मधु काँकरिया कृत उपन्यास 'सेज पर संस्कृत' में नारी चेतना

- संगम वर्मा

उपन्यास की जानकारी
सेज पर संस्कृत- मधु काँकरिया
पहला संस्करण : 2010
पहली आवृत्ति : 2014
राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली-110002
पेपरबैक
मूल्य- ₹ 200.00
ISBN-978-81-267-1870-2

धार्मिक आडम्बरों के चक्रव्यूह में फँसी स्त्री मन की व्यथा 
 ('सेज पर संस्कृत' उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में)

स्त्री प्रत्येक युग में समाज एवं साहित्य का अभिन्न अंग रही है। समाज और साहित्य से स्त्री को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। साहित्य, कला और दर्शन से स्त्री का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है कि उसके अभाव में सभ्यता की कल्पना संभव नही है। पुराणों और संस्कृत महाकाव्यों में स्त्री अत्यन्त गरिमामयी रुप में चित्रित हुई है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में स्त्री को अत्यन्त गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है तथा उसे देवी के समान स्थान दिया गया है- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" अर्थात् जहाँ नारियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, वहाँ स्वयं ईश्वर का निवास होता है।

                                आगे चलकर जैसे-जैसे परिस्थितियों में परिवर्तन आता गया, स्त्री के प्रति समाज के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आता गया। जहाँ वैदिक युग में स्त्री को अत्यन्त गौरवपूर्ण स्थान मिला था, वहीं उसके बाद स्त्री के गौरव का निरन्तर अवमूल्यन होता रहा। जो स्त्री देवी थी अब वह मानवी बनकर रह गई। धीरे-धीरे पुरुष-प्रधान समाज अपने प्राचीन आदर्शों को भूलने लगा। अब पुरुष के लिए स्त्री मात्र भोग्या रह गई। पुरुष अपनी स्वच्छन्दता का उपभोग करता रहा तथा स्त्री वर्जनाओं की परिधि में क़ैद रही।

उपन्यासकार: मधु काँकरिया
                                प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखिका सीमोन के अनुसार "स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है"। स्त्री को बचपन से ही मानसिक तौर पर उसके स्त्री होने का अहसास दिलाया जाता है। पितृ-सत्तात्मक समाज स्वयं की सत्ता को बनाये रखने के लिए स्त्री को जन्म से ही अनेक नियमों से घेर देता है। सीमोन लिखती हैं, "औरत जन्म से ही औरत नहीं होती, बल्कि औरत बनाई जाती है। कोई भी जैविक, मनोवैज्ञानिक या आर्थिक नियति आधुनिक स्त्री के भाग्य की अकेली नियन्ता नहीं होती।" 1

                                जैसे-जैसे पश्चिमी चिन्तन तथा जीवन-शैली का प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ा वैसे-वैसे स्त्री वर्जनाओं को तोड़ने में सक्षम होने लगी। शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तनों से स्त्री की स्थिति में परिवर्तन आने लगा। आधुनिक शिक्षित स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुई, जिससे वह प्राचीन रुढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास करने लगी। आधुनिक युग में आर्थिक उदारीकरण, सूचना-प्रसारण की नई विधियों आदि ने साहित्य को पूर्णरुपेण परिवर्तित कर दिया। पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव तथा नवीन सांस्कृतिक बोध के कारण नवीन दृष्टि का जन्म हुआ। पुरुषों के वर्चस्व का खंडन हुआ तथा हाशिए पर धकेल दी गई स्त्री समाज में अपना खोया हुआ स्थान ढूँढ़ने लगी। यहीं से स्त्री विमर्श की शुरुआत होती है। मूल रुप से स्त्री-मुक्ति के आस-पास केंद्रित रहने वाला साहित्य स्त्री विमर्श माना गया है। हिन्दी-साहित्य के स्त्री विमर्श के सम्बन्ध में कृष्णदत्त पालीवाल लिखते हैं, "स्त्री की व्यथा पर आधुनिक काल के सभी रचनाकारों ने लेखनी उठाई है। ... लोक हृदय और लोक चिन्ता रचनाकर्ता की सच्ची पहचान है। ... साहित्य हमारे मानुष भाव की रक्षा का प्रयत्न है-जो हमें बेहतर मनुष्य बनाता है-भाव परिष्कार करता है और मनुष्यता की उच्च भूमि पर ले जाकर खड़ा कर देता है।" 2

