छल (कहानी) - रवि कुमार गोंड़

रवि कुमार गोंड़
गर्मी का महीना था। गाँव उमरी में एक व्यक्ति के पागल होने की खबर जोरों पर थी। मदन जो एक धरिकार जाति से सम्बन्ध रखता था। उसकी लोग तरह-तरह से खिल्ली उड़ाया करते थे। गाँव के बड़े लोग उसे दुत्कारते रहते थे। उसका पारंपरिक व्यवसाय बाँस से दौरी, खचोली आदि बनाना था। उसी को बाजार में बेचकर वह अपने परिवार वालों का पेट पालता था। वह बहुत ही मेहनती था। रात-दिन मेहनत करके अपने बच्चों के स्कूल की फीस भरता था। उसकी ख्वाहिश थी कि उसके लड़के पढ़ लिखकर एक काबिल अधिकारी बनें और अपने परिवार को गरीबी की दलदल से बाहर निकाले। समय बीतता गया और बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते चले गये। एक बेटी कविता तो ब्याहने लायक होने वाली हो गई थी। मदन को बेटी की शादी की चिंता रात-दिन सताने लगी। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह आखिर क्या करे? रात-दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद भी वह अपने परिवार का बड़ी मुश्किल से भरण-पोषण और बच्चों की फीस भर पाता था। अब वह अपनी जिंदगी से हताश और निराश होने लगा। गाँव के बड़े लोग उसकी बेटी पर गिद्ध की तरह से नजर गड़ाये हुए थे। एक दिन वह सरयू नगर कुटिया पर एक बाबा से मिला। उसके बाद वह रोज बाबा के पास जाने लगा। इसी तरह से करीब छः महीने तक सिलसिला चलता रहा। उसका परिवार भूखों मरने लगा। अब उसके सभी बच्चे स्कूल जाने की बजाय लोगों के यहाँ काम करने लगे। मदन पहले की अपेक्षा काफी बदल चुका था। अब उसे गाँजे की लत लग चुकी थी। रोज शाम को चिलम पीने के लिए मारा-मारा फिरने लगा। उसका दिमाग धीरे-धीरे तांत्रिक जैसा बन गया। एक दिन वह कहीं से दुर्गा जी की मूर्ति लेकर आया और उसे घर में लगे नीम के पेड़ के नीचे रख दिया। अब वह ओझा बनकर सबके दुखों का हल ढूँढने लगा था। लोग उसे बेवकूफ समझने लगे। उसके पास थोड़े से पैसे आने लगे। जिससे बड़े लोग जलने लगे थे। वे सब सोच रहे थे कि कैसे मदन को बर्बाद किया जाए।

  एक दिन गाँव के राम सिंह जी अचानक मदन से मिले। मदन ने राम सिंह को प्रणाम किया।

मदन:- ठाकुर साहब परनाम।
राम सिंह:- राजी ख़ुशी रहा। काहो मदन का हालचाल बा तुम्हरा। सब ठीक ठाक है ना।
मदन:- हाँ ठाकुर साहब। सब आपकै आशीर्वाद है।
राम सिंह:- मदन आजकल का कर रहे हो।
मदन:- कुछ ना ठाकुर साहब ! आज कल जनसेवा करत बाटी।
राम सिंह:- अरे ! मदन तुम तो बड़ा मशहूर होई गये हो।
मदन:- ऊ कइसे ठाकुर साहब।
राम सिंह:- कइसे का ! तुम तो बढ़िया ओझा होइ गये हो।
मदन:- नहीं ठाकुर साहब। मैं तो बस ... जन... सेवा ... ऐसे।
राम सिंह:- तो मदन इसमें तो पईसा खूब मिलत होइगा।
मदन:- हाँ ठाकुर साहब। थोड़ी बहुत।
राम सिंह:- लेकिन मदन ई तुम्हरा काम अउर आगे बढ़ सकता है।
मदन:- ऊ कइसे साहब।
राम सिंह:- अरे ! कुछ दान-दक्षिणा करो, भोजन-वोजन कराओ। समझे की नहीं (इशारा मुर्गा और शराब, भोजन की तरफ) तब जाकर देवी प्रसन्न होगी न।
मदन:- अच्छा साहब! लेकिन...
राम सिंह:- लेकिन का।
मदन:- ठाकुर साहब हम ठहरे नीच जाति के। हमरे यहाँ कउन आईगा भोजन करने।
राम सिंह:- काहे नहीं आईगा। तुमहूँ तो मानव ही हो।
मदन:- तो ठीक है ठाकुर साहब। हम इंतजाम करत बाटी।
राम सिंह:- ठीक है। अच्छा हम चलत हई मदन।
मदन:- ठाकुर जी परनाम।
राम सिंह:- राजी ख़ुशी रहा और अइसे...  (हास्य व्यंग्यात्मक रूप में)।

