विकास का गांधीवादी नजरिया: प्रकृति, प्रेम और मनुष्यता का साझा भविष्य

निशांत राहुल

शोधार्थी (स्त्री अध्ययन विभाग)
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
ईमेल: apnaemailpata@gmail.com

दुनिया में हरेक की जरुरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीजें हैं लेकिन हरेक के लालच को पूरा करने के लिए नहीं। - महात्मा गांधी

‘आधुनिक विकास मॉडल’ यानी ‘एक रेखीय विकास मॉडल’ स्थापित होने के साथ ही पर्यावरण के संकट का भी सवाल पैदा हुआ। भले ही यह सवाल अपने शुरूआती दौर में एक अलहदा सवाल रहा था, लेकिन समय के साथ ही इस सवाल ने मनुष्य के बचे रहने का सवाल बना दिया। मनुष्यता के इस आसन्न संकट को बहुत दिनों तक टाला या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, और इसीलिये मनुष्यता के शुभचिंतकों (विकसित देशों के रहनुमा) का एकजुट होना शुरू हुआ। विकसित देशों के इन रहनुमाओं ने अपने साथ उन्हें भी शामिल किया जिनको इस संकट का कोई भान नहीं था, जो विकास के अपने देसी मंथर चाल में मस्त थे। और जिनके यहाँ पृथ्वी के तापमान से कहीं अधिक गर्म था मनुष्य का पेट। लेकिन वह अपनी क्षुधापूर्ति के लिए के लिए प्राकृतिक संसाधनों को तहस-नहस नहीं कर रहा था और न ही उसका भरपूर दोहन। प्राकृतिक संसाधनों का सर्वाधिक दोहन विकसित होते जिन राष्ट्रों ने किया वे ही विकास का ककहरा पढ़ने वाले राष्ट्र-राज्य पर यह आरोप लगाने कि इनके यहाँ जो जनसंख्या है, जो लोग हैं उसने प्रकृति का सारा माहौल बिगाड़ दिया है। ‘प्रकृति के बिगड़ते माहौल’ में मनुष्यता का दीर्घजीवी होना मुश्किल होता जा रहा है। पर्यावरण के इस संकट से हर कोई बहुत जल्दी पार पा लेना चाहता था, लेकिन “कैसे?” का सवाल अनुत्तरित था? एक अलहदा सा सवाल जो 1970 के दशक में शुरू हुआ, और बीसवीं सदी के अंत में गंभीर सवाल बन गया। इस गुरु गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए हर कोई गंभीर था। गंभीरता इतनी कि सत्ताओं ने इसे व्यक्तियों तक पहुँचा दिया। और व्यक्तियों ने इसे आत्मसात कर लिया और घर का आंगन, आंगन क्या बालकनी और छत ‘बोनसाई पौधों’ से घिर गए। क्योंकि ताकतवर राज्यसत्ताएँ जल्द से जल्द हल कर देना चाहती थी इस समस्या का हल। ताकतवर सत्ताएँ अभी ‘विकास का पाठ’ पढ़ रहे कम ताकतवर सत्ताओं पर तोहमत मढ़ देना चाहते थे, और उन्होंने इसे सरेआम मढ़ा भी। विकास की वृद्धि दर में हाँफते और तेजी से नापते विकासशील देशों ने इसे सहर्ष स्वीकार भी किया। विकास के इस खेल विकासशील देशों ने अम्पायर की भूमिका निभाने वाले विकसित सत्ताओं (राष्ट्र-राज्य) के निर्णयों पर कभी भी सवाल नहीं उठाया, और न ही संदेह किया।

    पर्यावरण का यह संकट 21वीं सदी में मनुष्य-जीवन के लिए एक संकट के तरह आता है। और सत्ता संरचनाएँ अपने हर नागरिक को इस संकट से रूबरू करा देना चाहती हैं और अपनी जिम्मेदारी  से मुक्त भी। चूंकि यह संकट विकसित और विकासशील राज्य-राष्ट्रों द्वारा लाया गया है इसलिए नागरिकों को इस संकट की इत्तला देने भर से राज्य-राष्ट्र मुक्त नहीं हो जाते। विकसित राष्ट्रों ने विकासशील राष्ट्रों पर दबाव डाला और पर्यावरण संरक्षण का नारा बुलंद किया। विकराल होते इस पर्यावरण-संकट से निजात पाए बिना मनुष्य के स्वास्थ्य एवं दीर्घजीवी होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए ये सवाल लाजमी हैं कि पर्यावरण को आधुनिक जीवन शैली ने किस तरह से प्रभावित किया, मनुष्यता के संकट को कैसे टाला जाये, और कैसे विभिन्न जीवन शैलियों एवं जीवन मूल्य को बचाया जाये?

