‘बंजारे’ गीत संग्रह में मानवीय संवेदना

समीक्षा: पूर्णिमा पांडेय 


 * बंजारे (गीत संग्रह) *
कवि: डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
ISBN # 978-93-86579-29-4
पृष्ठ संख्या: 124
प्रकाशक: आर.के.पब्लिकेशन, दहिसर (पूर्व), मुंबई - 400068
ईमेल: publicationrk@gmail.com



प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक मन होता है। इस भीतरी मन के भीतर भी एक मन होता है। इसके अस्तित्त्व से हर कोई अवगत नहीं होता है। पर जो इसको ढूँढ लेता है वह कलाकार, रचनाकार, साहित्यकार और सबसे बढ़कर एक उत्कृष्ट व्यक्तित्त्व के निर्माण की प्रक्रिया में स्वयं को चलता हुआ पाता है। इसी प्रक्रिया में संवेदना अपना उदात्त स्थान पाती है। यूँ तो संवेदना लगभग सभी जीव-चेतन के पास होती है पर इसका स्तर सभी में अलग-अलग होता है। संवेदना में मूल है ‘विद्’, ‘विद्’ का अर्थ है जानना। ‘विद्’ से ही ‘वेद’, विद्या और वेदना निकले हैं। भीतर कुछ है जो जानता है, महसूस करता है और यही वेदना है। साधारणतया लोग वेदना को कष्ट या पीड़ा समझ लेते हैं परंतु इसमें बहुत ही सूक्ष्म भेद है। यदि अज्ञान है तो वेदना कष्ट बनेगी और ज्ञान है तो करुणा बनेगी। जब वेदना करुणा बन जाती है तो वह संवेदना कहलाती है। अर्थात संवेदना के मूल में कुछ जानना है, कोरी भावुकता नहीं। ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव उससे मन में होनेवाला बोध, अनुभूति संवेदना के लिए नम जमीन होती है। साधारण मनुष्य की और कलाकार की संवेदना में अंतर होता है। एक साधारण सी घटना जिसकी ओर सामान्य व्यक्ति का ध्यान भी आकृष्ट नहीं होता, वही संवेदनशील व्यक्ति के मन में भावनाओं का तूफान उठा देती है।

