विषय-क्षेत्र के आधार पर तुलसी साहिब के साहित्य में निहित आगत शब्द

तुलसी साहिब 'हाथरसवाले' जो साहिब या साहेबजी के नाम से भी भक्तों के बीच प्रसिद्ध हुए, इनका समाधि-स्थल हाथरस में है। जोगियाग्राम में प्रतीक रूप में है। तुलसी साहिब कबीर पंथ के संत हुए जो महर्षि मेहींदास के गुरु शृंखला में ,उनसे दो-तीन गुरु के पूर्व हैं। पूरी तालिका भागलपुर, बिहार में महर्षि मेहीं आश्रम में दीवार पर अंकित है। अठारहवीं सदी में जब साहित्य में रीतिकालीन शृंगारिक काव्यों की प्रधानता थी, कहीं एक कोने में समाज की कुरीतियों से लेकर ईश्वर के अद्वैत ज्ञान को कबीर की ही तरह तुलसी साहिब विस्तार दे रहे थे।



आरती स्मित
       तुलसी साहिब (हाथरसवाले) कबीर की परंपरा के बहुत ही विद्वान संत कवि हुए, जो हिंदी साहित्य के वर्गीकरण के अनुसार रीतिकाल  (अठारहवीं सदी के उस संक्रांत युग) में अवतरित हुए, जब हमारा देश एक ओर मुग़लों के शासन के पतन, हिंदू राजाओं में से कुछ को छोड़कर अन्य की विलासिता, सामंतों के व्याभिचार, जनसमूह पर अत्याचार, अंग्रेज़ी शासन के प्रभुत्व को एक साथ झेल रहा था, जब हमारा समाज तमाम कुरीतियों और कुंठाओं को प्रश्रय देता हुआ स्त्रियों पर वर्जनाएँ बढ़ाने और आम जन को शिक्षा से विमुख रखने में व्यस्त था, उस काल में तुलसी साहिब का निर्गुण संत कवि के रूप में मूक अवतरण निश्चय ही शोध का विषय होना चाहिए किंतु अफ़सोस, आज, जबकि उनके अनुयायी पूरे देश में फैले हैं, उनका साहित्य अब भी उपेक्षित है। बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद  ने उनके साहित्य को प्रकाशित करने का सुकार्य अवश्य किया, किंतु प्रेस बंद हो जाने के कारण उनकी कृतियों की अनुपलब्धता बनी हुई है।
       तुलसी साहिब  के साहित्य --' घटरामायण', 'रत्नसागर', 'शब्दावली' एवं अपूर्ण कृति 'पद्मसागर' में  में अध्यात्म का मूल स्वर तो है ही, साथ ही सामाजिक दुरावस्थाओं, कुरीतियों और स्त्रियों की शोचनीय दशा का भी मर्मस्पशी वर्णन है जो इस संत कवि की समाज के प्रति जागरूक मानसिकता को दर्शाती है। साथ ही साथ इनकी कृतियों प्रयुक्त आगत शब्दों की बहुलता विस्मित करती है और निश्चय ही शोध का विषय है। तुलसी साहिब के जीवन पर  में डॉ. हरस्वरूप माथुर ने गहन शोध  किया। अपने शोध प्रबंध में उन्होंने संत तुलसी साहिब के जीवन से संबद्ध समस्त पक्षों का स्पर्श करते हुए उनके कृतित्व की भी सुंदर विवेचना प्रस्तुत की है, साथ ही साथ तुलसी साहिब की स्वीकृत समस्त रचनाओं की रचना- भाषा एवं काव्य कला का रोचक निरूपण किया है और  उनके शोधकार्य के लंबे अंतराल के बाद मैंने पाया कि उनकी रचनाओं पर भाषाशास्त्रीय अध्ययन का क्षेत्र पूरी तरह रिक्त है, विशेषकर आगत शब्दावली का क्षेत्र। 1999 से इस कार्य में संलग्न होने पर मैंने जो पाया, उसका एक अंश आपसे साझा कर रही हूँ, किंतु आगत शब्द  के विविध रूपों की चर्चा करने से पूर्व यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि क्षमाशील, विनम्र किंतु अनाचारों के प्रति अक्खड़ स्वभाव के इस संत कवि का ध्येय यद्यपि अन्य संतों की भाँति ही आत्मा से परमात्मा का मिलन ही था और अपनी कृतियों में उन्होंने इसका बहुत ही मर्मस्पर्शी वर्णन भी किया है। इसके साथ ही निकटस्थ गाँवों से लेकर दूर-दराज के प्रदेशों में भ्रमण करना और जनसमुदाय को सत्संग द्वारा सन्मार्ग दिखाना इनके कार्य रहे। भ्रमण ने एक ओर इन्हें तत्कालीन समाज की स्थिति- परिस्थितियों से जोड़ा तो दूसरी ओर भिन्न-भिन्न प्रदेशों की स्थानीय बोलियों के शब्द स्वत: कवि के शब्द- भंडार का हिस्सा हो गए।
