निराला का व्यक्तित्व और उनके काव्य के सामाजिक सरोकार

आनन्द दास

आनन्द दास

     सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म पश्चिम बंगाल के महिषादल में 29 फरवरी, 1899 को हुआ। निराला का जन्म रविवार होने के कारण वे 'सुर्जकुमार' कहलाए। निराला के बाल मन पर जो संस्कार अंकित हुए, उनमें अपने गाँव घर गढ़ाकोला से लेकर महिषादल (बंगाल) तक के अनेक अनुभव थे। बचपन निराला का जरूर बंगाल में बीता और निराला बंगाल की संस्कृति से प्रभावित भी हुए, पर उनका प्रखर और जिद्दी किसानी स्वभाव उससे एक तरह का तनाव भी अनुभव करता था। ढाई साल की उम्र में निराला माँ को खो चुके थे, महिषादल में पिता के साथ रहना पड़ा। निराला के साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ अल्पायु अवस्था में ही हो गया था। बचपन में ही वे बांग्ला में कविता करने लगे थे। वे किशोरावस्था से ही संस्कृत में पद रचना करने लगे। वे बाद में गरीबी से त्रस्त होकर निराला गढ़ाकोला गांव से पुनः महिषादल आ गये और उन्होंने अल्पकाल के लिए फिर नौकरी की। इसी समय सुर्जकुमार ने कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले पत्र 'समन्वय' के लिए 'भारत में रामकृष्ण अवतार' लेख लिखा। इस एक मात्र लेख ने सुर्जकुमार में 'निराला' की संभावना को उजागर कर दिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा स्वामी माधवानंद जैसे विद्वानों ने लेख की प्रशंसा की और तब द्विवेदी जी की संस्तुति पर 'समन्वय' पत्र में सुर्जकुमार का सुयोग बैठ गया। वे नौकरी छोड़ आए थे। सन् 1922 ई. की बरसात में सुर्जकुमार कलकत्ता के समन्वय कार्यालय से सम्बद्ध हो गये। इस समय तक सुर्जकुमार की लेखनी अनेक क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा की बीज बो चुके थे। तत्कालीन कई हिन्दी पत्रिकाएँ माधुरी, प्रभा, समन्वय तथा सरस्वती सुर्जकुमार की प्रतिभा से परिचित हो गयी थीं। सुर्जकुमार ने बंगीय प्रभाववश अपने को सूर्यकान्त त्रिपाठी लिखना प्रारम्भ कर दिया था। 'समन्वय' बागबाजार, कलकत्ता के 'उद्बोधन कार्यालय' से निकलता था। इसके सम्पादक स्वामी माधवानंद थे और सहायक थे सूर्यकान्त त्रिपाठी। वे न केवल 'समन्वय' के संपादन में सहयोग देते, वरन् आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए विविध प्रकार के लेख लिखते। इसी समय सूर्यकान्त हिन्दी के कई वरिष्ठ साहित्यकारों के सम्पर्क में आए। बांग्ला के नाटककार घोष से प्रेरित होकर उन्होंने इसी बीच 'पंचवटी प्रसंग' नाम का गीत नाट्य लिखें। सूर्यकान्त को 'निराला' बनाने का श्रेय 'मतवाला' को है। 'समन्वय' में रहते हुए सूर्यकान्त त्रिपाठी अपनी प्रतिभा प्रमाणित कर चुके थे। कलकत्ता के धनाढ्य हिन्दी प्रेमी बाबू महादेव प्रसाद सेठ एक हिन्दी साप्ताहिक निकालने की योजना बना रहे थे। उनके साथ थे शिवपूजन सहाय और मुंशी नवजादिक लाल। चूँकि अब तक सूर्यकान्त त्रिपाठी की जय की घंटी हिन्दी जगत में बज चुकी थी, अतः महादेव प्रसाद सेठ तथा शिवपूजन सहाय ने सूर्यकान्त त्रिपाठी को 'निराला' उपनाम देकर 'मतवाला' के सम्पादन मण्डल में शामिल कर लिया।
     निराला के काव्य में सामाजिक परिवेश का वर्णन अत्यंत विशद है। उन्हें सामाजिक सरोकारों का जनकवि भी कह सकते हैं। निराला के काव्य में उनका सामाजिक सरोकार एक विद्रोही कवि के रुप में देखने को मिलता है जिसका स्वर प्रतिवादात्मक है। छायावादी काव्य में निराला ही एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने साधारण मनुष्य को बहुत करीब से देखा और अपनी रचनाओं द्वारा तत्कालीन विदेशी सत्ता के खिलाफ विद्रोह करने को भी प्रोत्साहित किया। निराला का विद्रोही व्यक्तित्व सृजनात्मक था अपने समय की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और साहित्यिक सभी क्षेत्रों की गलित मान्यताओं, रूढ़िगत संस्कारों एवं मूल धारणाओं के प्रति उन्होंने विद्रोह किया। नियम तोड़ना निराला ने आज की पीढ़ी को सिखाया। नियम भंग तो निराला के जीवन व व्यक्तित्व के साथ एक रूप हो गया था। उनके नियम भंग के साथ विद्रोह जुड़ा हुआ था। इसी विद्रोह को उनके काव्य में स्थान मिलता गया। अनेक आलोचकों और विद्वानों ने निराला के काव्य की विभिन्न रूपों में समीक्षा की है समाज की यथास्थिति के प्रति उनका स्वर सदैव विद्रोही ही रहा है, वे मूलतः क्रांतिकारी कवि रहे हैं केवल कथनी में ही नहीं, करनी में भी। 'सरोजस्मृति' कविता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने आजीवन, रूढ़ियों, परम्पराओं, कुंठित मर्यादाओं का विरोध किया काव्य के क्षेत्र में भी और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने लिखा है-
"दुःख ही जीवन की कथा रही।     
क्या कहूँ जो आज तक नहीं कहीं।।"1