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
साहित्य और संवेदना का चोली–दामन का साथ है। किसी घटना, प्रसंग या अनुभव का सीधा-सीधा वर्णन इतिहास, भूगोल, विज्ञान दर्शन चाहे कुछ भी हो साहित्य नहीं हो सकता। साहित्य तो तभी बनेगा जब उसमें संवेदना और अनुभूतियों का आत्मीय वर्णन होगा। उमेशचन्द्र शुक्ल जी ऐसे ही रचनाकार हैं जिनके स्वभाव में आस्था, करुणा, दया के अनुभव के साथ -साथ इनकी अनुभूति भी समाई हुई है। मनुष्य जीवन तथा व्यक्तित्त्व पर उसके आंतरिक और बाहरी परिवेश का गहरा प्रभाव होता है। सामाजिक मेल-मिलाप और संपर्क का सीधा प्रभाव उसके विचारों पर पड़ता है फलस्वरूप भावों का जन्म होता है। भाव और विचारों का मिश्रण उसमें संवेदना पैदा करता है। उमेश जी का गीत संग्रह ‘बंजारे ‘भी कुछ इन्हीं तरह की भावनाओं का परिणाम है। वे स्वयं कहते हैं कि उनकी भटकन की लंबी यात्रा बनारस की गलियों से होती हुई काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गलियारों तक पहुँची फिर मुंबई महानगर की सड़कों तक फैल गई। रचनाकार की भौतिक यात्रा कहीं भी विराम ले सकती है परंतु मानसिक यात्रा अनवरत चलती रहती है। इस यात्रा में पड़ाव तो आते हैं पर मंजिल नहीं आती। उमेश जी ने भी कहीं पड़ाव के लिए खेमा लगा लिया और उनकी तमाम अनुभूतियाँ कलम का सहारा लेकर कागज पर उतरने को मचल उठीं। परिणामस्वरूप हमारे हाथ लगा बहुमूल्य गीत संग्रह ‘बंजारे’। इस गीत संग्रह में यूँ तो उन्होंने कई मुद्दों को साकार किया है परंतु उनका संवेदनात्मक पक्ष प्रखरता से उभर कर आता है। संवेदना भी अपने आप में कई रूप लिए हुए होती है। मोटे तौर पर हम इसे व्यक्तिपरक संवेदना और समाजपरक संवेदना में वर्गीकृत कर सकते हैं। और भी गहराई में जाएँ तो अनुभूतिजन्य संवेदना, मूर्ततापरक संवेदना, सामाजिक,नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और न जाने कितने आयामों में देख सकते हैं। पर मेरी नजर पड़ी तो इन सबके मिले-जुले रूप पर यानि मानवीय संवेदनाओं पर। जो कुछ भी मानव मन, जीवन और मूल्यों से जुड़ा है वह सभी कुछ मानवीय संवेदनाओं में समाहित होता है। ‘बंजारे’ उमेश जी की ‘अपनी ही बात’ जैसे ही पढ़ी -
समीक्षक: पूर्णिमा पांडेय
 * गीत नहीं कुछ पीर बहक कर; बंजारन सी घूम रही है: शायद कण पारस हो कोई;माटी – माटी चूम रही है *
अहा हा! बस इन्हीं पंक्तियों पर मन झूम उठा और पूरी किताब हाथ में लेने को विवश कर गया। इस गीत संग्रह में आम आदमी के जीवन की लगभग सभी स्थितियाँ हैं – प्रेम, वियोग, उल्लास, हर्ष, विषाद, स्मृतियाँ और उनके दंश, संघर्ष, स्त्री शोषण, देशप्रेम,राजनीति और राजनितिक विडंबना, देश निर्माण, व्यक्तित्त्व निर्माण, चिंतन,दर्शन और जीवन की आध्यात्मिकता। कहीं कवि अपनी आंचलिक मातृभाषा में भी फूट पड़ा है तो कहीं आतंकवाद और नेताओं के दोहरे और बहुरूपियेपन पर प्रहार करता नजर आता है।

कवि वही होता है जो युगधर्म का बोध रखता है। किसी रचनाकार को हम केवल इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक काल्पनिक मनोरम दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा है बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने संसार की हूबहू तस्वीर खींच कर हमारे हाथों में दे देता है। यही कार्य उमेश जी की लेखनी भी कर रही है। साधारण मनुष्य को अनुभव होता है तो रचनाकार एवं कलाकार को अनुभूति होती है। इन्हीं अनुभूतियों के स्पर्श कदम-कदम पर बंजारे के शब्द हमें कराते चलते हैं। पहले ही पृष्ठ की सरस्वती वंदना, कुल गीत और इसमें सन्निहित बंधुत्व-भावना, चराचर की मंगल कामना अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत, गरिमामयी संस्कृति का दर्शन कराते हैं। विनीत भाव हम भारतीयों की चरित्रगत विशेषता है। आदिकाल से ही हम प्रकृति, समाज, परिवार सभी के प्रति विनम्र भाव से कृतज्ञता व्यक्त करते आए हैं। अनादि सत्ता से अपनी जरूरत भर ही माँगते हैं। स्वार्थ से दूर विश्व कल्याण की भावना हर पल मन में निवास करती है। वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा भारतीय मानस का वैशिष्ट्य है।
 *आदि शक्ति, हे आदि भवानी; सृष्टि -जननी, ब्रह्मा ब्रह्माणी :
 खोल ज्ञान की दृष्टि धरा पर; प्रेम की वर्षा कर-कर रे माँ
 * एक ब्रह्म की जब माया है;
 आतंक का बादल क्यों छाया है :
 भातृ भावना की किरणों से विश्व प्रकाशित कर-कर रे माँ
कवि अपने देश को भी मानस में बसाए हुए है।
 *मंगल की संकल्प शक्ति से अटल साधना देश भक्ति से;
 प्रकट हुई जो जीवन गीता उसको भास्वर स्वर दे, स्वर दे
मातु शारदे, वर दे,वर दे, मातु शारदे वर दे।

