लघुकथाएँ: मधु जैन

नजराना नजरों का

"खिड़की बंद कर दूँ रमा, ठंडी हवा आ रही है।"
"नहीं, अच्छी लग रही है। सरपट भागते पेड़ पौधे, बादलों की ओट में छुपते-छुपाते दौड़ता सूरज कितना अच्छा लग रहा है।"
पति ने पत्नी के पीछे तकिया लगाकर शाल पहनाते हुए कहा, "ठंड लग जाएगी।"
सामने की बर्थ पर नवयुवती रूबी की नजरों में पत्नी का इतना ख्याल रखने वाले सुरेश के प्रति आदर का भाव आया।
एक स्टेशन पर गाड़ी रुकने पर रमा ने गरमा गरम मंगौड़े देख खाने की इच्छा जाहिर की।
"ठीक है! लाता हूँ ..." वापसी में वह सैंडविच और जूस देते हुए बोला, "मंगौड़े का तेल ठीक नहीं है।"
पर उसे स्वयं मंगौड़े खाते देख रुबी ने कहा, "आंटी जी बाहर देखिए।"
बाहर देख कर रमा मुस्कुरा उठी।
दूसरे स्टेशन पर आलूबंडे की फरमाइश पर सेब और केला लाकर देते हुए बोला आलूबंडे के आलू बासी लग रहे हैं।
दोनों बार सुरेश को वही चीज खाते देख वह मुस्कुराती रही।
अब रूबी की नजरें सुरेश के प्रति नफरत में बदल गयी।
सुरेश के ऊपर के बर्थ पर सोते ही रूबी बोली, "आंटी जी आपको मना करने के बाद वही चीज अंकलजी ने छक कर खाई और आप मुस्कुराती रहीं, आपकी जगह मैं होती तो बहुत झगड़ती।"
"यही तो प्यार है।"
"ये कैसा प्यार है?"
"बीमारी की वजह से मेरा लिवर कमजोर हो गया है। इसलिए तली हुई चीजें नहीं खा सकती।"
"फिर आप फरमाइश क्यों करती हैं।"
"ये इनकी पसंदीदा चीजें है। उनका ध्यान उस ओर दिलाने के लिए।"
"अजीब हैं आप भी।"
"दरअसल घरवाले समझते हैं कि मुझे अपनी बीमारी के बारे में नहीं पता। घर मैं ये अपना पेट खराब बताकर सादा खाना बनवाते हैं, जबकि ये खाने के बड़े शौकीन हैं। बच्चों ने हमारी पच्चीसवीं एनीवर्सरी पर यह सेकंड हनीमून का गिफ्ट दिया है, ताकि कुछ चेंज हो।"
"आप क्यों नहीं कहतीं कि आप सब जानती हैं?"
"क्योंकि मैं उनके भुलावे को बरकरार रखना चाहती हूँ।"
अब रूबी की नजरों में सुरेश के प्रति श्रद्धा का भाव है।