समाज में व्याप्त असंतोष
, अव्यवस्था, अराजकता, कुशासन को देखकर निराला में रोष जागृत होता है और वे 'कुकुरमुत्ता' लिख डालते हैं। वहीं दूसरी ओर इन तमाम अव्यवस्थाओं के बीच उनका हृदय द्रवित हो उठता है, नयनों से करुणा बहने लगती है और वे संसार की पीड़ा से दुखी होकर कह उठते हैं -
"दलित जन पर करो करुणा
माँ अपने आलोक निखारो,
नर को नरक त्रास से वारो
जीवन की गति कुटिल अन्धतम जाल।।"2

कवि समष्टि की चिन्ता करता है। जड़ समाज से जूझते-जूझते जब वे हार जाते थे तो एकांत में आत्ममंथन करते थे
, जैसे -
"गहन है यह अन्धकार।
मैं अकेला
स्नेह निर्झर बह गया है।
हो गया जीवन व्यर्थ, मैं रण में गया हार।।"3   

इन पंक्तियों में नैराश्य भाव है किंतु पराजय का भाव नहीं है। क्योंकि निराला को यह अच्छी तरह ज्ञात था कि मानव मन निराश हो सकता है पर
, हार नहीं सकता। मन की सबलता ही मनुष्य को कर्म करने और संघर्षों से लड़ने की प्रेरणा देती है। निराला की उत्तरवर्ती काव्य यात्रा की सर्वाधिक चर्चित कृति 'कुकुरमुत्ता' है। इस कविता में मूलतः सामंती वर्ग और सर्वहारा वर्ग का द्वन्द्व युद्ध प्रस्तुत किया गया है। यह एक लम्बी प्रबन्धात्मक कविता है। इनकी अन्य कविताओं से इस कविता की रचना शैली भिन्न है। वास्तव में  तत्कालीन समय में विदेशी शासन तथा सामंती मानसिकता के पैरोकारों, चाटुकारों के लिए निराला ने इस कविता में कुकुरमुत्ता को प्रतीक रूप में प्रयोग करके खूब आलोचना की है। कविता का प्रारंभ ही नवाब के बगीचे से होता है जहाँ नवाब एक फारसी खिले हुए गुलाब पर मोहित हो जाते है, उसकी तारीफ करते हैं वहीं दूसरी ओर बिना खाद पानी के पनपा एक स्वदेशी पौधा भी है जो अनायास ही इधर-उधर से उग जाता है, उसमें भी अपने स्वाभाविक गुण हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है क्योंकि शायद वह स्वदेशी और निष्प्रयोज्य है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में निराला ने अभिजनों के विरूद्ध आक्रोश को अभिव्यक्त किया और सामंतवादी व्यवस्था के प्रति अपनी घृणा वृत्ति को भी दर्ज किया।

