चीफ की दावत कहानी में पंजाब की लोककला व लोकगीतों की सजीव सम्वेदना

संगीता गांधी
संगीता गांधी

लोककला, लोकगीत लोक परम्परायें मानव जीवन के युगीन विकास की धरोहर हैं। मनुष्य ने प्राचीन आदिम मानव से विकसित सभ्य होने की प्रक्रिया में जिन मूल्यों को सहेजा --वे कला व संस्कृति के संस्कार हैं।

लोककलाएँ किसी सभ्यता, क्षेत्र की समस्त अस्मिता व विकास चेतना का जीवंत स्वरूप होती हैं। एक स्थान विशेष के लोकगीत, दस्तकारी, लोककलाएँ वहाँ के परिवेश, निवासियों के क्रमिक विकास व सभ्यता के द्योतक होते हैं। इनके माध्यम से एक सभ्यता के मूल में निहित संस्कारों की अभिव्यक्ति होती है।

पंजाब प्रदेश अपने समृद्ध सांस्कृतिक वैभव के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की भाषा, खान-पान, रहन-सहन ये सभी यहाँ के लोकगीतों व लोककलाओं में अभिव्यंजित होते हैं। पंजाब के लोकगीत व दस्तकारी अपने जीवंत व कलात्मक सौंदर्य के कारण विश्वप्रसिद्ध है।

भीष्म साहनी जी की कहानियों में पंजाबी परिवेश बहुत प्रबलता से उभरता है। उनकी सभी कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं व परिवेश के जीवंत दस्तावेज हैं। 'चीफ की दावत' कहानी उनकी बहुत प्रसिद्ध व उल्लेखनीय कहानी है। इस कहानी का कथ्य तो मूल रूप से एक माँ के निश्छल त्याग, वेदना और पुत्र के स्वार्थ पर केंद्रित है। परंतु इस कथ्य के उभार के भीतर पंजाब की दस्तकारी स्वयं में एक महत्वपूर्ण स्थान पा लेती है।

पंजाब की सबसे प्रसिद्ध दस्तकारी है - फुलकारी। फुलकारी एक प्रकार की कढ़ाई है। इसके अंतर्गत कपड़े पर मूल रूप से फूलों की कढ़ाई की जाती है। फूल से ही इसका नाम फुलकारी पड़ा। यानी फूल की कारी। इस कढ़ाई का उदय एकीकृत भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ। कई लोगों का मानना है कि ये कला ईरान से आई है, जहाँ इसे गुलकारी कहा जाता है, जिसका मतलब भी लगभग यही होता है (गुल मतलब फूल और कारी मतलब काम)।

फुलकारी में प्रमुख रूप से रेशम के धागों का प्रयोग होता है। रेशम के धागों से कपड़े पर बहुत महीन फूलों के डिजाइन बनाये जाते हैं। यह बहुत बारीक व कलात्मक कढ़ाई होती है। पंजाबी सूट, दुपट्टों पर बहुत महीन काम किया जाता है। फूलों के साथ साथ ज्यामितीय आकृतियाँ भी बनाई जाती हैं। आरम्भ में फुलकारी केवल कपड़ों पर की जाती थी। अब बैग, जूतों आदि पर भी यह देखने को मिल जाती है। फुलकारी में भी चार तरह की फुलकारी -बाघ, थिरमा, दर्शन द्वार और बावन फुलकारी ख़ास मानी जाती हैं।
 
चीफ की दावत कहानी में बेटा शामनाथ माँ को एक बोझ समझता है। बूढ़ी, अशिक्षित माँ उसके आधुनिक रहन-सहन में फिट नहीं होती। माँ उसके लिए शर्म का विषय है। माँ के कपड़ों, खर्राटों, उठने-बैठने के तरीकों सभी से शामनाथ को चिढ़ है। घर में उसने अपने अमरीकन चीफ के लिए दावत रखी है। सारा इंतज़ाम एकदम आधुनिक है पर परम्परागत माँ शामनाथ के लिए समस्या है।

माँ को कई प्रकार की हिदायतें देकर शामनाथ छुपाने के यत्न करता है। उसे लगता है कि चीफ का कहीं माँ से आमना-सामना हुआ तो माँ उसके लिए शर्मिंदगी साबित होगी।

चीफ से माँ का सामना हो जाता है। जहाँ शामनाथ पाश्चात्य रंग में रंगा भारतीय है! वहीं चीफ अमरीकन होकर भारतीय संस्कृति व लोककलाओं का मुरीद है। वह शामनाथ से पंजाब की दस्तकारी के बारे में पूछता है।

तालियाँ थमने पर साहब बोले, "पंजाब के गाँवों की दस्तकारी क्या है?"

