कहानी: परिष्कार

शरत कुमार

शरत कुमार

इतवार का दिन था। सुबह बरसात हो चुकी थी। कुछ बिन बरसे बादल आसमान में धूप से लुक छिपि कर रहे थे। ऐसी धूप छांह में कपड़े सूखने की संभावना नहीं थी और कपड़ों के बिना कल दफ्तर कैसे जाना होगा? विवाह से पहले पुराने नौकर ने अनेक वर्षो तक ऐसी उलझनों से मुझे बचाये रक्खा था। लेकिन अब वह पुरानी बात हो चुकी थी। नई पत्नी और पुराने नौकर के अधिकार संघर्ष में पत्नी की विजय अवश्यम्भावी थी। फिर चलचित्रों के बदलते दृश्यों समान आते जाते नौकरों की अंतहीन गति से बाधित हो यह भार पत्नी को अपने ही कंधों पर लिये बिना चारा न था। घर की उचित साज सज्जा और रहन सहन के तरीकों में परिष्कार लाने की महत्वाकांक्षाओं के बीच हर सुबह दफ्तर जाने के कपड़े तैयार रखने जैसी रोज़मर्रा बात पत्नी के ध्यान से उतर जाने पर शोरगुल मचाना खतरे से खाली नहीं था। नौकरों को तो डाँट लगाकर स्थिति में सुधार होने की आशा की जा सकती थी। वर्तमान निरसहाय स्थिति में दार्शनिक त्याग मार्ग या सहिष्णुता का ज्ञान और बोध ही संभव था। ऐसी दशा में नौकरों की जीवन परिस्थिति से सहानुभूति हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं थी।

दोपहर बाद जमादार एक अट्ठारह बीस वर्षीय आदिवासी लड़के को कहीं से ढूँढ लाया। "कपड़े धो सकता है और कुछ दिनों में खाना बनाना सीखा जायेगा" जमादार ने कहा। चाकलेटी रंग का दमकता वर्ण जिस पर सफेद कमीज़ निखर रही थी। काली पुतलियों और चेहरे के गहरे रंग के बीच उसकी आँखों की शुभ्र अकलंक सफेदी में एक निर्भीक चमक थी।

पहाड़ियों के अंचल में विस्तृत साल के जंगलों में पला यह युवक शहर की घुटी हवा में कैसे रहेगा?

"कौन इसे सिखाएगा?" पत्नी ने कहा। पर बदलती वैवाहिक आस्थायें अभी इस स्तर पर नहीं पहुँची थीं कि पत्नी मेरे अनधुले अनसूखे कपड़ों की ज़िम्मेवारी सैद्धान्तिक रूप से अस्वीकार कर सके। पिछले तीन दिन से घर नौकर विहीन था। लाचारी में रोज़मर्रा स्तर के कामों में व्यर्थ होती शक्ति से ऊँचे स्तर के जीवन में विघ्न पड़ रहा था। ऐसी दशा में रहन-सहन में परिष्कार कैसे लाया जा सकेगा। काश ऐसी हतोत्साहिक स्थिति की कल्पना क्रोध के आवेश में नौकरों को निकालते समय की जा सकती। मनोविज्ञान में एमए डिग्री के सुप्रभाव से पत्नी ने अनधुली कमीज़ों की उठती ढेरी के अनुपात में बढ़ते अपने स्नायु तनाव को हल्का कर लेना ही उचित समझा।

चार दिन बाद गुलाबी रंग की मेरी सबसे प्रिय कमीज़ गायब थी। सूती कमीज़ें जल्दी नहीं सूखती। ठीक तरह इस्तरी किये बिना पहनी भी नहीं जा सकतीं। पत्नी के अनुसार रासायनिक धागों के कपड़े त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं। इसके अलावा, टेरीलीन की कमीज़ की से असंस्कृत शारीरिक दिखावट भी पत्नी को नापसन्द थी। लम्बी बहसों के बाद इस जटिल विवाद का फैसला बौद्धिक धार्मिक मध्यम मार्ग के अनुसार हुआ कि वस्त्र में बीस प्रतिशत से अधिक रासायनिक सूत नहीं होना चाहिए। समझौता स्वीकार करने के बाद मुझे मालूम हुआ कि बाज़ार में सबसे कीमती कमीज़ें ही मध्यममार्गीय थीं।

"वही कमीज़ जो पिछले महीने खरीदी थी" गुमी कमीज़ की जानकारी मांगने पर पत्नी ने कहा, "अपने कपड़ों का तुम ख्याल क्यों नहीं रखते।" नौकर-विहीनता के दुष्परिणामों की याद अभी ताज़ी थी, शायद इसलिए।

कमीज़ गुम होने का दोष धोबी, जमादार या हवा से उड़ जाने आदि पर लगाकर आत्मसंतुष्टि कर ली गई।

अगले सप्ताह मुझे शहर से बाहर जाना था। दफ्तर से लौटकर सूटकेस में कपड़े रखते समय पाया कि बीस प्रतिशत रासायनिक सूत की नीली कमीज़ गायब है।

"यही लड़का बदमाश है।" पत्नी ने कहा, "कल इससे रसगुल्ले मंगवाये थे। रास्ते ही में दो खा गया। कहता है दुकानदार ने कम दिये होंगे।" अपनी सबसे अच्छी दो कमीज़ों की चोरी ने नौकर के प्रति मेरे सद्भाव और सहिष्णुता की मात्रा हल्की कर दी थी।

