जीवन के अधिकार का तात्पर्य

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


मानवाधिकार के विषय में आम धारणा यह है कि ये व्यक्ति को मनुष्य होने के नाते प्राप्त होते हैं। इस संदर्भ में, दुनिया के विचारकों का मानना है कि ‘मानवाधिकार का महत्व तब तक रहेगा जब तक मनुष्य रहेंगे। जहाँ तक इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात है, मानवाधिकारों के संदर्भ प्राच्य ग्रीस, रोमन कानून या प्राकृतिक विधि के सिद्धांतों में देखने को मिलते हैं’। किन्तु मानवाधिकार को एक आधुनिक संकल्पना के रूप में चिन्हित किया गया है। जहाँ तक इनकी सार्वजनिक स्वीकृति का सवाल है, दस्तावेज़ों के आधार पर हम यह पाते हैं कि मानवाधिकारों की अवधारणा का क्रमिक विकास हुआ, जो 10 दिसम्बर, 1948 को कुछेक देशों के तटस्थता किन्तु आम सहमति से संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत किया गया।

मनवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा पत्र में 30 अनुच्छेद हैं। ‘जीने के अधिकार’ की व्याख्या या इस विषय में विमर्श करते समय सार्वभौम घोषणा पत्र के अनुच्छेदों की ओर गम्भीर होना उचित प्रतीत होता है। इस सार्वभौम घोषणा पत्र के पहले अनुच्छेद में ही यह कहा गया है कि, "सभी मनुष्य प्रतिष्ठा और अधिकारों के संदर्भ में स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं। वे तर्क और विवेक से सम्पन्न हैं तथा उन्हें परस्पर भाईचारे की भावना का व्यवहार करना चाहिए।" और इसी के साथ अनुच्छेद (3) में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन, अपनी स्वतंत्रता और अपने सुरक्षा का अधिकार है। यह दोनों अनुच्छेद जीने के अधिकारों की बुनियादी स्थापना हैं जिसके आधार पर जीवन, जीवन का अधिकार तथा जीने की सार्थकता को समझा जा सकता है।

यूँ तो सभी मनुष्यों को जीवन का नैसर्गिक अधिकार जन्मना प्राप्त है किन्तु एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारा जीवित रहना मात्र हमारे 'जीवन के अधिकार' की सीमारेखा है। हमसे अगर यह कह दिया गया कि तुम्हें जीने का अधिकार है, जियो तो क्या यही काफी है? जीवन का अधिकार हमें केवल जीने के लिए कह देने से प्राप्त नहीं हो जाता। यहाँ हम पुनः मानवाधिकार के सार्वभौम घोषणा पत्र की ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे जिसमें प्रतिष्ठा का उल्लेख किया गया है। इस शब्द का व्यापक अर्थ है। इसे लॉक, राल्स, रूसो और अरस्तू ने अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया। गरिमा मनुष्य की आत्मा के साथ जुड़ी है। धर्म के अनुसार सभी मनुष्य सृष्टि के लिये पवित्र हैं, इसलिए आत्मा की गरिमा समान है। मैकडोगल, लॉस वेल जैसे विद्वानों ने गरिमा के लिए कुछ विशेष जरूरतों को रेखांकित किया। उनका मानना था कि मानवाधिकार मानव गरिमा की मांग करते हैं जिसके कुछ बिन्दु हैं जो मानव को गरिमा प्रदान करते हैं। इसमें उनके अनुसार:
- सम्मान
- सत्ता या शक्ति
- समझ या बौद्धिकता
- सुखमय जीवन की समानता
- स्वास्थ्य
- कौशल या दक्षता
- स्नेह तथा
- साधुता

