आधुनिक हिंदी कविता में चित्रित भावबोध (एक इतिहास सम्मत अवलोकन)

रामधन मीणा

वरिष्ठ शोध अध्येताहिंदी विभागपोंडिचेरी (केंद्रीय) विश्वविद्यालयपुदुच्चेरीचल दूरभाष: 7598430736



प्लासी की निर्णायक विजय के बाद अंग्रेजो की रीति–नीति में बदलाव होना शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने भारत में रेल, भाप के जहाज और तार की आधुनिक संचार क्रांति की व्यवस्था का विस्तार करने की योजना बनाई। हिंदी नवजागरण काल भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम से ही शुरू होता है। इस स्वाधीनता संग्राम की पहली विशेषता यही है कि यह सारे देश की एकता को ध्यान में रखकर चलाया गया था। इस ग़दर की दूसरी विशेषता यह है कि “राज्यसत्ता की मूल समस्या सामंतो के हित में नहीं है, जनता के हित में हल की गई थी।”[1] इसी 1857 के ग़दर से हम आधुनिक हिंदी कविता का आग़ाज मान सकते है क्योंकि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अंग्रेजी राज की तारीफ़ करते हुए ग़दर के बारे में लिखा भी है कि :-
“कठिन सिपाही द्रोह अनल जा जल बल नासी।
जिन भय सिर न हिलाय सकत कहुँ भारतवासी।।”[2]

उन्नीसवी सदी में जब नवजागरण आंदोलन चल रहा था तब से ही आधुनिक आचार – विचार का विस्तार होने लगता है एवं इसी की प्रेरणा और प्रभाव से उत्तर भारत में खड़ी बोली हिंदी को आधुनिक गद्य – पद्य की भाषा में उकेरने की कोशिशें शुरू हो जाती है। खड़ी बोली हिंदी को आधुनिक भाषा का रूप देने का काम इस दौरान अंग्रेजो द्वारा स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी (उर्दू–हिंदी) के अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट की देखरेख में लल्लूलाल और सदल मिश्र ने किया। कुछ ऐसी ही कोशिशें कॉलेज के बाहर के लोगोंयथा सैयद इंशा अल्ला खां और कुछ ईसाई धर्म–प्रचारकों ने भी कीं। अंततः नतीजा यह हुआ कि दुविधा और संकोच से निकलकर इसमें (खड़ी–बोली में) कविता संभव करने का साहस भी आ गया, और इसमे सर्वप्रथम कविकर्म की शुरुआत करते हैं बाबू हरिश्चंद्र, “जिस धड़ाके के साथ गद्य के लिये खड़ी बोली ले लि गई उस धड़ाके के साथ न ली जा सकती।”[3]

इस तरह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में आधुनिक हिंदी कविता की शुरुआत हुई और बीसवीं सदी के आरंभ में हिंदी को काव्य भाषा के रूप में संस्कारित और परिमार्जित करने का दायित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन द्वारा अपने हाथ में लिया”अत: कुछ लोगों का यह कहना या समझना कि मुसलमानों के द्वारा ही खड़ी बोली अस्तित्व में आई और उसका मूल रूप उर्दू है जिससे आधुनिक हिंदी गद्य की भाषा अरबी फारसी शब्दों को निकाल कर गढ़ ली गईशुद्ध भ्रम या अज्ञान है।”[4] हाँ इससे पहले अपभ्रंश काव्यों में भी खड़ी बोली की परंपरा मिलती है :-
“ भला हुआ जु मारिया, बहिणि! म्हारा कंतु।
अड़बिहि पत्ती नइहि जलुतो बिन बूहा हत्थ।”[5]
इस प्रकार हम हिंदी कविता के आरम्भिक काल के दो चरणों को भारतेंदु युग और द्विवेदी युग कह सकते है। काव्य भाषा में सक्षम हो जाने के बाद आधुनिक हिंदी कविता में कई मोड़  व  पड़ाव देखने को मिलते है जैसे छायावादप्रगतिवादप्रयोगवाद और नई कविता तथा साठोत्तरी कविता आदि।