"कमीज़ हमको नहीं मालूम साब" आदिवासी लड़के ने जवाब-तलबी में कहा। तैश में आकर मैंने उसको एक चाँटा लगाया, "नहीं कैसे मालूम? कमीज़ को क्या भूत ले गया?" उसकी कोठरी की तलाशी में भी कमीज़ नहीं मिली। हालांकि मुझे निश्चय था कि चोरी उसी ने की थी। ट्रेन का समय हो रहा था। "लौटकर आने पर देखा जायेगा।" मैंने पत्नी से कहा।

लेकिन अगले दिन सुबह ट्रेन में बैठे-बैठे चाँटा लगने के बाद आदिवासी युवक का स्तब्ध चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमता रहा। कमीज़ें उसने ही चुरायी थीं इसमें मुझे सन्देह नहीं था। सुबह की ताज़ी धूप में ट्रेन दक्षिणी बिहार की छोटी पहाड़ियों में घूमती जा रही थी। घाटियों के अन्तहीन विस्तार में दूर-दूर पर साल वृक्षों के समूह थे। मैदानों में खुली हवा ने मन को अपनी स्वच्छ स्फूर्ति से भर दिया। पहले दिन उसकी आंखों में देखी अकलंक निर्भीक चमक मुझे याद आती रही। शायद कुछ ही दिन हुए वह शहर में आया होगा। जीवन की विषमताओं से अनबुझा अनझुका। यह समझने में असमर्थ कि सुन्दर कमीज़ों को पहनने का अधिकार सम्पन्न जन्म परिस्थिति पर निर्भर था। वह नहीं जान पाया था कि साल के जंगलों से दूर विषम बुद्धि के मनुष्य जंगली पशु-पक्षियों को चिड़ियाघर के सींखचों में बन्द कर रखते हैं। "मेरी सबसे सुन्दर कमीज़ें ही उसने चुरायीं" - ख्याल आने पर मैं मन ही मन मुस्कराया - "उसके सुरूचिपूर्ण चुनाव की सराहना तो पत्नी को करनी ही पड़ेगी।"

प्रकृति की नैसर्गिक छाया में पले युवक का मिठाई खा लेना क्या अस्वाभाविक था? मिठाई की सुगंध से मुँह में पानी न भर आना तो जीवन की विषमताओं के सम्मुख झुक जाने के बाद ही संभव है। घर की सजावट और परिधान के परिष्कार से संतुष्ट मन:स्थिति में यह सरल बात क्यों समझ नहीं आती। ग्लानि से मन भर गया। खिड़की से बाहर दूर पहाड़ियों की चोटियों पर सफेद बादल रूई के फाहों की तरह तैर रहे थे। ट्रेन मनुष्य के रोज़मर्रा जीवन की असंगत गति की अवहेलना में हरे मैदानों के बीच स्थिर गति से दौड़ती जा रही थी।

सात दिन बात घर लौटने पर मैं इस सम्भावना के लिये बिल्कुल तैयार नहीं था कि उस आदिवासी युवक को देखने के लिये पुलिस-स्टेशन जाने की ज़रूरत पड़ेगी। "रंगे हाथ पकड़ गया" पत्नी ने उत्साह से कहा, "मैं हमेशा तुमसे कहती थी कि इन लोगों को सख्ती से ही अकल आती है।"

पत्नी का छोटा भाई अरूप मेरी अनुपस्थिति में दो दिन के लिये आया था। उसके लम्बे चौड़े कसरती शरीर को देखने के बाद भी आदिवासी युवक ऐसी ग़लती कैसे कर बैठा।

"अरूप की लापरवाह आदतें तो तुम जानते हो" पत्नी बताती गयी, "कपड़े-लत्ते संभालना तो दूर, रुपये पैसे भी खुले छोड़ जाता है।"

बात मालूम हुई। अरूप सिनेमा देखने घर से निकला था पर बीस मिनट बाद ही लौट आया। लेकिन तब तक गुसलखाने में भूल से छूट गया उसका बटुआ गायब हो चुका था। उस दौरान नौकर के सिवा और कोई आदमी घर में नहीं आया था। मामला बिल्कुल साफ था।

"अरूप ने गुसलखाने में खूब पिटाई की। तब भी नहीं माना। फिर पुलिस में दे दिया" पत्नी कहती गई, "अगले दिन सुबह जब पुलिस वाले उसे वापिस लेकर आये तो पिटाई से उसकी शक्ल बदल गयी थी। अरूप का बटुआ और तुम्हारी गुलाबी कमीज़ भी मिल गई। कहता था कि नीली कमीज़ गाँव का एक लड़का ले गया है।"

आदिवासी युवक अभी थाने में बन्द है। मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जायेगा और कई महीने की सज़ा मिलेगी। उसके खिलाफ लिखाया बयान वापिस लेना मेरे लिये संभव नहीं है। उस युवा चेहरे को एक बार फिर देखने की अनहोनी इच्छा मुझे पुलिस स्टेशन की ओर खींच ले जाती है। इस वयस्क संसार के बोध का क्या कोई सरल मार्ग नहीं है। पुलिस स्टेशन की लाल इमारत के पास पहुँचते-पहुँचते बूंदा-बांदी शुरू हो गयी। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि उस युवक से क्या कहूँ।

- शरत कुमार
बी - 5/22, सफदरजंग एन्कलेव
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