राजेन्द्र बाला घोष उर्फ बंग महिला और उनकी कहानी ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’

डॉ. सितारे हिन्द

- सितारे हिन्द

राजेन्द्र बाला घोष उर्फ ‘बंग महिला’ का जन्म सन् 1882 ई. में मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका नाम आधुनिक हिन्दी साहित्य के शुरुआती गद्य लेखिकाओं में प्रमुख है। बंग महिला, राजेन्द्र बाला घोष का लेखकीय नाम था। हिन्दी में इनकी कहानियाँ इसी उपनाम से 19 वीं शताब्दी के अंतिम तथा 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में छपती रहीं। इनकी रचनाएँ उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाएँ जैसे –‘सरस्वती’, ‘आनंद कादंबनी’, ‘भारतेन्दु’, ‘समालोचक’, ‘लक्ष्मी’ आदि छपीं। बंगला भाषा में इनकी रचनाएँ ‘प्रवासिनी’ उपनाम से छपा करतीं थीं। बंग महिला का जन्म एक संभ्रांत बंगाली परिवार में हुआ था। इन्हें बचपन में ‘रानी’ और चारुबाला नाम से पुकारा जाता था। इनका विवाह पूर्ण चंद्रदेव के साथ हुआ था जिनकी असमय मृत्यु हो गई थी। इनकी मातृभाषा बंगाली थी अतः इन्होंने काफी सफलता के साथ अनेक बंगला रचनाओं का अनुवाद हिन्दी में किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दी साहित्य के प्रति इनका अनुराग आजीवन बना रहा।
बंग महिला का समय हिन्दी गद्य का आरंभिक समय था और वैसे समय में इन्होंने हिन्दी की साहित्यिक दुनिया को कई वैचारिक निबंध तथा अनेक कहानियों से समृद्ध बनाया। इनकी रचनाओं में ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’(1904 ई.), ‘दुलाई वाली’ (1907 ई.), ‘भाई-बहन’(1908 ई.), ‘हृदय परीक्षा’(1915 ई.)आदि कहानियाँ तथा ‘गृह-चर्चा’, ‘संगीत और सुई का काम’, ‘स्त्रियों की शिक्षा’, ‘हमारे देश में स्त्रियों की दशा’ आदि निबंधों के अतिरिक्त अनूदित रचनाओं में नारायणदास सेन की कहानी ‘मुरला’, दीनेन्द्र कुमार सेन की कहानी ‘मातृहीना’, हरिहर सेठ की कहानी ‘संसार सुख’, सखा ओ साथी की कहानी ‘अपूर्व प्रतिज्ञा पालन’, रवींद्रनाथ ठाकुर की दो कहानियाँ –‘दान-प्रतिदान’ और ‘दालिया’, नीरदवासिनी घोष की कहानी ‘कुम्भ में छोटी बहु’, देवेन्द्र कुमार रॉय का डिडेक्टिव नॉवेल ‘तिल से ताड़’, अविनाश चंद्रहास का लेख ‘गृह’, श्री मती लावण्य प्रभा सरकार का लेख ‘पति सेवा’, रामचन्द्र चट्टोपाध्याय के लेख ‘नीलगिरि की होडा जाति’ और ‘अण्डमान द्वीप के निवासी’, बैकुंठ दास का लेख ‘भगवती देवी’ तथा इतिहास से लिए गए एक चरित्र ‘जोधा बाई’ प्रसिद्ध हैं। इनकी रचनाओं का एक संग्रह आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के सम्पादन में ‘कुसुम संग्रह’ नाम से सन् 1911 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित हुआ।
‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ बंग महिला जी की एक प्रसिद्ध कहानी है। यह कहानी सन् 1904 ई. में ‘सरस्वती’ पत्रिका में निबंध के रूप में प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने इसे कहानी के रूप में ही प्रकाशित किया। ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ पत्रात्मक शैली में लिखी गई हिन्दी की पहली कहानी है। यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 20वीं सदी के पहले दशक के भारत की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का यथार्थ चित्रण है। कुछ विद्वानों ने इसे हिन्दी की पहली राजनीतिक कहानी भी माना है। देखा जाय तो इसकी कथावस्तु पर 11 अप्रैल, 1903 ई. को ‘भारत-मित्र’ पत्रिका में प्रकाशित बालमुकुंद गुप्त के निबंध ‘शिवशम्भु के चिट्ठे’ का प्रभाव है। ‘शिवशम्भु के चिट्ठे’ निबंध की तरह ही ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी में बंग महिला के द्वारा देश के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन और उनकी गलत नीतियों पर टिकी हुई व्यवस्था पर व्यंग्य किया गया है। कहानी की पूरी अंतर्वस्तु संवादात्मक शिल्प पर टिकी हुई है। यह संवाद भगवान चंद्रदेव और स्वयं लेखिका के बीच हुई है। इनके पति का नाम पूर्ण चंद्रदेव था, जिनकी मृत्यु असमय हो गई थी अतः चंद्रदेव के प्रति सम्बोधन कभी-कभी लेखिका के अपने पति के प्रति भावनात्मक लगाव को दिखाता है तो कभी ‘श्वेतांग अंग्रेज’ का प्रतीक बन जाता है तो कभी ‘चंद्रमा’ का। 
