लघुकथा: रौशनी और खुशबू

गौतम कुमार सागर

गौतम कुमार सागर

वह फूल बेचता है नुक्कड़ पर। उसके फूल ताज़े होते हैं। वह मुरझाए फूलों को एक तरफ रख देता है। उसकी दुकान के गुलाब, मोगरे, चमेली, चंपा, गेंदे सब बिल्कुल महकते हुए, हँसते हुए दिखते हैं। वह बीस साल का हैं। कम पढ़ा लिखा। मगर हमेशा खुशमिजाज। शायद उसकी खुशमिजाजी उसके फूलों और सुंदर बना देती है। या महकते फूल उसे खुशमिजाज रखते है।

उसके पिता एक परिचित को कह रहे थे, “सरकार की एक योजना में इसकी नौकरी लग रही थी। मैने रोज़गार दफ़्तर में भी बात की थी। मगर यह तैयार नहीं हुआ।"

लड़के ने कहा, "पिताजी … मुझे फूलों से प्यार है। जो लोग मेरे ग्राहक हैं उन्हें ताज़े सुंदर फूल बेचना मुझे रूहानी खुशी देता है। वे मेरा सम्मान करते है। कल ही एक आंटी मुझे कह रही थी, कि तेरी दुकान से खरीदी फूल-मालाओं से मेरी कितनी मनौतियाँ पूरी हुई। एक बार एक साहब कह रहे थे, ऑफ़िस में इतना टेंशन रहता है। मगर शाम को जब तेरे पास से गुजरता हूँ, तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा देखता हूँ, तेरे गुलाब, गुलदाउदी को देखता हूँ तो मन एकदम तरो ताज़ा हो जाता है।"

"मैं इतना सुंदर काम छोड़कर और कहीं क्यों जाऊँ? … और बाबा तुमसे तो दूर जाना भी नहीं है। तुमने ही माँ की तरह पाला है। आज भी रोज सुबह बगीचे से फूल तुम्हीं लाते हो। मुझसे कहीं ज़्यादा मेहनत तुम करते हो।"

बाप की आँख में आँसू आ गये, "काश जितना सुंदर हृदय है तेरा, ईश्वर ने तुम्हे आँखें भी दी होती तो कितना अच्छा होता।"

लड़के ने कहा, "बाबा, फूल रंग रूप से अधिक खूशबू से पहचाने जाते है।" लड़के की बेनूर आँखें मानो चमक उठीं। यह रौशनी उसकी सकारात्मक सोच की थी और उसमें खुशबू जीवन के प्रति निश्चल विश्वास की थी।

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