भारतेंदु युग :-
“भारतेंदुयुगीन कवियों का काव्यफलक अत्यंत विस्तृत है। उनकी रचना – प्रवृत्तियाँ एक और भक्तिकाल और रितिकाल से अनुबंद्ध  है तो दूसरी और समकालीन परिवेश के प्रति जागरूकता का भी उनमें अभाव नहीं हैं।”[6]  इस प्रकार हिंदी कविता के विकास के 1850 से 1900 ई. तक के प्रथम चरण को सामान्यत भारतेंदु युग कहा जाता है, और इस युग में हिंदी कविता में कई प्रकार की राष्ट्रियता से ओतप्रोत कविताएँ आने  का गुणगान होने लगा था। यथा
“भीतर – भीतर सब रस चुसेहँसि- हँसि के तन – मन – धन मूसै|
जाहिर बातन में अति तेजक्यों सखि सज्जन! नहिं अंगरेज।।”[7]
इस प्रकार यह देखा जाता है कि इस उथल पुथल से ही साहित्य में संक्रमण का दौर भी शुरू होता है क्योंकि काव्य की भाषा जो ब्रज थी एवं उसकी विषय वस्तुभाव-भंगिमा और शैली आदि सब में धीरे – धीरे नये इतिहास बोध और राजनीतिक चेतना के साथ – साथ खड़ी बोली अपनाई जाने लगती है। भारतेंदु के दौर की कवि सक्रियता मुख्यत: तीन प्रकार की थीसेवकसरदार और हनुमान। आगे हम बढ़ते है तो सायास ही अनुभव कर सकते है कि यह संक्रमण का दौर था एवं कवियों की विषयवस्तु में पर्याप्त वैविध्य था, कवि रूचि के पारंपरिक विषयों के साथ – साथ लोक प्रचलित अभिव्यक्तियों का प्रयोग भी करते थे जैसे होली, कजली तीज, बारहमासा, लावनी आदि का प्राद्रूभाव हो गया यहाँ हम प्रतापनारायण मिश्र की उक्त पंक्तियों  में इस भावबोध के रूप में देख सकते है :-
“यह जिय धरकत यह न होई कहु कोउ सुनि लेई।
कछू दोष दै मारहि अरु रोवन नहि देई।।”[8]
इस प्रकार की परिस्थितियाँ अंग्रेजी राज में नव जागरण के लिए उत्पन्न की गई थी। एक प्रकार से आधुनिक कविता अपने पैरो पर खड़ा होने का प्रयास करने लगती है तभी तो अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिओध द्विवेदी अपनी कविता में कहते है कि :-
                  “मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्रवाले।
                         जाके  आये न मधुवन से औ न भेजा संदेसा।
                         मैं रो-रो के प्रिय–विरह से बावली हो रही हूँ।
  जा के मेरी सब दुख–कथा श्याम को तू सुना दे।।”[9]
 द्विवेदी के प्रिय प्रवास जिसको कि हिंदी खड़ी बोली का प्रथम खण्ड काव्य कहा जाता है। जिसमें हिंदी कविता का प्रार्दुभाव बड़े आग़ाज के साथ होता है।
द्विवेदी युग :-
              बीसवी शताब्दी के आरम्भ में जब महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी के विकास और संस्कार – परिष्कार के काम की बागडोर संभाली तो हिंदी अपने पाँवो पर खड़ी हो चुकी थी। इस युग में हिंदी कविता का कवि कर्म खड़ी बोली हिंदी में शुरू हो गया था। फिर भी कवि समुदाय में इस कवि कर्म को लेकर दुविधा एवं संकोच था। 1903 में जब द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक बने तो उन्होंने हिंदी कविता को यथोचित स्थान दिया।  हिंदी का मानक रूप तय किया एवं कवियों को दकियानूसी छोड़कर नयी बात पकड़ने का परामर्श दिया।  साथ ही साथ उन्होंने कविता को केवल मनोरंजन ही नहीं अपितु उपदेशजनक बनाने की तरफ ध्यान आक़ृष्ट किया तभी तो कहा भी गया है कि :-
“केवल मनोरंजन न कवि का काम होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।”[10]
इसलिए  अब कविताये उपदेशात्मक होनी चाहिए क्योकि  यमुना किनारे के कौतुहल का वर्णन बहुत हो चुका था।  समाज और विमर्श के उस समय में समाज सुधार और राष्ट्रिय भावना का वर्चस्व था इसलिए द्विवेदी काल में यह सब उस समय के कवियों के मुख्य सरोकार और प्रेरणास्रोत बने तभी दलित समाज के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति विद्रोह हरिओध की इन पंक्तियों में देख सकते है :-
“आप आँखे खोलकर के देखिए,
आज जितनी जातियां है सिर – धरी।
पेट में उनके पड़ीं दिखलायेंगी,
जातियां कितनी सिसकती या मरी।।“[11]
देखा जाता है की इस युग का मूल्यांकन करते हुए लिखा भी गया है कि “समग्रत द्विवेदी युगीन काव्य सांस्कृतिक पुनरुत्थानउदार राष्ट्रीयताजागरण – सुधार एवं उच्चादर्शों का काव्य है।”[12]इस प्रकार यह कहा जा सकता है की द्विवेदी काल हिंदी कविता के आधुनिक भावबोध की दृष्टि से समृद्धि की ओर था |
छायावाद :-
          मुकुटधर पाण्डेय अपने ‘छायावाद क्या है’ आलेख में  छायावाद को परिभाषित करते हुए लिखते है कि “ ‘छायावाद’ एक ऐसी मायामय सूक्ष्म वस्तु है कि शब्दों द्वारा उसका ठीक वर्णन करना असम्भव है। उसका एक मोटा लक्षण यह है कि उसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहता है। कहीं – कहीं  तो इन दोनों का परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता। लिखा कुछ और ही गया हैपर मतलब उसका कुछ और ही निकलता है। किन्तु पाठक इस शब्द अर्थ के विरोध को देख अलंकार – शास्त्र के रूपक अथवा व्यंग्य का विभ्रम न होने दे।”[13] इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके शिष्य कवियों के प्रयत्नों का सुफल यह हुआ कि खड़ी बोली में कविता संभव करने का सामर्थ्य आ गया। अब यह भावों के विस्तार और बारीकियों को व्यक्त कर सकती थी। इसलिए हिंदी कविता का महत्वपूर्ण दौर को हम छायावाद कह सकते है। धीरे-धीरे जब छायावाद की मायामय वस्तु वाली संज्ञा प्रचलन में आयी तो विद्वानों ने इसे अलग – अलग तरह से व्याख्यायित किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे बंगाल के ब्रह्म–समाजियों के छायापदों और टैगोर की रहस्यानुभूतियों का एक प्रकार से नवरूपांतरण मानते हुए अन्योक्ति परक शब्द–प्रयोग का प्रश्रय देने वाली काव्य शैली घोषित कर दिया। इस युग में राष्ट्रीय – सांस्कृतिक कविता का विकास हुआ। तभी तो माखनलाल चतुर्वेदी अपनी अनुभूति प्रकट करते हुए कहते है कि :-
“क्या देख न सकती जंजीरों का गहना।
हथ कड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश राज्य का गहना।
कोल्हू का चर्रक चूं? जीवन की तान।
मिट्टी पर लिखे अंगुलियों ने क्या गान?
हूँ मोट खीचता लगा पेट पर जुआ।
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कुआ।।”[14]
छायावाद की व्यापक संज्ञा के अंतर्गत होने के बावजूद छायावादी कवियों की भावभूमि और सरोकार बहुत अलग–अलग थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने शुरुआत तो श्रृंगार और प्रकृति से किया लेकिन आगे चलकर आत्मसंघर्ष उनकी कविता में खासकर उनकी प्रंबंध रचनाओं में सर्वोपरि रहा। छायावादी कवियों की रचनाएँ गीतों के रूप में ही अधिक होती है। जयशंकर प्रसाद की कविता में पुनरुत्थान की चेतना सर्वाधिक मुखर है यथा :-
“शशि–मुख पर घूँघट डाले,
अंचल में दीप छिपाये।
जीवन की गोधूली में,
कौतूहल- से तुम आये।।”[15]

