गोदान और अंतरजातीय प्रेम-विवाह

- गुड्डू कुमार

पी एचडी शोधार्थी, अ.मु.वि, अलीगढ़

          प्रेमचंद हिंदी उपन्यास में नये युग के प्रवर्तक हैं। उनके उपन्यास में पहली बार सामान्य जनजीवन की वास्तविक और प्रामाणिक अभिव्यक्ति हुई है। उनके उपन्यास में विषय की विविधता और व्यापकता के साथ-साथ चरित्रों का स्वाभाविक विकास भी है। उन्होंने अपने उपन्यास के माध्यम के भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय आन्दोलन, कृषि समस्या, मानवतावाद, विधवा विवाह, शोषण, अनमेल विवाह, दहेज़ प्रथा, अंतरजातीय विवाह आदि समस्याओं पर प्रकाश डाला है।

गोदान हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ट महाकाव्यात्मक उपन्यास है। इस उपन्यास में भारतीय जनजीवन की कई समस्याओं का चित्रण है; पर इसका मुख्य विषय किसान जीवन की त्रासदी का अंकन है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र होरी और धनिया है। इसमें इन दोनों चरित्रों की दैनंदिनी को चित्रित कर भारतीय किसान की यथास्थिति का वर्णन किया गया है। इसमें मुख्य कथा से साथ-साथ अन्य कई सहायक कथानक भी है, जो मुख्य कथानक की प्रकृति में कसाव लाती है। इन संपूर्ण कथानक को एक साथ देखने पर प्रेमचंद युगीन भारतीय किसान का जीता जगता रूप दृष्टिगोचर होता है। भारतीय किसान का यही स्वरूप कुछ नये कलेवर के साथ आज भी मौजूद है।

गोदान में चित्रित भारतीय जनजीवन की अनेक समस्याओं में से अंतरजातीय प्रेम-विवाह भी एक गंभीर समस्या है। इस समस्या पर प्रेमचंद जी ने सहज भाव से प्रकाश डाला है। यह अपने समकालीन समय की तमाम मान्यताओं और मर्यादाओं को झेलते हुए अंतरजातीय प्रेम-विवाह की एक सफल उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने इस अंतरजातीय प्रेम-विवाह को गोदान में ‘गोबर और झुनिया’ तथा ‘मातादीन और सिलिया’ के माध्यम से उभारा है। गोबर जात का महतो और होरी का पुत्र है जबकि झुनिया जात का अहीर और भोला की विधवा पुत्री है। मातादीन जात का ब्राह्मण और दातादीन का पुत्र है जबकि सिलिया जात की चमार और हरखू की पुत्री है। प्रस्तुत लेख में अंतत: विवाह में परिणत होने वाली इन्हीं दोनों प्रेम-कथाओं पर प्रकाश डाला गया है।

गोदान में इन दोनों प्रेम-कथाओं का विस्तार जिसकी परिणति विवाह में होती है; की अलग-अलग पृष्ठभूमि है। गोबर और झुनिया अलग-अलग जाति से है पर ये दोनों ही जाति-व्यवस्था की दर्जा में नीची समझे जाने वाले जाति के है। अत: इनके प्रेम-प्रसंग में कोई विशेष क्रांति नहीं मिलती है; यह सहज ही स्वीकृत हो जाती है। मातादीन और सिलिया भी अलग-अलग जाति के है; पर इनका पृष्ठभूमि गोबर और झुनिया से इतर है। मातादीन ब्राह्मण है, अत: ये जाति व्यवस्था में सबसे ऊपर है; जबकि सिलिया चमार है, अत: ये जाति व्यवस्था में सबसे नीचे है। अतएव इनके प्रेम-प्रसंग में क्रांति की झलक मौजूद है। क्रांति की इस झलक को आज के सुशिक्षित सभ्य समाज में भी देखा जा सकता है।

