बंगला साहित्य में जीवनी या आत्मकथ्य का उद्भव एवं विकास

कुमुद बाला

कुमुद बाला

साहित्यिक वर्ग इस बात पर दो राय नहीं रखता कि बंगला  भाषा एक आर्य भाषा है एवं इसकी व्युत्पत्ति मागधी अपभ्रंश से स्वीकार की गयी है। पुरातन बंगाल में वस्तुतः दो प्रकार की भाषाएँ प्रचलित थीं - -एक तो स्थानीय भाषा, जिसे हम प्राचीन बंगला कह सकते हैं, दूसरी अखिल भारतीय जन साहित्यिक भाषा, जो सामान्यतः समूचे उत्तर भारत में समझी जा सकती थी। बौद्ध तथा हिन्दू धर्म के उपदेशक जनता में प्रचार करने के लिए जो रचनाएँ तैयार करते थे, वे प्रायः पुरातन बंगला तथा नागर अपभ्रंश दोनों में होते थे।पुरातन बंगला की उपलब्ध रचनाओं में सैंतालीस चर्यापद विशेष महत्त्व के हैं। बारहवीं शताब्दी के अंत तक पुरातन बंगला में यथेष्ट साहित्य तैयार हो चुका था।  इसका साहित्य दसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में उपलब्ध हुआ था, किन्तु वर्तमान में हम इसे सोलहवीं शताब्दी से ही  प्राप्त  मानते हैं। यह सर्वसम्मति से प्रमाणित हो चुका है कि बंगाली भाषा का प्राचीनतम ग्रन्थ 'रामचरित ' है जिसकी रचना ' अभिनन्दन ' कवि ने की है। इसी काल में बड़े प्रबंध काव्यों एवं वर्णनात्मक रचनाओं का निर्माण हुआ, उदाहरणार्थ आदर्श नारी बिहुला और उसके पति लखीधर की कथा, कालकेतु और फुल्लरा का कथानक इत्यादि।

जब प्रसिद्ध वैष्णव कवि महाप्रभु चैतन्य [1486ईस्वी -1533 ईसवी] का प्रादुर्भाव हुआ, तब उनके अलौकिक जीवन तथा धार्मिक उपलब्धियों ने उनके भक्तों के समान साधारण जनता में भी उनके प्रति अपार श्रद्धा एवं असीम भक्ति की भावनाओं को उद्वेलित कर मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके आविर्भाव एवं मृत्यु के उपरांत संतों तथा भक्तों के जीवन चरित्रों के निर्माण की परंपरा चल पड़ी। इनमें से कुछ हैं - वृन्दावनदास कृत चैतन्य भागवत [लगभग 1573 ईसवी], लोचनदास कृत चैतन्य मंगल, जयानंद कृत चैतन्य मंगल तथा कृष्णदास कविरत्न का चैतन्य चरितामृत [लगभग 1581 ईसवी]। वस्तुतः जीवनी या आत्मकथ्य बंगला साहित्य में भी गद्य की ही एक विधा है। यह परंपरा प्रारम्भ से ही राजा-महाराजाओं के काल से चली आ रही है जब सेनापति मंडल के साथ कवि, लेखक, विद्वान्, गायक एवं नर्तक भी दरबार का हिस्सा होते थे। ये कवि अपनी रचनाओं में राजा का गुणगान, तरह-तरह के प्रसंगों को लेकर लिखते थे तथा उन्हीं रचनाओं का भरे दरबार में पाठ करते थे। धीरे-धीरे गद्य शैली का प्रादुर्भाव हुआ और इसी के साथ जीवनी या आत्मकथ्य की शुरुआत हुई। वैष्णव गीतकारों तथा जीवनी लेखकों की परंपरा सत्रहवीं शती में चलती रही। उत्तरकालीन माध्यमिक बंगला साहित्य के अन्तर्गत इन जीवनी लेखकों में ईशान नगर [1564 ईसवी]और नित्यानंद [1600 ईसवी] के बाद यदुनंदनदास [करनानंद के लेखक, 1607 ईसवी], राजवल्लभ [कृति मुरलीविलास], मनोहरदास [1652ईस्वी कृति अनुरागवल्ली], एवं घनश्याम चक्रवर्ती [कृति भक्तिरत्नाकर तथा नरोत्तमविलास] के नाम प्रमुख हैं। जीवनी साहित्य में सर्वप्रथम 'गोविन्ददास कमर' का नाम सामने आता है जिन्होंने 'कछडा' लिखा है। कछडा से तात्पर्य है  समय-समय पर लिखे गये विवरणों से है, जिसमें महाप्रभु के जीवन का एक प्रत्यक्षदर्शी द्वारा किया गया वर्णन है। इनके अतिरिक्त नरहरि सरकार, वंशीनन्दन चट्ट, वासुदेव घोष तथा इनके दो अनुज, गोविन्द और श्यामघन तथा परमानन्द गुप्त भी महाप्रभु की तथा परमानन्द गुप्त भी महाप्रभु की जीवनी के आदि लेखकों में से हैं। अन्य उल्लेखनीय रचनाकार हैं - मुरारी गुप्त, वासुदेव दत्त, मुकुंददत्त, गोविंदाचार्य, रामानंद बासु, माधवाचार्य इत्यादि। इसके  अलावा तीन और शिष्यों,  वृन्दावनदास, बलरामदास, और ज्ञानदास ने भी जीवनी लिखी है ।इसी क्रम में जब मुस्लिम कवियों का अस्तित्व सामने आया, तब कई कवियों ने जीवनी लिखने की तरफ ध्यान दिया। मुस्लिम विद्वान् मोहम्मद शाहीदुल्लाह का नाम सामने आता है जिन्होंने पैगम्बर साहब की जीवनी लिखी।