यहाँ पर उन्होंने अपनी संस्कृति को अन्य संस्कृतियों के घात–प्रतिघात के बीच को पुन:आविष्कृत करने की कोशिश की है। तभी तो वे आगे फिर कहते है कि
“वह रूप  रूप ही केवल
                      या रहा ह्रदय भी उसमें,
जड़ता की सब माया थी,
                                  चैतन्य  समझ कर मुझमें।
विकसित सरसिज वन-वैभव
                     मधु–उषा के अंचल में,
                                   उपहास करावे अपना
                      जो हँसी देख ले पल में।।”[16]
इस तरह जयशंकर प्रसाद की आँसू तक पहुँचते–पहुँचते कविता का भावबोध बहुत कुछ सीधे–सीधे बया होने लगता है। इसी कड़ी में हम सुमित्रानंदन पन्त को लेते हुए कह सकते है की वो अपने असाधारण प्रकृति प्रेमचित्रण और शिल्प कोशल के कारण विख्यात हुए। यथा :-
“शून्य जीवन के अकेले पृष्ठ पर,
विरह, अहह कराहते इस शब्द को।
किस कुलिश की तीक्ष्ण चुभती नोक से,
निठुर विधि ने अश्रुओं से लिखा है।”[17]
हाँ आगे चलकर ये वर्गभावना से प्रेरित हुए और अंतिम समय में अरविंद दर्शन से प्रभावित होकर नव अध्यात्म की और मुड़ गए। इस प्रकार छायावाद एक व्यापक संज्ञा और परिधि  वाला आन्दोलन था लेकिन इसके भीतर और  इसके तत्काल बाद कुछ अलग पहचान रखने वाली काव्य प्रवृत्तियाँ भी विद्यमान थी। छायावादी कविता में प्रेम का जो अलौकिक और वायु समान रूप था उसमें लौकिक प्रेम  के लिए जगह नहीं के बराबर थी।
प्रगतिवादी कविता :-
              छायावादी काव्य आन्दोलन अपनी  अपूर्व सौंदर्य चेतनासूक्ष्म प्रकृति – पर्यवेक्षण और अभिनव अभिव्यक्ति – ऐश्वर्य के लिए विख्यात हुआ। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिंदी कविता फिर सक्रिय हुई। इस नयी सक्रियता को ही हम प्रगतिवाद कह सकते है। इसे छायावाद की प्रतिक्रिया न मानकर उसके आर्विभाव में बदली हुई वैश्विक भारतीय परिस्थितियों की भूमिका के रूप में देखना चाहिए। वामपंथी विचार रखने वाले लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की जिसका पहला अधिवेशन 1936 ई. में प्रेमचंद की अध्यक्षता में हुआ। इसलिए हम देखते है कि केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन की कविता प्रगतिवाद के कायाकल्प की वाहक बनती है।  इस युग के कवियों ने छायावाद की संकीर्ण व्यक्तिचेतना प्रधान कविताओं की जगह सामाजिक जीवन की कविताएँ लिखीं। इन्होंने अपने समय के विवेक और यथार्थ को खास महत्व दिया। एक देहाती मास्टर दुखरन, और  उसके  शिष्यों  व  मदरसे की तस्वीर नागार्जुन इस प्रकार खीचें हैं एक बानगी देखिये
“घुन खाए शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बाँचे,
फटी भीत हैछत है चूती, आले पर बिस्तुइया नाचे,
लगा – लगा बेबस बच्चों पर मिनट – मिनट में पांच तमाचे,
इसी तरह से दुखरन मास्टर गड़ता है आदम से साँचे।”[18]
इस प्रकार यह जोर देकर कह सकते है कि इस युग के कवियों के पास अपने यथार्थ को समझने की स्पष्ट वर्गसचेतन जीवन दृष्टि थी। इन कवियों को अपने परिवेशलोक, प्रकृति और लोक जीवन से गहरा लगाव था। इस युग के कवियों को आशावादी कवि कहा जाना चाहिए क्योंकि इनका जीवन और भविष्य में विश्वास था। इनकी भाषा जीवन की हलचल से लि गई और वह उससे ही बनी थी। इस युग के कवियों में वास्तव में जीवन का ताप और गंध रची बसी हुई थी।