प्रेम के विषय में कहावत है कि – ‘प्रेम की शुरुआत पहली नजर में ही होता है’। गोबर और झुनिया के संदर्भ में यह कहावत सही साबित होता है। गोबर का झुनिया से प्रथम मुलाकात तब होता है जब वह उसके घर भूसा पहुँचाने जाता है। यहाँ आतिथ्य की आड़ में इन दोनों के बीच कुछ हास्य-विनोद पूर्ण बातें होती है; और बातों ही बातों में प्रेम का बीजारोपण हो जाता है। गोबर का झुनिया से दूसरी मुलाकात तब हुई जब वह उसके यहाँ गाय लेने गया। गोबर जब गाय लेकर चला तो झुनिया उसके साथ आधे रास्ते तक आई थी। चलते-चलते उन दोनों में जो बातें हुई वह उनके प्रथम मिलन की प्रेम-प्रसंग को और अधिक गहरा कर दिया। झुनिया कहती है- “मैं  समझती हूँ कि तुम्हारे पास मुझे देने के लिए कुछ नहीं है पर मेरे पास जो तुम्हारे लिए है वह बड़े-बड़े लखपतियों के पास नहीं हैं; जिसे तुम भीख न मांगकर मुझसे मोल ले सकते हो; और उसका कीमत है – तुम्हें मेरा होकर रहना पड़ेगा।”[1] इस प्रकार वे दोनों अप्रयत्क्ष रूप से ही सही पर एक होकर रहने के लिए राजी हो गए। गोबर झुनिया पर अपना अधिकार समझने लगा। किसी अन्य व्यक्ति द्वारा झुनिया को रस भरी निगाह से देखने की बात सुनकर गोबर तिलमिला उठता था। इस संदर्भ में प्रेमचंद का कथन है – “प्रेम सीधी-साधी गऊ नहीं खूंख्वार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आँख नहीं पड़ने देता।”[2]

गोबर और झुनिया के मध्य हुए वार्तालाप में, गोबर ने जब झुनिया से प्रेम की खातिर अपनी जान देने की बात कहता है, तब झुनिया प्रत्युत्तर में कहती है - “जान देने का अरथ समझते हो... जान देने का अरथ है साथ रहकर निबाह करना। एक बार हाथ पकड़कर उमिर-भर निबाह करना, चाहे दुनिया कुछ भी कहे, चाहे माँ-बाप, भाई-बन्द, घर-द्वार सब छोड़ना पड़े।”[3] झुनिया की इस उक्ति में दो भिन्न जातियों के बीच पनपने वाले प्रेम-संबंध पर समाज की भयावह स्थिति को देखा जा सकता है। यह स्थिति रचनाकार के समकालीन समय में अपने चरम सीमा पर थी। यह सही है कि आधुनिक समय में समाज का स्वरुप और सोच दोनों बदला है; पर उस स्थिति का अवशेष आज भी मौजूद है। आज भी हमें हर रोज कमोबेश यह सुनने को मिल जाता है कि युवक-युवतियाँ अंतरजातीय प्रेम विवाह के कारण घर-बार छोड़कर भागने को विवश हैं। समाज के ठेकेदार कहीं उन्हें दंडित करते हैं; तो कहीं माँ-बाप द्वारा उन्हें घर में ही क़त्ल कर दिया जाता है। कहीं सरकार इन समस्याओं की छानबीन करती है तो कभी-कभी उन तक इसकी खबर ही नहीं पहुँच पाती है।

 प्रेम-प्रसंग के संबंध में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि युवक और युवतियाँ आखिरकार क्यों एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं या करते हैं? इस संबंध में अगर गोबर और झुनिया के प्रेम-प्रसंग से उत्तर ढूंढे तो यह ज्ञात होता है कि इसके दो स्वरूप हैं; पहला ऐयाशी के लिए और दूसरा जीवन निर्वाह के लिए। इस संबंध में प्रेमचंद की यह उक्ति सटीक है कि - “प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप ले लेता है, तभी ब्याह है; उससे पहले ऐयाशी है।[4] झुनिया गोबर के साथ ऐयाशी नहीं आत्मसमर्पण चाहती है। वह गोबर से कहती है – “मैं जैसी हूँ, वह मैं जानती हूँ। मगर लोगों को जवान मिल जाये। घड़ी भर मन बहलाने को और क्या चाहिए। गुण तो आदमी उस में देखता है, जिसके साथ जन्म भर निबाह करना हो।[5] इसके साथ ही साथ झुनिया प्रेम की दूसरे स्वरूप के संबंध में कहती है – “मेरी समझ में तो यही नहीं आता किसी का रोज-रोज मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी के भी गया-बीता हो गया है? लेकिन किसी को बुरा नहीं कहती भाई! मन को जैसा बनाओ वैसा बनता है। ऐसों को भी देखती हूँ, जिन्हें रोज रोज के बाद कभी-कभी मुँह का स्वाद बदलने के लिए हलवा-पूरी भी चाहिए और ऐसों को भी देखती हूँ जिन्हें घर की दाल-रोटी देखकर ज्वर आता है। कुछ बेचारियाँ ऐसी भी हैं, जो अपनी रोटी-दाल में ही मग्न रहती हैं। हलवा-पूरी से उन्हें कोई मतलब नहीं।[6]

