मेहनत से नए काम और माहौल को समझने लगा। तीन महीने बाद रवि जब ताउजी की बेटी की शादी के लिए चार दिन की छुट्टी लेकर घर गया तब पिता ने पूछा। "हाँ भई... सब ठीक चल रहा है? कोई परेशानी है तो बताओ।"

"परेशानी होगी तो बता दूंगा।" संकोचवश इतना कह कर वह चुप हो गया था। पिता इस बात से संतुष्ट हुए कि बेटे के साथ सब ठीक चल रहा है और बेटा इस बात से खुश कि पिता ने बेवजह सवाल पूछकर उसे उपदेश नहीं दिए। नौकरी और दो शहरों के बीच की दूरी ने रिश्ते पर मरहम लगा दिया था। अब कभी -कभी पिता को पुत्र मोह जाग उठता था और पुत्र को जीवन में परेशानियों के चलते पिता और उनका अनुभव ज्ञान याद आ जाता था। अकेलेपन और अवसाद के क्षणों में उसे माँ का स्नेह व्यथित कर देता था। परन्तु घर फ़ोन करने पर होता फिर वही था। मन के भीतर कुछ और होता था और बाहर शब्द कुछ और निकलते थे। पिता मशवरे देते हुए उसे फिर जीवन के पाठ पढ़ाने लगते थे और वह केवल हूँ-हाँ तक सीमित रह जाता था। माँ ठीक से खाना, ठीक से रहना आदि कहकर अपना प्रेम न्योछावर करने लगती थी। वह फिर से 'हाँ माँ', और 'ठीक है माँ', कहकर अपने मन की बातों को कहे बिना अपने आप को समेट लेता था।

 लगभग पांच महीने तक ऑफिस में सब ठीक चलता रहा। बात तब से बिगड़ी जब एक दिन सभी ऑफिस के लोग नया वर्ष मनाने के लिए वर्मा के घर पर एकत्रित हुए थे। उसी रोज़, वहीं पर उनकी छोटी बेटी कोमल का दिल रवि को देख कर हिरण की तरह कुलांचें भरने लगा। रवि से निकटता बढ़ाने की उसकी बहुत सी कोशिशों के बावजूद भी रवि उससे दूर ही रहा। वर्मा की अनुभवी नज़रों से यह सब बच नहीं सका। उस दिन से कोमल की भावनाओं का ध्यान रखते हुए वर्मा बात-बेबात रवि को अपने घर भेजने-बुलाने लगे। दोनों बाप-बेटी उससे अतिरिक्त प्रेम दिखाते थे, परन्तु रवि अपने काम तक ही सीमित रहता था। वर्मा जी का यह प्रयास जब सफल नहीं हुआ तो एक दिन उन्होंने रवि से स्पष्ट शब्दों में कहा, "रवि...बेटा तुम्हारे माता-पिता से बात करनी थी। कोमल तुम्हें पसंद है न?"

चौंक कर रवि ने वर्मा की तरफ देखा। अपने काम से मतलब रखने वाले इस व्यक्ति को उस समय अहसास हुआ कि क्यों गाहे -बगाहे उसे घर बुलाया जाता है, और कोमल क्यों उसके इर्द -गिर्द मंडराती रहती है। उसे सोच में डूबा देख कर वर्मा ने फिर कहा। "रवि तुम आराम से सोच लो बेटा, कोई जल्दी नहीं है।" अपना पाला मजबूत करते हुए वे फिर बोले। "देखो रवि बेटा... हमारा क्या... आज हैं, कल नहीं। सब कुछ इन दो बेटियों का ही है। इनके घर बस जाएँ तो हम गंगा नहा लें।" इससे पहले बात इतनी आगे तक बढे कि पीछे लौटना मुश्किल हो जाए रवि विनम्रता से बोला। "सर कोमल एक अच्छी लड़की है। उसे शीघ्र अच्छा लड़का मिल जाएगा। आप नाहक परेशान न हों।"