‘चंद्रदेव पर मेरी बातें’ कहानी पर चर्चा करने से पूर्व उस स्थिति को समझना होगा जिसपर इस कहानी की अंतर्वस्तु टिकी हुई है। सन् 1899 ई. में लॉर्ड कर्जन भारत के वायसराय बने। इनका समय काफी विवादित रहा। इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय जनमानस की आकांक्षाओं की अवहेलना की। इतना ही नहीं राजनीतिक रूप से गुलाम भारत में लॉर्ड कर्जन ने निर्मम क्रूरताएँ की। बालमुकुंद गुप्त कृत ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ के संपादक डॉ. विजयेन्द्र स्नातक ने इसी पुस्तक की भूमिका में लॉर्ड कर्जन के संबंध में कुछ तथ्य दिए हैं, जो कि यहाँ उल्लेखनीय हैं –
“लॉर्ड कर्जन के विषय में प्रसिद्ध है कि वह क्रूर स्वभाव का अहंकारी शासक था। उसके शासन काल में भारतीय जनता को सुख-सुविधाएँ प्राप्त होना तो असंभव था ही, प्रत्युत वह तो पहले से प्राप्त अधिकारों को भी छीनने के पक्ष में था। फलतः उसने सिविल सर्विस में भारतीयों के प्रवेश का निषेध किया, उच्च स्तरीय शिक्षा के मार्ग में रोड़े खड़े किये, बंगाल को विभाजित कर देश में फूट के बीज बोए, कर वसूली के काले कानून बनाकर जनता को दुख-दैन्य के पाश में कसकर तड़पाया और निर्धन प्रजा का शोषण कर अपने अहं की तुष्टि के लिए दरबार रचाया तथा विक्टोरिया महल हॉल बनवाया।”1
“ लॉर्ड कर्जन को अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दूसरी बार फिर दो वर्ष के लिए वायसराय नियुक्त किया गया। भारतवासी इस नियुक्ति पर अत्यंत खिन्न हुए लेकिन वे करते भी क्या –“जो कुछ खुदा दिखाए सो लाचार देखना”2
“भारत की प्रजा को यह आशा थी कि दूसरी बार वायसराय होकर आने पर लॉर्ड कर्जन भारतीयों के हित के लिए कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। उन्हें ऐसी भी आशा थी कि बड़े लाट अपने भाषण में उन सुधारों का उल्लेख करेंगे जो इस बार वे भारत में करना चाहते हैं किन्तु उनका प्रथम भाषण भारतीयों की ‘आशा का अंत’ करने वाला सिद्ध हुआ।”3
उपर्लिखित तथ्यों के आलोक में ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी को भली-भाँति समझा जा सकता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ एक प्रकार का साहित्यिक अभिलेख है जिसमें 19 वीं सदी के पहले दशक में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से गुलाम भारत के नौकरशाहों की मानसिक मनोदशा, बेरोजगारी-महामारी आदि का यथार्थ चित्रण है।
            बालमुकुंद गुप्त के ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ की तुलना में बंग महिला की कहानी ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ में व्यंग्य की धार कमतर होते हुए भी निडर तथा यथार्थ चित्रण में बीस ठहरता है। अतः इसका स्थायी महत्व है। बालमुकुंद गुप्त का पात्र ‘शिवशंभु’ स्वयं लेखक है, लेकिन रचना में ‘शिवशंभु’ अन्य पुरुष के रूप में है, लेकिन ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ की लेखिका राजेन्द्र बाला घोष उर्फ बंग महिला लेखिका के रूप में स्वयं यानि उत्तम पुरुष में हैं। अतः तुलनात्मक रूप से लेखिका पर खतरा ज्यादा है, लेकिन बावजूद इसके इन्होंने सत्य बातें कहकर एक सजग तथा संवेदनशील साहित्यकार का परिचय दिया।
            अंग्रेज सरकार के समय नौकरी में गोरों को वरीयता दी जाती थी चाहे भले ही भारतीय उनसे अधिक शिक्षित तथा योग्य क्यों न हों। बंग महिला को यह बात खटक रही थी। उन्होंने अंग्रेज सरकार की इस नीति पर खुला व्यंग्य किया है। वो चंद्रदेव को संबोधित कर कहतीं हैं “यदि आपको अंग्रेज जाति की सेवा स्वीकार हो तो, एक ‘एप्लिकेशन’(निवेदन पत्र) हमारे आधुनिक भारत प्रभु लॉर्ड कर्जन के पास भेज देवें। आशा है कि आपको आदरपूर्वक अवश्य आह्वान करेंगे। क्योंकि आप अधम भारतवासियों के भाँति कृष्णांग तो हैं ही नहीं, जो आपको अच्छी नौकरी देने में उनकी गौरांग जाति कुपित हो उठेगी।”4 अंग्रेजों की रंगभेद की नीति पर इससे बड़ा व्यंग्य और भला क्या हो सकता है!