साहित्यकार के मन में भाव होते हैं। वह उनसे उद्वेलित होता है जिससे उसके मन में संवेदना जन्म लेती है। यह संवेदना केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं होती बल्कि इसका संबंध चिंतन से भी होता है, मनन को भी प्रेरित करनेवाली होती है और अंतिम चरण में कविता के रूप में प्रस्फुटित होती है। ऐसे ही बंजारा कवि कहता है –
 *अब सावन की राह न देखो; अलकों की गागर छलकाओ :
 अंतर्मन तक प्यासा पंछी; एक बूँद लेकर आ जाओ।
 *मृगतृष्णा का खेल छोड़ दो; दौड़-दौड़ चकराया हिरना
 अब,पिंजरे का द्वार खोल दो; बोल-बोल पथराया सुगना
 आलिंगन की प्यास जगी है दर्पण से मन मत बहलाओ।

शुक्ल जी सोचने को प्रेरित करते हुए कहते हैं - ’हे मानव अब तू तृष्णाओं के बंधन, इच्छाओं के मायाजाल से स्वतंत्र होने की दिशा में सोच। सभी सामाजिक बंधनों, दकियानूसी परंपराओं,रूढ़ियों से बाहर निकलकर आगे बढ़। कोरी भावुकता से बाहर आ, पानी में चमकते चाँद की छाया का आकर्षण छोड़, दर्पण के मनमोहक प्रतिबिंब से भ्रमित मत हो ।’

गीत साहित्य की अत्यंत लोकप्रिय और शायद सबसे पुरानी विधा है। प्रकृति के विभिन्न स्वर— उन्मुक्त पंछियों का गायन, भौरें की गुंजन, नदी की कल-कल, झरने की झर-झर, मेघ की घनन-घन, तड़ित की गर्ज़न आदि में ताल–लय बद्धता के साथ हर्ष, रोमांच, आश्चर्य,प्रीत आदि भाव मुखरित होते रहे। निश्चित ही यह संगीतमय उत्कंठित स्वर गीत के प्रथम स्वर रहे होंगे। उमेश जी भी इसका लोभ संवरण नहीं कर पाए, अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने गीतों का ही सहारा लिया। भावावेश में उनके स्वर गीत का दामन थाम लेते हैं।
 *गीत नहीं कुछ पीर बहक कर बंजारों सी घूम रही है
 शायद कण पारस हो कोई, माटी-माटी चूम रही है
 मन सोना-सोना हो जाए, अब से कोई रीति बताओ
 अंतर्मन तक प्यासा पंछी एक बूंद लेकर आ जाओ।

कवि का मन सांसारिक बातों के साथ-साथ मानव जीवन की उच्चतम संभावना तक सहज ही पहुँच जाता है। कर्मफल की आकांक्षा करते-करते परम सत्ता के आलिंगन की बात, चाह कैसे चली आती है पता ही नहीं चलता।
 *बादल कब लेगा अँगड़ाई, कब सीपी का द्वार खुलेगा
 कब तक पंथ निहारे हंसा, कब मोती का प्यार मिलेगा