 ब्रिटिश साम्राज्य जब अपने पाँव पसारने लगा, तब जाकर शैली में भी परिवर्तन आने लगा। पाश्चात्य सभ्यता का असर हमारी भारतीय संस्कृति पर बहुत जोरों से हुआ। लोग अनजाने ही अंग्रेज़ियत की तरफ खिंचते जा रहे थे। अंगेज़ी साहित्य भी काफी मात्रा में लोग पढ़ना पसंद करते थे और यह सम्भ्रान्तता की भी निशानी था। अंग्रेज़ी में गद्य के बाद जीवनी, वृतांत, यात्रा, पत्र इत्यादि लिखे जा रहे थे, अतः बंगाली लेखकों ने भी उसी तर्ज़ पर लिखना शुरू कर दिया। जब राजा राम मोहन रॉय का अवतरण हुआ, तब जैसे देश में क्रांति आ गयी।उन्होंने वेद और बंगला व्याकरण का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी किया। इसके बाद ईश्वरचंद्र विद्यासागर सामने आये और इन्होंने अंग्रेज़ी से कई ग्रंथों का बंगला में अनुवाद किया। जिस तरह से  महापुरुषों का आगमन बंगाल में धीरे-धीरे होने लगा था, साहित्य  विधा में भी परिवर्तन आता जा रहा था। आत्मकथ्य या जीवनी की शैली आरम्भ से ही गद्यात्मक रही और यही विधा प्रचलित भी हुई। एक जमाना था जब आत्मकथा को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था। आत्मकथाओं के केंद्र में आने का मुख्य कारण है, राजाओं एवं गुरुओं के शिष्यों की प्रेम उद्गारित भक्ति जो महाप्रभु के आगमन के साथ ही प्रारम्भ हुई। शिष्यों द्वारा वर्णित जीवनी एक आख्यानात्मक शैली के रूप में विकसित हुई और यह एक परंपरा या पद्धति बन गयी। फिर भी इस शैली में कम ही रचनाएँ सामने आतीं हैं। जब तक चैतन्य महाप्रभु की भक्ति प्रथम स्थान पर रही, ढाई सौ वर्षों तक बंगला साहित्य पर वैष्णव संप्रदाय की स्पष्ट छाप रही। वैसे बंगला गद्य के कुछ नमूने 1550 ईस्वी के बाद पत्रों एवं दस्तावेज़ों के रूप में भी  उपलब्ध हैं। कैथोलिक धर्म संबंधी कई रचनाएँ पुर्तगाली तथा अन्य पादरियों द्वारा प्रस्तुत की गयीं और 1778 ईस्वी में नथेनियल ब्रासी हलहद ने बंगला व्याकरण तैयार कर प्रकाशित किया। 1799 ईस्वी में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के बाद बाइबल के अनुवाद तथा बंगला गद्य में अन्य ग्रन्थ तैयार कराने का भी  उपक्रम किया गया। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ी भाषा के प्रसार और संस्कृत के नवीन अध्ययन से बंगला के लेखकों में जब नए जागरण और उत्साह की लहर सी दौड़ गयी तब एक ओर जहाँ कंपनी सरकार के अधिकारी बंगला सीखने के इच्छुक अंग्रेज़ कर्मचारियों के लिए बंगला की पाठ्यपुस्तकें तैयार करा रहे थे और बैप्टिस्ट मिशन के पादरी कृत्तिवासीय रामायण का प्रकाशन तथा बाइबल आदि का बंगला अनुवाद प्रस्तुत कराने का प्रयत्न कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर बंगाली लेखक भी गद्य ग्रन्थ लेखन की तरफ ध्यान देने लगे थे।

