गणगौर पर्व - मालवा-निमाड़ की शान

सरस्वती माथुर

- सरस्वती माथुर


भारतीय संस्कृति के अनेक रूप हैं। हमारे त्यौहार, रंगारंग, आनंद, उमंग, उत्साह, और प्रेरणा से तो परिपूर्ण हैं ही पर एक बड़ी विशेषता है उनकी सामूहिक भावना। यहॉं परंपराए आज भी सांस लेती है। जिसका जीवंत उदाहरण हमारे सामने गणगौर पर्व का है। जो निमाड़, मालवा हरियाणा एवं राजस्थान के साथ अन्य कई प्रदेशों में मनाया जाता है। गणगौर हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। आम पर बौर आ गये है खेतो में गेहूँ  की फसल कटकर घर आँगन में आ गई है और हमारी गणगौर माता भी इसी समय आती है जिसके साथ गण और गौर होती है 'गण 'यानि शिव 'गौर 'यानि पार्वती इससी मिलकर बना है यह पर्व !गणगौर मालवा और निमाड़ का गौरवमय पर्व है। चैत्र माह की तीज को मनाया जाने वाला यह महापर्व एक महोत्सव रूप में संपूर्ण मध्यप्रदेश निमाड़-मालवांचल में अपनी अनूठी छटा बिखेरता है। इसके साथ ही चैत्र माह में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में महाकाली, महागौरी एवं महासरस्वती अलग-अलग रूपों में नवरात्रि में पूजी जाती हैं। यहाँ यह केवल नौ दिन मनाया जाता है।

पारिवारिक व सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है गणगौर का त्योहार। चैत्र गणगौर पर्व गणगौर दशमी से अथवा एकादशी से प्रारंभ होता है, जहाँ माता की बाड़ी यानी जवारे बोए जाने वाला स्थान पर नित्य आठ दिनों तक गीत गाए जाते हैं। यह गीत कन्याओं, महिलाओं, पुरुषों, बालकों के लिए शिक्षाप्रद होते हैं। अन्य प्रदेशों में युवतियाँ 16 दिनों तक सुबह जल्दी उठकर बगीचे में पहुँच जाती हैं और दूबा, फूल लाती हैं। उस दूबा से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता पर चढ़ाती हैं। थाल में पानी, दही, सुपारी और चांदी का छल्ला अर्पित किया जाता है। जबकि मालवा व निमाजी में नौ दिन तक ही पर्व को मनाने की परंपरा है। प्राचीनकाल में पार्वती ने शिवजी को पति रूप में पाने के लिए तपस्या, व्रत आदि किया था। पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हो गए थे और वरदान मागने के लिए कहा था। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की इच्छा बताई। माँ पार्वती की यह मनोकामना पूरी हो गई थी। उसी समय से कुँवारी लड़कियाँ भी इच्छित वर पाने के लिए ईश्वरजी और माँ पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। सुहागिन महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु के लिए यह पूजा धूम-धाम से करती हैं। यह काफी बड़ा त्योहार है। व्रत करने वाली महिलाएँ 16 सुहागन स्त्रियों को 16 शृंगार की वस्तुएँ भेंट करके भोजन करवाती हैं।

मालवा व निमाड़ी में व्रत करने से पहले रेणुका गौरी की स्थापना की जाती है। घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर 24 उंगल चौड़ी और 24 उंगल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाई जाती है और हल्दी, चंदन, कपूर, केसर आदि से चौक बनाया जाता है। फिर बालू से गौरी (पार्वती) बनाकर स्थापित किया जाता है।