मानव जीवन का उत्कर्ष देखिए कि उसे साधारण मनुष्य से शिव-भक्त बना दिया। शिव जो स्वयं में ही घुमक्कड़ हैं, मस्त हैं, आल्हादिनी गंगा को जटाओं में धारण किए हुए जीवन की निस्सारता लपेटे हुए हैं, उसका साधक, रसिया जोगी बन गया है। कैसी सरस धारणा है –
 *शिव मंदिर का रसिया जोगी बस्ती-बस्ती घूम चुका है :
 पर्वत से सागर तक सारे कंकड़-पत्थर चूम चुका है
 कब नदिया के चंचल मन को सागर का श्रृंगार मिलेगा
 कब तक पंथ निहारे हंसा, कब मोती का प्यार मिलेगा।

मानवीय संवेदना का एक और आयाम पढ़ते-पढ़ते प्रकट हो जाता है वह है जीवन दर्शन,संतोष और नैतिकता का -
 *मैं पनघट की काँची माटी बिन चाहे धुल जाऊँ, मैं झरने का चंचल पानी ढाल मिले गिर जाऊँ
 *आज मिला जो सब अपना है, बीत गया जो सब सपना है
 सब कुछ हार, यह जाना मैंने;न कल अपना था न कल अपना है
(यहाँ मात्रा का संतुलन थोड़ा डगमगाया है पर भाव इतने प्रवाही हैं कि सहसा ध्यान नहीं जाता।)
मानव जीवन किस तरह सतत यात्रा में रहता है साथ-साथ कितना बुद्धि चातुर्य लिए हुए है उसकी बानगी देखिए
 * मैं नदिया का बहता पानी, बिन ठहरे, बढ़-बढ़ जाऊँ
 बंशी लिए मछेरा हूँ मैं, छलिया स्वप्न चितेरा हूँ मैं
 सब कुछ लूट बहक जाऊँगा, ऐसा कुशल लुटेरा हूँ मैं
कुछ और बेहतर पाने की चाहत मनुष्य को कितना भटकाती है, उससे अपना घर, गाँव सब छुड़ा देती है। इसके बावजूद मन कहीं तरस भी रहा है इस विडंबना का सटीक चित्रण बंजारे उमेश जी से अच्छा कौन कर सकता था –
 *जब से तेरा गाँव है छूटा, सब जादू ही जादू;सपनों से बाजार भरा है कैसे छोड़ के भागूँ
 माया नगरी के टोने से, बँधा है मन का तार, जोगिनियाँ। जोगिनियाँ ढूँढ रही संसार

‘यादों की खोरी’ सहज स्मृतियों के दंश झेलती हर मानव के मन की व्यथा है। सुख-दुःख की अनुभूति, ह्रदय के साथ उनका संघर्ष और कहीं उन स्मृतियों से होता धीमा-धीमा संवाद हम सबको अपनी-अपनी स्मृतियों की वीथिकाओं में भटकने पर मजबूर कर देता है और यहीं कवि की सफलता का परचम लहराने लगता है। कृष्ण बिहारी नूर जी की मशहूर पंक्तियाँ सहसा याद आ जातीं हैं – ‘मैं तो गजल सुना के अकेला खड़ा रहा; सब अपने-अपने चाहनेवालों में खो गए’
 *सपने भटकते हैं, आवारा वेश में; साधो की बस्ती वीराने देश में
 अंगारा लगते हैं, पीपल के छाँव रे; यादों की खोरी में जलते हैं पाँव रे
 पनघट का रिश्ता कुँवारा खड़ा है; सखियों का किस्सा बेचारा पड़ा है
 गलियाँ पियासी उदासे हैं गाँव रे, यादों की खोरी में जलते हैं पाँव रे।

हमारी स्मृतियों पर से समय की राख हटाकर उजागर कर देनेवाला साहित्य हमारे मानस पटल पर स्थायी रूप से अंकित हो जाता है। जाने-अनजाने हम अपने दुखों से, उदासियों से प्यार करते हैं उन्हें कभी छोड़ नहीं पाते। उमेश जी के गीत हाथ में पकड़ी हुई किताबों में बिखरी हुई आंतरिक पीड़ा की स्याही है। अत: हमारे मन के करीब सरसराहट पैदा करते हैं। दर्द से गीतकार का रिश्ता बहुत पुराना है क्योंकि वह स्वयं बता रहा है –
*मेरे संचय की पीड़ा ही जन्मों-जन्मों की साथी है
दीपक हो चाहे हो प्रकाश,पीड़ा दोनों की बाती है।