आदि का होना जरूरी है जिससे एक मनुष्य गरिमापूर्ण जीवन निर्वाह कर सके। जीवन के अधिकार के प्रथम पहलू के रूप में गरिमा को मान लें, जिसमें पूर्ववर्णित उपलब्धियाँ एक मनुष्य को प्राप्त हों, तो वहीं जीवन के लिए दूसरा पहलू यह भी है कि उसकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी हों। इससे वह अनुच्छेद-3 में वर्णित भय से मुक्त होता है। वैसे मानवाधिकार के विकास की तीन पीढ़ियाँ मानी गयी हैं। यानी:
- सिविल एण्ड पॉलिटिकल राइट्स
- इकॉनामिक एण्ड कल्चरल राइट्स तथा
- कलेक्टिव ह्यूमन राइट्स।

इनमें जीने के अधिकार की विविध संभावनाओं को दर्शाया गया है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर एक व्यक्ति कितने अधिकारों को प्राप्त कर सकता है। जीने के अधिकार की बात करते समय प्रकृति में मानव को जीने के लिए कह देना मात्र काफी नहीं है। पूर्व में उठाए गए सवाल पुनः उभरते हैं क्योंकि जीने का अधिकार प्रकृति में जीवन जी रहे अन्य जीव को भी प्राप्त है। पशु और पक्षियों को भी नैसर्गिक रूप से बहुत कुछ प्राप्त है। वे भी जीते हैं तो क्या मनुष्य की ज़रूरतें उससे कुछ अलग हैं, यह एक स्वाभाविक प्रश्न है। यदि हम इस पर विचार करेंगे, तो यह जरूर महसूस होता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसकी बुनियादी जरूरतों के पूरा हुए बिना एक मनुष्य गरिमामय जीवन नहीं जी सकता।

भारत के संविधान के आर्टिकल-21 में जीवन के अधिकार की स्पष्ट व्याख्या मिलती है। संविधान में यह कहा गया है कि ‘किसी व्यक्ति को उसके प्राण अथवा दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार से वंचित नहीं किया जाएगा।’ वैसे जीवन के अधिकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बहुत पुरानी है। प्रथम उल्लेख इसका मैग्ना कार्टा के अन्तर्गत आता है लेकिन इससे भी पुरानी मांग सोफेक्लीज के नाटकों में है। मस्तराम कपूर के शब्दों में ‘इसकी पुष्टि पिटिशन आफ राइट्स (1626), हेबियस कार्पस (1640 और 1679), और बिल ऑफ राइट्स (1669) में हुई। अमेरिका की स्वाधीनता की घोषणा में भी इसे स्वीकार किया गया और 1791 के बिल आफ राइट्स में इसे शामिल किया गया। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति में इस अधिकार को मूलभूत और महत्वपूर्ण अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जीने का अधिकार काफी समय से हमारी मूलभूत आवश्यकता समझा जाता रहा है। लेकिन उसकी निम्नतम जरूरतों के मद्देनज़र छत, भोजन और कपड़े आवश्यक हैं। इस प्रकार वह अब आवास का अधिकार भी रखता है। आजीविका का अधिकार वह रखता है। इसका मतलब हुआ कि उसे रोजगार के अधिकार चाहिए। कुछ अन्य पहलुओं पर विचार करें तो वह जरूर स्वास्थ्य, शिक्षा के अधिकार की मांग करता है। फिर प्रश्न उठता है कि जब सारी आवश्यकताएँ मनुष्य के हित में सोची जा रही हैं। तो बढ़ते प्रदूषण, शोर आदि से उसे मुक्ति दी जानी चाहिए अथवा नहीं? ऐसी स्थिति में वह पर्यावरण के अपने अधिकार की मांग करता है जो स्वच्छ हो।