   राम सिंह ने अपने बिरादरी लोगों को बुलाया और उनके सामने मदन की बात करके जोर-जोर से खिल्ली उड़ाकर हँसने लगे और कहने लगे कि मदनवा चला था हमरे बराबर धनी बनने। हम उसको अइसन पट्टी पढ़ाये हैं कि वह जिंदगी भर याद रखेगा। नीच पैरों तले ही ठीक लगता है। उनको दबाके रखा जाए तभी ठीक है, नहीं तो वह कपारे पर चढ़कर पेशाब करने लगता है। इस बात पर सब बड़े लोग ठहाके मारकर हँसने लगे। इधर मदन फूला नहीं समा रहा था कि उसके यहाँ पूजा में सब बड़ा लोग आएंगे खाना खाने। जो आज तक कभी किसी छोटे आदमी के घर नहीं गये थे। उसे बड़े लोगों के इज्जत की फ़िक्र होने लगी थी। लेकिन उसे यह मालूम नहीं था कि बड़े ठाकुर जैसे लोग उसके खिलाफ़ साजिश रच रहे हैं।

 मदन ने बड़े लोगों का मान-सम्मान रखने के लिए बैंक से 35,000 रूपया कर्ज भी ले लिया। आखिर वह दिन आ ही गया जिस दिन का इंतजार मदन को बहुत था। मदन पंडित जी के पास गया।
मदन:- पंडित जी परनाम।
पंडित जी:- खुश रहा मदन। का हाल बा।
मदन:- सब आशीर्वाद है आपका।
पंडित:- कहो कइसे आना हुआ।
मदन:- पंडित जी मैंने देवी जी की पूजा रखी है अपने घर पर। उसी की पूजन के लिए आपको बुलाने आया हुआ हूँ।
पंडित:- (गुस्से में) तेरा दिमाग खराब है रे। अपनी औकात में रह। तुझे पता नहीं कि नीच के घर पंडित पूजा नहीं कराते। यह पूजा-पाठ नीचों के लिए नहीं बनाया गया है। समझे कि नहीं? अब जा भाग जा यहाँ से नहीं तो...।

यह सब सुनकर मदन की आँखों में आँसू आ गया। मानो जैसे एक ही झटके में सब सपना चकनाचूर हो गया हो। वह फिर भी अपने मन को सांत्वना देते हुए सारा पूजा वगैरह खुद ही कर लिया। उसके यहाँ भोजन बन चुका था। उसने सभी बड़े घर के लोगों के यहाँ भोजन करने के लिए न्योता भिजवा दिया था। धीरे-धीरे समय बीतता गया और उसके घर बस उसके परिवार के अलावा कोई नहीं आया भोजन करने के लिए। उसके यहाँ मुश्किल से पाँच-छः लोग ही थे। जबकि उसने 40,000 रूपया खाने के लिए खर्च किया था। गाँव के बड़े जाति के लोग उसके यहाँ खाना खाने नहीं आए। उसके यहाँ बना हुआ सारा भोजन बर्बाद हो गया। उसने अपनी हाथों से सभी बचे हुए भोजन को गड्ढ़े में फेंका था। उस समय उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अपने हाथों से कोई अपने बेटे को दफ़ना रहा हो। उसने जान लिया था कि उसके साथ छल हुआ है। बड़े लोग कभी नहीं चाहेंगे कि एक गरीब दलित किसी तरह से आगे बढ़े। वह आसमान की तरफ देखकर डॉ. अम्बेडकर, महात्मा बुद्ध, राम, अल्लाह से कह रहा था कि क्या यही तूने संसार बनाया है? क्या वास्तव में यही मेरा और आपके सपनों का देश है शायद नहीं, हाँ ... शायद कभी नहीं?

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