शक्ति स्वरुपा माँ जगदम्बा साक्षात गणगौर के रुप में घर-घर विराजमान होती है। जहाँ ज्वारों की पूजा अर्चना की जाती है उसे 'बाड़ी 'भी कहाँ जाता है। इन आठो दिन बाड़ी के पास महिलाओं द्वारा रात्रि में गणगौर गीत गाये जाते हैं। गीतों में गणगौर माता के गीतों का उच्चारण होता है। वही प्रतिदिन गीतो के समापन पश्चात बाड़ी माता को प्रसाद (जो घर-घर से लाया जाता है) चढ़ाया जाता है इसे 'तम्बोल 'कहा जाता है। चेत्र शुक्ल तीज के रोज सिर्वी समाज द्वारा गणगौर रथो को सिंजारा जाता है व गणगौर माता को ज्वारे रख कर पूरे उत्साह के साथ घर लाया जाता है जिसमें माँ का स्वरूप देखा जाता है। अनेक गणगौरो के साथ ईसर राजा भी होते है ये शिवजी के रूप माने जाते है व गणगौर (रणूबाई) को माँ पार्वती के रूप माना जाता है। रणूबाई अपने मायके आती है और उनके साथ ईसर राजा भी आते है और घर-घर गणगौर गीतो के उच्चारण के साथ जल भोजन फल-फूल से इ्न्हे जिमाया जाता है व पूजा अर्चना की जाती है।

'अना बना को चम्पा मवरोय, मवरोय से फुलवारी' गीत के साथ ज्वारे की बाड़ी में मंगल गीत गाये जाते है, कहने का अर्थ ये है कि हमने अनेक बाग बगीचों से अनके प्रकार फूल -फुलवास जिसमें चम्पा, चमेली, गुलाब, आदि आदि फूल लाये हैं और माता की बाडी को सुसज्जित किया है। 'धोडा बठी न धणीयर जी आया, कालो धोडे लाया' गीत के साथ रणुबाई को बताया जाता है कि तुम्हारे गण धणीयर जी परदेश से तुम्हें लेने आये है और तुम्हे ससुराल जाना है। मान्यता है कि रणुबाई का मायका मालवा और ससुराल राजस्थान में था। उनका मन मालवा में इतना रमता कि ससुराल रास नहीं आता था, पर विवाह के बाद उन्हें ससुराल जाना पड़ा। जब-जब भी वे मायके मालवा में आती थीं, मालवा की महिलाओं के लिए वे दिन एक उत्सव का माहौल रच देते थे। तभी से यह पर्व मनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल विदा किया जाता है, यानि कि विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का स्थान गाँव का कुँआ या तालाब होता है। कुछ स्त्रियाँ जो विवाहित होती हैं वो यदि इस व्रत की पालना करने से निवृति चाहती हैं वो इसका अजूणा (उद्यापन )करती हैं! जिसमें सोलह सुहागन स्त्रियों को समस्त सोलह शृंगार की वस्तुएँ देकर भोजन करवाती हैं | गणगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए वर्जित है। गौरी पूजन का यह त्योहार भारत के सभी प्रांतों में थोड़े-बहुत नाम भेद से पूर्ण, धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं। इस दिन स्त्रियाँ सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण करती हैं।