 विकास की भेंट चढ़ते पर्यावरण पर बातचीत करने के लिए 1972 में स्वीडन के शहर ‘स्टॉकहोम’ में एक बैठक आयोजित की गई जिसके केंद्र में ‘एक ही पृथ्वी’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया और जिसे 119 देशों ने स्वीकार भी किया। लेकिन विकास के आपाधापी और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन व लूट ‘एक ही पृथ्वी’ का सिद्धांत महज ‘कागजी घोड़ा’ बनकर दौड़ता रहा। और यह कागजी घोड़ा हमें नित नए पैतरे बताता और अपनी चालें चलता, समस्या को हल करने के लिए। दुनिया भर के हुक्मरान भी पांच-दस सालों में एक बार बैठकर पर्यावरण की समस्या को एक समस्या की तरह ही हल कर लेना चाहते हैं, लेकिन समस्या ऐसी की हल होने का नाम ही नहीं लेती।

वर्तमान समय में जैसे-जैसे विकास की जीडीपी बढ़ रही है, वैसे-वैसे जीवन-प्रत्याशा घट रही है एवं पृथ्वी का लगातार बढ़ता तापमान अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पृथ्वी के गर्म होने का मतलब वायुमंडल के गर्म होने से है, और वायुमंडल का गर्म होना मनुष्यता का गर्म होना है। लेकिन यह बहस पश्चिम बनाम पूर्व के जीवन-मूल्य व जीवन-दर्शन के केंद्र पर आकर ठहरती है। प्रश्न यह है कि जब विकास पसंद समाज व दुनिया की तरक्की की बात हो रही है तो सवाल मनुष्यता के बचे रहने व दीर्घजीवी होने का भी है, जबकि हो इसके उलट रहा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट इस कदर मची हुई है कि मनुष्यता ही खतरे में पड़ गयी है। यानी मनुष्य के सकुशल स्वस्थ बचे रहना पिछले सदी की बात लगने लगी है, इसलिए पर्यावरण के संदर्भ में जो भी चिंताएँ हैं वह अनायास नहीं हैं, बल्कि यह अपने अस्तित्व के बचे रहने का, जीवन- प्रत्याशा को कम होने से बचाने का, एवं दीर्घजीविता के दर्शन व मूल्य को प्रस्थापित करने का एक सहज प्रबोध है। लेकिन वर्तमान समय में हो इसके उलट रहा है। जैसे-जैसे मनुष्य सुविधाभोगी होता जा रहा है वैसे-वैसे उसकी जीवन-प्रत्याशा लगातार घट रही है। यहीं कारण कि  पर्यावरण संकट पर बात हो रही है और साथ ही ‘आधुनिक जीवन-मूल्य’ (औद्योगिक विकास के फलस्वरूप जो जीवन-मूल्य बने हैं) पर भी विमर्श हो रहा है। जीवन-मूल्यों के इस विमर्श में गांधी के जीवन-मूल्यों को एक आदर्श के रूप में देखा जा रहा है जो सहज जीवन के लिए प्रकृति और मनुष्य के सहअस्तित्व की बात करते हैं।