डॉ. संगम वर्मा
                                समाज स्त्री को स्त्री बनाये रखने के लिए लगातार वातावरण तैयार करता रहता है लेकिन आज की स्त्री पितृ-सत्तात्मक समाज, दोहरे मापदंडों एवं स्त्री-पुरुष के लिए बनाए गए अलग-अलग नियमों का विरोध कर रही है। विरोध के ये स्वर हिन्दी-साहित्य में आसानी से सुने जा सकते हैं।

                                हिन्दी-साहित्य के विकास में महिला लेखिकाओं का अमूल्य योगदान रहा है। इन महिला लेखिकाओं के साहित्य में स्त्री-जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं का चित्रण हुआ है। इनमें एक महत्त्वपूर्ण नाम मधु काँकरिया का है, जो समकालीन महिला कथाकारों में राजी सेठ, सुषम बेदी, अलका सरावगी, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, कुसुम कुमार अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं । समकालीन महिला कथाकारों में सम्भवतः इन्हीं का कथा-साहित्य सबसे अधिक चर्चित हुआ। इन्होनें अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त परम्परावादी विचारधारा एवं सड़ी-गली कुरीतियों का खुलकर विरोध किया है। इनकी रचनाओं में भारतीय समाज का यथार्थ चित्रण हुआ है। इनकी रचनाएँ भारतीय समाज के भीतर टूटते हुए आदर्शों एवं मान्यताओं का प्रतिबिम्ब है। इस सम्बन्ध में डॉ. शोभा पालीवाल का कथन है, "रचनाकार अपनी रचनाओं में वही सब तो कहना चाहता है, जो अन्य कहीं जोरदार शब्दों में नहीं कहा जा सकता। कहने के प्रति जो उद्दाम लगाव है, वह सामाजिक सरोकारों और उनसे अपनी चिन्ताओं का कारण है। क्षमता के साथ विचार आता है, वह पाठक वर्ग को उस चिन्ता से जोड़ता है, जो चिन्ता रचनाकार की चिन्ता है, जो चिन्ता हर एक सामाजिक व्यक्ति की चिन्ता है। इसलिए रचना में आया हुआ समाज, वह समाज नहीं होता, जिसे हम अपनी आँखों से देख रहे हैं, बल्कि वह समाज होता है, जिसे हम नित्य देखकर भी अनदेखा करते हैं। रचना का महत्त्व यही है कि वह हमारे समाज को, समाज के उन अवयवों को और उन बिन्दुओं को हमारे सामने खोलकर रखता है, जिन पर हमारी दृष्टि उस रुप में कभी नहीं गई, जिस रुप में रचनाकार की दृष्टि ने उसे देखा है।"3

                                मधु काँकरिया के कथा-साहित्य में स्त्री-जीवन के संघर्ष का चित्रण किया गया है। इनका साहित्य जीवन की उस कड़वी सच्चाई का प्रतिबिम्ब है, जिससे वर्तमान समय में स्त्री का सामना हो रहा है। इनके द्वारा रचित 'सेज पर संस्कृत' उपन्यास में स्त्री विमर्श को अत्यन्त दृढ़ एवं सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है साथ ही जैन धर्म के मनुष्यविरोधी होते जाने का प्रामाणिक एवं तर्कपूर्ण विश्लेषण किया गया है। यह उपन्यास जैन धर्म में साध्वियों के जीवन की स्थिति तथा उनके संघर्ष का मर्मस्पर्शी चित्रण करता है। इस उपन्यास में निडर, संघर्षशील, धैर्यवान एवं अन्ततः विद्रोहिणी बन चुकी नारी की आंतरिक पीड़ा का मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है। भारत एक धर्मप्रधान देश है। ऐसे देश में एक नारी का जीवन कितना यातनामय एवं भयावह हो सकता है-इस उपन्यास में इसी यातना गाथा का चित्रण किया गया है।