लेखक 'रामराम बासु'  ने 'राजा प्रतापादित्य'  की जीवनी लिखी और 'मृत्युंजय विद्यालंकार' ने बंगला में 'पुरुष परीक्षा' लिखी जिसका 1818 ईस्वी में प्रकाशन 'समाचारदर्पण' साप्ताहिक में हुआ और इस तरह बंगला में पत्रकारिता की नींव पड़ी। प्रारंभिक गद्य लेखकों की भाषा, प्रचलित संस्कृत शब्दों के प्रयोग के कारण, कुछ कठिन थी, किन्तु 1850 ईस्वी के लगभग अधिक सरल और प्रभावपूर्ण शैली का प्रचलन आरम्भ हो गया। इसमें ईश्वरचंद्र विद्यासागर, प्यारीचंद मित्र आदि लेखकों का विशेष हाथ था। विद्यासागर ने अंग्रेज़ी तथा संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद बंगला में किया और गद्य की सुन्दर, सरल शैली का विकास किया। नवीनचंद्र सेन [1847-1909 ईस्वी] ने पाँच खण्डों में अपनी जीवनी 'आमार जीवन' लिखी जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया।प्रसिद्ध संस्कृत एवं इतिहास के विद्वान् हरप्रसाद शास्त्री [1853-1931 ईसवी] ने 'बाल्मीकिर जय' की रचना की जिसे बहुत ही सुन्दर और प्रभावोत्पादक बंगला में लिखा गया है। पश्चिमी भाषा एवं बंगला आत्मकथा लेखन में एक अंतर यह है कि पश्चिम में आत्मकथा लेखक को इतिहास काम परेशान करता है अर्थात लेखक आसानी से स्वयं को इतिहास से मुक्त होकर लिखता है। किन्तु यहाँ इतिहास को साथ लेकर चलना पड़ता है। किसी-किसी लेखक ने आत्मकथा में जातिप्रथा को भी ऐतिहासिकता के साथ शामिल कर लिया है।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर के बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय था और वे बंगाल के पुनर्जागरण के स्तंभों में से एक थे। वे उच्च कोटि के विद्वान थे एवं नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह के समर्थक थे। उन्हीं के प्रयासों से 1856 ईस्वी में विधवा पुनर्विवाह कानून पारित हुआ था। उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया था। उन्हें सुधारक के रूप में राममोहन रॉय का उत्तराधिकारी माना जाता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर की जीवनी मधुसूदन दत्त ने लिखी और उन्होंने लिखा कि ईश्वरचंद्र, राजा राममोहन रॉय के विचारों के सच्चे उत्तराधिकारी हैं तथा उनकी जीवनी हम सभी को मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए ही लिखी गयी है। राजा राममोहन रॉय ने ब्रह्मसमाज की स्थापना की और वे समाज सुधारक के रूप में ही समाज में जाने जाते हैं। उन्होंने समाज को मार्गदर्शन देकर एक नयी ऊँचाई तक पहुँचाया है। नारी शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह  सती प्रथा जैसे कुछ मुद्दों पर उन्होंने समाज को नयी राह दिखाई है और रविन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद आदि के साथ, लेखकों एवं कवियों ने भी उनका साथ दिया। वैसे तो बहुत से लेखकों एवं कवियों ने राजा राममोहन रॉय पर अनेक आलेख एवं जीवनी लिखे हैं मगर सबसे पहले लॉर्ड विलियम बेन्टिंक ने उनके विचारों से प्रभावित होकर उनकी जीवनी लिखी। दक्षिणेश्वर मंदिर के पूज्य पुजारी एवं स्वामी विवेकानंद जी के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से कौन परिचित नहीं है? बंगाल में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के वैसे तो वे गुरु हैं और उनकी ईश भक्ति, विद्वता के सभी कायल हैं। समाज के सभी प्रतिष्ठित वर्ग उनकी इज्ज़त करते थे एवं करते रहेंगे। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं हैं। उनकी विद्वता से प्रभावित होकर बहुत से साहित्यकारों ने उनकी जीवनी लिखी किन्तु चंद्र मजुमदार ने अंग्रेज़ी में 'द हिन्दू सेंट' [1871-1885 ईसवी] के रूप में उनकी जीवनी लिखी। उनकी इस पुस्तक के कारण विदेशों में भी श्री रामकृष्ण परमहंस प्रसिद्ध हो गए। इनके परम शिष्य स्वामी विवेकानंद ने अपने शून्य पर दिए गए भाषण की वजह से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गए थे एवं समूचे विश्व में उनके शिष्य बन गए थे। उन शिष्यों में से भी कुछ ने उनकी जीवनी लिखी जिनमें प्रमुख नाम हैं -असीम चौधुरी, राजगोपाल चट्टोपाध्याय, विमलकुमार घोष इत्यादि। इसी प्रकार प्रख्यात साहित्यकार ताराशंकर बंद्योपाध्याय की जीवनी भी कई प्रसिद्ध लेखकों ने लिखी है उन्हीं में से सुकुमार सेन, सेनगुप्ता, सुबोधचन्द्र घोष, महाश्वेता देवी इत्यादि प्रमुख हैं। इनके बाद के साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय पर भी जीवनी भाबातोष चैटर्जी, उज्जवलकुमार मोजुमदार, वाल्टर रुबेन आदि ने लिखी और उन्हें ' युग प्रणेता ' बताया। महाकवि निराला पर जीवनी रामविलास शर्मा ने लिखा है। निराला की जीवनी में ब्रेकडाउन पद्धति का प्रयोग किया गया है  क्योंकि उनके जीवन के दर्द को प्रथम स्थान दिया गया है। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी जीवनी नहीं लिखी है मगर उन्होंने अपने संस्मरण, पत्र , यात्रा, गद्य इत्यादि लिखे हैं। उनकी कहानियाँ , उपन्यास, गीत कविताएँ इत्यादि को एकत्रित करके दो भागों में पुस्तक का रूप देकर प्रकाशित किया गया है जिसका श्रेय जाता है उमादास गुप्ता को। उन्होंने इसे पुस्तक का रूप देकर इसका शीर्षक दिया - मेरे ही शब्दों में मेरी ज़िंदगी, और यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर के मित्र आनंद चट्टोपाध्याय ने भी इन्हें युग द्रष्टा बताते हुए इनके कार्यों की बहुत प्रशंसा की है एवं उन्होंने कई आलेखों के साथ जीवनी भी लिखी है  प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चैटर्जी की जीवनी प्रख्यात लेखक विष्णु प्रभाकर ने लिखी है एवं उन्होंने  उन्हें युग का मसीहा बताया है। बंगला साहित्य में प्रमुख साहित्यकारों, लेखकों एवं कवियों की जीवनियाँ आधुनिक युग  में बहुत  लिखी  गयी हैं।

