बोलो गंगापुत्र – डॉ पवन विजय: समीर लाल ’समीर’ की नजर से

समीक्षक: समीर लाल 'समीर'

बोलो गंगापुत्र
डॉ. पवन विजय
मूल्य: ₹ 99.00 रुपये
आईएसबीएन संख्या:
प्रकाशक: रैडग्रैब बुक्स, इलाहाबाद
वेबसाइट: www.redgrabbooks.com


डॉ पवन विजय से ब्लॉग के समय का परिचय रहा ब्लॉग के माध्यम से। पवन से एक छोटे भाई बड़े भाई का सबंध शुरुआती संवादों से ही स्थापित हो गया था, हालांकि उम्र के लिहाज से वो मेरे बेटों की उम्र का है। बड़ों के लिए न सिर्फ उसकी नजरों में सम्मान है वरन वह उसकी लेखनी में भी स्पष्ट झलकता है।

हमारे साथी साहित्यकार एवं अति विशिष्ट ब्लॉगर स्व. अविनाश वाचस्पति के जीवन के अंतिम समय में, जब वे हैपटाईटिस से लड़ाई लड़ते हुए कुछ विषम परिस्थितियों से गुजर रहे थे, तब अक्सर फोन पर उनसे हुई बातचीत में वे पवन का जिक्र किया करते कि किस तरह जब सब साथ छोड़ गये थे, तब पवन उनके पास आता था और जीने का एक हौसला देता था। यह वाकया मात्र पवन के भीतर के उस संवेदनशील इंसानियत के पहलू को बतलाने के लिए,  जो आज की इस कार्मशियल हो चली पीढ़ी में देखने को नहीं मिलता। पवन की लेखनी में शुरु से ही एक अलग आकर्षण रहता था। चाहे उनके मुक्तक रहे हों:

मन पर कितने घाव लगे हैं तुम्ही कहो मैं किसे दिखाऊँ।
शब्दों पर भी दांव लगे हैं तुम्ही कहो मैं किसे बताऊँ ।
पीड़ा का चरणामृत पीते कथा बाँच दी जीवन की
व्यथा कंठ पर पाँव रखे है तुम्ही कहो मैं किसे सुनाऊँ।

या कविता कहने का अपना एक अलग अंदाज:

आषाढ़ की बारिश
भीगी हुई मटियारी गंध
जी करता है अंजुरी भर भर पी लूँ
गीली खुश्बुओं वाली भाप
और चुका दूँ किश्तें
चक्रवृद्धि ब्याज सी
बरस दर बरस बढ़ती प्यास की

या सामाजिक मुद्दों पर उनकी विश्लेषणात्मक पकड़: उनके आलेखों में यमुना की गंदगी पर बात होती तो वहीं राजनीती में हो रही उथल पथल और बदलाव पर समाज के बदलते रवैये की समीक्षा चमत्कृत करती।
हाल ही उनकी किताब ’बोलो गंगापुत्र’ पढ़ी, जिसे उन्होंने बड़े ही प्रेम पूर्वक अपने हस्तलिखित नोट के साथ मुझे भेजी। मन भाव विभोर हो उठा पुस्तक प्राप्त कर। एक अलग नजरिया भीष्म पितामह की सोच का, उनके काल के संग वार्तालाप तथा उनके आत्मालाप के माध्यम से।
किताब अपने बिना खोले ही पिछले कवर को पढ़ते हुए ही बांध लेती है और मजबूर कर देती है इस किताब को खत्म करने के लिए:
काल के प्रश्नों का उत्तर दो; चुप क्यों हो? बोलो गंगापुत्र!
‘अंत में धर्म की विजय होती है’, ऐसा इसलिए कहा जाता है ताकि अन्तिम परिणाम को न्यायोचित ठहराया जा सके। वस्तुत: राजनीति में ‘विजय ही धर्म’ है। राजकुल में सत्ता ही सत्य, धर्म और नैतिकता है।
फिर किताब का समर्पण:
किनारे के पानी की हर बूंद को,
जो लोगों की प्यास बुझाने के लिए अपने रास्ते से हटी,
गति कम की, रुकी और गंदला होना मंजूर किया।
समीर लाल 'समीर'