शामनाथ खुशी में झूम रहे थे। बोले, "ओ, बहुत कुछ - साहब! मैं आपको एक सेट उन चीजों का भेंट करूँगा। आप उन्हें देख कर खुश होंगे।"

मगर साहब ने सिर हिला कर अंग्रेजी में फिर पूछा, "नहीं, मैं दुकानों की चीज नहीं माँगता। पंजाबियों के घरों में क्या बनता है, औरतें खुद क्या बनाती हैं?"

शामनाथ कुछ सोचते हुए बोले, "लड़कियाँ गुड़ियाँ बनाती हैं, और फुलकारियाँ बनाती हैं।"

चीफ फुलकारी के बारे में ज्यादा जानना चाहता है। पंजाबी दस्तकारी के प्रति उसकी रुचि है। यहाँ फुलकारी नाम की पंजाबी कढ़ाई महत्वपूर्ण हो जाती है। जो माँ एक बोझ थी ! वह अब महत्वपूर्ण हो जाती है। माँ फुलकारी बनाने वाली कलाकार हो गयी है। उसके माध्यम से बेटे का चीफ प्रसन्न होगा !अब माँ फुलकारी बनाएगी। बेटे की तरक्की का रास्ता माँ की बनाई फुलकारी से होकर निकलेगा।

चीफ पूछता है, "फुलकारी क्या?"

शामनाथ फुलकारी का मतलब समझाने की असफल चेष्टा करने के बाद माँ को बोले, "क्यों, माँ, कोई पुरानी फुलकारी घर में हैं?"

माँ चुपचाप अंदर गईं और अपनी पुरानी फुलकारी उठा लाईं।

साहब बड़ी रुचि से फुलकारी देखने लगे। पुरानी फुलकारी थी, जगह-जगह से उसके तागे टूट रहे थे और कपड़ा फटने लगा था। साहब की रुचि को देख कर शामनाथ बोले - यह फटी हुई है, साहब, मैं आपको नई बनवा दूँगा। माँ बना देंगी। क्यों, माँ साहब को फुलकारी बहुत पसंद हैं, इन्हें ऐसी ही एक फुलकारी बना दोगी न?”

यहाँ यह व्यंजना भी उल्लेखनीय है कि भारतीय भले ही अपनी लोककलाओं को विस्मृत कर चुके हों पर विदेशी भारतीय लोककलाओं को बहुत पसन्द करते हैं। फुलकारी इस कहानी में एक लोकदस्तकारी है पर साथ ही वह प्रतीकात्मक रूप से माँ की ममता व बेटे के स्वार्थ को व्यंजित करने का माध्यम भी है।

चीफ के जाने के बाद शामनाथ माँ के पास आता है। माँ अपनी उपेक्षा से बहुत आहत है। वह बेटे से कहती है, "मुझे हरिद्वार भेज दे।"

"मैंने अपना खा-पहन लिया। अब यहाँ क्या करूँगी। जो थोड़े दिन जिंदगानी के बाकी हैं, भगवान का नाम लूँगी। तुम मुझे हरिद्वार भेज दो!"

"तुम चली जाओगी, तो फुलकारी कौन बनाएगा? साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है।"

"मेरी आँखें अब नहीं हैं, बेटा, जो फुलकारी बना सकूँ। तुम कहीं और से बनवा लो। बनी-बनाई ले लो।"

"माँ, तुम मुझे धोखा देके यूँ चली जाओगी? मेरा बनता काम बिगाड़ोगी? जानती नही, साहब खुश होगा, तो मुझे तरक्की मिलेगी!"

माँ चुप हो गईं। फिर बेटे के मुँह की ओर देखती हुई बोली, "क्या तेरी तरक्की होगी? क्या साहब तेरी तरक्की कर देगा? क्या उसने कुछ कहा है?"

"कहा नहीं, मगर देखती नहीं, कितना खुश गया है। कहता था, जब तेरी माँ फुलकारी बनाना शुरू करेंगी, तो मैं देखने आऊँगा कि कैसे बनाती हैं। जो साहब खुश हो गया, तो मुझे इससे बड़ी नौकरी भी मिल सकती है, मैं बड़ा अफसर बन सकता हूँ।"

माँ के चेहरे का रंग बदलने लगा, धीरे-धीरे उनका झुर्रियों-भरा मुँह खिलने लगा, आँखों में हल्की-हल्की चमक आने लगी।

"तो तेरी तरक्की होगी बेटा?"

"तरक्की यूँ ही हो जाएगी? साहब को खुश रखूँगा, तो कुछ करेगा, वरना उसकी खिदमत करनेवाले और थोड़े हैं?"

