वल्लभ संप्रदाय और उसके आठ कवि

आनंद कुमार शुक्ल

- आनंद कुमार शुक्ल

मध्यकाल में कृष्ण भक्ति के प्रचार-प्रसार में ब्रज क्षेत्र स्थित गोवर्धन पर्वत का वल्लभ संप्रदाय और उसके अष्टछाप कवियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वल्लभ संप्रदाय के प्रधान आचार्य और संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने सन् 1519 ई. के लगभग अपने मत का प्रधान केंद्र श्रीनाथ जी के मंदिर को बनाया। यह मंदिर उनके ही एक शिष्य पूरनमल खत्री द्वारा उसी वर्ष बनवाया गया था।  वल्लभाचार्य मूलतः दक्षिण से थे।  और राजा कृष्णदेव राय के दरबार में शास्त्रार्थ द्वारा विभिन्न विद्वानों को पराजित कर महाप्रभु की पदवी से विभूषित थे (1565 वि.)। दर्शन के क्षेत्र उनका मत शुद्धाद्वैतवाद के नाम से प्रचलित हुआ। उनका जन्म संवत् 1535 विक्रमी, वैशाख कृष्ण एकादशी को रायपुर के निकट चंपारण्य में विष्णुस्वामी मतावलंबी भक्त श्री लक्ष्मण भट्ट के यहाँ हुआ। इनकी माँ का नाम इलम्मागारु था।  कहते हैं अल्प अवस्था में ही ये देशाटन को निकल पड़े और रामानुजनाचार्य के समान भारत के बहुत से भागों में पर्यटन और शास्त्रार्थ द्वारा अपने मत का प्रचार किया।  देशाटन से पूर्व ही इनका विवाह श्री देवभट्ट जी की कन्या महालक्ष्मी से हुआ। महालक्ष्मी से इन्हें दो पुत्र हुए  - गोपीनाथ और विठ्ठलनाथ। गोपीनाथ का जन्म 1568 वि. में हुआ।  गोपीनाथ का जन्म देशाटन करते हुए सूरदास से मिलने के बाद हुआ।

शुद्धाद्वैतवाद
शुद्धाद्वैत = शुद्ध अद्वैत।  अर्थात वल्लभाचार्य जी ने शंकर के अद्वैत दर्शन का खंडन नहीं किया बल्कि उनका शुद्धीकरण किया है।  शंकर के अद्वैत सिद्धांत के अनुसार ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या।  जिस प्रकार स्वप्न मिथ्या होते हैं उसी प्रकार अविद्या (जिसको उन्होंने माया कहा है) के कारण जीव इस मिथ्या संसार को सत्य मानकर चलता है।  फलतः वह ब्रह्म से पृथक हो जाता है।  भिन्न हो जाता है। माया या अविद्या के हटते ही जीव ब्रह्म हो जाता है।  वल्लभाचार्य जी अद्वैत सिद्धांत के इस मत से सहमत नहीं हैं।  वे यह नहीं मानते कि ब्रह्म और जीवन में माया या अविद्या के कारण कोई भेद है, बल्कि माया को उन्होंने ब्रह्म की इच्छा शक्ति के रूप में ही ग्रहण किया और ब्रह्म जीव और जगत तीनों को सत्य माना।  तीनों में अंतर उनमें निहित गुणों को माना जो अवस्था या स्थिति के अनुसार होते हैं।

ब्रह्म में सत, चित और आनंद तीनों गुण हैं। जीव में केवल दो गुण- सत और चित ही सक्रिय रहते हैं और जड़ में केवल सत्। और इन्हीं ब्रह्म, जीव और जड़ से जगत का निर्माण होता है।
शंकर के अद्वैत में ब्रह्म और जीव में भेद नहीं है फलतः एक की दूसरे में भक्ति अज्ञानता की सूचक है। क्योंकि वहाँ आत्मा और परमात्मा एक हैं। परंतु वल्लभाचार्य जी के अनुसार जिस प्रकार बूँद और समुद्र में तात्विक दृष्टि से कोई भेद नहीं है परंतु बूँद अपने उद्भव और विकास के लिए समुद्र पर निर्भर करती है उसी प्रकार जीव भी ब्रह्म के अनुग्रह पर निर्भर हैं। इसी अनुग्रह को उन्होंने पुष्टि की संज्ञा दी है। भगवान या ब्रह्म की अनुग्रह प्राप्त करने का सिद्धांत यद्यपि वल्लभाचार्य का नवीन सिद्धांत नहीं है। इसके प्राचीन सूत्र गीता में भी मिलते हैं –
“तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शांति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।”[1]

