लघुकथा: हिप्पोक्रिट

प्राण शर्मा

 - प्राण शर्मा

सावन का मास था। शीतल बयार बह रही थी। सुमन कुमार शहर में घूमने के लिए निकला । रसिक है इसलिए पारदर्शी कपड़ों में अँगरेज़ युवतियों को देखकर अपना दिल बहलाने लगा । बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा तो उसे एक जान-पहचान की एक अँगरेज़ महिला मिल गयी जिसे पारदर्शी लिबास में देख कर वह खिल उठा । उससे मिलते ही वह बोला, "वाओ लिज़, इस लिबास में तू  ख़ूब जँच रही है। तेरा ख़ूबसूरत बदन अब भी वैसा का वैसा है, बिलकुल परी जैसा।"

अपनी तारीफ सुनकर लिज़ ऐसे खुश हुई जैसे कि उसे अपार धन मिल गया था ।

जब तक वह बातें करते रही तब तक सुमन कुमार की कामुक नज़रें उसके लिबास पर ही टिकी रहीं।

घर लौटने पर भी सुमन कुमार अपने आपको ताज़ा खिला गुलाब की तरह सुगंध भरा महसूस कर रहा था। प्रवेश द्वार पर वह वह जूते उतार ही रहा था कि उसकी  पत्नी दौड़ी-दौड़ी आयी और उत्साह से पूछने लगी, "उर्वशी की बर्थडे पार्टी में जा रही हूँ। ज़रा देखिये, ये ड्रैस मुझ पर कैसी लग रही है?"

सुमन कुमार ने सिर उठाया। देखते ही वह तिलमिला कर रह गया। पत्नी ने मिनी स्कर्ट पहन रखी थी। शर्ट भी पारदर्शी सा था। उसने दायें हाथ से पत्नी के बायें गाल पर थप्पड़ दे मारा। आँखें तरेर कर वह चिल्लाया, "ऐसा गन्दा लिबास? कहाँ से उठा लाई है? जाकर शलवार-कमीज़ पहन।"

3 comments :

  1. मानसिकता ।
    हाथी के दांत, खाने के और दिखाने के और।

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  2. आदरणीय प्राण जी की ग़ज़लों की तरह लघुकथाएं भी अपनी अलग पहचान रखती हैं

    अपने स्नेहिल अपनत्व और आशीर्वाद के साथ
    अंतर्जाल पर वे हमें सदैव मिलते रहेंगे...
    उनकी स्मृतियों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम नमन वंदन !
    🙏🙏🙏❤🙏🙏🙏

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  3. फार्मूला कथा का एक उदाहरण।

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