गांधी कोई पर्यावरणविद या विशेषज्ञ नहीं थे। उनका जीवन-मूल्य ही इस बात की गवाही देता है कि वे प्रकृति के प्रति कितने मितव्ययी थे। उन्होंने ताउम्र प्राकृतिक संसाधनों का पुनर्भरण एवं न्यूनतम उपयोग किया। इस संदर्भ में उनकी एक सूक्ति वाक्य जो ऊपर लिखी गई है सर्वोत्तम उदाहरण है। गांधी का जीवन-मूल्य अस्तित्वमूलक है। यानी मनुष्य और मनुष्येतर के एकत्व में विश्वास।  सबको अपने अस्तित्व को बचाए रखने के विचार के साथ गांधी द्विज में नहीं बल्कि अद्वैत दर्शन में विश्वास रखते थे, इसलिए प्रकृति का क्षरण नहीं बल्कि उसके साथ वे साहचर्य का संबंध के हिमायती थे। गांधी कहते हैं- “मैं अद्वैत में विश्वास करता हूँ, मैं मनुष्य की मूलभूत एकता में भी और केवल मनुष्यों की ही क्यों सभी जीवधारियों की एकता में विश्वास करता हूँ। इस कारण मेरा तो ऐसा यकीन है कि एक मनुष्य के अध:पतन के साथ इस हद तक सारे संसार की अधोगति होती है।”  वे आगे कहते हैं- “मैं केवल मानवों के साथ ही तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना नहीं चाहता अपितु पृथ्वी पर रेंगने वाले कीड़ों-मकोड़ों के साथ भी तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना चाहता हूँ।... क्योंकि हम सभी उसी ईश्वर की संतान है और इसलिए जीवन जिस रूप में भी दिखाई देता है, तत्वतः एक होना चाहिए।”

गांधी जी कोई पर्यावरण विशेषज्ञ नहीं थे लेकिन प्राकृतिक नियमों के अनुरूप वे एक ऐसी जीवन पद्धति के पक्षधर जरूर थे जो नैसर्गिक रूप से पर्यावरण संरक्षण की हितैषी हो। खादी, अहिंसा, स्वच्छता और सफाई उनका रचनात्मक कार्य है। और यही रचनात्मकता उनके जीवन-मूल्य को निर्धारित करते हैं। गांधी के शाश्वत जीवन-मूल्य आज भी विश्व भर में सराहे जाते हैं। ’प्रकृति पर विजय’ और दुनिया को एक ही ‘तथाकथित विकास’ के चश्मे से देखने वाली नीति पर सबसे पहले महात्मा गांधी ने ही सवाल खड़ा किया था- ‘‘ईश्वर ही बचाए अगर भारत को कभी पश्चिम की तर्ज पर औद्योगीकरण करना पड़े। एक अकेले छोटे से द्वीप (इंग्लैंड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज दुनिया को जंजीरों में बांध रखा है। अगर तीस करोड़ लोगों का एक पूरा राष्ट्र वैसा ही आर्थिक दोहन शुरु करता है तो यह दुनिया को टिड्डियों की तरह ठूँठ करके छोड़ देगा।”  वर्तमान समय में विकास का एक रेखीय मॉडल ही अपनी सार्वभौमिक सत्ता स्थापित करता जा रहा है। और इसी कड़ी में ‘विकास’ के इस वर्चस्व को तीसरी दुनिया में भी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। तीसरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और परोक्ष रूप से लोगों की जिंदगियों पर किए जा रहे दमनात्मक नियंत्रण (जल, जंगल, जमीन के संबंध में) ने भूमंडलीकरण की प्रचलित अनिवार्यता के खिलाफ एक प्रतिरोधी चेतना को जन्म दिया है। इसी चेतना की वजह से चिपको आंदोलन, नर्मदा बांध आंदोलन, टिहरी बांध आंदोलन आदि आंदोलनों का जन्म हुआ। इस तरह का कोई भी आंदोलन विकास के विरोध में नहीं था बल्कि अपने जैव-परिस्थितिकीय व पर्यावरण को बचाने का था। यानी विकास का मॉडल एकरेखीय न हो बल्कि विकास की जो भी परिघटना है वह स्थानीय जैव पारिस्थितिकीय व पर्यावरण को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए। लोगों को अपने जैव संपदा व जैव पारिस्थितिकी को बचाना अपने जीवन को बचाना है व अपने जीवन मूल्यों के साथ खड़े होना का है। विभिन्न जीवन रूपों के अपने-अपने जीवन-मूल्य व आदर्श हैं। अपनी अपनी विश्व-दृष्टियाँ है। जीवन जीने का अपना ढंग है। लेकिन हम विकास और आधुनिकता के नाम पर किसी समुदाय, समाज को एक खास तरीके से जीने को बाध्य करते हैं। और उसे अपने सांस्कृतिक संरचना व जैव पारिस्थितिकीय से दूर करने का सायास और अनायास दोनों रूपों में प्रयास करते हैं। गांधी जी इससे इत्तफाक रखते थे।