फिर रामानुजनाचार्य ने भी ईश्वर कृपा को भक्ति में महत्वपूर्ण स्थान दिया था फिर भी नवीन व्याख्या और उसे व्यावहारिक क्षेत्र में लाने का प्रयोग वल्लभाचार्य को ही जाता है।
पुष्टि की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा –
“पुष्टि किं में?
पोषणम्
पोषणम् किंम्तद् अनुग्रहः। भगवत्कृपा।”[2]

‘पोषण’ के भाव को भक्ति के दो रूपों द्वारा समझा जा सकता है – पहला साध्य रूप और दूसरा साधन रूप।  साध्य रूप में भक्त अपने को ईश्वर की कृपा पर छोड़ देता है।  जबकि साधन रूप की भक्ति में भक्त को ईश्वर तक पहुचनें का प्रयत्न करना होता है।  साध्य रूप की भक्ति ही पुष्टिमार्गियों में स्वीकृति है।  वल्लभाचार्य ने जीव को ईश्वर तक पहुँचने का अर्थात् सत्, चित्त और आनंद की सम्मिलित अवस्था के लिए तीन मार्गों का उल्लेख किया है –
मर्यादा मार्ग
प्रवाह मार्ग और
पुष्टि मार्ग

और इन तीनों भागों में पुष्टि मार्ग को सर्वाधिक महत्व दिया।  जो ईश्वर कृपा अर्थात् अनुकम्पा पर निर्भर है-
पुष्टि मार्गोनुग्रहैक साध्यः, कृष्णानुग्रह रूपा हि पुष्टि, अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः।”[3]
पुष्टिमार्गीय भक्ति कर्मकांड मुक्त ईश्वरीय अनुकंपा युक्त रागानुराग प्रेम लक्षणा भक्ति है, जिसका पल्लवन वल्लभाचार्य के बाद अष्टछाप कवियों ने मिलकर किया।  ये कवि अपनी भक्ति व काव्य के माध्यम से स्वयं को भगवत कृपा पर छोड़ उसकी अनुकंपा या अनुग्रह प्राप्त करने का ही प्रयत्न किए।

आचार्य वल्लभ ने श्रीकृष्ण को ही परमपिता परमेश्वर माना। वे अनित्य, स्वतंत्र और सर्वज्ञ हैं। घर-घर में व्याप्त नाश रहित हैं। वे पारमार्थिक सगुण रूप में लीलाएँ करते हैं। उनकी लीलाएँ अप्राकृतिक हैं जो उन्हीं के समान हैं। श्रीकृष्ण में ही तीनों गुण सत् चित्त आनंद की व्याप्ति है, जो शाश्वत है।  अतः जीव को उन्हीं की अनुकंपा या अनुग्रह प्राप्त करने का सुझाव दिया। जिसके लिए उन्होंने पुष्टि को आवश्यक बताया।  वैसे तो वल्लभाचार्य ने कई ग्रंथ लिखे जिनमें पूर्वमीमांसा भाष्य, उत्तरमीमांसा या अणुभाष्य, सुबोधिनी टीका, तत्वदीप निबंध, पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम, श्रृंगाररसमंडन, विद्वन्मंडन आदि मुख्य हैं। परंतु उनके शुद्धाद्वैतवाद का प्रतिपादक ग्रंथ ‘अणुभाष्य’ ही है जिसे ब्रह्मसूत्र भाष्य भी कहा जाता है।

अष्टछाप कवियों में से चार सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे। बाकी चार गोविंद स्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास वल्लभाचार्य जी के कनिष्ठ पुत्र विठ्ठलनाथ के। सन् 1565 ई. में विठ्ठलनाथ जी ने अष्टसखा या अष्टछाप की स्थापना की।  जो श्रीनाथ जी की सेवा के आठ प्रहरों के लिए नियुक्त किये गये। ये आठ प्रहर हैं – मंगलाचरण, श्रृंगार, ग्वाल, राजयोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती तथा शयन। इन्हीं आठ प्रहरों की सेवा के लिए मंदिर प्रांगण में ये भक्त कवि पदों को गाया करते थे। इनके पदों से भक्ति और साहित्य की ऐसी स्वर्णिम लहर उठी जिससे हिंदी साहित्य का सम्पूर्ण मध्यकाल भीग गया।