देवी को अर्पित करने के लिए कांच की चूड़ियाँ, महावर, सिन्दूर,  रोली, मेहंदी, टीका, बिन्दी, कंघा, शीशा, काजल आदि चढ़ाया जाता है। चैत्र नवरात्री माँ दुर्गा की उपासना से सजे चैत्र नवरात्रि के इस महा अवसर पर म.प्र. के निमाड़ मालवाचंल में उत्साह उमंग व हर्षोउल्लास के साथ गणगौर पर्व मनाया गया। निमाड़ मालवा अंचल के धार झाबुआ, उज्जैन, खरगोन, रतलाम, इन्दौर जिले के सीरवी ग्रामो में सीरवी समाज द्वारा यह पर्व उत्साह - उमंग व अपार श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। घर-घर माताजी के ज्वारों की पूजा अर्चना व उपासना कर गणगौर रथों को नये-नये परिधानों से श्रंृगारित कर नाच-गाने के साथ सामाजिक स्तर पर मनाने की परंपरा है। रथों को सिर पर धर कर रखने से माता का आशीर्वाद मिलता है। इन रथों को देख कर मन प्रसन्न हो उठता है। बड़ा उल्लसित करने वाला नज़ारा नज़र आता है! गणगौर पर्व निमाड़ मालवाचंल के सिर्वी समाज के सबसे बड़े पर्व के रुप में मनाया जाता है। इस पर्व के पूर्व समाज के आम जन  अपने घर-मकानों की लीपाई पुताई रंगाई करते है, और सअपने परिजनों के नये पोशाक की खरीदी भी,  इस अवसर पर करते है, व माँ की उपासना आस्था, श्रद्धा से सजे इस पर्व को उत्साह -उमंग व हर्षोउल्लास के साथ मनाते है। तीन से चार दिवसीय इस पर्व पर सामाजिक गोठ की जाती है, व ताली नृत्य, गरबा नृत्य व एकल नृत्य कर प्रकृति  के इस अनूठे त्यौहार का लुफ्त उठाते है। निमाड़ का गणगौर नृत्य मूलत: राजस्थान की लोक परम्परा से है जो निमाड़ और मालवा अंचल में भी परंपरागत रूप में किया जाता है। यह महिलाओं द्वारा गणगौर पर्व पर ही आयोजित होता है, जिसमें रनुबाई और घनियर देव के रथ सजाकर, सिर पर रख स्त्रियाँ नृत्य करती है, यह आनुष्ठानिक है।

यह लोक पर्व यथार्थ में महालोक पर्व ही है। जिसमें मध्यप्रदेश के निमाड़ के लोग नौ दिनों तक जात-पात, ऊंच-नीच, गरीबी-अमीरी का भेद भूलकर, हर्षोल्लास, आपसी सदभाव और सौहार्द्र के साथ इस पवित्र पर्व को मनाते हैं।

करीब दो दशक पहले सादगी के रूप में मनाए जाने वाले गणगौर उत्सव का स्वरूप हाईटेक होते ही जमाने के साथ बदल गया है,  शोर-शराबा व दिखावा बढ़ गया है। हालाकि इस पर्व को मनाने में लोगों की आस्था और विश्वास तो वही है लेकिन व्यवस्था और रंगीन चमक दमक पर अब लाखों रुपये खर्च किये जा रहे हैं।

मध्यप्रदेश में विशेषकर मालवा, निमाड़ और भुआंणा अंचल में ही नहीं इस पर्व की  आजकल भोपाल से लेकर इन्दौर जैसे बड़े महानगरो में भी धूम रहती है। इस आयोजन में धनियर राजा और रनुबाई के सुन्दर भजनो, मधुर गीतो की धुन पर महिलाओं व पुरुषों का आकर्षक नृत्य व छालरा देखते ही बनता है जिससे ग्रामीण अंचल का वातावरण अलग ही निर्मित हो जाता है। मनोकामनाएँ पूरी होने पर लोग रनुबाई को पावनी बुलाते हैं।

गणगौर महाउत्सव के दौरान आठवें दिन धनियर राजा के रथो को विशेष तरीके से सजाकर विधि विधान के साथ कुँए पर जाकर लग्न लगाई जाती है। नौवे दिन प्रसाद और भंडारे का आयोजन कर चल समारोह निकाल कर धनियर राजा और रनुबाई के रथ व ज्वारो की गाँवों में घर-घर पूजा की जाती है इसके बाद नदी पर जाकर विसर्जन किया जाता है विदाई के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा परंपराएँ वैसे ही निभाई जाती है मानो अपनी बेटी की विदाई की जा रही हो। सभी की आँखो से बरबस ही आँसू झलक पड़ते है। इस पर्व में पर्यटन विभाग की भागीदारी भी रहती है! ऐसा माना जाता है कि सावन की तीज से शुरू हुए त्योहारों का सिलसिला गणगौर तीज पर जाकर खत्म होता है...। राजस्थानी में तो एक कहावत भी है कि 'तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर' अर्थ है कि सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है।

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