नये पत्ते - नये पत्ते संग्रह की रजत कविताओं का स्थान अद्भुत रूप से महत्वपूर्ण है। सनी और कामी इस संग्रह की चर्चित कविता है
, जो प्रगतिवादी समस्या को लेकर लिखी गयी है-
"बीनती है, काटती है, लूटती है, पीसती है,
डालियों के तीले, अपने सूखे हाथों मीचती है।
घर बुहारती है करकट फेंकती है,
और घड़ो भरती है पानी।।"4

इसमें एक ओर मातृ हृदय की ममता का मर्मस्पर्शी चित्रण है तो दूसरी ओर कुरूपता के कारण विवाह न हो पाने के सामाजिक विसंगति पर करारा व्यंग्यात्मक प्रसार किया गया है। प्रगतिवादी से प्रभावित निराला की प्रमुख रचनाएँ प्राचीन साहित्य युग
, युग से घोषित, पीड़ित, अभावग्रस्त मानव को संगठित करता हुआ नूतन समाज के सृजन की प्रेरणा देता है। निराला की प्रगतिवादी रचनाएँ ही नहीं उनका समस्त काव्य संसार इसका प्रमाण है जिसमें सर्जन जनहितैषी और सकल तत्व सन्निहित थे। वे लिखते हैं-
"वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता,
उठा कर सर शिखर से, अकड़कर बोला कुकुरमुत्ता।
अबे, सुन बे गुलाब!
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा है 'कैपिटलिस्ट' !"5

यहाँ पर यह बता देना भी शायद जरूरी है कि इसी
'कैपिटलिस्ट' शब्द की वजह से बहुत से आलोचकों ने निराला को 'कम्युनिस्ट' घोषित कर दिया जबकि सच्चे अर्थों में यह शब्द यह एक देशी द्वारा विदेशी को दिये गये गहरे भावार्थ से जुड़ी एक फटकार मात्र है। गुलाब की प्रवृत्तियों का बखान करते हुए निराला उसे स्वार्थी ओर लोलुप बताते हैं और जिसके चंगुल में फंसकर व्यक्ति अपना सर्वस्व लुटा देता है -
"हाथ जिसके तू लगा
पैर सर रखकर वह पीछे को भगा।
औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर
तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर।"6      

गुलाब जहाँ मनमोहक
, लुभावना होता है तो उसका कारण भी श्रमजीवी लोगों द्वारा उसका पोषण, संरक्षण करके उसे तैयार करना उसकी देखभाल करना है। गुलाब कलमी है, इस बात को लक्ष्य करते हुए कुकुरमुत्ता कहता है -
"देख मुझको, मैं बढ़ा
डेढ़ बालिश्त और ऊँचे चढ़ा,
और अपने से उगा मैं,
बिना दाने का चुगा मैं
कलम मेरा नहीं लगता
मेरा जीवन आप जगता।"7  

वस्तुतः इस कविता के अंत में निराला सर्वहारा वर्ग की महत्ता को स्थापित करते हुए उसकी आवश्यकता की यथास्थिति को सही बताया है। वास्तव में यह कविता स्वदेशी बनाम विदेशी
, शोषक बनाम शोषित की वस्तु स्थिति को स्पष्ट करती है। निराला के विद्रोही व्यक्तित्व में कर्मठता और प्रतिभा का भाव एक संयोग था। अन्याय के प्रति तीव्रतम प्रतिकार उनकी सभी कृतियों के मूल में रहा है। आजीवन विरोध की कटुता सहते हुए बारम्बार आहत होकर भी समझौते का मार्ग उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। निराला आधुनिक कविता के अपराजेय व्यक्तित्व है। परम्परा के भंजक और विद्रोह की मूर्ति होकर भी वे परम सांस्कृतिक एवं अद्भुत सर्जक थे।
निराला का लेखन विवेकानन्द तथा बंगला भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर से प्रभावित था। अद्वैतवाद की भावना का उदात्त स्वरूप उनके विचारों में झलकने लगा, उन्होंने अनुभव किया कि जब सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं तो अमीर-गरीब का भेद क्यों? और उनका अंतस इसी बात से झंझा-झंकृत हो गया उनके मन में शोषितों के प्रति गहरी संवेदना, लगाव, उत्पन्न हो गया वहीं रईसजादों, पूंजीपतियों के प्रति क्षोभ की भावना विकसित हुई। उनकी कई कविताएँ यथा- 'वह तोड़ती पत्थर', 'भिक्षुक', 'विधवा' आदि इसी लोक संवेदना से परिपूर्ण हैं। एक कविता में वे समाज को संबोधित करते हुए कहते हैं -
'छोड़ दो जीवन यों न मलो।
यह भी तुम जैसा ही सुन्दर।
तुम भी अपनी ही डालों पर फूलो और फलों।'