अज्ञेय जी के शब्द सहसा मस्तिष्क पर दस्तक देने लगते हैं - दुःख सबको माँजता है। साथ-साथ यह पंक्ति भी याद आ जाती है ‘रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद’। इन्हीं भावों को पोषित करते हैं गीतकार के शब्द-
*जलना भी एक महोत्सव है, सूरज देखूँ या श्मशान
मिटना ही सच्चा अनुभव है जीवन देखूँ या महाध्यान
आँसू हो या मधुर हास पीड़ा सबको महकाती है।

उमेश जी आशावादी भी हैं और दृढ़ निश्चयी भी हैं। उनकी जिजीविषा यह बतलाती है –
*पक्का सोना बन जाने को, कंदीलों सा गलना सीखा
 जीवन का हास चुराने को दीपों पर हँस जलना सीखा
 नव सृजन हो या हो महाविनाश पीड़ा सबको चमकाती है।
*सुख-दुःख का अभ्यस्त पुजारी; शाकुंतल रचने लगता है
* तुम पाटल का रूप सँवारो, मैं राखों का नश्वर गाऊँ या
* तुम अनुरागी भाव बिखेरो; मैं विद्रोही बीन बजाऊँ
 आओ फिर समवेत स्वरों का एक अनोखा गीत बनाऊँ

दुःख से पराजित न होने का भाव कवि की नस-नस में समा गया है। चुनौती भरा जीवन अब उसे रास आने लगा है
और यही चुनौती उसे सँवारती भी है। मशहूर गीत सहज ही जबान पर आ जाता है – ‘राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है दुःख तो अपना साथी है’। उमेश जी के अंदर का गीतकार भी दर्दों के मौसम में गाने को बेताब हो उठता है –
 *दर्दों के सरगम पर सेहरा गा सकता हूँ;पहने हो जो हीरा उसको खा सकता हूँ
 जीवन की परिभाषा दर्दों से सीखी है; जब उभरेगा भाव कहीं भी जा सकता हूँ
 इसीलिए दर्दों के कोने में अस्त हुआ हूँ; पीड़ा सहने का मैं तो अभ्यस्त हुआ हूँ

ऐसे अनेक आह्वान इस गीत संग्रह में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। पन्ने दर पन्ने, पलटते जाइए भावों की भागीरथी में अवगाहन करते जाइए। कहीं ललकार है तो कहीं पुचकार,कहीं तेजस्विता तो कहीं प्रखरता और कहीं – कहीं गंभीर दर्शन सहज ही विचार-गंगा में प्रवाहित होने लगता है। ऐसे में कबीर आँखों के समक्ष खड़े हो जाते हैं –‘वो दुनिया मोरे बाबुल का घर ये दुनिया ससुराल, जाके बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे, लागा चुनरी में दाग’
 *बात पीहर की प्रियतम से कहना प्रिये; छोड़कर आ बसा है क्यों इस गाँव में
 दूरियों के छलावे की क्यों बेड़ियाँ; पड़ गईं हम सभी जीव के पाँव में
 सत्य के गाँव से जो बुलाहट हुई; रो रहे क्यों सभी झूठ के मोह में
 जबकि साकार खुद मिल रहा ब्रह्म से; जग रहा मोह क्यों झूठ की देह से

उनकी पिछली पुस्तक ‘आम आदमी की बात’में भी उमेश जी अपने अधिकार के लिए उठे हाथों की आवाज बन जाते हैं। वो आदत यहाँ भी परिलक्षित होती है। अधिकार के लिए संघर्ष करना उनके स्वभाव का हिस्सा बन चुका है -
 *दीपक की आग चुराने को भुनगे बागी बन जाते हैं
 अंतस की प्यास बढ़ाने को चातक त्यागी बन जाते हैं
 मधु शैय्या हों या सजे काष्ठ पीड़ा ही अंतिम साथी है।