प्रयोगवाद और नई कविता
                        प्रगतिवादी काव्य आंदोलन के विकास के मंद पड़कर अन्तर्वती हो जाने के बाद प्रयोगवाद और नई कविता का आविर्भाव हुआ। नयी कविता को प्रयोगवाद का ही एक विकसित रूप माना जाना चाहिए लेकिन परिस्थितियाँ ही कुछ इस प्रकार की बनी कि दोनों को अलग – अलग नाम से जाना जाने लगा। इसलिए नई कविता या प्रयोगवाद की वास्तविक शुरुआत हम अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ (1943 ई .)से मान सकते  है।  इस सप्तक में अज्ञेय सहित मुक्तिबोधगिरिजाकुमार माथुरभारतभूषण अग्रवाल, नेमीचंद जैन, रामबिलास शर्मा और प्रभाकर माचवे की कविताएं शामिल थी। इस युग के कवियों ने विषयवस्तु की अपेक्षा शिल्प को ज्यादा महत्त्व दिया। नयी कविता एक प्रकार से प्रयोगवाद का विकसित रूप थी। अज्ञेय कहते है कि  “हम प्रयोगशील प्रगतिशील आदि नहीं कहना चाहतेइसी से कहते है नयी कविता क्योंकि प्रगतिवाद राजनीतिक बिल्ला है और प्रयोगवाद आक्षेप ज्ञेय। नयी कविता नयी मनःस्थिति का प्रतिबिंब हैएक नये मूड का एक नये रागात्मक संबंध का। नयी कविता की मूल विशेषता है मानव और मानव जाति का नया संबंध यह मानव – जाति और सृष्टि के संबंध के परिपार्श्व में।”[19] दरअसल यह शीतयुद्धयुगीन पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव और प्रेरणा से उत्पन्न आन्दोलन था। तभी तो अज्ञेय का यह कथन स्पष्ट बयान कर रहा उस समय की स्थिति को कि “अपने अन्वेषणचिंतनमननअध्ययन और अनवरत नये प्रयोगों के द्वारा कविता को अंतर्वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर समृद्ध करके उसे मनुष्य की सहज वृत्तियो से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया। स्वतन्त्रचेता और सतत जागरुक कवि अज्ञेय ने पश्चिमी विचारधाराओ और आंदोलनों को यथेष्ट समर्थन देते हुए उनका अंध समर्थन नहीं किया।”[20]  