           महान संत कवि क़बीर  की  भाँति तुलसी साहिब के ग्रंथों  में हमें  धर्म के पाखंड, कर्मकांड, एवं निरर्थक बाहयाचार का खंडन कर ज्ञान-भक्तियुक्त सरल-संतोषमय जीवन के  प्रचार- प्रसार की झलकियाँ मिलती हैं   तो काव्यकला की दृष्टि से इनकी भाषा में भी वे ही गुण- दोष परिलक्षित होते हैं जो संतों की भाषा की विशिष्टता मानी जा सकती है। यही कारण है कि तुलसी -साहित्य में हमें अवधी, ब्रज, संस्कृत, पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली के साथ ही अरबी, फ़ारसी, कुछएक अंग्रेज़ी एवं तुर्की शब्द मिल जाते हैं जो मूलभाषा के साथ मिलकर अपना विदेशीपन खो चुके हैं और पूर्णरूप में गृहीत हैं। ये प्रयोग सायास नहीं अनायास, या कहा जाय कि स्वत: शामिल प्रतीत होते हैं। कवि ने इन शब्दों को विदेशी जानकर सायास त्याज्य भी नहीं माना है। आगत शब्दों के मुक्तहस्त प्रयोग से एक ओर कवि की  भाषिक उदारता का प्रमाण मिलता है, दूसरी ओर उनके व्यापक शब्द- भांडार का पता चलता है।
       'आगत शब्द को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। 'आगत' शब्द का अर्थ है-- 'आया हुआ' शब्द। एक भाषाभाषी  जब दूसरे भाषाभाषी के संपर्क में आते हैं तो स्वाभाविक रूप में, विचार-विनिमय के क्रम में एक भाषा के शब्द दूसरी भाषा की परिसीमा में स्वत: प्रविष्ट हो जाते हैं और उसी के व्याकरण के अनुरूप रच- पचकर उस दूसरी भाषा का हिस्सा बन  जाते हैं। ऐसे शब्दों को न तो 'विदेशी' कहना उचित जान पड़ता है न 'उधार' (लोनवर्ड्स, बोरौड, बोरोइंग) और न ही  'उद्धृत''विदेशी' शब्द से पराएपन का बोध होता है, 'उधार' से ब्याज या बिना ब्याज के विषयवस्तु को लौटाए जाने का और 'उद्धृत'  से ऐसे शब्द को मूल रूप में ज्यों के त्यों प्रयोग करने का। 'आयात' शब्द प्रयोग भाषा के संदर्भ में उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि यह अपने मूलार्थ से पूरी तरह अलग हो जाता है। प्राय: शब्दों में ग्राहिका भाषा के अनुकूल ध्वन्यात्मक एवं रूपात्मक परिवर्तन होता है। अतएव ऐतिहासिक स्रोतों की दृष्टि से इन्हें अन्य अभिधान की अपेक्षा 'आगत' कहना समीचीन प्रतीत होता है, क्योंकि  'आगत' अभिधान ग्राहिका भाषा में आकर पूरी तरह घुल-मिल  जाने का बोध देता है और अपना विदेशीपन / परायापन भी खो देता है। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया ने सबसे पहले इन शब्दों के लिए 'आगत' अभिधान प्रयोग किया, जिसे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त हो चुका है।
      आगत शब्दावली की प्रकृति-प्रवृत्ति और उनके प्रयोग के प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए उनके साहित्य पर  विशेष अध्ययन में वैज्ञानिकता के समावेश और उपयुक्तता के लिए आगत शब्दावली का वर्णन शब्द-संदर्भ और शब्द-प्रकृति के आधार पर किया जाना उचित है। शब्द संदर्भ को भी विषय-क्षेत्र एवं शब्दार्थ के आधार पर देखा जाना उचित प्रतीत होता है। यद्यपि   तुलसी साहिब ने आगत शब्दों के  अल्प प्रयोग को कहीं भी ध्यान में नहीं रखा होगा, इसलिए इनके साहित्य में ऐसे शब्द विपुल परिमाण में मौजूद हैं। संप्रति, शब्द-संदर्भ को ध्यान में रखते हुए यदि हम केवल विषय क्षेत्र के आधार पर भी इन शब्दों को एक-एक फूल की तरह चुनें तो भी वे कई रूप में मिलेंगे। जैसे कि