अष्टछाप कवि
कुंभनदास (1468 ई. – 1583 ई.)
हरिराय कृत भावप्रकाश के अनुसार कुंभनदास जी का जन्म गोवर्धन के निकट जमुनावती ग्राम में संवत् 1525 विक्रमी कार्तिक कृष्ण एकादशी को हुआ। ये अष्टसखाओं में आयु की दृष्टि से सहसे बड़े थे। इनके सात पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे चतुर्भुजदास थे। चतुर्भुजदास बाद में विठ्ठलनाथ से दीक्षा लेकर पुष्टिमार्ग में प्रवृत्त हुए। कहते हैं एक बार सम्राट अकबर ने इनकी विद्वता से प्रभावित होकर इन्हें फतेहपुर सीकरी बुलाया। न चाहते हुए भी इन्हें जाना पड़ा। और बादशाह के सम्मुख सिर झुकाना पड़ा। जिसका बाद में इन्हें बड़ा दुख हुआ। क्योंकि ये गिरिधर गोपाल की ही भक्ति करते थे।   किसी अन्य के सम्मुख इन्हें सिर झुकाना पसंद नहीं था –
संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?
आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरिनाम।
जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परि सलाम
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सबै बेकाम।
इनके द्वारा कोई ग्रन्थ नहीं रचा गया केवल कुछ पद ही वार्ता ग्रंथो में मिलते हैं।

सूरदास (1478 ई. – 1583 ई.)
सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी दिन मंगलवार को संवत 1535 वि. में रुनकता ग्राम में हुआ।  ये कृष्ण के अनन्य भक्त थे।  परम सत्य श्री कृष्ण के बाल गोपाल की जैसी तन्मयता से वर्णन सूरदास जी ने किया वैसा हिंदी साहित्य में फिर कभी दुबारा न हुआ।  वर्णनों में वात्सल्य और प्रेम की चाशनी है। इनके विषय में प्रसिद्ध गायक तानसेन ने कहा है –
“किंधौ सूर की सर लग्यौ, किंधौ सूर की पीर
किंधौ सूर को पद सुन्यौ, तन-मन धुनत सरीर।”[4]

इनके द्वारा रचित तीन ग्रन्थ मिलते हैं –
सूरसागर, सूरसारावली(सं.1602) और साहित्य लहरी(सं.1550)।
सूर-सारावली में लंबे फगुआ (होली) गीत हैं। साहित्य लहरी में 118 दृष्टकूट पद हैं जिनका विषय नायिका भेद है। जो संभवतः कृष्णदास जी के आग्रह उपरांत लिखा गया। परन्तु इनकी प्रसिद्धि का मूल भागवत पुराण का आधार लिए हुए सूरसागर ही है। इसी में निर्गुण पर सगुण की विजय दर्शाता प्रेमरस परिपूर्ण भ्रमरगीत प्रसंग भी है। सूरसागर की काव्यता से प्रभावित होकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है – “यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियाँ सूर की जूठी-सी जान पड़ती हैं।”[5] मथुरा के पारसौली ग्राम में विठ्ठलनाथ जी के सम्मुख सूरदास जी की मृत्यु हुई। सूरदास जी ने अपने पदों में आसक्ति के ग्यारह रूपों का वर्णन किया है, परन्तु सख्य, वात्सल्य, कांत, तन्मया और विरहासक्ति के वर्णनों में मिठास ज्यादा है। नारदभक्ति सूत्र के अनुसार जीव की प्रभु से आसक्ति के ग्यारह रूप हैं- गुणमाहात्म्यासक्ति, रूपासक्ति, पूजासक्ति, स्मरणासक्ति, दास्यासक्ति, सख्यासक्ति, कान्तासक्ति, वात्सल्यासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति, तन्मयासक्ति और परमविरहासक्ति। और इसी परमविरहासक्ति से भ्रमरगीत के सारे पद हैं-
मधुबन तुम कत रहत हरे
विरह वियोग श्याम सुन्दर के ठाढ़े क्यों न जरे।

कृष्ण की बाल लीलाओं के पदों को देखकर नहीं लगता कि सूरदास जन्मांध थे। ब्रज और अवध प्रदेश में प्रचलित लोककथा के अनुसार श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य के रूप को न देखने की इच्छा से ही इन्होंने अपनी आँखें स्वयं फोड़ ली थी।