गोबर और झुनिया का प्रेम-प्रसंग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। वे लुकछिप कर मिला करते हैं। इस बात का आभास होरी और धनिया ( गोबर के माता-पिता ) को है; पर वह गोबर को नादान समझकर इसकी ओर ध्यान नहीं देते हैं। उन दोनों को गोबर और झुनिया के प्रेम-प्रसंग का वास्तविक पता तब चलता है जब झुनिया गोबर के साथ उसके घर आती है; और वह पाँच महीने की गर्भवती होती है। गोबर पहले झुनिया को घर भेजता है और उससे वादा करता है कि पहले तुम चलो पीछे से मैं आता हूँ। झुनिया जब घर चली जाती है तो वह छिप कर सारा वृत्तांत देखता रहता है। उसे आभास हो जाता है कि झुनिया अब यहाँ सुरक्षित है; तो वह लोक-लाज के भय के लखनऊ भाग जाता है। लखनऊ में वह मिर्जा खुर्शेद के यहाँ मजदूरी करने लगता है। होरी और धनिया ‘झुनिया’ को अपनी बहू स्वीकार कर लेते हैं। इसके लिए उसे जाति से बहिष्कृत किया जाता है; पर वह जाति के ठेकेदारों को दण्ड देकर पुन: अपने जाति में शामिल हो जाता है। इस प्रकार गोबर और झुनिया का प्रेम-प्रसंग विवाह के बदल जाता है।