"तो मैं बना दूँगी, बेटा, जैसे बन पड़ेगा, बना दूँगी।"

एक दस्तकारी पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को उभारने का माध्यम बनी। यह भीष्म साहनी जी के अनुभवी, संवेदनात्मक लेखन का कमाल है।

फुलकारी के साथ ही कहानी में पंजाबी लोकगीत की भी झलक है। पंजाब का लोकसंगीत बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ के भांगड़ा, गिद्धा लोकनृत्य, माहिया, बोलियां व टप्पे के रूप में लोकगीत एक समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा को प्रस्तुत करते हैं। पंजाब में हर आयोजन लोकगीत-संगीत के बिना अधूरा होता है। विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले लोकगीत तो पंजाबी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।

'चीफ की दावत' में दो पंजाबी लोकगीतों का जिक्र हुआ है। एक टप्पे के रूप में। दूसरा विवाह के अवसर पर गाया जाने वाला एक लोकगीत है। टप्पा' पंजाबी भाषा में रचित लययुक्त एक लघु रचना होती है जिसे तीन पंक्तियों में लिखा जाता है। मूल रूप से ये डेढ़ पंक्ति की रचनाएँ थी, पहली पंक्ति आधी और दूसरी पूरी काफ़िये-रदीफ़ से मिल कर एक स्वाभाविक लय पैदा करती है।

साहब इस पर खुश नजर आए। बोले - सच? मुझे गाँव के लोग बहुत पसंद हैं, तब तो तुम्हारी माँ गाँव के गीत और नाच भी जानती होंगी? चीफ खुशी से सिर हिलाते हुए माँ को टकटकी बाँधे देखने लगे।

माँ, साहब कहते हैं, कोई गाना सुनाओ। कोई पुराना गीत तुम्हें तो कितने ही याद होंगे।

माँ धीरे से बोली - मैं क्या गाऊँगी बेटा। मैंने कब गाया है?

वाह, माँ! मेहमान का कहा भी कोई टालता है?

साहब ने इतना रीझ से कहा है, नहीं गाओगी, तो साहब बुरा मानेंगे।

मैं क्या गाऊँ, बेटा। मुझे क्या आता है?

वाह! कोई बढ़िया टप्पे सुना दो। दो पत्तर अनाराँ दे …”

दो पत्तर  अनाराँ दे -- टप्पा शैली में गाया जाने वाला बहुत प्रसिद्ध लोकगीत है।

दूसरा लोकगीत एक सुहागगीत है। विवाह के अवसर पर स्त्रियां यह गीत गाती हैं। इनमें वधु के मायके से दूर जाने की वेदना, नए जीवन को लेकर हँसी -ठिठोली आदि होती हैं। भारतीय संस्कारों में ये सुहाग गीत विवाह के संस्कार का अहम हिस्सा होते हैं। कहानी में माँ एक पंजाबी सुहागगीत की कुछ पंक्तियाँ चीफ को सुनाती है।

माँ बैठ गईं और क्षीण, दुर्बल, लरजती आवाज में एक पुराना विवाह का गीत गाने लगीं -
हरिया नी माए, हरिया नी भैणे
हरिया ते भागी भरिया है

'चीफ की दावत' कहानी का मूल स्वर आधुनिक शिक्षित पीढ़ी की स्वार्थपरता, वृद्धों की दुर्दशा पर केंद्रित है। इस मूल स्वर की अभिव्यक्ति के लिए जो परिवेश गढ़ा गया है, उसमें पंजाबी लोककला व लोकगीत एक अभिन्न अंग बन कर उभरे हैं। यह भीष्म साहनी जी का लेखकीय कौशल है कि कहानी के कथ्य में उन्होंने कला व संस्कृति के महीन बिंदुओं को बड़ी सहजता से गूंथ कर प्रस्तुत किया है।

1 comment :

  1. बेहतर होता कि लेखिका इस लेख में दोनों लोकगीत भी पूरी तरह से दे देतीं। तब इस लेख का महत्व बढ़ जाता। ’हरिया ते भागी भरिया है’ इसका हिन्दी में क्या मतलब होगा? -- हरिया तो भाग्यशाली है कि उसके माएँ-बहनें हैं? क्या यह मतलब होगा? कहानी का शीर्षक है -- ’चीफ़ की दावत कहानी में पंजाब की लोककला व लोकगीतों की सजीव सम्वेदना’ जबकि लेख में लेखिका ने कहानी की चर्चा की है -- लोककला और लोकगीतों की चर्चा बेहद कम है। यह ख़राब लेख है।

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