यह और कोई नहीं, पवन खुद है, ऐसा समर्पण खुद से खुद को। आगे देखें:
सत्ता द्वारा धर्म और सत्य को, जाने कितने क्षेपकों की दीवारों में चुनवा दिया गया। कुलप्रमुख धृतराष्ट्र और भीष्म के पूर्वाग्रहों में आश्चर्यजनक एकरूपता है। एक का दुर्योधन के प्रति, तथा दूसरे का पाण्डवों के लिए आग्रह है।

एक प्रवाह, तरह-तरह के आयाम, सुनी अनसुनी बातें, बार-बार सोचने को मजबूर करती हैं। द्रोण के ऊपर एकलव्य का अंगूठा काट लेने का वास्तविक कारण, कृष्ण का यह कहना कि सत्य अनावृत है, एवं पितामह की संजय के माध्यम से सत्य के पुष्टिकरण की मंशा,  संजय द्वारा पितामह को अर्जुन से युधिष्ठिर के दुर्व्यवहार एवं अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर को मारने का प्रयास जिसमें कृष्ण ने बीच-बचाव किया आदि कथानक के हिस्से, तथा दुर्योधन का वह पक्ष जिसमें अगर वह अपने साथियों के षड्यंत्रों से भ्रमित न होता आदि को जिस तरह पिरोया गया है, बहुत सराहनीय है।
एक लघु उपन्यासिका, जो मात्र 111 पृष्ठों में सम्पूर्ण ग्रंथ का रुप धारण किये है।

लेखन की शैली, सोच और आज की ताजगी से भरे महाभारत के दृष्टांत, निश्चित ही साधुवाद के पात्र हैं। यह पवन की लेखनी का कमाल है। जैसे-जैसे पुस्तक पढ़ता गया मुझे लगा कि मैं भारत सहित वैश्विक राजनीति के रहस्यों  से पर्दा हटा रहा हूँ। राजनीति में जीतने वाले अपने चाल कुचाल को किस प्रकार न्यायोचित ठहराते हैं और हारने वाले कैसे अधार्मिक और अप्रासंगिक बना दिया जाता , पुस्तक में बखूबी चित्रित किया गया है। जीवन-मरण, जय- पराजय, धर्म-अधर्म, नियति-कर्म, सत्य-असत्य, नैतिक-अनैतिक जैसे पहलुओं से जुड़े प्रश्नों को अत्यंत सरल और संवादात्मक तरीके से लेखक ने पाठकों के सम्मुख रखा है। पुस्तक को पढ़ने के बाद यह महसूस होता है कि महाभारत को समझने के लिए पूरक के तौर पर इसे अवश्य पढ़ा आना चाहिए।

मैंने यह किताब बड़ी उम्मीद से उठाई थी और उससे भी बड़ी उम्मीद के साथ एक सांस में पढ़कर खत्म की, जिसमें मुझे इस युवा लेखक में असीम संभावनायें दिखीं। मेरी शुभकामनायें पवन को इस संदेश के साथ कि तुम्हारी किताब मेरी अलमारी की उन किताबों में से एक है जो मेरे आर्म लेन्थ पर हैं, बार-बार पढ़ने के लिए।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगर आपने यह किताब अब तक नहीं पढ़ी है तो आप एक नई पीढ़ी के सशक्त युवा हस्ताक्षर से परिचित होने से वंचित हैं जो कल निश्चित ही एक बड़ा नाम होगा। तब मत कहियेगा कि बताया क्यूँ नहीं था!

अपनी जिन्दगी के कुछ घंटे आप इस अनमोल लेखनी के लिए निकालें, मेरा दावा है कि आप निराश नहीं होंगे और वो समय आपके जीवन का अनमोल समय बन जायेगा।

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