जीने के अधिकार के साथ अब इस पर विचार करना भी आवश्यक हो जाता है कि क्या उसको जीवन से मुक्ति का अधिकार दिया जाना चाहिए कि नहीं? इस संदर्भ में अगर पिछले पचास सालों का इतिहास उठाकर देखें तो सुख-मृत्यु, मृत्यु दण्ड की काफी चर्चा रही है। सुख मृत्यु मनुष्य को प्राप्त होने चाहिए या नहीं इस पर गौर करना है। क्या किसी को सुखपूर्वक मृत्यु दी जा सकती है? जैन समाज ने संथारा प्रथा के तहत ऐसी कोशिश की जो विवाद के घेरे में थी। स्वास्थ्य विभाग से कोई मरीज किसी असह्य दर्द से पीड़ित हो तो उसे मृत्यु दी जा सकती है क्या? ऐसे कई सवाल हैं जो काफी दिलचस्प हैं। एक डाक्टर तो किसी को मरने की इजाजत नहीं दे सकता क्योकि उसकी नैतिकता, उसके अपने आत्म की गुहार किसी को मरने पर कैसे राजी कर सकती है। किसी के मेन्टली या फिजिकली फिट न होने पर भी वह मृत्यु के लिए हामी नहीं भरता।

वह कहता है कि हम सुख-मृत्यु की इजाजत नहीं दे सकते। इसी प्रकार गर्भपात के सवाल पर भी विवाद है। एक माँ को अगर भ्रूण से मुक्ति पानी है या गर्भपात वह कराना चाहती है तो ऐसे में दो सवाल खड़े होते हैं। पहला उस भ्रूण का अधिकार, दूसरा उस माँ का स्वयं का अधिकार। जीवन के अधिकार दोनों को मिले हैं तो किसे समाप्त किया जाए किसे बचाया जाए, यह एक धर्मसंकट होता है। भारत में माँ को तीन से चार माह के भ्रूण से मुक्ति पाने का अधिकार है क्योंकि डॉक्टर के अनुसार तब तक बच्चा अपना पूरा आकार नहीं ले चुका होता है। माँ अगर मेडिकली खतरे में है तो भी उससे मुक्ति का अधिकार है उसे।

इस प्रकार जीवन का अधिकार व्यापक संदर्भों में मानव के अस्तित्व, उसकी स्थापना व विकास के लिए सर्वोच्च मानवाधिकार माना गया है। यह बुनियादी अधिकार के रूप में तो है ही, बहुत सारे सम्भावनाओं की मांग करने वाला एक मानवाधिकार है। जब जीवन नहीं रहेगा तो बाकी सभी अधिकार बेकार हैं। इसलिए मनुष्य की प्रथम मांग जीवन के अधिकार के लिए ही है। बाकी सभी अधिकार उसके रहने पर ही प्राप्त होते है। वर्तमान में हम तकनीक में काफी विकसित हो गए हैं। हमारे जीवन के अधिकार में काफी नई संभावनाएँ आनी चाहिए लेकिन विडम्बना ही है कि मनुष्य के अपने विकास ने उससे अपने जीवन के अधिकार को छीनने की कोशिश तेज कर दी है। अगर ऐसे में भूमण्डलीकरण, बाजार और नए मानवविरोधी प्रयोगों से नहीं बचा गया तो अन्य सभी अधिकार की जगह मनुष्य का प्राथमिक अधिकार नहीं मिलेगा।

1 comment :

  1. वाकई दिलचस्प ... और चिंतनीय! जीवन और मृत्यु के अधिकार को मैं सापेक्ष मानता हूँ । सामान्यतः जन्म को जीवन की शुरुआत मान लिया जाता है जबकि जेनेटिकली यह निरंतरता मात्र है । हाँ ! मृत्यु का विषय किंचित भिन्न है । मृत्यु के अधिकार पर चर्चा करते समय हमें भारतीय महर्षियों द्वारा आयु के चार प्रकारों पर भी विचार करना होगा जो जीवन की सार्थकता को केंद्रित कर वर्गीकृत किए गए हैं । ये हैं - हितायु, अहितायु, सुखायु और दुःखायु । जो व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और देश का भी हित करता चले वह हितायु जीवन जीता है । इसके विरुद्ध जीवन अहितायु है । जो व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए जीता हो वह सुखायु जीवन जीता है जबकि दुःखायु जीवन वाला स्वयं भी दुःख पाता है और अन्य लोगों को भी दुःख देता है । हमें जीवन की सार्थकता और उपादेयता का इसी संदर्भ में विचार करना होगा ।

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