गांधी जी ने 1937 में अपने वर्धा आगमन के बाद गांवों की पुनर्रचना के संदर्भ में ‘हरिजन’ में एक लेख लिखा जिसमें आदर्श भारतीय गाँव को परिभाषित किया। “गाँव में पर्याप्त रोशनी एवं हवादार घर होंगे। इनको बनाने की सामग्री 5 मील के दायरे के भीतर से ही आएगी। घरों में आंगन होगा जिसमें परिवार के लोग घरेलू उपयोग के लिए सब्जियाँ एवं पशुओं के लिए चारा उगाएंगे। गांव की नालियाँ व गलियाँ साफ सुथरी होगी। सभी लोगों की आवश्यकताओं एवं पहुँच के अनुकूल कुएँ होंगे। सभी के प्रवेश के लिए खुले पूजा स्थल होंगे। साथ ही एक सार्वजनिक स्थान होगा, जहाँ लोग आपस में मिल सकें, सहकारी डेयरी (दुग्धशाला) होगी, प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालय होंगे, जिसमें रोजगारोन्मुखी शिक्षा दी जाएगी, तथा विवाद निपटारे के लिए पंचायत होगी। यह गाँव अपनी आवश्यकता का अन्न, फल, सब्जियाँ, खुद उपजाएगा। यही मेरे आदर्श गांव का चित्र है।”  गांधी के इस ग्राम-मॉडल में पर्यावरण का वह यूटोपिया मौजूद है जिसका पूर्ण होना वर्तमान समय व विकास के तथाकथित आधुनिक मॉडल में असंभव जान पड़ता है। लेकिन गांधी अपने यूटोपियन विचार को महज एक यूटोपियन सपना भर नहीं मानते थे वे इसे यथार्थ के धरातल पर फलीभूत करने के लिए लगातार प्रयास भी करते थे।

गांधी जीवन में मशीनीकरण के विरोध में नहीं थे लेकिन वे यह मानते थे कि मशीनों का अत्यधिक उपयोग मनुष्य को प्रकृति से बहुत दूर ले जाएगा। उन्होंने कृषि के तीव्र मशीनीकरण के प्रति आगाह किया था- “जल्दी लाभ पाने के लिए मृदा उर्वरता में व्यापक भयानक व अदूरदर्शी नीति सिद्ध होगा। इसका परिणाम मृदा के सामान्य रिक्तिकरण के रूप में होगा।”  गांधी विकास को किसी ‘खास प्रतिमान’ (पैराडाइम) में नहीं देखते थे, बल्कि वह जैव-पारिस्थितिकी व मौजूद संसाधनों के अंतर्गत ही विकास को विकसित करने के लिए केन्द्रीयकरण की नहीं बल्कि विकेन्द्रीयकरण की बात करते थे। 1935 में इंदौर के एक सभा में संसाधनों के केन्द्रीयकरण की चेतावनी दे चुके थे जिस पर शहरी जीवन आधारित हो चुका था। उन्होंने कहा था कि- “हम इस सुंदर पंडाल में बिजली की रोशनी की चकाचौंध में बैठे हैं लेकिन हम नहीं जानते कि हम इस रोशनी को गरीबों की कीमत पर जला रहे है।”

गांधी के इसी विकेंद्रीकरण की पक्षधरता को नंदिनी सुंदर ने भी मानने के लिए सरकार से सवाल किया। इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ का एक उदाहरण दृष्टव्य है- नंदिनी सुंदर और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के संदर्भ में एक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- “आजादी के बाद विकास के जिस प्रतिमान (पैराडाइम) को अपनाया गया, उसने समाज में हाशिए पर पड़े तबकों में पहले से मौजूद असंतोष को और भी ज्यादा बढ़ाया...। नीति-निर्माताओं द्वारा तय किए गए विकास के प्रतिमान को इन समुदायों पर थोप दिया गया... इससे इन लोगों को अपूर्णनीय क्षति हुईं। इस विकास प्रतिमान की अधिकांश कीमत गरीबों ने चुकाई, लेकिन इसके फायदों के बड़े हिस्से पर समाज के प्रभुत्वशाली तबके का कब्जा होता रहा है और गरीबों को बहुत ही कम फायदा मिला है। दरअसल, विकास इन समुदायों की जरूरत के प्रति असंवेदनशील ही रहा है। इस कारण इन्हें अनिवार्य रुप से विस्थापन का सामना करना पड़ा है और इसने इन्हें अमानवीय जिंदगी जीने को मजबूर किया है। खासतौर पर आदिवासियों के मामले में इसने उनके सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों को नष्ट किया है... विकास के तरीके और इसके  क्रियान्वयन ने नौकरशाही के भ्रष्ट व्यवहार और ठेकेदारों, बिचौलियों, व्यापारियों और व्यापक समाज के लोभी तबकों द्वारा किए जाने वाले खूँख्वार शोषण को और भी ज्यादा बढ़ाया है जो इनके संसाधनों पर कब्जा करने और उनकी गरिमा का हनन करने पर उतारू हैं।”

