पाल ले इक रोक नादाँ – गौतम राजऋषि का गज़ल संग्रह

समीक्षक: समीर लाल 'समीर'

पाल ले एक रोग नादाँ
गौतम राजऋषि
मूल्य: ₹ 100.00 रुपये
आईएसबीएन संख्या: 9384419605 तथा 978-9384419608
प्रकाशक: हिन्द युग्म, नई दिल्ली

फ़िराक गोरखपुरी का शेर कभी पढ़ा था:
पाल ले इक रोग नादाँ ज़िंदगी के वास्ते
पाल ले इक रोग सिर्फ़ सेहत के सहारे...

गौतम राजऋषि
और कहीं दूर कश्मीर की वादियों में फौज की ड्यूटी निभाते हुए एक कड़क फौजी, अपनी मोहब्बत को याद करते अपने नाजुक दिल से कह उठा - आह! पाल ले इक रोक नादाँ... और उसके दिल की वादियों से निकले उदगार गज़लों की शक्ल लिए 'पाल ले इक रोग नादाँ' किताब में ढल गये।

न जाने नादाँ कौन? दिल जिसका शायराना हो... भाई गौतम राजऋषि या कि दिल मेरा... जो अहसास पाया उस मुस्कराहट को, उस कशिश को, उस मुहब्बत को, उस कसमसाहट को, जिसका रोग वो दिले नादाँ पाल बैठा... किसी उदास सी फिज़ाओं में। इबारत कहती है, भूल जा क्या गुजरा है और याद कर कि किस तरह गुजरना है!

पाल ले इक रोग नादाँ, ब्लॉग के समय से मित्र रहे गौतम राजऋषि की इस किताब से गुज़रना एक अद्भुत अनुभव रहा। हालाँकि उन्हें पढ़ते और उनको पढ़वाते हुए एक अरसा गुजरा। भारत यात्रा के दौरान इस जोशीले नौजवान से कभी फोन पर भी बात हुई। मगर किताब की शक्ल में जो गौतम मिलता है
वह कोई और ही है। बड़ा लम्बा सफर तय करके किताब को भारत से मेरे हाथ तक गौतम ने बड़ी मुस्तैदी
से एवं तरतीब से पहुँचाया और एक लम्बा इन्तजार खत्म हुआ।

कुछ अनुभूतियाँ, जो उनके शेरों से गुजरते हुए महसूस कीं, उन्हीं शेरों की जुबानी:
तुझको क्या मालूम कि कितना शोर उठा है सीने में
दिल के दरवाज़े पर तेरी आँखों की इक दस्तक से

समीर लाल 'समीर'
आगे देखें:
हौले-हौले लहराता था... उड़ता था दीवाना मैं
रूठ गई हो जबसे तो इक सुई चुभी गुब्बारे में

फिर वह दिल सुलग जाता है और कहता है कि:
उसने छू कर छोड़ दिया
मेरी रूह सुलगने को

फिर ये उलाहना, गौतम के अंदाज में:
हर रोज़ ही देते हो हवाले इसी से तुम
फिर ऐंठ के कहते हो... पुरानी है कहानी?
कितने ख़्वाबों के पर टूटे, कितने उड़ने वाले हैं
कुछ हैं ग़ैरों वाले इनमें, कुछ तो अपने वाले हैं

एक और:
उसने तो गीला दुपट्टा अलगनी पर रख दिया
और इधर खिड़की में हम बस भीगे-भीगे रह गए
आप विभिन्न अहसास करते हैं, कभी चाय की गरमागरम प्याली, कभी वादियों में उतरी नरम धूप, कभी सिगरेट का धुआँ, कभी केडबरी चाकलेट का स्वाद, कभी बालकनी से दूर तकती ख्वाहिशें, सब कुछ अपना-अपना सा, अपने आसपास का सा ही।

आह! वाह! करते ही किताब गुजर जाती है, एक याद का सफर थमा कर। और आप डूबे हुए खो जाते हैं, इस बात को झुठलाते हुए कि अब आप भी एक मरीज हैं और ज़ुबाँ कह रही है कि 'पाल ले इक रोग
नादाँ', इस गौतम को पढ़ते चले जाने का।

आप गुजरेंगे तो जानेंगे कि अहसास क्या होते हैं। फौजी का धरम कुछ और, कलम और दिल कुछ
और, नजर कुछ और। यही तो फ़र्क है, जो गौतम को गौतम बनाता है।

सलाम है फौजी के इस ज़ज्बे को, एक फौलादी जिस्म में धड़कता मोम का दिल:
न सुनी है जो अगर तो अब से सुन लो... वो धड़कन...
जिन्दगी के नाम कर दी... जिन्दगी की वो सरगम...

बार बार पढ़ते रहने को मजबूर करती गौतम की लेखनी...अगर आपने अब तक न पढ़ी हो तो देर न करें।

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