चिंतन: और कितनी प्रतीक्षा ...

अपर्णा झा

अपर्णा झा


कहते हैं कि बालबोध बहुत ही मासूम होता है उसे लोगों की समझ नहीं होती, परन्तु मेरा मानना है कि बालबोध सभी तरह की संवेदनाओं को भलीभांति समझता है पर उसे उसकी अभिव्यक्ति की समझ नहीं होती। शायद यही कारण रहा हो कि बचपन की एक घटना ने ऐसा झकझोरा था कि मुझमें शायद समाज को देखने का नज़रिया ही बदल दिया। बचपन में गाँव जाती थी तो हमेशा राजू की छोटकी चाची पर नज़र चली ही जाती थी। एक अनजाना सा लगाव उस छोटकी चाची से हो गया था, लोगों ने उसके लिए न जाने कितने ही नाम धरे हुए थे। कभी कोई निरासी कहता, तो कोई डाइन और न जाने क्या-क्या। उस बेचारी को तो न उसके मायके से कोई बुलाता, न ही पति और बच्चों का सुख। और फिर ससुराल की सेवा का पूरा-पूरा बोझ सर-काँधे पर लिए। फिर कोई न उसे पूछता न ही कोई उसके दर्द में शामिल था। जब भी मैं उनसे मिलाने जाती तो मुझे बड़े प्यार से बैठा दुलारती, पुचकारती। जो उपलब्ध खाने की वस्तु होती उनके पास वह बड़े आग्रह से खिलाती। परन्तु इसके ठीक पलट जब वापिस अपने घर आ कर यदि मैं बता देती कि छोटकी चाची के पास गई थी, तो रिश्तेदार कहना शुरू कर देते, "अब तो बुरी नज़र लग ही गई इसे समझो। अब तो देखना बीमार हो के ही रहेगी। जरा कोई इसकी नज़र तो उतार दे।" मैं हैरान हो सोचती कि भला उस चाची में इनको ऐसा क्या बुरा दिखता है कि ये ऐसा सोचते हैं!

थोड़ी और बड़ी हुई, सोच परिपक्व होने लगी, तो उस चाची के रहस्य से पर्दा उठा उठने लगा। चाचा (यानी उनके पति) ने चाची को आर्थिक मजबूरी का हवाला देकर शहर चले गए थे। बूढ़े माँ बाप की देख-रेख, उनकी दवाइयों का खर्चा, खेती की मार से लिये गए कर्जे फिर भाई की पढ़ाई, बहन की शादी सभी कुछ तो चाचा को ही करना था। पर यह क्या? घर से क्या कहकर निकले थे और फिर कभी घर लौटकर नहीं आए। यदि छोटकी चाची को इसका तनिक भी आभास होता तो शायद चाचा को घर की दहलीज कभी भी लांघने नहीं देते) परिवार वालों के संग चाची की अब तक आँखें पथरा गईं थीं। फिर सारा दोष चाची पर, अभागन होने का दोष भी ऊपर से मढ़ दिया गया। आने वाले इस दर्द का अहसास जो कभी हुआ होता। और फिर उम्र भी तो उस समय 15-16 की रही होगी। बेचारी चाची अपना दुःख कहती तो किससे? सुनता कौन? चाची को कोई रास्ता सूझता भी तो कैसे? अपनी किस्मत का लिखा मान अब जीने लगी थी। अब वह न तो बेवा थी कि खुद को बेवा की जिंदगी जी ले और न सुहागिन के तरह कोई शृंगार ही उसके लिए। क्योंकि वह तो थी एक परित्यक्ता। इस पुरुषसत्तात्मक समाज में अमीरी और गरीबी का फलसफा जब स्त्रियों के प्रति सोच को नहीं बदल पाया तो छोटकी चाची तो परित्यक्ता थीं। गाँव वाले जो चाहे बोले या लांछन लगाये उसे तो अब ऐसे ही जीना था। सो चाची ने किस्मत का लेखा मान अपना जीवन परित्यक्ता के रूप में यापन करती रही। उन्हें अधिकारहीन रहकर बस ताउम्र अन्य लोगों की सेवा में बिताते हुए उफ़ भी नहीं करना था। बस यही सोचकर साथ जीतीं कि काश एक बार पति फिर से मिल जाएँ, कुछ बोल जाएँ, एक अक्षर की चिट्ठी उसके नाम लिख अपने संदेशा भिजवायें जिसके सहारे वह शेष जिन्दगी जी सके। लोगों से यह कह सके कि "मैं अब परित्यक्ता नहीं, वह मेरे साथ हैं।" बस इसी आस में कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा। छोटकी चाची ने अपने जीवन के 50 साल तो बिता ही लिए।