गांधी जी औद्योगिक विकास के विरोधी नहीं थे लेकिन वे औद्योगिक केन्द्रीयकरण से सहमत नहीं थे। वे विकास को जैव-पारिस्थिकीय व मनुष्य के जरूरत के हिसाब से देखते हैं। गांधी दर्शन में निहित औद्योगिक विकेन्द्रीयकरण का सिद्धान्त इस दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। केन्द्रीकृत औद्योगिक व्यवस्था के अन्तर्गत किसी क्षेत्र विशेष से संसाधनों का दोहन, फिर उसका किसी औद्योगिक केन्द्र तक स्थानान्तरण, संयन्त्रों से कच्चे माल के उपयोग से वस्तु विशेष का उत्पादन और अन्ततः विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादित वस्तु का संभरण-इस प्रक्रिया शृंखला का प्रत्येक पग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पर्यावरण प्रदूषण में सहायक है। इससे प्रदूषण बढ़ता है एवं ऊर्जा का अपव्यय होता है। विकेन्द्रित कुटीर-उद्योग इन समस्याओं का हल है। इससे यह स्पष्ट है कि औद्योगिक विकेन्द्रीयकरण से उत्पन्न सांस्कृतिक वैविध्य पर्यावरणीय सन्तुलन को बनाये रखते हुए संपूर्ण तंत्र के स्थायित्व को बल प्रदान करेगा। गांधी जी विकास के एक रेखीय मॉडल (यूरोपीय व अमरीकी मॉडल) का मुखालफत प्रारम्भ से करते रहें हैं।

 वे विकास को जैव-पारिस्थितिकीय तंत्र से देखते हैं। हिन्द स्वराज में वे इसकी दार्शनिक व्याख्या भी करते हैं। 1926 में यंग इंडिया में उन्होंने लिखा था- ‘‘भारत को इंग्लैंड और अमेरिका जैसा बनाने का मतलब धरती पर नई नस्लों और जगहों को उत्पीड़न के लिए खोजना है, क्योंकि पश्चिमी राष्ट्रों ने पहले से ही दोहन के लिए यूरोप से बाहर की सभी ज्ञात नस्लों का ही बंटवारा कर लिया है और अब खोजने के लिए कोई नई दुनिया नहीं बची है। उन्होंने साफ-साफ पूछा था-  पश्चिम की नकल करने की कोशिश करने वाले भारत की गति क्या हो सकती है?”  पर्यावरण प्रदूषित न हो इसके लिये गांधी जी ने ग्राम ‘सुराज’ की कल्पना की थी। ‘हरिजन सेवक’ में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है कि हर एक गाँव का प्रथम कार्य यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिये कपास खुद पैदा करे। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिये जिसमें पशु चर सकें और गाँव के बड़ों तथा बच्चों के मन-बहलाव के साधन और खेल-कूद के मैदान वगैरह का बंदोबस्त हो सकें, उन्होंने कहा था कि हर गाँव को पूर्ण रूप से एक आत्मनिर्भर इकाई होना चाहिये। गांधी का यही जीवन-दर्शन व जीवन-मूल्य मनुष्यता की हिमायती हो जाती है।