                                'सेज पर संस्कृत' उपन्यास में एक ऐसे परिवार का चित्रण किया गया है, जिसके मुखिया और पुत्र ऋषि की असामयिक मृत्यु हो जाने के कारण माँ पूर्णिमा देवी पर सारे उत्तरदायित्व आ गये है। उसकी दो पुत्रियाँ हैं और घर में कोई पुरुष नहीं है, जो परिवार को सुरक्षा प्रदान कर सके। वह कहती है, "अरे जिस समाज ने चार भुने हुए चने के लिए धर्मात्मा तुलसीदास को भी नहीं छोड़ा वह हमें क्या बख्शेगा?"4

                                उसका विश्वास है कि इस संसार में रोटी तो मिलेगी लेकिन उसकी कीमत बोटी देकर चुकानी पड़ेगी, "घर में कोई मर्द होता तो क्या ऐसे बोलने की हिम्मत कर सकता था वह? यह आदमियों की दुनिया है जो रोटी तो देगी पर बोटी नोच लेगी। फटी चदरी-सा यह घर अब न तुम्हारे सँभले-सँभलेगा और न मेरे।" 5

                                आर्थिक समस्या के कारण माँ पुत्रियों को लेकर असुरक्षा की भावना से इस सीमा तक ग्रस्त हो जाती है कि वह अध्यात्म को ही अपनी पुत्रियों का मुक्तिमार्ग समझने लगती है। इसलिए वह साध्वी बन जाना चाहती है। वह चाहती है कि उसकी पुत्रियाँ संघमित्रा और छुटकी भी इसी मार्ग को अपना लें, जिससे उनका जीवन सुरक्षित रह सके एवं माँ को भी उसके उत्तरदायित्वों से सम्मानसहित मुक्ति प्राप्त हो जाए। वह कहती है, "कितनी वाहियात चीज़ है यह शादी। मैं नहीं चाहती कि तुम इसमें फँसो, मेरी ही तरह विधवा हो और तिल-तिलकर अपने बच्चे को मरते हुए देखो। संसार में रहने का मतलब ही है - दुखों के दलदल में फँसना।"6

                                संघमित्रा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है। वह विवाह को एक सामाजिक संस्कार मानती है और इस बात का समर्थन नहीं करती कि सारा परिवार दीक्षा ले ले। वह माँ को समझाने का प्रयास करती है, "तुमने तो धर्म को, लोमड़ी की तरह चालाक बना दिया है। जीवन मुश्किल लगे तो धर्म का लबादा डाल लो। सोचो माँ, तुम्हारा डर और असुरक्षा बोध इस कारण है कि घर में कोई पुरुष नहीं। तुम्हें लगता है कि तुम अपने बूते हमारे लिए पति का जुगाड़ नहीं कर पाओगी तो इन्हें धर्म रुपी पति के हवाले कर दो। पर हमें न पति चाहिए न घर। हमें बस थोड़ा-सा भरोसा दो जिससे हमारे पंखों को मजबूती मिल जाए, फिर हम अपना आसमान ख़ुद ढूँढ़ लेेगें। औरत होने के भय से तुम खुद भी मुक्त हो जाओ और हमें भी मुक्त कर दो।"7

                                संघमित्रा साध्वी जीवन एवं दीक्षा के विरुद्ध है। वह अपनी ग्यारह वर्षीया छोटी बहन को दीक्षा से बचाना चाहती है। उसके अनेक प्रयासों के बावजूद माँ का पलड़ा भारी पड़ जाता है। आक्रोश और हताशा में संघमित्रा कहती है, "माँ तुम्हारा वैराग्य यदि जीवन के प्रति स्वाभाविक विरक्ति, किसी बड़ी रोशनी में आने की व्याकुलता, तत्त्व चिन्तन या परम की प्राप्ति के लिए होता तो मैं विरोध नहीं करती। मैं आगे बढ़कर खोल देती सारे दरवाज़े-लो उड़ो, जितना ऊँचा उड़ सकती हो तुम। पर तुम्हारे ख़्वाबों ने पटरी इस कारण बदली कि अंधेरा तुम्हारी आत्मा तक फैल गया है कि इस उजड़े घर में तीन खाने वाले और कमाने वाला कोई हाथ नहीं। तुम्हें संसार-असार तब जान पड़ने लगा, जब पाँच रुपयों की आमदनी के लिए तुम्हें दिन भर पापड़ बेलने पड़ गए। जब ज़िन्दगी तुम्हें डराने लगी तो तुमने धर्म की चादर ओढ़ ली।"8