             यह पहले ही बताया जा चुका है कि लॉर्ड कर्जन को कार्यकाल पूरा करने बाद पुनः दो वर्षों के लिए भारत का वायसराय नियुक्त किया गया था जबकि भारतीय इसे नहीं चाहते थे। इसी पर बंग महिला ने लिखा है कि “यह क्यों? क्या आपके डिपार्टमेंट (महकमे) में ट्रांसफर(बदली) होने का निया नहीं है?”5
              लॉर्ड कर्जन ने अपने कार्यकाल के दौरान भारत में बहुत से मिशन और कमीशन बनाए। लेकिन जमीन पर ये तमाम कमीशन ज्यादा प्रभावी कार्य नहीं कर पायीं। और अब पुनः जब उनका दूसरा कार्यकाल शुरू होगा तो आम लोगों में इसकी चिंता स्वाभाविक है। इसी पर लेखिका ने व्यंग्य किया है-
“जब लॉर्ड कर्जन हमारे भारत के स्थायी भाग्य विधाता बनकर आवेंगे, तब आपको किसी कमीशन का मेम्बर नहीं तो किसी मिशन में भर्ती करके वे अवश्य ही भेज देवेंगे क्योंकि उनको कमीशन और मिशन, दोनों ही, अत्यंत प्रिय हैं।”6
               भारत के अंदर फैली बेरोजगारी, बेकारी, अशिक्षा आदि को देखने वाला कोई नहीं था। अधिकारी सिर्फ और सिर्फ अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए थे। अंग्रेजों को जहाँ भी असुविधा होती, वो खुद के लिए सुविधा ढूँढ़ लेते, लेकिन आम भारतीय मुँह ताकते रह जाते। इसी कारण लेखिका को कहना पड़ा कि “ हमारे श्वेतांग महाप्रभु गण को, जहाँ पर कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ा, झट उन्होंने ‘इलेक्ट्रिसीटी’(बिजली) को ला पटका। बस कठिन से कठिन कार्य सहज में सम्पादन कर लेते हैं और हमारे यहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त युवक काठ के पुतलों की भाँति मुँह ताकते रह जाते हैं।”7
              यह सर्वविदित है कि भारतीय नवजागरण में एक साहित्यकार के रूप में बंग महिला का अप्रतिम योगदान है। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ‘आधुनिकता’ के बीज बोए। पौराणिक मान्यताओं एवं रूढ़ियों पर प्रश्न खड़े किए एवं नवीन चेतना का संचार किया। इसकी सुंदर झलक ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी में दिखाई देती है। वो लिखती हैं “शायद आप पर यह बात भी अभी तक विदित नहीं हुई कि आप और आपके स्वामी सूर्य भगवान पर जब हमारे भूमंडल की छाया पड़ती है, तभी आपलोगों पर ग्रहण लगता है। पर आपका तो अब तक, वही पुराना विश्वास बना हुआ है कि जब कुटिल ग्रह राहु आपको निगल जाता है तभी ग्रहण होता है। पर ऐसा थोथा विश्वास करना आप लोगों की भारी भूल है। अतः हे देव! मैं विनय करती हूँ कि आप अपने हृदय से इस भ्रम को जड़ से उखाड़ कर फेंक दें।”8 नव वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न इस उद्धरण का दूसरा आशय यह भी है कि लेखिका अंग्रेज सरकार को चेतावनी दे रही है कि जब जनता संतुष्ट एवं खुश नहीं होती है तो बड़ी से बड़ी सत्ता एवं सरकार पर विपत्ति या सकती है। तमाम सरकारी चमक-दमक मेहनतकश जनता पर ही टिकी हुई है अतः आप चेत जाएँ।
