कविता: अधूरे आँचल

कुमुद बाला

कुमुद बाला

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वेदनाओं के आकाश में, शब्दों के बादल छाये हैं
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये हैं
गम के बादल छाये हैं।
कोमल पल्लव सा था बचपन
खेल पुराना अटकन-चटकन
किताब-कापियों की जकड़न
माँ के गीतों की मधुर गुञ्जन
नैनों की दहलीज़ पे अब तक, दृश्य मैंने ठहराये हैं
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये है।

गम के बादल छाये हैं।
थी अपनेपन की मुझे तलाश
भरे थे स्वार्थ से हर एक पाश
नहीं मिटी नफरत की दीवार
उठी हूक मिटा पाती मैं काश
न चाहत थी काँटों की लेकिन जीवन में उग आये हैं
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये हैं।

गम के बादल छाये हैं।
संयोग-वियोग और विषमताएँ
अनुराग-विराग की भूमिकाएँ
पीढ़ियों की चयनित मान्यताएँ
रिवाजों में फँसी अंध परम्पराएँ
डोली-अर्थी की झोली में, नैनों ने नीर बहाये हैं।
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये हैं।

गम के बादल छाये हैं।
तम-हिंडोले पर जलता दीपक
जलता-बुझता-लड़ता दीपक
पगडण्डी पर वह ठहरा दीपक
चुनौतियों को समझता दीपक
सामाजिक विषमताओं को सह,पग में छाले आये हैं।
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये हैं।

गम के बादल छाये हैं।
विष-वल्लरियों को तन में लपेटे
धीरज धर मुस्कानों को सहेजे
दहलीज़ पे नैनों के परकोटे
आँचल में मन्नत के हल्दी-गोटे
सौगात भरोसे की थी किन्तु अब,लहू के छत्ते छाये हैं
तमन्नाओं की सीढ़ी पर, अधूरे आँचल लहराये हैं।
गम के बादल छाये हैं।

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