अपनी सामर्थ्य की प्रखरता कितनी नजाकत से कह जाते हैं कि पाठक उसमें खो सा जाता है। प्रखरता और नजाकत दोनों परस्पर विरोधी भाव हैं परंतु शुक्ल जी की लेखनी से एक साथ यूँ प्रवाहित होते हैं जैसे पहाड़ों से प्रपातों का गिरना,जैसे कहीं किसी कंदरा में बना खूबसूरत शिल्प। एक बानगी देखिए –
 *मैं पत्थर पर उकेरा फूल-चिपका हूँ दीवारों से; किसी मौसम में मुरझाकर, कभी गिरता नहीं यारों
 * शिलाओं से बना हूँ फूल, मैं बहुरूपिया लेकिन; सदा अहसास है निर्माण की ऊँची मीनारों का
 * सुनहरे पटल पर मैं शब्दार्थ रच दूँ; हवाओं की मस्ती अजंता की मूरत
 बदलती दिशाएँ तेरा नाम लेकर; कोई गीत लिख दूँ समंदर के पट पर

यही कोमलता उमेश जी के बंजारेपन को कहीं -कहीं प्रेम के आलिंगन में बाँध लेती है। जहाँ प्रेम है वहाँ विकलता का होना अवश्यम्भावी है।
 *कुछ गीतों का आवारापन, कुछ रातों की तनहाई
 याद तुम्हारी आई साथी, याद तुम्हारी आई

 ‘समय की शिला पर मधुर चित्र कितने...’ गीत सी ऊँचाई, भाव प्रवणता शुक्ल जी ने अपने गीतों में कायम रखी है।
 *किसी ने लिखा ताज सा गीत सुंदर, कोई लिख गया कल्पना के महल पर,
 गीतों ने ही हर प्रणय को जिलाया किसी नए पढ़ा गीत पत्थर पे लिखकर।

यत्र-तत्र- सर्वत्र मानव मन को झूठ, धोखा, फरेब से सामना होता है। वह व्याकुल होकर एकला चालो रे की रीत पकड़ कर चलना शुरु कर देता है।
 *फिर राही का बंजारापन फिर मंजिल की परछाईं
 डाल चुके हैं जाल मछेरे सागर की गहराई तक
 घूम रहे हर ओर लुटेरे, घाटी घाट ऊँचाई तक
 क्यों लुटने का दीवानापन बहकी-बहकी अँगड़ाई या
 *कौन, किसी का साथ दिया है मंजिल के दरवाजों तक
 मिलन गीत जितने बजते हैं रह जाते हैं साजों तक

कवि ठहरा बंजारा, भला कितनी देर तक वियोग में आँसू बहाता निकल पड़ा दूसरे ठाम पर। नीड़ का निर्माण फिर-फिर, जो बीत गई वो बात गई, बच्चन जी उमेश जी का हौसला बढ़ाने खड़े हो गए। उमेश जी के भीतर का मन गा उठा-
 *रूठकर चला गया जो ख्वाब था, जो है आज लाजवाब है
 *जो बचे हैं क्षण उन्हीं को जीत लो;दर्द में भटकते मन को खींच लो
 कारवाँ में भीड़ की कमी नहीं;जो गले लगे उसी को भींच लो

रचनाकार बतलाना चाहता है- ‘जो प्रसन्न रहकर काम करे वो सुखी, जो रोते हुए काम करे वो दुखी रहने को अभिशप्त होगा’। ‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है‘’ इस सत्य को आत्मसात करते हुए समय को पहचानो, वर्तमान में खुश रहना सीखो।