                                संघमित्रा के समझाने का माँ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और माँ घर पर रहकर ही साध्वी जीवन की शुरुआत कर देती है। घर में सूर्यास्त के पश्चात् आहार ग्रहण न करने का नियम लागू हो जाता है। छोटी पुत्री छुटकी पर माँ का प्रभाव बढ़ता चला जाता है। वह खेलने-कूदने की आयु में ही धर्म रुपी दलदल में फँसने लगती है। संघमित्रा लाख प्रयास करने के बाद भी छुटकी को माँ के प्रभाव से मुक्त नहीं कर पाती। माँ और छुटकी दीक्षा लेने के लिए कलकत्ता चले जाते हैं। संघमित्रा छुटकी की दीक्षा लेने का विरोध करना चाहती है। वह अपनी सहेली मालविका की सहायता लेती है, जिससे वे संघप्रमुख गुरुदेव श्री जीवसिद्धि से मिलकर इस दीक्षा को रुकवा सके। संघमित्रा उनसे कहती है-

"गुरुदेव जैसे एक वीणावादक का सत्य उसकी वीणा में, नृत्यांगना का सत्य उनके घुँघरुओं में, कुम्हार का चाक में, पक्षी का उड़ान में, वैज्ञानिक का प्रयोगशाला में ... क्योंकि यहीं वे अपनी आत्मा का सर्वश्रेष्ठ उड़ेलकर ... अपना सर्वश्रेष्ठ मानवता को देकर मुक्त हो सकते हैं, मोक्ष पा सकते हैं वैसे ही एक ग्यारह वर्षीय बालिका का सत्य तो उसके खिलौने और उसकी पुस्तक ही हो सकता है। उसके सत्य पर किसी और सत्य का आरोपण करना क्या उसके सत्य के साथ बलात्कार नहीं होगा? जवानी के कपड़े बचपन में नहीं पहने जा सकते हैं गुरुदेव ! आपसे अपेक्षा है ... गुरुदेव कि आप छुटकी ... जी मेरा मतलब है राशि विनायिका की बाल दीक्षा की अनुमति वापस ले लें क्योंकि यह उनके हित के विरुद्ध होगा।" 9

                                लेकिन अनेक प्रयास करने के बाद भी संघमित्रा को छुटकी की दीक्षा को रोकने में सफलता नहीं मिलती। दीक्षा के दिन छुटकी को साध्वी दिव्यप्रभा घोषित कर दिया जाता है और पूर्णिमा देवी को साध्वी मणिप्रभा। मुँह पर श्वेत पट्टी, नंगे पैर, केश लुंचन आदि प्रक्रियाओं से उन्हें गुजरना पड़ता है। संघमित्रा वापस आकर जीवन को पुनः जीने का प्रयास करती है लेकिन वह सुख से जी नहीं पाती। जीवन को नए सिरे से जीने के प्रयास में उसे कुछ कटु अनुभव प्राप्त होते हैं। वह एक साॅफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी करने लगती है, जहाँ का मैनेजर मि. मेहता उससे अश्लील व्यवहार करता है। वह उसे सबक सिखाना चाहती है। वह अपने सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए लड़ाई लड़ती है। वह कम्पनी के एम.डी. से कहती है -

"हाँ सर, इतनी ही सी तो बात है। एक अदना सी स्टाफ की अदना सी इज़्ज़त। अपराध तो सिर्फ़ बलात्कारी और हत्यारे ही करते हैं। इन चमचमाते अफ़सरों की ये सूक्ष्म कमीनी हरकतें अपराध थोड़े ही हैं। ये इनका चारित्रिक पतन नहीं, हल्का-फुल्का दिल बहलाव है और हमें इसका आदी हो जाना चाहिए। इसलिए जिस अपमान ने मुझे हिला डाला, आपको एक हिचकी तक नहीं आई ... क्योंकि आधुनिकता की इस चकाचैंध ने आपको इतना मोटा देखने का अभ्यस्त बना डाला कि नारी स्वाभिमान और सम्मान की ये बारीक हरकतें आप लोगों को दिखलाई ही नहीं पड़ती। पर यदि मेरी जगह आपकी बेटी होती ... तो भी क्या ..."।10