परमानन्द दास (1493 ई.- 1584 ई.)
इनका जन्म सं. 1550 वि. में कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। इन्होंने वल्लभाचार्य जी से अरैल (प्रयाग) में सं.1576 वि. में दीक्षा ली। ब्रह्मचर्य का आजीवन पालन करते हुए श्रीकृष्ण की माधुर्यपक्ष और बाल लीलाओं का गान किया। वल्लभाचार्य जी भी इनके पदों के प्रशंसक थे। इनके कई ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें परमानंद के पद, परमानन्द सागर महत्वपूर्ण हैं। इनकी मृत्यु सं.1641 वि. में मानी जाती है। भाषाई-गठन और काव्यकला की दृष्टि से सूरदास और नंददास के उपरांत इन्हीं का स्थान है। बालहठ सम्बन्धी इनका एक पद है –
“तनक तनक की दोहनी दै-दै री मैया
तात दुहन सिखवन कह्यो, मोहि धोरी गैया
हरि विषमासन बैठि के बेदु कर थन लीन्हौं
धार अटपटी देखि कै ब्रजपति हसि दीन्हौं
गृह-गृह से आई जबै, देखन ब्रज-नारी
सचकित तन-मन हरि लियौ, हंसि घोष बिहारी
द्विज बुलाइ दक्षिणा दई, मंगल जस गावै
‘परमानंद’ प्रभु लाडिलौ, सुख सिंधु बढ़ावै।”[6]

कृष्णदास (1496 ई.-1578 ई.)
इनका जन्म गुजरात राज्य के चिलोतरा ग्राम में हुआ था। सं. 1566 वि. के लगभग मथुरा में वल्लभाचार्य जी ने इन्हें दीक्षा दी। अपनी प्रशासनिक रूचि के कारण ही ये श्रीनाथजी के मंदिर के अधिकारी पद पर विभूषित हुए थे। कहते हैं कि वल्लभाचार्य जी की मृत्यु के बाद उनके पौत्र पुरुषोत्तम को गद्दी पर बिठाने के लिए इन्होंने विठ्ठलनाथ जी से विवाद भी कर लिया था। मंदिर के वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि में इनका ही महत्वपूर्ण योगदान था। इनके पद श्रृंगारिक हैं-
“कंचुकी के बंद तरकि-तरकि टूटे, देखत मदन मोहन घनश्यामसिंह।
काहे को दुराव करत है री नागरी! उमगत उरज दुरत क्यों याहिं।
कछु मुस्कात, दसन छवि सुन्दर, हँसत कपोल लोल भ्रू भ्रानहिं।
रवि ससि जुगल परे रति फंदन, स्रवननि पलक ताटंक के नामहिं।
वदन कमल पर, अलक मधुप वर, खंजन नैन लेत विश्रामहिं।
सुन ‘कृष्णदास’ रसिक गिरधर रंग, रंगति सुमुखि लजावति कामहिं।”[7]

नंददास (1533 ई.-1582 ई.)
नंददास प्रसिद्ध कवि तुलसीदास के चचेरे भाई थे। इनका जन्म सं. 1590 वि. में तथा मृत्यु सं. 1639 में हुई। तुलसीदास और नंददास दोनों ने प्रारंभ में नृसिंह पंडित से शिक्षा ग्रहण की। पंडित नृसिंह रामोपासक थे अतः प्रारंभ में इनकी रूचि रामभक्ति की ओर थी। किन्तु एक दिन द्वारिका जाते हुए मार्ग में इनकी मुलाकात विठ्ठलनाथ जी से हुई और वहीँ इन्होंने पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली। इन्होंने कुल 15 ग्रंथों की रचना की। जिनमें अनेकार्थ मंजरी, मान मंजरी, रस मंजरी, रूप मंजरी, विरह मंजरी, प्रेम-बारहखड़ी, श्याम सगाई, सुदामा चरित्र, रुक्मिणी मंगल, भंवरगीत, रासपंचाध्यायी, सिद्धांत पंचाध्यायी, दशमस्कन्धभाषा, गोवर्धन लीला, पदावली प्रमुख हैं। इन्होंने अपने शुद्धाद्वैत संबंधी विचारों को अनेकार्थ मंजरी में संकलित किया है। किन्तु लौकिक-पारलौकिक प्रेम एवं भाषा सौष्ठव की दृष्टि से इनकी श्रेष्ठ कृति रासपंचाध्यायी है। रासपंचाध्यायी भागवत पुराण के 29 वें से 33 वें अध्यायों का सम्मिलित नाम है। जो मूलतः रोला छंद में है।