साठोत्तरी कविता :-
                     नयी कविता के विकास के साथ–साथ कुछ ऐसी भाषा रूपी शिल्प–रूढ़ियों का प्रचलन हुआ जो नई कविता के इस बने बनाये प्रारूप के लिए तो ठीक था लेकिन उसका स्वरूप बदले बिना वस्तुस्थितिक द्वंद्व को व्यक्त करना असम्भव प्रतीत होने लगा था। एक प्रकार से हम कह सकते है कि प्रयोगवाद और नई कविता सातवें दशक तक तो अपनी व्यक्तिवादिता और जड़ीभूत सौंदर्य की अभिरुचि की चरम पर थी लेकिन कुछ कवि प्रतिमाएँ इसे व्यर्थ एवं अप्रासंगिक बताते हुए कविता को सीधे अपने समय विशेष की अराजक और विक्षिप्त मनोदशा पर एकाग्र करती हुई प्रतीत हो रही थीं और यही से साठोत्तरी हिंदी कविता का उभार तत्कालीन विषम भारतीय परिदृश्य के नये उभार रूप में देखने को मिलता है। स्वतंत्रता के कुछ समय बाद ही हम देखते है कि सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भयावह विषमताएँ दृष्टिगत होने लगीजिनके बीज हमारे स्वाधीनता आंदोलन में पहले से ही मौजूद थे। स्वतंत्रता के बाद सदियों पुराने जर्जर और निष्प्राण सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन अपेक्षित था क्योंकि मूल्यहीन शिक्षा एवं जातिप्रथा, सांप्रदायिकता, छुआछूत और दहेज जैसी कुप्रथाओ ने दलगत और मूल्यहीन राजनीति को पुनर्जीवन दे दिया, सितम्बर 1914 में सरस्वती में पटना के हीरा डोम की कविता ‘अछूत की शिकायत’ जो कि मूलतः भोजपुरी में है प्रकाश में आती है यथा –
“हमनी के राती दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के सहेबे से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुःख भगवनओ न देखताजे,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजा,
बेधरम होके रंगरेज बनि जाइबि।
हाय राम! धरम न छोड़त बनत बाजे,
बेधरम होके कैसे मुहवा देखाइबि।।”[21]
इस प्रकार कहा जा सकता है कि आधुनिक कविता में हम जब समकालीन कविता की और देखे तो हमें यह सायास ही आभास होता है कि साठोत्तरी कविता का उभार कुछ और पार्थक्य के साथ भाव देता है व आगे बढ़ने पर सातवे दशक में कुछ और कविता का विच्छेद तीव्र चेतना के साथ होते हुए अल्पजीवी कुकुरमुत्ता काव्य प्रवृत्तियों के आंदोलन को लेकर सामने आता है।