  1. जातिगत /धार्मिक और सांस्कृतिक शब्द: अकीदा, अजाबी, अली, अल्लाह, आफताब, आलम, इनायत, इलल्ला, इलाह, इस्म, ईमाम, ईसा, कब्र, कबीर, काफिर, काबे, कामिल, कारिम, कुरान, खुदा, खुदाई, गंग, गाजी, गैब, चिल्ला, जहन्नुम, जिबराईल, ताजिया, ताबूत, दरगाह, दादू, दीन, दुआ, दोजख, नबी, पीर, पैगंबर, फना, फिरिस्ते, फैज, मक्का, मलकुत, महजीत, महताब, मुरदा, मुरसिद, मुरीद, मुरीदी, मुल्ला, मुसलमान, मुहम्मद, मुहर्रम, मौत, मौला, रब, रहमान, रूह, रोजा, सुन्नी, सुहेला, सैयद, हज, हसन, हुसैन।
     2.   प्रशासनिक/ दरबारी  शब्द: अदालत, अमलदार, अमली, अमीन, इलाके, इंसाफ, काजी, कारिंदा, कासिद, किला, खजाना, खिजमत, गवाही, गुमास्ते, चक, जंग, तख्त, तीर, तेग, तेगा, दमदमा, दरबानी, दरबार, दरबारी, दाद, प्यादे, फरमान, फौज, मुकद्दम, मुलक, म्याना, रुजगार, रैयत, लशकर, वतन, वली, समसेर, सरकार, सहजादी, साहब, साहिबी, हाकिम, हाकिमी।

     3.  शिक्षा संबंधी शब्द: अलिफ, कलम, काबिल, कारी, किताब, कुंद, जेर, परचा, हरफ।

     4. व्यवसाय संबंधी शब्द: कसाई, कारीगर, कीमत, खरीदी, जहाज, तगार, तसमा, दौलत, दाम,
          दुकान, नाव, पैसे, मल्लाह, माल, साइस, सौदा।
      
     5. साहित्य एवं चिकित्सा संबंधी शब्द: अकसीर, इलम, गजल, दवा, मरहम, हकीम।

    6. खाद्य एवं पेय पदार्थ संबंधी शब्द: अनार, आब, गुलकंद, दारू, नान, पान, पुलाव, पोस्ते, मसरूवा, मेवा, सीरमाल।
      
    7. शृंगार संबंधी शब्द: जवाहिर, जेवर, तौक, पन्ना, मेहंदी, रंगमहल, सुरमा।                              
           
   8. संख्यावाचक शब्द: अलफानी, इक, चार, यक, हजार।
       
   9. अपशब्द: नजीस, नाचीज, नालाइक, पस्तो, पाजी, मजनूँ, मरदूद, स्याहरू, हरामखोर, हरामी,
             हैवाना।
         
   10. अंग संबंधी शब्द: गरदन, चसम, चिहरे, जिगर, तन, पंजा, पलक।

   11. पहरावा संबंधी शब्द: कफन, चदर, जामा, परदा, पोसाका।
        
   12. विभिन्न वस्तुएँ: अबीर, कमानी, खंजरी, गुल, गुललाला, गुलाब, गुलाबांस, गूलर, गोला, चीजै,
         चंग, चंदन, जंजीर, जाल, तंबू, तार, दरवाजा, दूरबीन, नस्तर, संदुक, साबुन, सामान, सेल, हार।