अंतिम पंक्ति

सुमनलता उम्र के उस दौर पर पहुँच गयी जहाँ लोगों को अकेला और खालीपन काट खाने को दौड़ता है। उसे पढ़ने का शौक तो था ही, फेसबुक मित्रों और लेखन से अपने खालीपन को भर लिया। उसने आज एक कहानी लिखी, जिसके अंत को लेकर असमंजस में है।
"किसकी सलाह लें..." सोच ही रही थी कि सुक्कू बाई पर नजर पड़ी, "क्यों न आज इससे ही पूछा जाए? नहीं! नहीं! यह तो यही कहेगी कि शराबी पति ने मारपीट कर भगा दिया।"
"आभा से ही बात करती हूँ।" सोचकर उसने फोन उठाया, लेकिन फिर ...
"नहीं ! सुक्कू बाई से ही पूछती हूँ, आखिर कहानी भी तो उन्हीं लोगों पर है।"
"सुक्कू बाई दो कप चाय बनाना।"
"जी दीदी, इस कमरे में पोंछा लगा लूँ, फिर बनाती हूँ।"
"और हाँ, पहले साबुन से हाथ धोना।"
"दीदी चाय।"
"तू भी अपनी यहीं ले आ।"
 "कोई कहानी सुनाना है क्या?"
"नहीं रे, आज तुझसे कहानी पर सलाह लेनी है।"
"मुझसे?" सुक्कू बाई आश्चर्य से बोली।
"तुम्हीं लोगों पर तो कहानी लिखी है।"
कहानी सुनाने के बाद सुमनलता ने कहा, "इसमें दो अंत हैं, बता कौन सा सही लग रहा है। पहले में पति उसे चरित्रहीन कहकर घर से निकाल देता है। दूसरे में वह बच्चों को लेकर स्वयं घर से निकल जाती है।"
"दीदी, दोनों ही सही नहीं है।"
"अच्छा, फिर सही क्या है?"
"पहली बात तो यह कि हम लोग इतने गिरे हुए नहीं है। घरों में हम पुरुषों की कैसी-कैसी नज़रों का सामना करते हैं। कुछ तो बेवजह ही छूने की कोशिश करते हैं। दूसरी बात यह कि हम अनपढ़ ज़रूर हैं पर इतना तो कमा ही लेते हैं कि अपना परिवार चला सकें।"
"अगर तुम होतीं तो क्या करतीं?"
"मैं होती तो, उस हरामी, शराबी-कबाबी को ही घर से निकाल देती।"

विकास बनाम विनाश 

घना जंगल होने के कारण बहुत कम लोग ही वहाँ से गुजरते थे। लोगों का आना-जाना बढ़ा, एक छोटी सी पगडंडी बन गई। यहीं से मेरा जन्म हुआ।

दिन में मनुष्य और रात में जानवर मेरा उपयोग करते। लोगों के साथ बैलगाड़ी, ऊँटगाड़ी चलने से पगडंडी चौड़ी, और चौड़ी होती गई। फिर नये वाहनों के आने से, आवागमन बढ़ने से पगडंडी पर डामर की पर्त चढ़ाई गई। अब मैं एक पक्की सड़क थी।

जैसे जैसे मेरा विस्तार होता गया और जंगल छोटा होता गया। अब मैं फोर लाइन सड़क हूँ, और मुझे  राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिया गया है। मैं चारों ओर लगी लाइटों से जगमगा रही हूँ। लोग मेरी सुन्दरता की तारीफ कर रहे हैं, पर इसके असली हकदार वो अनगिनत शहीद होने वाले पेड़ भी हैं।

चारों ओर का घना हरा भरा जंगल अब कंक्रीट के जंगल में बदल चुका है। कभी चिड़ियों की चहचहाहट, जानवरों की उछल-कूद सकून देती थी। अब वाहनों की धमाचौकड़ी, हार्न की कर्कश ध्वनि मेरे हृदय को बैचेन करती है।  सुगंधित प्राणवायु आज डीजल और पेट्रोल की गंध से भरी हुई बीमारियों को जन्म दे रही।

बसंत के मौसम में टेसू मुझे लाल रंग से रंगता था। ठीक वैसे ही अभी भी मैं लाल रंग से रंग जाता हूँ, पर यह बात और है कि वह रंग मानव के लहू का होता है।

जन्म से पगडंडी, कर्म से राष्ट्रीय मार्ग, सिर पर ताज पहने मैं साक्षी हूँ, मनुष्य की विकास यात्रा की।

3 comments :

  1. प्रथम लघुकथा संबंधों की आत्मीयता लिए है, तो शेष दो में व्यंग्य अपने अपने ढंग से उभरा है।

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  2. तीनों ही बेहतर हैं। 1.पहली में घटना की तारतम्‍यता पर ध्‍यान देना चाहिए। 2.रचनाकार को अपनी भाषा तथा व्‍याकरण पर भी ध्‍यान देना चाहिए।

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  3. सुझाव हेतु धन्यवाद आदरणीय

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