दलित एवं आदिवासी कविता
                           जब हम आधुनिक पर बात करते है तो दलित कविता का आग़ाज वैसे तो 1914 में हीरा डोम की इस अछूत से ही माना जाता है जिसमें उनका प्रतिरोध मुख्यधारा के समाज द्वारा जो सामजिक वितृष्णा उनके साथ बरतता है उसके प्रति है लेकिन आदिवासी कविता अपना कुछ अलग ही रुख लेकर अपना पक्ष रखती है अर्थात आदिवासी कविता में अपने विषय के साथ स्वाभाविक प्रतिक्रियां की संभावना रहती है। आदिवासी प्रकृति के सान्निध्य में बेहद खुश रहते है। प्रकृति के सान्निध्य में ही उसे अकृत्रिम स्वतंत्रता का अनुभव होता है अतः उनका नजरिया भी अप्रतिम होता है जैसे
“बामणों में पैदा होगे,
लिख–लिख मरोगे।
मारवाड़ी  होगे,
तोल–तोल मरोगे।
चमार होगे,
जूता घिस–घिस मरोगे।
पर होगे वारली,
तो जंगल के राजा बनोगे।”[22]

इस प्रकार हम देखते है कि आदिवासी प्रकृति की गोद में नाचता रहता है तो उसकी कविता भी ऐसी ही होगी और आचार्य शुक्ल ने तो कहा भी है कि ‘साहित्य युग एवं प्रवृत्तियों के अनुसार बदलता रहता है’। उसी प्रकार यहाँ आधुनिक कविता में भावबोध समकालीन कविता में एक तरह से कविता और वस्तु जगत के संबंधो में असाधारण घनिष्ठता को दर्शाता है कवि वस्तु जगत पर पहले की तरह टिप्पणी ही नहीं करता है वरन वह (कवि) उसका हिस्सा होकर उसकी अंतःप्रक्रिया के बीच अपनी स्थिति और सक्रियता को भी पहचानता है। इस प्रकार से हम कह सकते है कि सदियों से आततायी और अन्यायी शक्तियों द्वारा शोषित उत्पीड़ित और आधारभूत सुविधाओं से वंचित आम आदमी इस समकालीन कविता का केंद्रीय सरोकार है क्योंकि एक तरफ हीरा डोम अपनी शिकायत  ‘अछूत की शिकायत’ कविता के माध्यम से दर्ज कराते है वहीं आदिवासी भी अपना विरोध अपनी मौखिक अभिव्यक्ति से दर्ज करवा रहे है:-
“ये वो लोग है जो हमारे बिस्तर पर करते हैं
हमारी बस्ती का बलात्कार,
और हमारी ही जमीन पर खड़ा हो पूछते हैं
हमसे हमारी औकात!”[23]