गीतकार अपने साहित्यिक पूर्वज जाज्वल्यमान नक्षत्रों को जो आज भी अपनी आभा बिखेरे हुए कविता-गीत के आकाश मंडल पर प्रखरता से चमक रहे हैं को याद करते हुए कविता को अपने ढंग से परिभाषित करता है -
 * बेबस क्यों है बलखाती, कवि के अंतर उद्गारों में; मौन पड़ी है क्यों घायल भावों के गहन कछारों में
 * तुलसी, सूर, कबीर, मैथिली, पंत, निराला, दिनकर में; वही महादेवी बसती है जयशंकर प्रसाद उद्गारों में

क्या अद्भुत मेल रचा है बंजारे ने। पर है तो आखिर बंजारा, न एक ठाम न एक गान। पन्ने पलटते हुए अचानक एक नया मोड़ दिखलाई पड़ने लगता है। धार्मिक उन्माद, खोखली राजनीति, भ्रष्ट नेता के कारनामों से लिप्त और इस पर प्रहार करते उमेश जी के गीत। उस मोड़ के गीतों से आपकी राजनीतिक संवेदना आँखें मलकर जाग उठती हैं।

कुर्सी की लोलुपता, अंधे गलियारों में भटकती राजनीति, इस भटकाव का दुष्परिणाम, धर्म के नाम पर अपनी रोटी सेंकते दोगले नेता और धार्मिक लीडरान सभी का आवरण खींच कर उतार फेंकने का बीड़ा उठाए हुए रचनाकार चल रहा है। कभी उसके मन में आक्रोश उबाल मारता है, तो कभी नैराश्य जाग उठता है। कभी वह जागरण की मशाल प्रज्ज्वलित कर अभियान पर निकल पड़ता है, तो कभी शांत मन से अमन की राह खोजने का प्रयास करता है। अपने युगधर्म को रचनाकार पहचानता है और उसे निबाहने का उद्यम भी करता है। आम आदमी के स्वप्न और संघर्ष से जुड़ी पीर गीतकार अपने शब्दों में अंकित कर देता है।
 *मंत्र-अजान-शब्दों के हाथों, रक्त भरी पिचकारी है; उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम सुलग रही चिंगारी है।
 *जब हिंसा की मदिरा पीकर, पागल हुआ पुजारी है; उत्तर-दक्षिण -पूर्व-पश्चिम सुलग रही चिंगारी है।
 * धर्म जहाँ जीवन की गति पर विकृत रोक लगाता है;पंचतत्त्व का बना खिलौना हत्यारा बन जाता है।

जब बाड़ ही खेत चरने लगे, रक्षक ही भक्षक बन जाए तो परिणाम घातक ही होगा। रचनाकार आगाह कर रहा है कि मंदिर से मस्जिद उलझती रही तो नेता ही सबका धरम बेच देंगे और मुल्ला-पुजारी सियासत में आएँ तो समझो कि गंगो-जमन बेच देंगे। रचनाकार सीमा पार आतंकवाद से परेशान तो है पर राह भी दिखा रहा है –
 *वादियों में आज फिर स्यापा पड़ा धूप अपने घर में है, सिकुड़ी पड़ी,
 श्वेत चादर तर-ब-तर है खून से; मौत दरवाजे पर बन दस्तक खड़ी

इसका निदान केवल बातों से नहीं मिलेगा। गीता के शब्दों में राह खोजने को कहता है – ‘योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय। सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते’
 *रच रहे हैं शब्द,जो कुछ अनमने बँध रहे पाँव तेरे उन-चने,
 धर्म-धर विस्तार हृद उदार दानव दान दें, ना मान, जन अभिमान जानो
 काट दे हर बंध रोशन हो परागण जगमगाए दीप स्यापा राह खोजे