                                आधुनिकता के वर्तमान दौर में स्त्री के सम्मान को ठेस पहंुचते हुए देखकर संघमित्रा स्वयं को आहत महसूस करती है। समाज से प्राप्त हुए कटु अनुभव के कारण वह स्त्री के सम्मान एवं व्यक्तित्व की रक्षा करने के लिए नारी शक्ति संघ की नींव रखती है। वह कहती है, "बाबा, आपकी बात यही है कि कितनी नौकरियाँ बदलूँगी मैं। पर मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ। अपमान की यह रोटी तो मुझसे नहीं निगली जाएगी। जब तक धरती का वह गन्दा धब्बा मुझसे माफी नहीं माँग लेता मैं यहाँ काम नहीं कर पाऊँगी ... न्याय का सूरज अगर उगाना होगा तो आसमान की ओर छलाँग मारने की चोट भी खानी ही पड़ेगी।"11

                                बाद में मि. मेहता उससे लिखित माफ़ी माँगकर वचन देते है कि जीवन में कभी किसी स्त्री के साथ ऐसा दुव्र्यवहार नहीं करेंगे। दूसरी ओर छुटकी अर्थात् साध्वी दिव्यप्रभा पाँच वर्षों तक संन्यासी जीवन में रहने के बाद अपनी बहन संघमित्रा की बातों का मर्म समझ पाती है। उसे साध्वी जीवन के खुरदुरेपन का अहसास होने लगता है, "मन करता है इतना रोए, इतना रोए वह कि आँसुओं से धरती डूब जाए। पर उसकी भी इजाज़त नही है। रोना इस दुनिया में निषिद्ध है। साध्वी रो नहीं सकती। जिसे दुनिया के दुःख छू लें, विचलित कर दें, जो रो पड़े, वह भला कैसी साध्वी? फाँसी खाई शशिप्रभा को देख वह चीख पड़ी थी और फफक-फफक कर रोने लगी थी। तब उसे दंड दिया गया था- तीन उपवास और दो एकासना (एक बेर आहार)।"12

                                दिव्यप्रभा के मन में संसार के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है। वह परिव्रज्या अर्थात् विहार भ्रमण करके अपने जीवन को गतिशील बनाने का प्रयास करती है। उसी समय अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलन में उसे आठ दिनों के लिए बाहर भेजा जाता है। वहीं विजयेन्द्र मुनि और दिव्यप्रभा एक-दूसरे के प्रति आकर्षण में बँध जाते है। विजयेन्द्र मुनि कहते है, "नहीं देवी, तुमने तो सिर्फ़ मुझे आईना दिखाया है ... तुमने तो सिर्फ़ यही सिद्ध किया है कि मैनें स्त्री को जिया नहीं वरन् इसे सिर्फ परे सरका दिया था और इसीलिए स्त्री के प्रथम संसर्ग ने ही मेरी आन्तरिक सत्ता को हिलाकर धर दिया। तुमने सिर्फ मुझे अपने अस्तित्व का नया और गहरा अर्थ महसूस कराया है। आज जान सका हूँ कि बिना स्त्री को जाने जीवन को सम्पूर्णता में नहीं जाना जा सकता है।"13

