लघुकथा: काला कौआ

सरिता बघेला

पेड़ के नीचे सो रही मिनी की आँख काँव-काँव की आवाज़ों से खुल गई। दादा और मिनी के ऊपर बहुत सारे जामुन गिरे हुये थे।

मिनी: "दादू, उठो ना! इन गंदे काँव-काँव ने बहुत सारे जामुन आपकी चादर पर गिरा दिये हैं।"

दादू हँसते हुये बोले, "तो क्या हुआ मिनी? तेरे पति ने तेरे उठने से पहले तेरा नाश्ता तैयार कर दिया।"

मिनीः (नाराज होते हुये ) "दादू अब मैं आपके साथ नहीं सोऊंगी । काँव-काँव को मेरा दूल्हा क्यों कहते हो?" ओर कुछ खीजते हुये बोली, "और जामुन के नीचे ही अपनी खाट क्यों लगाते हो?"

दादू ने प्यार से मिनी के सर पर हाथ फेरते हुये कहा, "दूसरे सवाल का जबाव यह है कि यह पेड़  मेरे पिताजी ने  लगाया था और सब मेरे घर को व मुझे इसी के नाम से पहचानते हैं। यह ठंडी हवा में मुझे मेरे पिताजी के हाथों की थपकी जैसे सुलाता है।"

मिनी ने तपाक से कहा, "और पहले सवाल का जवाब?"

दादू (हँसते हुये), "मेरी प्यारी बिटिया को यह काला कौआ दूर उड़ाकर ले जायेगा न!"

मिनी उदास होकर करवट ले सिसकते हुये बोली, "नहीं दादू, आपको छोड़कर मुझे कहीं नहीं जाना।"

दादू: "अरे मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था। चलो उठो, अपन दोनों सुबह की सैर को चलें।"

मिनी गुस्से से कौओं की और देख रही थी क्योंकि उन्होंने फिर से शोर मचाना शुरू कर दिया था।

2 comments :

  1. इसमें कोई कथ्‍य है ही नहीं ।

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  2. गाँव का परिवेश, पेड़ और संस्कारों का ताना बाना,पर्यावरण के सन्दर्भ में वृक्षारोपण को बल देती, जहां बेटा और बेटी के परवरिश में फर्क किया जता है,वहां दादाजी का पोती के साथ सकारात्मक रिश्ते को पुष्ट करती हुई कथ्य का विस्तार समेटे हुए ये लघुकथा बेहद खूबसूरत बनी है. बधाई आपको आदरणीया सरिता बघेला जी.

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