 आज की सामाजिक स्थितियों से गीतकार आहत भी है। युगबोध भी उसके लेखन मे सतत चल रहा है –
 *जाति की दीवार में इंसान कैदी, धर्म की दीवार में भगवान कैदी,
 कुर्सियों पर बिक रहा है देश सारा सिक्कों की झंकार पर ईमान कैदी।
 हर तरफ झूठों की जय-जयकार है, मैं कहाँ पर ढूँढूँ कहाँ पर द्वार है।

समाज के नैतिक पतन पर वह व्यथित है। मासूम दामिनियों के दमन पर भी उसकी लेखनी कराहती है और सिसकती है –
 *पूजा के फूलों को मसलों न सेजों पर, मान जाओ मेरी तुम, पाप लग जाएगा।
 अधखिली कलियों को गूँथों न गजरों में, अज्ञात यौवन का श्राप लग जाएगा।

शुक्ल जी का अंतस आज भी अपनी माटी की सोंधी खुशबुओं से गहरे जुड़ा हुआ है और इसीलिए नेता का गुणगान करते समय लोकभाषा में ही गा उठे और हास्य की चाशनी में लिपटा व्यंग्य हमारे सामने परोस दिया -
 *जे रोटी खाला पइसा क,कपड़ा पहिरला पइसा क,
 हर बतिया जेकर पइसा क, बेइमानी क कसले फेंटा है उ नेता हौ

लोकगीत का लहजा और लोकभाषा की ठसक बात के चुटीलेपन तथा मार्मिकता को बढ़ा देती है। इसी प्रवाह में सीमा पर शहीद हुए जवान की बहन, माँ और पत्नी के दर्द को कलमबद्ध किया है।

इस तरह हम देखते हैं कि उमेश जी का यह गीत संग्रह मानवीय संवेदनाओं से भरा हुआ है। प्रेम, करुणा, स्मृतियाँ, विषाद, आक्रोश आदि चेतनाएँ पाठक को जागृत रखती हैं। ऐसा होना अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी। कवि समाज से कट नहीं सकता। साहित्य समाज का दर्पण होता है। उमेश जी स्वयं कहते हैं ये गीत मेरे जीवन संघर्ष के साक्षी और मन के कोमल उद्गार हैं।
 *ब्रह्म हँसे ध्वनियों में निश्छल ध्वनि हँसती शब्दों में,
 शब्दों का भंडार यहाँ है नाच उठा बंजारा

बंजारे का नाच यूँ ही चलता रहे। उसकी संवेदनाओं को नदियों की चंचल लहरों और सागर की उन्मत्त लहरों सा विस्तार और उत्थान मिलता रहे और पाठक वर्ग को भ्रमर संगीत की आनंद लहरी झुलाती रहे।

2 comments :

  1. समीक्षा पढ़ी.। और तुरंत महसूस किया कि पूरी कवितांजली ही पढ़नी चाहिए।बहत सुंदर,सटीक एवं अर्थवाही विवेचन! समीक्षा के इस लेख ने साहित्य के क्षेत्र में नया पन्ना जोड़ दिया है।शुभेच्छाओंसहित अभिनंदन!👍 Vrunda Kulkarni, Member of Board Of studies ,Maharashatra

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  2. लेखक या कवि लिखता या रचता है और वह उसे छोड़ देता है, क्योंकि उसका कार्य वहां समाप्त होता है । समीक्षक उस कृति को जब अपनी पारखी नजरों से देखता है तब वह आमजन को यह बता पाने में कामयाब होता है कि रचना क्या है, किस तरह की है कितनी पठनीय या अपठनीय है । इससे समीक्षक की अपनी सोच का भी पता चलता है। आपने बंजारे की समीक्षा करते हुए अपने मन के भावों के साथ-साथ विचारों और रचनाकारों के भावों को भी को करने की कोशिश की है और यह इतनी सरल सुगम और सहज है कि मन ललचा उठा कि इस कविता को पढ़े नहीं बल्कि कवि के मुंह से सुने या फिर इन कविताओं को लय बद्ध किया जाए और उसे सुना जाए।

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