                                वे दोनों सन्न्यासी जीवन को छोड़ने के लिए तत्पर हैं। विजयेन्द्र मुनि पलायन के स्थान पर संघ प्रमुख के नाम एक पत्र छोड़कर जाना चाहते हैं। इस कार्य के लिए विजयेन्द्र मुनि अपने गुरुभाई अभय मुनि की सहायता लेते हैं। अभय मुनि दिव्यप्रभा को निकालने में सफल हो जाते हैं लेकिन वे दिव्यप्रभा के साथ बलात्कार कर देते हैं और विजयेन्द्र मुनि को सन्देश देते हैं कि दिव्यप्रभा ने उनके साथ पलायन से मना कर दिया। धर्म के नाम पर अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित करने के बावजूद दिव्यप्रभा को बलात्कार जैसी घिनौनी स्थिति का सामना करना पड़ता है। दिव्यप्रभा गर्भवती हो जाती है और संसार की सबसे पापी औरत घोषित करके उसे संघ से निष्कासित कर दिया जाता है। पुत्री पर कलंक लगने से आहत माँ संथारा ग्रहण कर लेती है।

                                अठारह वर्षों के बाद दोनों बहनें पुनः मिलती हैं। अब संघमित्रा सामाजिक कार्यकर्ता बन चुकी है। वह नारी शक्ति संघ की स्थापना कर चुकी है और अब इस संस्था में दस हज़ार महिलाएँ हैं। संघमित्रा का परिचय ऋषिकन्या नामक लड़की से होता है, जो उसे अपने घर ले जाती है। उस लड़की की माँ दिव्यप्रभा है। दिव्यप्रभा बताती है कि संघ द्वारा उसे चाचा को सौंप दिया गया लेकिन चाचा ने भी उसे घर से निकाल दिया। चाचा का दरबान उसे नौकरी दिलवाने का लालच देकर कोठे पर बेच गया। अब उसे कैंसर हो चुका है और वह संघमित्रा को ऋषिकन्या की जिम्मेदारी देकर मरना चाहती है। दिव्यप्रभा अपनी ज़िन्दगी का सच संघमित्रा को बताते हुए कहती है, "और सच पूछो जीजी, तो यह दुनिया भी उतनी बुरी नहीं। यहाँ कम-से-कम कोई किसी को बदचलन तो नहीं कहता। उस तपोवन से भी अच्छी है यह दुनिया, जिसने आज तक जाने कितनी औरतों को सहारा दिया पर किसी को पापिन कहकर निकाला नहीं। मुझे गलत मत समझना जीजी, पर मुझे तुम्हारी पवित्र दुनियां से अब डर लगने लगा है। सोचो जीजी, कितनी कमज़ोर थी वह दुनिया, जिसकी नींव हिल गई एक अजन्मे गर्भ के चलते। कहीं अच्छी है यह दुनिया। यहाँ हम सब एक जैसी हैं। जैसी भीतर वैसी बाहर। न कोई पाखंड, न पवित्रता का झंझट, न धर्म की थानेदारी। हम सबके माथे पर चिपकी है हमारी हक़ीक़त। हम सबका धर्म एक है- रोटी का धर्म। हम सबका सत्य एक है- ग्राहक। जो भी आ जाए हमारे आँगन, राजा, रंक, योगी, कोढ़ी ... सबको समान भाव से स्वीकार करती हैं हम। वह दुनिया मेरे किस काम की जीजी, जो भेद करे इन्सान इन्सान में"14

                                नारी शक्ति संघ को राष्ट्रीय संघ बनाने वाली और सम्पूर्ण स्त्री जाति की सहायता करने वाली संघमित्रा अपनी बहन की दशा देखकर बहुत दुखी होती है। संघमित्रा उन दोनों को अपने घर ले आती है। दिव्यप्रभा की मृत्यु हो जाती है। संघमित्रा बदले की आग में जल रही है। वह अभयमुनि को ढूँढ निकालती है और उसे अपने प्रेम के जाल में फँसाकर उसकी हत्या कर देती है। वह अभयमुनि से कहती है, "नहीं मुनि, मुझे दुःख है कि मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर सकती क्योंकि तुम सिर्फ़ मेरे नहीं, तुम पूरी मनुष्यता के गुनाहगार हो। एक धर्मगुरु होकर तुमने ऐसा किया ... इसलिए तुम्हारा अपराध अक्षम्य है मुनि। जो धोखा, ज़िल्लत और अकथनीय आँसू तुमने दूसरों को दिए, देखो, कैसे लौटकर वे आते हैं तुम्हारे पास। तुम धरती के धब्बे, पृथ्वी की गन्दगी... देखो, कैसे मिटाती हूँ मैं तुम्हें।"15