 इसलिए आदिवासियों ने तो सपने में भी नहीं सोचा था की उनके साथ ऐसा होगा  वे तो उन्मुक्त प्रकृति की गोद में रह रहें एक प्रकार से प्रकृति की भाव–भंगिमाओ के साथ नाचने गाने वाले प्रकृति पालक है  सारांशत यह कहा जा सकता है कि आधुनिक हिंदी कविता का भावबोध भी उसी प्रकार बदल जाता है। जिस प्रकार आचार्य शुक्ल बताते है कि जहाँ का जैसा समाज होगा वैसा ही वहा का साहित्य होगा उसी तर्ज पर यहाँ यह कहा जा सकता है कि जैसे–जैसे समय की माँग होगी हिंदी कविता का भावबोध भी उसी प्रकार परिवर्तित हो जायेगा क्योंकि जिस कविता का जो इतिहास हम देखते है कि प्लासी के युद्ध के पश्चात लोगो का बर्ताव अपने साथ देखा उसी युग एवं परिवेश के अनुसार कविता का भावबोध परिवर्तित होता रहा। इसलिए यह एक तरह से सार्वभौमिक सत्य है कि समय की माँग आपको उस युग और प्रवृत्तियों की और मुड़ने को प्रेरित करती है और यह एक प्रकार से सामजिक मनोवृतियों के भावबोध के लिए भी उपयुक्त ही सिद्ध हो सकता है।
  
संदर्भ


[1] रामबिलास शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, राजकमल प्रकाशन, 1977, पृष्ठ संख्या 6
[2] रामबिलास शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, राजकमल प्रकाशन, 1977, पृष्ठ संख्या 12
[3] आचार्य शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, 2014, पृष्ठ संख्या 280
[4] आचार्य शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, 2014, पृष्ठ संख्या 281
[5] आचार्य शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, 2014, पृष्ठ संख्या 282  
[6] डॉ नगेंद्र डॉ हरदयाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स बयालीसवा संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 439-440  
[7] डॉ नगेंद्र डॉ हरदयाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स बयालीसवा संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 440
[8] रामबिलास शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, राजकमल प्रकाशन, 1977, पृष्ठ संख्या 202
[9] अयोध्यासिंह उपाध्याय, उन्मेष, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राज.की कक्षा 12वी, वैकल्पिक पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ संख्या 19
[10] उमेश शात्री, हजारी लाल शर्मा, हिंदी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास, महेश बुक डिपो जयपुर, पृष्ठ संख्या 19
[11] उमेश शात्री, हजारी लाल शर्मा, हिंदी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास, महेश बुक डिपो जयपुर, पृष्ठ संख्या 62
[12] उमेश शात्री, हजारी लाल शर्मा, हिंदी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास, महेश बुक डिपो जयपुर, पृष्ठ संख्या 63
[13] मुकुटधर पाण्डेय, वर्तमान साहित्य, अगस्त-सितम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 65
[14] उमेश शात्री, हजारी लाल शर्मा, हिंदी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास, महेश बुक डिपो जयपुर, पृष्ठ संख्या 64
[15] जयशंकर प्रसाद, आँसू, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी,2009, पृष्ठ संख्या 15
[16] जयशंकर प्रसाद, आँसू, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी,2009, पृष्ठ संख्या 18
[17] उमेश शात्री, हजारी लाल शर्मा, हिंदी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास, महेश बुक डिपो जयपुर, पृष्ठ संख्या 73
[18] विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, ओरियंट ब्लैकस्वाँन, पृष्ठ संख्या 137  
[19] अयोध्यासिंह उपाध्याय, उन्मेष भूमिका, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राज.की कक्षा12वी, वैकल्पिक पाठ्यपुस्तक,पृष्ठ संख्या 12
[20] प्रो.वशिष्ट अनूप, असाध्य वीणा की साधना (मूल्याकन और पाठ), विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पृष्ठ संख्या सम्पादकीय
[21] रामबिलास शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, राजकमल प्रकाशन, 1977, पृष्ठ संख्या 357
[22] रमणिका गुप्ता, आदिवासी साहित्य यात्रा, रमणिका फाउंडेशन,2008, पृष्ठ संख्या 26 
[23] निर्मला पुतुल, समकालीन आदिवासी कविता, स.हरिराम मीणा, भूमिका, अलख प्रकाशन 2013, पृष्ठ संख्या 11 

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