वर्मा जानतें थे होनहार और मेहनती रवि लंबी रेस का घोड़ा है। इसलिए उन्होंने कई तरह के प्रलोभनों से उसे लुभाना चाहा। उनके तरह -तरह के प्रयासों पर विराम लगाते हुए एक दिन दोस्तों से राय -मशवरे के बाद रवि ने वर्मा से साफ़ शब्दों में फिर कह दिया। "सर कोमल मेरी छोटी बहिन जैसी है। आपने मुझे बेटा माना है इसलिए मैं उसके लिए योग्य वर तलाशने की हर संभव कोशिश करूंगा। मेरे लिए अन्य किसी भी तरह की सेवा हो तो अवश्य कहिएगा।"

के के वर्मा की बात की इतनी अवहेलना? वे दंभ और अपमान से भर उठे। तब से बात-बात पर रवि को परेशान करना उन्होंने अपनी आदत का हिस्सा बना लिया। उसका छुट्टी माँगने पर स्टाफ की कमी और काम का बोझ ज्यादा होने की बात कह देते थे और आवेदन ख़ारिज कर देते थे। फाइलों का ढेर उसकी टेबल पर पहुँचा देना, टाईम -बेटाइम उसे देर तक ऑफ़िस में रोके रखना उनका आए दिन का काम हो गया था। परेशान रवि समझ नहीं पा रहा था अब इन सब से कैसे निबटा जाए? महानगरों और शहरों की यही कलाबाजियां इंसान के भीतर का भोलापन सोख कर उन पर चालाकियों का मुलम्मा चढ़ा देतीं हैं। परन्तु रवि यह सब सीख नहीं सका। उसके गहराई तक समाये हुए संस्कार उसके आड़े आ जाते थे।

 वर्मा की नफरत की वजह वह समझ रहा था। परन्तु इसके सुधार में वह कुछ कर भी नहीं सकता था। परेशान होकर उसने दूसरी जगह नौकरी करने का मन बना लिया। तब एक दिन उसने पिता को फोन करके इस बात की इत्तला दी। उन्हें वर्मा के कारनामों के विषय में बताया और कहा कि इस नौकरी को छोड़कर अब वह दूसरी जगह नौकरी ढूंढ लेगा और सारी बातें उनके सामने रख दीं। ध्यान से उसकी बातों को सुन कर पिता उसे घुड़क कर बोले। "बरखुरदार होनहार हो जवान हो इसलिए ये सब होता ही रहेगा। तुम समझदारी से काम लो। तुम्हें क्या लग रहा है दूसरी कंपनी में रामराज्य होगा? वहाँ कोई परेशानी नहीं होगी? मैं दिल्ली आता हूँ। तब तक तुम यहीं पर काम करते रहो।" अब तक ईमानदार छवि वाले परन्तु खुद्दार पिता को के के वर्मा का ये हिसाब नागवार गुज़रा। फ़ोन रख कर बड़बड़ाने लगे। 'पैसे वाला होगा तो अपने घर का। अरे रवि की इच्छा, नहीं पसंद उसको तुम्हारी बेटी। कोई जबरदस्ती है क्या? ऑफिस के काम में इस तरह घर की बातों की वजह से मतभेद पैदा करना कहाँ तक जायज है? देख लूंगा इस वर्मा के बच्चे को।' माँ भी अपने पुत्र की परेशानी से दुखी होकर वर्मा पर लानतें भेजने लगी। अगले ही दिन बिना देर किए पिता और माँ दिल्ली पहुंच गए।

दूसरे दिन सुबह उन्होंने वर्मा से मिलने लिए रवि के द्वारा संदेश भिजवाया। ऑफिस पहुंच कर रवि ने वर्मा के केबिन के दरवाजे पर दस्तक दी। और बुलाने पर भीतर जाकर कहा। "गुड मॉर्निंग सर।"

"ठीक है, ठीक है…क्या काम है?" वर्मा ने बिना उसकी तरफ देखे हुए ही उसे घुड़का।

"सर घर से माँ और पिताजी आएं हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। यदि आप... उन्हें थोड़ा वक्त... "

