रातों के अँधेरे में - लघुकथा

मुहम्मद हनीफ़

- मुहम्मद हनीफ़


"नहीं... नहीं, आबिदा। नहीं, ऐसा हरगिज नहीं करना। यह पाप है, हत्या है। बिल्कुल अपराध।"

एक सन्नाटे की चीख़। ऐसी चीख़ जिसमें चीत्कार भरी हों, रुदन भरा हों, एक इतिहास के कत्ल हुआ हों।

आँखें खुली तो श्वासें तेज थीं। धड़कनों की रफ़्तार तेज़। चेहरा उदास। चिंताएँ स्पष्ट। पलकों पर आँसुओं के भार। दृष्टि अपलक। बत्ती बुझी हुई। अँधेरा, घुप्प अँधेरा। खिड़कियों से ध्रुवतारा छिपकर निहार रहा था, शान्त। रात्रि सोयी हुई।

देखा तो वे बदहोश सोयी पड़ी थीं। बालों की लटें चेहरे को घेरे हुए। तिरछी करवटें। कान की बाली स्पष्ट दीख रही थीं, अँधेरे के प्रकाश में।

"आखिर कैसे हो सकता है? एक माँ जन्म के साथ ही अपनी औलाद की हत्या करवा दे। सांसो को बेच दे। गला दबाकर मार दे।"

"हाँ, अब्बा हुजूर। ऐसा ही किया गया मेरे साथ। मुझे गला दबाकर मार दिया गया। मेरी साँसें बेच दी गईं, मौत के हाथ।"

"लेकिन.....यह कैसे हो सकता है?"

"अब्बाजान, बस कीजिये। खुदा के लिए चुप रह जाईये।"

"काश! मैं एक बार जन्म लेकर तुम्हें देख पाती। कितने अरमान थे तुम्हारे? कैसे सपने सजाये थे? कितने  खुश होते, मुझे मुस्कुराता देख। चलो ... अपने साथ लिए चलती हूँ। अब तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।"

"नहीं... नहीं... इस सीमा को मैं नहीं लाँघ सकता। यह रेखा है, जिसके अंदर आग है। दोज़ख की आग।"

"मेरे कदमों से गंगा निकलती है। यह आग को बुझाकर शीतल बना देगी। चलो न?"

"समझने की कोशिश करो ...। यह इस्लाम के ख़िलाफ़ है। तुम्हारी माँ मुझसे अलग़ हो चुकी है। उसने मेरे साथ ज़ुल्म किया है। तौहीन की है।"

"मैं जानती हूँ। सब कुछ जानती हूँ। मैंने जुल्म करते देखा है। मैं अबोध थी। आज बड़ी हो गई हूँ। समझने लगी हूँ। फिर भी चलो न? मैं तुम्हें मिला देती हूँ। अम्मी तुम्हें बहुत याद करतीं हैं।"

"तुम जाओ", सुनते ही उसने मुँह फेर लिया था।

अचानक रातों के अँधेरे में सफेद कपड़ा पहने चुपचाप खड़ी देख वह समझ गया था कि यह वही थी, जिसे उसकी माँ ने तीन लफ़्ज के लिए जन्म के साथ ही गला दबाकर मार डाला था, और वह अपने पिता के आँगन कवच बनकर उनकी रक्षा कर रहीं थीं।

"घबराइये नहीं, अब्बा हुजूर। तुम्हारे एकाकीपन की साथी हूँ। तुम्हारी बेटी। तुम्हारी सुरक्षा।"
"..."
"नहीं चाहते हुए भी मैंने तुम्हें ख्वाबों में हक़ीक़त बता डालीं। अम्मीजान कष्टों का भोग कर रहीं हैं। जिसके हरेक पलों की जानकारी मैं तुम्हें देती हूँ।
"..."
"अलविदा !अब्बूजान, मैं चलती हूँ।

ख़्वाब टूटा तो घड़ी बारह बजा रही थी। कुत्ते भौंक रहे थे। शांत पसरा हुआ था। मैं अचंभित, डरा-डरा महसूस कर रहा था कि अतीत के जख्मों ने आँसू भर डाले थे।
   "कितना अच्छा होता ....
     वह साथ रहती
     रातों का अंधेरापन ख़त्म हो
     गया होता।
     जीवन के उजाले में
     मिलन-संसार की गीत रच
     डालते
     और एक अध्याय जुड़ जाता
     स्मृति के आर-पार।"

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