हिन्दी साहित्य का स्वर्ण-युग: भक्तिकाल

डॉ. योगेश राव

योगेश राव

       डॉ. श्यामसुन्दर दास ने हिन्दी साहित्य के इतिहासान्तर्गत भक्ति-काल को साहित्यक दृष्टि से हिन्दी-साहित्य-रचना का सर्वश्रेष्ठ युग बताया है। इस दृष्टि से इस युग के साहित्य और उसके निर्माता-कवियों का मूल्यांकन करने के पहले हमें साहित्य के उच्च कहे जाने वाले प्रतिमानों की ओर दृष्टिपात कर लेने चाहिये। साहित्य की अपनी कुछ निश्चित मर्यादाएँ हैं। उसका समाज के प्रति कुछ दायित्व होता है। अपनी इन्हीं मर्यादाओं और दायित्वों का भली-भांति पालन करते हुये ही, किसी युग का साहित्य श्रेष्ठ कहा जा सकता है। यही ध्वनि स्वयं ‘साहित्य’ शब्द से निकलती है। उसकी व्युत्पत्ति है, ‘स हितस्य भाव: इति साहित्यम्’। साहित्य उसे कहते हैं जिसमें (समाज के) मंगल की भावना निहित हो। संस्कृत-साहित्य-शास्त्रियों ने साहित्य और काव्य दोनों शब्दों को पर्यायवाची माना है। उनके द्वारा दी गई काव्य की विविध रचनायें साहित्य के श्रेष्ठ मूल्यों का निर्धारण करने वाली हैं। इस दृष्टि से मम्मट की परिभाषा विशेषरूप से उल्लेखनीय है–
“काव्यं यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये
        सद्यः परिनिर्वृत्तये कान्ता-साम्मितयोपदेश युजे।I” 1  
                                                                              (काव्य-प्रकाश)
      “काव्य (रचना) यश (प्राप्ति) के लिए, धन-अर्जन के लिए, व्यवहार-ज्ञान के लिए, अमंगल के विनाश या निवारण के लिए तुरन्त ही परमानन्द (की प्राप्ति) के लिए तथा प्रियतमा के समान उपदेश देने के लिए होता है।”
      यह तो हुई साहित्य या काव्य के भावपक्षगत दायित्व की बात। पंडितराज जगन्नाथ काव्य के कलापक्ष पर बल देते हुये इसकी परिभाषा देते हैं-
                                                “रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्।” 2
                                                                             (रसगंगाधर)
      “रमणीय (सुन्दर) अर्थ का प्रतिपादन करने वाली रचना काव्य है।” ऊपर साहित्य के मूल्यों का निर्धारण करने वाली कुछ धारणाओं का विवेचन किया गया है। ये धारणाएँ व्यक्ति, समाज और स्वयं साहित्य की आवश्यकताओ को ध्यान में रखकर व्यक्त की गयी हैं। किसी युग का साहित्य यदि इन सभी मूल्यों को धारण करता है तब तो वह सच्चा साहित्य है वरना उसे साहित्य की संज्ञा नहीं दी जायेगी। इन सभी दृष्टियों से यदि भक्ति साहित्य का मूल्यांकन किया जाये तो चाहे व्यक्तिगत हित हो या सामाजिक हित हो या फिर स्वयं साहित्यक हित हो, सभी हितों की साधना की दृष्टि से इस युग का साहित्य उच्च कोटि का है। भक्तों की काव्यमयी वाणी एक साथ ही व्यक्तिगत संतोष, सामाजिक हित और साहित्यक या कलात्मक उच्चता को धारण करती है। इस दृष्टि से यदि पिछले युग तथा इसके परवर्ती युग क्रमश: आदि-काल और उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल ) की कविताओं को देखें तो भक्ति साहित्य का और भी महत्व बढ़ जाता है। इन दोनों युगों की कविताओं में न तो व्यक्तिगत शान्ति निहित है, न ही समाज के हित का चिन्तन है और न कला को ही कोई उत्कर्ष प्राप्त हुआ है। भक्ति-युग का काव्य इन सभी दृष्टियों से उच्चकोटि का काव्य कहा जा सकता है। इस युग के कवि श्रेष्ठ साधक, उच्चकोटि के समाज-हितचिन्तक तथा अद्भुत विद्वत्ता से सम्पन्न हैं। डॉ. श्यामसुन्दरदास का यह कहना है कि- “तुलसीदास, सूरदास, नन्ददास, मीरा, रसखान, हित हरिवंश, कबीर, इनमें से किसी पर भी संसार का कोई साहित्य गर्व कर सकता है।” अक्षरश: सत्य है। इन सभी कवियों ने जिस राजनैतिक उथल-पुथल के बीच अपने काव्य-रत्नों का प्रणयन तथा अपनी साधनाओं का निर्वाह