पर मेरा मन आज भी उतना ही अशांत है, यह जानकर कि आज भी हमारे समाज में एक नहीं अनेक छोटकी चाची हैं, जो परित्यक्ता का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। ये बात और है कि पहले सिर्फ गाँव में दिखती थी अब बदले स्वरूपों में ये घटनाएँ शहरों में भी दिखती हैं। अगर कारण में जायें तो इन महिलाओं की गलती बस इतनी कि या तो ये अशिक्षित हैं या शायद सुंदरता भी एक कारण हो, परन्तु ये कैसी स्वतंत्रता कि पत्नी पसंद न आने पर किसी से भी अवैध सम्बन्ध बना लिए या दूसरी शादी कर ली और समाज उस पुरुष को गलत ठहराने या नये सम्बंध को अवैध घोषित करने के बजाय स्त्री पर प्रहार करता है। ज़रा सोचिये जिस समाज में हम विधवा स्त्री के जीवन को दयनीय मान लेते हैं। अत्याचार तो उनके साथ भी बेहिसाब होता है परन्तु एक बात तो तय है कि उनकी स्थिति में सुधार की ओर समाज प्रयासरत है। एक विधवा स्त्री को समाज में कैसे रहना है उसे वह पता है, परन्तु एक परित्यक्ता सधवा होकर रहे या विधवा होकर या किसी अन्य प्रकार से जीवन जीये, इसकी कोई रूपरेखा समाज के पास नहीं है।

जब कभी समाज में ऐसे विषय को उठाया भी जाता है तो वापस सवाल उठने लगते हैं कि दोषी कौन? व्यक्ति या समाज अथवा परिस्थिति? परन्तु ऐसे सवालों को करते समय हम ये कैसे भूल जाते हैं कि समाज या परिस्थिति को बनाने वाला कौन है? क्या ये अपने आप बन जाते हैं या व्यक्ति की अवसरवादिता ऐसी परिस्थितियों को जन्म देती है। क्यों नहीं हम इतिहास को पलट कर देखते हैं? वैदिक काल जहाँ समाज अपने कार्यों का विभाजन कर अपने दायित्व का निर्वाह करते थे और स्त्री एवं पुरुष अपनी सीमा में रहकर समान रूप से खुशियों को जीते थे। रामायण में राम का सीता के लिये धोबी के पक्ष में न्याय देना, पांडवों का द्रौपदी से विवाह का निर्णय, जुए में द्रौपदी को हारना जैसे निर्णय किनके थे? चाहते तो निर्णय इसके पलट भी हो सकता था। इतना ही नहीं कहते हैं कि महाभारत के समय और उससे पहले भी विवाह जैसी संस्था नहीं थी। पुरुष चाहे तो किसी स्त्री को अपने भोग का साधन बना सकता था, परन्तु एक बेटे श्वेतकेतु ने अपनी माँ की इस पीड़ा को समझा था और वहाँ से विवाह जैसी संस्था सामने आई। विवाह का अर्थ यही था कि वर अपनी वधू को सम्मानपूर्वक अपने घर ले जाये और अब परपुरुष का उस पर कोई अधिकार नहीं होगा। कहने का अर्थ यही कि समाज या व्यक्ति चाहे तो इन कुरीतियों को नियम के तहत दूर कर सकता है। आवश्यकता सही दिशा में सही सोच लाने की है। दोषी लोगों का समाज में बहिष्कार आवश्यक है। घर में ऐसे स्त्रियों का परिवार सम्बल बने न कि अभागन कह अभागन का जीवन जीने को छोड़ा जाये। समाज की महिलाओं को, चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति, धर्म या उम्र की हों, सदैव जागरूक करने का प्रयत्न हो। बचपन से ही कन्याओं में आत्मबल, आत्मविश्वास, स्वावलंबन एवं निर्णय लेने की भावना को प्रेरित किया जाना चाहिए।

समाज स्त्री और पुरुष के जोड़ से ही बना है। यदि महिलायें समाज के गलत सोच का शिकार होती रहेंगी तो ऐसे में हम अपने सुखद भविष्य को कैसे देख पायेंगे। अपने नौनिहालों को हम कैसी शिक्षा और जागरूकता दें। यह भी सोचने की बात है आज पता नहीं क्यों फिर से वह राजू की छोटकी चाची याद आ रही है। कैसे सुबह का भजन गाती थीं -
"नारी के जीवन, केहेन ई जीवन
सब भेल व्यर्थ
कत्तेक दुःख हम सहब
कत्तेक दुःख हम कहब
हे दीनानाथ! कखन हरब दुःख मोर।"

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