मातादीन और सिलिया का प्रेम-प्रसंग इससे अलग है। इस प्रेम-प्रसंग की परिणति विवाह में क्रांति और हृदय परिवर्तन के बाद होता है। मातादीन अपने यहाँ मजदूरी करने वाली चमारिन सिलिया के सौंदर्य पर आसक्त होता है फिर शादी का प्रलोभन देकर उसका यौन शोषण करता है। धीरे-धीरे इस बात की खबर पूरे गाँव में फैल जाती है। सिलिया मातादीन को अपना पति समझती है; पर वह एक मजदूरिन की ही भाँति उसके खलिहान में काम करती रहती है। इस तरह मातादीन और सिलिया के बीच प्रेम-प्रसंग की शुरुआत होता है। इस प्रेम-प्रसंग में प्रेमचंद युगीन सामंती संस्कृति की झलक मौजूद है। भिन्न-भिन्न तरह का प्रलोभन देकर उस काल में निम्न वर्ग के स्त्रियों का शारीरिक, मानसिक आदि का शोषण कोई बड़ी बात नहीं थी। प्रेमचंद लिखते है –“सिलिया का तन और मन दोनों लेकर भी बदले में कुछ न देना चाहता था। सिलिया अब उसकी (मातादीन) निगाह में केवल काम करने की मशीन थी, और कुछ नहीं। उसकी ममता को वह बड़े कौशल से नाचते रहता था।”[7]
सिलिया मन ही मन अपने आप को इस शोषण का शिकार नहीं मानती है। वह मातादीन का मजदूरिन होते हुए भी उसके संपत्ति पर अपना अधिकार समझती है। उसे अपने वास्तविक स्थति का पता तब लगता है जब वह अपनी उधार चुकाने हेतु मातादीन के खलिहान से सेर भर अनाज सहुआइन को देती है। प्रेमचंद लिखते है – “सिलिया ने अनाज ओसाते हुए आहत गर्व से पूछा – तुम्हारी चीज में मेरा कुछ अख्तियार नहीं है? मातादीन आँखें निकालकर बोला – नहीं, तुझे कोई अख्तियार नहीं है। काम करती है, खाती है। जो तू चाहे कि खा भी, लुटा भी, तो यह यहाँ न होगा। अगर तुझे यहाँ परता न पड़ता हो, कहीं और जाकर काम कर। मजूरों की कमी नहीं है। सेंत में नहीं लेते, खाना-कपड़ा देते हैं।[8] मातादीन के इस निष्ठुर व्यवहार के बाद भी सिलिया अपने आप को तन और मन दोनों से मातादीन को सौप दी थी। उसके जीवन में अब मातादीन के अतिरिक्त और किसी के लिए कोई स्थान रिक्त नहीं था। प्रेमचंद के शब्दों में – “वह ब्याहता न होकर भी संस्कार में और व्यवहार में और मनोभावना में ब्याहता थी, और अब मातादीन चाहे उसे मारे या काटे, उसे दूसरा आश्रय नहीं है, दूसरा अवलंब नहीं है।”[9]
मातादीन का सिलिया से इस तरह के व्यवहार के बाद क्रांति की झलक उपलब्ध होती है। सिलिया के पिता हरखू, उसकी माँ कलिया, उसके दोनों भाई तथा कई अन्य चमार मातादीन के इस व्यवहार से दुखी होकर ब्राह्मणों को चुनौती देते हैं। वे मातादीन के मुंह में हड्डी डालकर उसका धर्म भ्रष्ट कर देते हैं। वे सिलिया को अपने घर वापस ले जाना चाहते हैं, पर सिलिया नहीं जाती है। वह उलटे अपने बिरादरी के लोगों से कहती है – “मेरे पीछे पंडित को भी तुमने भिरस्ट कर दिया। उसका धरम लेकर तुम्हें क्या मिला? अब तो वह भी मुझे न पूछेगा। लेकिन पूछे न पूछे, रहूंगी तो उसी के साथ। वह मुझे चाहे भूखे रखे, चाहे मार डाले, पर उसका हाथ न छोड़ूंगी। उसकी साँसत कराके छोड़ दूँ? मर जाऊँगी पर हरजाई न बनूँगी। एक बार जिसने बाँह पकड़ ली, उसी की रहूंगी।”[10]
सिलिया अपनी इस दुर्दशा के बाद धनिया के यहाँ आश्रय पाती है। वह धनिया के घर के पिछवाड़े अपना एक फूस का झोपड़ा डालकर रहने लगती है। वह मजदूरी करके अपना भरन-पोषण करती है। इसी बीच वह माँ बनती है। मातादीन अपने बेटा को देखने धनिया के घर आया करता है; पर वह बिरादरी के डर से उसे दूर से ही देखता है। अचानक एक दिन रामू (सिलिया का बेटा) को ज्वर हो जाता है; और वह मर जाता है। मातादीन इस घटना से दुखी होकर मन ही मन अपने ब्राह्मणत्त्व का त्याग करता है; और रामू को अकेले नदी के किनारे तक उसके अंतिम संस्कार के लिए ले जाता है। तत्पश्चात वह सिलिया के संग अपना जीवन निर्वाह करने का फैसला लेता है। वह लोक-लाज को तजकर कहता है – “मैं ब्राह्मण नहीं चमार ही रहना चाहता हूँ। जो अपना धरम पाले, वही ब्राह्मण है, जो धरम से मुंह मोड़े, वही चमार है।”[11]
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद अपनी सर्वश्रेष्ठ उपन्यास गोदान में गोबर और झुनिया तथा मातादीन और सिलिया के माध्यम से दो अंतरजातीय प्रेम-विवाह को सफल दिखाया है। इस अंतरजातीय प्रेम-विवाह के पीछे प्रेमचंद की मनोवृत्ति मौजूद है। उनका कथन कि –‘प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप ले लेता है, तभी ब्याह है; उसके पहले ऐयाशी है’। इस कथानक में इन प्रेमियों का प्रेम-प्रसंग आत्मसमर्पण का रूप लेता है। अत: प्रेमचंद की दृष्टि में यह  अंतरजातीय प्रेम-विवाह है; ऐयाशी नहीं।
                           
संदर्भ

[1] गोदान, लेखक- प्रेमचंद, पृ० 40
[2] गोदान, लेखक- प्रेमचंद, पृ० 268
[3] गोदान, लेखक- प्रेमचंद, पृ० 41
[4] गोदान, लेखक – प्रेमचंद, पृ० – 127
[5] वही, पृ० – 43
[6] वही, पृ० – 43
[7] गोदान, लेखक-प्रेमचंद, पृ० – 212
[8] वही, पृ० – 213
[9] गोदान, लेखक - प्रेमचंद, पृ० – 213
[10] वही, पृ० – 217
[11] वही, पृ० – 297

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