कविता: आरक्षण

सुबोध कुमार शांडिल्य
आज क्षमता पर अक्षमता का
योग्यता पर अयोग्यता का
गुण पर जाति का
नीति पर अनीति का
वर्चस्व व विजय का नाम है आरक्षण।

दरअसल आरक्षण एक सामाजिक मुद्दा है
कमजोर को मजबूत बनाने का
भटके को राह दिखाने का
अशिक्षित को शिक्षित करने का
गरीबों को मुख्यधारा में लाने का।

आरक्षण को जाति से कोई दरकार नहीं
सामाजिक नफ़रत से कोई सरोकार नहीं
सामाजिक समस्या का यह एकमात्र समाधान नहीं
यह तो है सिर्फ रक्षित करने का उपाय
जो पिछड़ गया है मुख्यधारा से।

जातिगत आरक्षण स्वार्थ की तलवार है
जिसमें लगी नफ़रत की धार है
सामाजिक ताना-बाना तहस-नहस करने का
एक सुगम औजार है
शोला भड़काने का साजो-सामान है।

विकास के नाम पर राजनीति करना
जोखिम भरा काम है
आरक्षण के नाम पर राजनीति करना
मेवा-माखन- मलाई के समान है
इसीलिए तथाकथित आरक्षण का सम्मान है।

आरक्षण जाति के नाम पर
मुट्ठी भर लोगों का बन गया दास है

ऐसा इसीलिए कि अवसर कम
उसमें कुछ शेर और बाघ हैं
शेष शशक समान हैं।
आरक्षण के नाम पर
मोटा और मोटा हो रहा
जाति की आड़ में
जाति का शोषण कर
और मुस्टण्डा हो रहा।

जातिगत आरक्षण एक अंतहीन सिलसिला है
बिना पैमाना का यह तुला है
दिखता इसमें सदा अवसर खुला है
प्रगति-अगति का न कोई झमेला है
इसीलिए चाहिए जाति का सुखात्मक आवरण है।
आरक्षण में ऐसा क्यों नहीं हो सकता
शामिल हो गरीब का सब तबका
गरीबी से बढ़कर न है कोई व्यथा
एक मार्ग सुलभ है अर्थ का
इसी से होगा भला सबका।

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