                                अभयमुनि की हत्या करके संघमित्रा आत्मसमर्पण कर देती है। उसे आजीवन कारावास की सज़ा मिलती है। अन्त में वह अदालत में स्त्री सशक्तीकरण एवं स्वस्थ समाज के निर्माण का मुद्दा उठाते हुए कहती है, "मी लॉर्ड, मैनें ख़ुद को समाज सेवा में झोंक दिया था। अपने जीवन के स्वर्णिम समय को मैनें बसन्त देखने में नहीं वरन् औरतों को शिक्षित, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनाने में लगाया क्योंकि मुझे लगा था कि मेरी माँ यदि आत्मनिर्भर होती और यदि अपनी ताकत को उन्होनें जाना होता तो सम्भवतः हमें ऐसा जीवन नहीं जीना पड़ता पर छुटकी के असामयिक अवसान के बाद यह पीड़ादायक सत्य मरे समक्ष उजागर हुआ कि मैं जो कर रही हूँ सिर्फ़ वही पर्याप्त नहीं है। मुझे समझ में आ गया कि गाँधी क्यों इस देश में असफल हुए। मी लॉर्ड, सुगन्ध फैलाने से कहीं ज़्यादा ज़रुरी है दुर्गन्ध के स्त्रोतों का सफाया करना। काली शक्तियों को ध्वस्त करना जो धर्म की आड़ में इस धरती को खून से तर-बतर कर रही हैं, जो ऐसे जानवर तैयार कर रही हैं। आप शौक से मुझे मौत दें हुजूर, जिससे रक्तबीज बनकर मैं खेतों में, खलिहानों में, जँगलों में जहाँ कहीं भी जगह खाली है, वहीं बिखर जाऊँ ... जिससे धरती के धब्बों को मिटाने की यह प्रक्रिया जारी रखी जा सके।"16

                                उपन्यास के अन्त में विजयेन्द्र मुनि ऋषिकन्या के साथ संघमित्रा से मिलकर ऋषिकन्या की देखभाल व नारी शक्ति संघ के कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं।

                                अस्तु, 'सेज पर संस्कृत' उपन्यास में स्त्री के दमन एवं शोषण की गाथा कही गई है। सदियों से स्त्री का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शोषण होता आया है। स्त्री इस शोषण को मूक भाव से सहती आई है। आज की स्त्री भी इस शोषण-चक्र में पिसी जा रही है। कुछ नारी संगठन स्त्री को शक्ति प्रदान करके, उसे संगठित व एकजुट करके पुरुष की दमनकारी प्रवृत्ति के विरुद्ध उसे खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। स्त्रियाँ भी अपना अबलापन भूलकर नारी कल्याण संस्थाओं एवं संगठनों की छत्र-छाया में सबला बनने का प्रयास कर रही हैं और अपनी अस्मिता को ढूँढ़ने की कोशिश कर रही हैं। स्त्री-जीवन में आए इस परिवर्तन को एक स्त्री की दृष्टि से अनुभव करते हुए मधु काँकरिया ने इस उपन्यास की रचना की है।


संदर्भ सूची

1.            सीमोन द बोउवार, अनुवादक - प्रभा खेतान, स्त्री उपेक्षिता, पृष्ठ 121
2.            कृष्णदत्त पालीवाल, उत्तर आधुनिकता की ओर, पृष्ठ 139
3.            डॉ. शोभा पालीवाल, अमृतलाल नागर के उपन्यासों में सामाजिक चेतना पृष्ठ 114
4.            मधु कांकरिया - सेज पर संस्कृत पृष्ठ 51
5.            वही, पृष्ठ  50-51
6.            वही, पृष्ठ  45-46
7.            वही, पृष्ठ  51
8.            वही, पृष्ठ  53
9.            वही, पृष्ठ 117
10.          वही, पृष्ठ 159
11.          वही, पृष्ठ 158
12.          वही, पृष्ठ 169
13.          वही, पृष्ठ 184
14.          वही, पृष्ठ 211
15.          वही, पृष्ठ 226
16.          वही, पृष्ठ 227

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