कविताएँ: वर्षा सरन

वर्षा सरन

वर्षा सरन

ये आवारगी

चारवाहों की घुमंतू आवारगी
उफ, क्या है ये दीवानगी?
घूमती हूँ इधर उधर
बेख्याल सी जैसे सारी हकीकत
यूँ ही अंजान रहूँ मैं
अपनी इस बेफिक्री में
कि अजब ही मज़ा है
दुनियादारी से हट कर,
बेखौफ सा सारा आलम है
कि हर जर्रे में
उसकी ही मोहब्बत है
उसे मुझ पर ऐतबार हो चला
वो सितमगर खुदा ही
अब मेरा हमदम है!


विरक्ति

मन तभी विरक्त होता है
जब किसी बहुत की अपने से
अपमानित, तिरस्कृत या
बोझिल होता है
ठगा सा मन व्याकुल हो
विलग और द्रवित होता है
आहत आँसुओं को पोंछता हुआ
परमसत्ता के सामीप्य होता है
मन तभी विरक्त होता है...

कुछ भी सार्थक सा लगता नहीं
इस समाज की ढकोसली
बातों से तब ही
विमुक्त होता है ...

संतापी हृदय यह,
बस उसी करुणामयी को
पुकार कर विह्वल होता है
मन तभी विरक्त होता है...

सांसारिक प्रपंचों से
विमुक्त होता है
जीवन के कठोर मर्म समझ कर
ज्ञानी और मुक्त होता है।
मन तब ही विरक्त होता है...

कुछ भी नहीं

कुछ नहीं
कुछ भी तो नहीं!

शायद भ्रम है मेरा
या ये कोई माया जाल
बार बार डूबती, उतरती हूँ
फिर भी इसमें गहरी निकलती हूँ
कभी तैर जाती हूँ
कभी साँस फूलती है
तड़पती हूँ मछली की तरह
फिर भी इस नदिया को रोज
किनारे जाकर तकती हूँ
कुछ नहीं है ये दुनिया
कम्बख्त एक मकड़जाल है
फिर भी भ्रम के इस जाल में
बार बार फँसती हूँ!

जब तक देह है
जरूरतें हैं
जब तक दिमाग क्रियान्वित है
जब तक प्रलोभन की आदतें हैं
जब हो जाऊँगी मुक्त
तब शायद
यूँ न दोराहे पर खड़ी तमाशबीन सा
खुद का मज़ाक देख पाऊँगी
और हो जाऊँगी मुक्त
जब मुक्ति के पथ पर
अग्रसर हो जाऊँगी
और परम पिता के हाथों को पकड़
चिर शान्ति के आकाश में
उड़ जाऊँगी!

सूखते कपड़े

ये छत पर ,
बालकनी और दीवारों पर
सूखते कपड़ों की उड़ान

हवा संग अठखेलियाँ करते
देते हैं अपने शैतानी का अहसास

चटक धूप में
अपनी सारी नमी को खोते
और स्वच्छता का करते ऐलान

फड़ फड़ करते, तार से गिरते
इनकी उनकी छतों पर जाते
ग़र न लगाओ क्लॉथ पिन का पहरा
तो कम्बख्त, गुमशुदा होने का देते हैं प्रश्नचिन्ह?
और कहते हैं, क्यों नहीं लगाया हम पर कोई पहरा!

अरे, कहाँ गया टिंकू का निकर
और रिंकी की एक जुराब!

पर हवा, सूर्य की रोशनी न हो
तो हो जाते हैं मायूस

देते हैं संदेश कि इनके उनके घरों में
धुले हैं कपड़े, हुए हैं कीटाणुमुक्त

आजकल तो मशीनों से निचुड़ जाते हैं
और  जल्द ही सूख कर फड़फड़ाते हैं

रोज निहारती हूँ इन कपड़ों को
जब चारों तरफ छतों पर
कपड़ों की रंगत को
देखती हूँ लहराते
गाते और गुनगुनाते

दिनचर्या का हिस्सा हैं
ये प्रकृति से बातें करते
वाशिंग पाउडर की खुश्बू से लबरेज़
ये महकते कपड़े!

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