मनुष्यता असल में मनुष्य होने की सीमाओं का अतिक्रमण है। सभ्यता की पूरी यात्रा में मनुष्य ने अपने होने के कुछ मूल्य निश्चित किये हैं। और मुश्किल से मुश्किल हालातों में भी उन मूल्यों पर आस्था एवं मानवीय कमजोरियों से परे उनका जीवन- व्यवहार ही मनुष्यता के पैमाने बने हैं। यद्यपि इस प्रक्रिया में प्रकृति के बरक्स मनुष्य के श्रेष्ठता बोध का एक भाव भी हमारे भीतर पनपता है। और इसी के चलते मनुष्य होना ही प्रकृति एवं अन्य प्राणियों पर मनुष्य के नियंत्रण पर अधिकार पत्र हासिल करने जैसा हो जाता है। खुद को प्रकृति से अलग एवं श्रेष्ठ घोषित कर शुरू हुई यह यात्रा अंततः मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ एवं निम्न की भावना को जन्म देती है। यानी मनुष्य अपने को प्रकृति विजयी कहलाने का हकदार समझने लगा है। ऐसे में प्रकृति से विछिन्न इस मनुष्य एवं मनुष्यता के बचे रहने पर सवाल खड़े होने लगे हैं। ऐसे समय में हमें इस प्रकृति से विच्छिन्न मनुष्यता पर विचार करने की जरूरत महसूस होती है। चूँकि यूरोपियन आधुनिकता व औद्योगिक विकास दोनों का समय एक है और इस समय विभिन्न संकल्पनाओं व धारणाओं को भी परिभाषित किया जा रहा था, इसलिए प्रकृति से विच्छिन्न मनुष्यता की अवधारणा भी बहुत मुखर रही। ऐसे समय में गांधी आधुनिकता के इस विशिष्टता व वर्चस्वशाली धारणाओं का नकार रचते हैं। प्रकृति पर मनुष्य की श्रेष्ठता की अवधारणा सार्वभौमिक तथ्य की तरह स्थापित किया जा रहा था। ऐसे समय में गांधी आधुनिकता एवं मनुष्यता का एक नया विकल्प, लेकर आते हैं जो प्रकृति के साथ संघर्ष की नहीं बल्कि साहचर्य की बात करता है। मनुष्य प्रकृति का नियंत्रक या गुलाम नहीं, बल्कि उसका साहचर्य है, अविभाज्य है। और एक के बचे रहने पर ही दूसरे की बचे रहने संभावना है। गांधी अपनी इन अवधारणाओं को जीवन व्यवहार में उतारते हैं और दुनिया के सामने एक नजीर पेश करते हैं।

गांधी के धर्म और आत्म चेतन की अवधारणाओं की एक नई समाज वैज्ञानिक व्याख्या की जा सकती है जो हमारे जरूरतों के भीतर से एक जरूरी मांग की तरह प्रकट हो रही है। इसके दो पहलू हैं- पहला यह कि वित्तीय पूंजीवादी समाज में पूंजी और ‘पर्यावरण’ दोनों प्राकृतिक संसाधनों के उत्पादन-पुनरुत्पादन से जुड़ा हुआ है जो कि मुनाफ़ावादी संस्कृति से अलग नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में एक सीमा तक इससे आजाद होने की लगातार कोशिश भी जरी है। और यह कोशिश लाभ से अलग कुछ और नहीं है। लाभ का यह सापेक्षतावादी सिद्धांत इस व्यवस्था के सामने मौजूद इनके भयावह रूप से संकटग्रस्त हो जाने की हालात का दूसरा पहलू है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट की एक सीमा है, इसके पार उसका दोहन-शोषण का मतलब है पर्यावरण के प्राकृतिक संतुलन व उसके वजूद को खतरे में डालना। इसी तरह पूंजीवादी मुनाफे की भी एक सीमा है, और यह मुनाफा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के एक सीमा के स्थिर होने की भी है, लेकिन इससे पहले ही प्रकृति का संतुलन जबाब दे देगा, जबकि इसके बरक्स विकास का दूसरा मॉडल है जो एकरेखीय विकास की अवधारणाओं से इतर स्थानीय आधार पर ‘प्राकृतिक संसाधनों’ के आत्मशोधी और आत्मोत्पादक रूपों को खोजकर प्रकृति के साथ अंतर्संबंध स्थापित करने की स्वतंत्रता है। गांधी जी इसी अंतर्संबंध की बात करते हैं जिससे मनुष्यता को बचाया जा सकता है।


  1. यंग इंडिया, अप्रैल 4, 1929
  2. विद ए कैपिटलिस्ट, यंग इंडिया, दिसम्बर 20, 1928 
  3. हरिजन, जनवरी 9,  1937
  4. हरिजन, अगस्त 8, 1946
  5. समयांतर अगस्त 2011 पृष्ट 13-14
  6. द सेम ओल्ड आर्ग्युमेंट, यंग इंडिया, जून 2, 1927

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