         यह सहज अनुमान किया जा सकता है कि आगत शब्दों के प्रयोग में काव्यकला के आदर्शों का पालन नहीं है, कवि का यह ध्येय भी नहीं है, किंतु जिस प्रवाह में विभिन्न विषयों से संबद्ध आगत शब्द प्रयुक्त हैं, उससे यह निश्चित करना आसान हो गया है कि विभिन्न प्रकार के संपर्कों के परिणामस्वरूप शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद एवं अनुकरण के फलस्वरूप गृहीत या प्रविष्ट होते हैं। (आर. आर. के, हर्टमेनिन एवं एफ़. सी. स्टोर्क: 'डिक्शनरी ऑफ लैंगवेज़ एंड लिंगविस्टिक्स ' के पृष्ठ 134)

        लियोनार्ड ब्लूमफ़ील्ड मानते हैं कि  "सामान्यत: आगत शब्द ग्राहिका भाषा की भाषण-प्रणाली में पचित होकर स्वदेशी भाषा के मूल शब्दों की तरह व्यवहृत होता है।"

        टी. बायनन के अनुसार, “किसी भाषा में आगत शब्दों का निर्धारण भाषा के समकालिक विकास के प्रसंग में होता है।"
                    
          ओटोजेस्पर्सन मानते हैं कि कोई भी राष्ट्र ऐसा नहीं है जिसने किसी अन्य भाषा के शब्दों को ग्रहण न किया हो।" क्योंकि उनके अनुसार "एक भाषा से दूसरी भाषा में कोई शब्द स्वभावत: स्थान पा लेते हैं।"
         उपर्युक्त वर्णित विद्वानों और भाषाविदों के विचारों, तर्कों से गुज़रते हुए यह तय करना आसान हो जाता है कि तत्कालीन समय में देश की राजनीतिक, सामाजिक, लोकप्रचलित, क्षेत्रीय  एवं प्रशासनिक स्थितियों के प्रभाववश तुलसी साहिब की रचना-भाषा में तत्कालीन शाही भाषा अरबी-फ़ारसी के शब्द प्रचुर मात्रा में आकर मिल गए, कुछ मूल रूप में तो कुछ हिंदी के व्याकरण में रच-पचकर। अन्य भाषाओं  के आगत शब्द भी कमोबेश हिंदी में एकसार हुए मिल जाते हैं, जिन्हें कई बार अलग करके पहचानना कठिन प्रतीत होता है।

संदर्भ-सूत्र 
रत्नसागर
शब्दावली भाग 1 एवं 2
घटरामायण भाग 1 एवं 2
पद्मसागर (शब्दावली के दूसरे भाग के अंत में संकलित)
डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया: कामकाजी हिंदी; पृष्ठ- 161-162
एच. ए. ग्लेसन: वैरिएशन इन स्पीच; जर्नल - एन इंटरोडक्शन ऑफ डिस्क्रिपटिव लिंगविस्टिक्स, पृष्ठ -397
डॉ. हरदेव बाहरी: देशी शब्द तत्व; हिंदी अनुशीलन, वर्ष 8, अंक 4, पृष्ठ -147
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा: हिंदी साहित्य का वृहत्त इतिहास
डॉ. हरस्वरूप माथुर: भारतीय साधना और संत तुलसी 
आर. आर. के, हर्टमेनिन एवं एफ़. सी. स्टोर्क: 'डिक्शनरी ऑफ लैंगवेज़ एंड लिंगविस्टिक्स ' के पृष्ठ 134
लियोनार्ड ब्लूमफ़ील्ड: लैंगवेज़, पृष्ठ - 444
'लोन्स एंड लोनवर्ड्स ' द्वारा - टी. बायनन; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ लिंगविस्टिक इन्फोर्मेशन एंड कंट्रोल में संकलित अध्याय
ओटोजेस्पर्सन: ग्रोथ एंड स्ट्रक्चर ऑफ इंग्लिश लैंगवेज़, पृष्ठ -27-27, एवं 28

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