कविताएँ: धनंजय कुमार मिश्र

धनंजय कुमार मिश्र

वन्दे शारदाम्

नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
विरंचिहरीशवन्द्ये विद्याप्रदायिनि हे।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
मनोहरमंजुगात्रे वीणावादिनि हे!
जगद्व्यापिनि हे! परमेश्वरीं वन्दे।
विपुलदानशीले विद्येमहाभागे
मनोरथप्रदे मे मातेश्वरीं वन्दे।।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
नमामि देवि दुःखहरे नमामि देवि सुखकरे
नमामि देवि ज्ञानदे सुरेश्वरीं वन्दे।
नमामि देवि बुद्धिदे नमामि देवि सर्वदे।
हंसासनस्थिते सरस्वतीं वन्दे।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।
नमामि देवि मातृके नमामि देवि शारदे।

दशानन दशमुख

दिल्ली का रामलीला मैदान!
एकत्रित जन-समूह, विजयादशमी की शाम,
उत्साहित, प्रफुल्लित स्मरण करते श्रीराम!
पुतला था जो खड़ा, अविचल !
मन ही मन मुस्कुराया। मैं रावण हूँ !
यों ही यहाँ जलने नहीं आया।
तुम पुतले को जलाकर
खुश होते, छोड़ते पटाखे।
रावण दहन का स्वांग भरते।
घास-फूस को जलते देख मुस्कुराते,
भारत को रावणमुक्त समझते।
पर, मैं नहीं मरने वाला, हूँ अमर!
पाँव पसारता हर गली हर शहर,
अखिल भारत अब मेरा ही घर।
भारत में भ्रष्टाचार के रूप में रहता हूँ,
प्रतिदिन सीता का हरण करता हूँ।
प्रशासन और लोकतन्त्र का करता परिहास,
बेइमानी और गैरकानूनी व्यवहार,
यही मेरे जीवन का शृंगार।
पद और सत्ता का दुरूपयोग,
रिश्वत, फिरौती, घपला, पक्षपात।
इस रूप में जीवित हूँ, भारत में।
नेता, अफसर, औद्यौगिक प्रतिष्ठान
मेरी आसुरी शक्ति के केन्द्र हैं आज।
मेरी शक्ति से परिचित तुम्हारा समाज।।
मेरा मेघनाद है कालाधन,
कुम्भकरण है अपराधीकरण ।
निवेश में बाधा, मानवाधिकार का उल्लंघन
आर्थिक विकास में बाधक, अविश्वास सरकार के प्रति,
क्या ये नहीं कहते कि मैं जीवित हूँ !
अपने समस्त कुटुम्ब जनों के संग।
मैं दशानन दशमुख रावण।।

प्यारी माटी

छोटा नागपुर-संताल की धरती, अब झारखण्ड कहलाती है।
सरहुल-कर्मा, होली-दिवाली, दिसोम सोहराय मनाती है।।

ईद-मोहर्रम, क्रिसमस में कितना खुद को सजाती है।
सब ए बारात की रातों में लौ से जब जगमगाती है।।

गुरू पर्व  हो या दीपावली, यह रौशनी से नहलाती है।
शादी-विवाह के मौसम में माँदर की थाप सुनाती है।।

सावन की वो काली घटाएँ, दिल में आग लगाती है।
अगहन की वो धान कटाई समृद्धिवश इठलाती है।।

आमों की डाली पर बैठी प्यारी कोयल गाती है।
महुए की मदमस्त हवा पागल सबको कर जाती है।।

फूलों पर भ्रमरों की पंक्ति मन को कितना भाती है।
झारखण्ड की प्यारी धरती एकता-पाठ पढ़ाती है।।

हर-हर बम के महोच्चार से बाबा नगरी गुँजाती है।
छिन्नमस्तिके की छाया में भक्ति-रस हमें पिलाती है।।

बलभद्र कृष्ण सुभद्रा की रथ-यात्रा कितनी निराली है।
ईद की वह मीठी खुशबू रसना से रस टपकाती है।।

ईशा की खामोश प्रतिमा शान्ति का पाठ पढ़ाती है।
हर सुबह मुझे नींद से मस्जिद की अजान जगाती है।।

दिसोम थान का पूजा वन्दन मन में श्रद्धा जगाती है।
झारखण्ड की प्यारी माटी चन्दन की भाँति सुहाती है।।

सिंहवाहिनी

जाने कहाँ खो गई भारत की वह विशेषता।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।।

नारियों को अब कहाँ कुछ अधिकार है प्राप्त।
उनके लिए तो कोशिशें भी होती नहीं पर्याप्त।।

भारत को माँ कहने वाले क्या यही तेरा पुरूषार्थ?
नारियों का सम्मान भी, जब हुआ यहाँ समाप्त।।

अब कहाँ कौन किसका देता है साथ ?
आधी आबादी रह गई अब यहाँ अनाथ।।

नारियों का होता सरेआम अपमान
मुस्कुराते खुले घूमते अब यहाँ शैतान।

लूटते हैं रोज इज्जत हर तरफ हैवान।
नहीं अब अवतरित होते स्वर्ग से भगवान।।



राह चलती लड़कियों संग होते अब ‘रेप’।
‘मेरा भारत महान’ सुन जाते हम झेंप।।

नारियों को मिले इज्जत चीखते हैं वे,
भेडि़यों सी चाल उनकी लूटते हैं वे।

रात के सन्नाटे को छोड़ मेरे भाई !
दिन के उजाले में घसीटते हैं वे।।

हर तरफ हर शहर हर डगर हर गली।
कृष्ण की खलती कमी, सिसकती फिर द्रौपदी।।

दुःशासन कल एक था, आज तो दुःखद शासन,
धृतराष्ट बन अन्धा खड़ा सर्वत्र ही प्रशासन।।

कैसी यह विषम स्थिति कराहती फिर मानवता।
अपहरण करता है रावण छटपटाती देवी सीता।।

राम और लक्ष्मण कहीं नजर नही आते।
दैत्य दानव दस्यु ही हर तरफ घूमते।।

मत अश्रु बहा अब तू हे अबले !
उठा खड्ग सिंहवाहिनी अम्बे !
दे आहुति नर पिशाच की,
जय-जय-जय हो हे जगदम्बे।।

मधुमास

पाटल पंकज जूही महुआ औ’ अमराई
फूले पलाश हैं जो वाे प्रीत की गहराई।।

मदकता मधुवन की चितवन है अलसाई
चकवे की चाहत में चकवी है बौराई।।

गंगा तट पर कितनी ये वात सुहानी है
मधुपति के स्वागत में मदहोस जवानी है।।

मधुमास के स्वागत में कलिका जो दिवानी है
फागुन का ये मौसम मदहोश जवानी है।।

कोई जाकर पूछो क्या हुक पुरानी है
उपवन में कोयल की जो कूक सुहानी है ।।

विरह विभावरी की ये बात बेमानी है
ऊषा और रजनी की ये प्रेम कहानी है।।

दरिया और सागर की क्या प्रीत पुरानी है
प्रियतम के नयनों में मौजों की रवानी है।।

फागुन का ये मौसम मदहोश जवानी है।।
फागुन का ये मौसम मदहोश जवानी है।।

2 comments :

  1. सेतु निःसंदेह साहित्यिक उत्कृष्टता का द्योतक है। संपादक महोदय को आभार।
    जय हो।।

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