वस्तुतः जीवनी लिखने की शैली चार तत्वों पर आधारित है - स्वायत्तता, आत्मानुभूति, प्रमाणिकता एवं व्यक्तित्वान्तरण। जीवनीकार जब किसी व्यक्ति का उद्घाटन किसी घटना अथवा अन्य के बहाने करता है तो जीवनीकार स्वयं को घटना से दूर कर लेता है, साथ ही लेखक की वस्तुगत भूमिका को भी सामने लाता है। इस क्रम में लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में चंद लोगों की भूमिका और उसके चारों ओर के वैविध्यमय संसार को पेश करते हुए विभिन्न साहित्य संबंधी अवधारणाओं, सामाजिक व्यवस्था और आंदोलनों की सटीक व्याख्या पेश करता है, इससे अनेक धारणाएँ बनतीं हैं। जब व्यक्तित्व विवेचन के बहाने अवधारणाओं का निर्माण किया जाता है तो जाने अनजाने परिस्थितियों और  अवधारणाओं की सीमायें भी व्यक्त की जातीं हैं। इस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के बाद बंगाल में जीवनी लिखने का कार्य बढ़ने लगा और प्रायः अब हर लेखक  एवं कवि की जीवनी लिखी जा रही है और यह सरलता से उपलब्ध है। अब हर साहित्यकार अपनी जीवनी लिखने की कोशिश स्वयं करता है क्योंकि अभी यह नये ज़माने के साथ चलन में है।

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