गोविन्द स्वामी (1505 ई.-1585 ई.)
इनका जन्म सं. 1562 वि. में भरतपुर राज्य में हुआ। कहते हैं तानसेन को पद-गायन की शिक्षा गोविन्द स्वामी ने ही दी थी। इनकी कविताएँ मुख्यतः राधा कृष्ण की श्रृंगारिक लीलाओं से सम्बंधित हैं। कुछ पद बाल लीला विषयक भी हैं। इनके लगभग 600 पदों का संकलन गोविन्द स्वामी के पद शीर्षक से प्रकाशित है।

छीतस्वामी (1515 ई.-1585 ई.)
ये मथुरा के ब्राह्मण और राजा बीरबल के पुरोहित थे। गोस्वामी विठ्ठलनाथ जी की चमत्कारपूर्ण दिव्य शक्ति से प्रभावित होकर इन्होंने सं. 1592 वि. के लगभग उनसे दीक्षा ली। ये मूलतः अपने पदों में भक्ति भाव की ही अभिव्यक्ति किया करते थे। इनका यह पद बड़ा ही प्रसिद्ध है-
“अहो विधना ! तो पै अंचरा पसार मांगौ
जनम-जनम दीजो मोहि यही ब्रज वसिनौ।”[8]

चतुर्भुज दास (1530 ई.-1585 ई.)
कुंभनदास जी के सात पुत्रों में चतुर्भुज दास जी सबसे छोटे थे। परंपरागत खेती- बाड़ी से अलग संगीत-काव्य और भजन-कीर्तन की ओर ही इनकी रूचि थी। इनको गान विद्या स्वयं इनके पिता कुंभनदास जी ने दी थी।  इनके पदों में श्रृंगार की छठा है। जो इनके द्वारा रचित ग्रंथों चतुर्भुज कीर्तन संग्रह, कीर्तनावली और दानलीला में संग्रहीत हैं।

उपरोक्त आठ कवियों के अलावा अन्य कवि और आचार्य भी वल्लभ सम्प्रदाय के अंतर्गत हुए हैं, जिनका उल्लेख वार्ता ग्रंथो में मिलता है। वास्तव में वैष्णव भक्ति का सूत्रपात आचार्य वल्लभ से पूर्व तमिल आलवारों ने कर दिया था। श्रीमद्भागवत की रचना भी तमिल प्रदेश में होनी बताई जाती है। भागवत का निचोड़ भक्ति ही है, और यही भक्ति दिव्यप्रबंध (आठ भाग प्रकाशित) की मूल स्थापना है। जिसके रचयिता आलवार (तमिल वैष्णव) हैं। दिव्यप्रबंध के गीतमय पद निश्चय ही सूरसागर की पूर्व पीठिका हैं। डॉ. राजमल बोरा ने इसका संकेत देते हुए कहा है- “यदि आचार्य शुक्ल दिव्यप्रबंध को अनूदित रूप में पढ़ गए होते तो वे सूरसागर की परंपरा को दिव्यप्रबंध का विकसित रूप कहते।”[9] और फिर रामानुजाचार्य (11वीं शती), निम्बार्काचार्य (12वीं शती), मध्वाचार्य (13वीं शती), विष्णुस्वामी (14वीं शती) आदि ने भी अपने-अपने दार्शनिक सिद्धांतों व साहित्य से वैष्णव भक्ति के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। परन्तु ब्रजभाषा और साहित्य को चरमोत्कर्ष सूर एवं नंददास ने ही दिया।



[1] श्रीमद्भगवद्गीता, अठारहवें अध्याय के क्रमशः 62 वें और 66 वें श्लोक |
[2] हिंदी साहित्य का इतिहास , सं. डाँ. नगेन्द्र, मयूर पेपरबैक्स, नोएडा, पैंतीसवा पुनर्मुद्रण : 2009, पृष्ठ सं. 187 
[3] वही , पृष्ठ सं. 187
[4] हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, प्रथम खंड, गणपति चंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, ग्यारहवाँ संस्करण : 2015, पृष्ठ सं. 258
[5] हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण : 2013, पृष्ठ सं. 105
[6] हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, प्रथम खंड, गणपति चंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, ग्यारहवाँ संस्करण : 2015, पृष्ठ सं. 262
[7] वही, पृष्ठ सं. 263
[8] हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण : 2013, पृष्ठ सं. 114
[9] भारतीय भक्ति-साहित्य, डॉ. राजमल बोरा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण : 1994, पृष्ठ सं. 17

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