वर्मा का चेहरा खुशी से खिल उठा। उसकी बात पूरी करने से पहले ही वह जल्दी से बोले। "अरे तुम खड़े क्यों हो भाई। बैठो, उनसे कहना मुझे बहुत खुशी होगी उन से मिलकर। आज रात के खाने पर मैं मेरी कोठी पर उनका इंतज़ार करूंगा।" वे अच्छी तरह जानते थे अपनी तमाम दौलत लुटा कर भी उन्हें अपनी बेढंगी और अशिष्ट बेटी के लिए रवि जैसा होनहार और सजीला वर नहीं मिल सकता। उन्हें पक्का यकीन था कैसे भी हो वे रवि के माता -पिता को इस शादी के लिए तैयार कर ही लेंगे।

 शाम करीब आठ बजे रवि के पिता, पत्नी के साथ वर्मा की आलीशान कोठी पर पहुँचे। खूब रौशनी से नहाई हुई कोठी किसी राजमहल से कम नहीं लग रही थी। मिश्राजी की आंखें चौंधियां गईं। उत्साह से पत्नी से बोले। "हे भगवान... इतनी दौलत होती है लोगों के पास? मेरे मालिक ये कैसा इंसाफ है? किसी के पास मेहनत और ईमानदारी से अपनी पूरी ज़िंदगी लगा देने के बाद भी दो कमरों का छोटा सा अभावों से भरा हुआ जीवन है और उल्टे-सीधे धंधों की कमाई से ये ठाट-बाट। वाह रे देने वाले।" व्यक्तित्व और हाव-भाव में उन गरीबी के तमगे लगे स्त्री-पुरुष को वहाँ पर आश्चर्य से खड़ा देख कर दरबान रूखे स्वर में बोला। "क्या काम है? देख लिया सब... तो चलो... खिसक लो अब।"

"अरे भाई वर्मा जी ने बुलाया है। उनसे जाकर कहो मिश्रा आए हैं, रवि मिश्रा के पिता।" दरबान ने थोड़ी हिकारत से उन दोनों की गरीबी की तरफ देखा और भीतर संदेश पहुँचाने के लिए वहीं से इण्टरकॉम मिलाया।

"साहब कोई मिश्रा जी आए हैं, आपके दर्शन के लिए, रवि मिश्रा..." उसकी बात पूरी होने से पहले ही स्पीकर पर वर्मा का आह्लादित स्वर गूंज उठा।

"नालायक... वहाँ क्यों रोक रखा है? उन्हें तुरंत सम्मान के साथ भीतर ले कर आओ।"

पिता सोचने लगे। 'किसी भी कीमत पर ऐसा वैभव उन्हें अब इस जनम में तो देखने को नहीं मिल सकता। रवि का क्या है, वह तो अभी बच्चा है उसका बुरा -भला हमें ही तय करना है।' दौलत की जगमगाहट ने उनकी खुद्दारी पर लोभ का आवरण चढ़ा दिया और सोच कलुषित कर दी। 'पत्नी, बंगला, मोटर, गाड़ी ... उस पर तरक्की अलग से। यह केवल रवि की तरक्की नहीं होगी वरन इस रिश्ते से पूरे घर की तरक्की हो जाएगी?' उन्होंने खुशी से छलकते हुए पत्नी से कहा। "अपनी तमाम ईमानदारी और मेहनत के बावजूद जो काम मैं अपनी पूरी ज़िंदगी लगा कर नहीं कर सका वह केवल श्री के के वर्मा का दामाद बन जाने से रवि चुटकियों में कर दिखाएगा।" पिता का ईमान डगमगा गया और बेटे के बाप की छाती गुरूर से दुगनी हो गई। बेटे के सौभाग्य पर माँ के होंठों पर भी तृप्त मुस्कान सज गई। भीतर जाते हुए दोनों सोचने लगे। 'बेटे की कीमत कितनी आंकी जाए?' आखिर नशा दौलत का था, सर चढ़ कर बोलने लगा।

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