यह साम्यवाद निराला की अन्य कविताओं में भी दिखायी देता है।
'जियो और जीने दो' का सिद्धांत मार्क्स के वैचारिक सिद्धान्तों से प्रेरित है हालांकि इसका प्रेरणा स्रोत अ‍न्य भारतीय दर्शन भी है जहाँ निराला अन्य ज्ञानियों के प्रभाव से प्रभावित दिखते हैं। 'अधिकांश' नामक कविता में निराला ने 'मोक्ष' और 'माया' के तुलनात्मक अधिग्रहण में माया रूपी जनसेवा या समाज अभिलाषा को अधिक महत्व दिया।

     सम्पूर्ण आधुनिक कविता पर निराला की विद्रोही चेतना का प्रभाव बार-बार परिलक्षित होता है। उनका विद्रोही व्यक्तित्व दुराग्रहों से मुक्त है। उन्होंने निरर्थक किन्तु प्राचीन मान्यताओं का डटकर विरोध किया है तथा उन परम्पराओं एवं व्यवस्थाओं को उचित महत्व दिया है जो हमारी नवीन मान्यताओं एवं विचारों के लिए दृढ़ आधार का काम कर सकता है। निराला ने न केवल द्विवेदी युगीन कविता पर प्रहार किया वरन् छायावादी कविता पर भी जहाँ जड़ता परिलक्षित हुई, करारा आघात किया। जब भी कोई काव्य प्रवृत्ति रूढ़िग्रस्त होकर निर्जीव होने लगी निराला ने उसमें प्राण का संचार किया। निराला का विद्रोह प्रगतिमूलक है। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में उन तत्वों का डटकर विरोध किया जो हमारी प्रगति के लिए अभिशाप सदृश है। वे न हर नयी चीज के समर्थक थे और न हर पुरानी चीज के विरोधी, हमारे भावी साहित्य में प्रगति और परम्परा को ऐसी ही कड़ी जुड़नी चाहिए। वस्तुतः निराला का प्रगतिवादी उस तरह का शास्त्रीय प्रगतिवाद नहीं है जैसा कि साम्यवादी राजनीतिक विचारधारा के नियमों व आदर्शों के अन्तर्गत किया जाता है। उसमें प्रगतिवाद होकर प्रगतिशीलता है, समाजवाद है मानवतावाद है।
    
            संदर्भ-सूची 
1. निराला त्रिपाठी सूर्यकांत, सरोज स्मृति, पृष्ठ क्रमांक-15
2. निराला त्रिपाठी सूर्यकांत, बस एक बार नाच तू श्यामा, पृष्ठ क्रमांक-24,25
3. चतुर्वेदी डॉ. रामस्वरूप, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, पृष्ठ क्रमांक-328
4. निराला त्रिपाठी सूर्यकांत, नये पत्ते
5. सम्मेलन पत्रिका, निराला विशेषांक, पृष्ठ क्रमांक-134,136
6. वही, पृष्ठ क्रमांक-212
7. चतुर्वेदी डॉ. रामस्वरूप, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, पृष्ठ क्रमांक 302

5 comments :

  1. कई सारी रोचक और तथ्यात्मक जानकारी के साथ निराला विचार का समग्रता से विश्लेष्ण. साधुवाद आनन्द जी. अच्छा प्रयास.

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    1. बहुत ही अच्छा प्रयास है।

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    2. बहुत ही अच्छा प्रयास है।

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