              बालमुकुंद गुप्त, अंग्रेज सरकार पर कर्तव्यहीनता का आरोप ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ के माध्यम से पहले ही लगा चुके थे। ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ में उन्होंने लिखा था “आपने माई लॉर्ड! जब से भारत वर्ष में पधारे हैं, बुलबुलों का स्वप्न ही देखा है या सचमुच कोई करने के योग्य काम भी किया है? खाली अपना ख्याल ही पूरा किया है या यहाँ की प्रजा के लिए भी कुछ कर्तव्य पालन किया? एक बार यह बातें बड़ी धीरता से मन में विचरिये। ... हिसाब कीजिए नुमायशी कामों के सिवा काम की बात आप कौन सी कर चले हैं और भड़कबाजी के सिवा ड्यूटी और कर्तव्य की ओर आपका इस देश में आकार कब ध्यान रहा है?”9 लॉर्ड कर्जन की अनीति के मामले में बालमुकुंद गुप्त और बंग महिला दोनों एक मत हैं।
             सम्पूर्ण रूप से देखा जाय तो बंग महिला ने इस कहानी के माध्यम से ‘अर्थनीति’ तथा ‘राजनीति’ को केन्द्रीय विषय बनाते हुए अपने समय का यथार्थ चित्रण किया है। कहानी में स्त्रियों की गुलाम स्थिति, महामारी की समस्या, नौकरशाहों की चापलूस मनोदशा आदि का चित्रण भी यथास्थान हुआ है। इस रचना की भाषा तत्सम तथा संस्कृतनिष्ठ सामासिक होते हुए भी जीवंत है। अपनी संरचना में वाक्य जरूर लंबे हैं, लेकिन निहतार्थ को सफलता के साथ संप्रेषित करते हैं। धन्वंतरी तथा चित्रगुप्त रूपी मिथकीय चरित्र को भी लेखिका ने अपने व्यंग्य विधान में शामिल किया है। अपनी विषय-वस्तु में यह कहानी इतनी समर्थ है कि इसे अपने समय एवं समाज का आयना कहा जा सकता है। जब-जब देश की सत्ता मूढ़ता का शिकार होगी, तब-तब यह रचना प्रासंगिक हो उठेगी।

संदर्भ सूची
1. शिवशंभु के चिट्ठे, बालमुकुंद गुप्त, डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(संपादक), दिग्दर्शन चरण जैन ऋषभ चरण जैन एवं संतति, नई दिल्ली, वर्ष-1985(प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या- 6
2. शिवशंभु के चिट्ठे, बालमुकुंद गुप्त, डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(संपादक), दिग्दर्शन चरण जैन ऋषभ चरण जैन एवं संतति, नई दिल्ली, वर्ष-1985(प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या -7
3. शिवशंभु के चिट्ठे, बालमुकुंद गुप्त, डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(संपादक), दिग्दर्शन चरण जैन ऋषभ चरण जैन एवं संतति, नई दिल्ली, वर्ष-1985(प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या -10 
4. महिलाबंग. “चंद्रदेव से मेरी बातें - कहानी.” बंग महिला, Hindi Sarang, hindisarang.com/chandradev-se-meri-baatein. Accessed 30 May 2022.
5. महिलाबंग. “चंद्रदेव से मेरी बातें - कहानी.” बंग महिला, Hindi Sarang, hindisarang.com/chandradev-se-meri-baatein. Accessed 30 May 2022.
6. महिलाबंग. “चंद्रदेव से मेरी बातें - कहानी.” बंग महिला, Hindi Sarang, hindisarang.com/chandradev-se-meri-baatein. Accessed 30 May 2022.
7. महिलाबंग. “चंद्रदेव से मेरी बातें - कहानी.” बंग महिला, Hindi Sarang, hindisarang.com/chandradev-se-meri-baatein. Accessed 30 May 2022.
8. महिलाबंग. “चंद्रदेव से मेरी बातें - कहानी.” बंग महिला, Hindi Sarang, hindisarang.com/chandradev-se-meri-baatein. Accessed 30 May 2022.
9. शिवशंभु के चिट्ठे, बालमुकुंद गुप्त, डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(संपादक), दिग्दर्शन चरण जैन ऋषभ चरण जैन एवं संतति, नई दिल्ली, वर्ष-1985(प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या- 19

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