किया वह कम आश्चर्यचकित करने वाला नहीं है। वास्तव में ये सभी कवि व्यक्तिगत हितों की चिंता छोड़ कर सामाजिक हित और साहित्यक उच्चता के प्रतिपादन में इतना निमग्न हो गये कि इन्हें युगीन राजनीतिक प्रभावित न कर सकी। इनकी ‘वसुधैवकटुम्बकम्’ की बलवती भावना ने क्रूर शासकों के कुचक्र को भी समीप नहीं आने दिया। ये सभी कवि-समाज का हित-चिन्तन करते हुये भी उससे निर्लिप्त नहीं थे। उच्चकोटि की कला-साधना करते हुये भी स्वयं पर गर्व नहीं करते थे। यही कुछ बातें थीं जिनके आधार पर इनकी अमर वाणी इस संक्रान्ति युग में  तेज सम्पन्न बनी रही और फिर आगे चलकर इनके साधना काल का मूल्यांकन एक स्वर्ण युग के रूप में किया गया। डॉ. श्यामसुन्दरदास लिखते हैं – जिस युग में कबीर, जायसी, तुलसी, सूर, जैसे रससिद्ध, कवियों और महात्माओं की दिव्यवाणी उनके अन्त:कारणों से निकल कर देश के कोने-कोने में फैली थी, उसे साहित्य के इतिहास में सामान्यत: भक्तियुग कहते हैं। निश्चय ही वह हिन्दी-साहित्य का  स्वर्ण युग है।’
      भक्तों के काव्य युग को इस उच्चस्तर पर पहुँचाने वाली उनकी कुछ प्रमुख साहित्यगत विशेषताओं का निरूपण किया जा सकता है –
      भक्तिकालीन कवियों की कविता श्रेष्ठ आध्यात्मिक चिन्तन से ओत-प्रोत है। इस युग के जितने भी सम्प्रदाय हैं, चाहे वे निर्गुण हों, चाहे सगुण सब में श्रेष्ठ आध्यात्मिक चिन्तन की प्रधानता है। उनका यह आध्यात्मिक चिन्तन पारम्परिक होते हुये भी नवीन उद्भावनाओं से युक्त है। हिन्दी साहित्य के अन्य किसी युग में साहित्य के अंतवर्ग आध्यात्मिक चिन्तन की धाराएँ इतने उत्कट रूप में प्रवाहित नहीं हुयीं। भारतीय परम्परा में प्रचलित सारी आध्यात्मिक चिन्तन धाराएँ किसी न किसी रूप में इस युग में स्थान पाती रही हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यह युग समस्त भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन का सार है।
      श्रेष्ठ आध्यात्मिक चिन्तन के अतरिक्त व्यक्ति तथा समाज को अच्छा मार्ग दिखाने के लिए दिए गये भक्त-कवियों के उपदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उनका साहित्य पग-पग पर नैतिक गुणों का आह्वान करता चलता है। व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन दोनों ही के उत्कर्ष की ओर ले जाने वाले नैतिक नियम- आत्म-संयम (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, और अहं का त्याग तथा वासनाओं की बलि), अपरिग्रह, इन्द्रिय संयम (निद्रा, स्वादिष्ट आहार, मांसाहार-मादक वस्तु, कामिनी-त्याग), मानसिक संयम (कपट, आशा, तृष्णा, निन्दा और मन की चंचलता का त्याग), आचार-व्यवहार सम्बन्धी नियम (कुसंग-त्याग, वेशभूषा सम्बन्धी आडम्बर का त्याग) इत्यादि, भक्त कवियों के साहित्य में स्थल-स्थल पर निबद्ध मिलेंगे। इन सभी नियमों का पालन किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचा सकता है। इस प्रकार श्रेष्ठ नैतिक नियम अन्य किसी युग के साहित्य में एक साथ देखने को नहीं मिलते। कुल मिलाकर श्रेष्ठ आध्यात्मिक चिन्तन और समाज को उत्कर्ष की ओर ले जाने वाले उच्च-नैतिक आदर्शों के उपदेशों की दृष्टि से भक्ति-साहित्य अन्य युगो और प्रवृत्तियों के साहित्य के बीच सर्वश्रेष्ठ है।
      उच्च-सामाजिक आदर्शों की स्थापना-भक्ति-साहित्य का प्रणयन जिस युग में हुआ, वह युग राजनैतिक विश्रृंखलता के साथ ही सामाजिक विश्रृंखलता का भी काल था। हिन्दू समाज जाति और वर्ग के जटिल बन्धनों में उलझा हुआ था। शासक वर्ग से सम्बन्धित मुसलमान जाति और हिन्दुओं का संघर्ष भी आये दिन साधारण बात थी। ये दोनों समस्यायें उस युग के समाज की सबसे जटिल समस्यायें थीं। इनके रहते न तो समाज में कोई आदर्श रह गया था और न ही कोई नियम। शासक और शासित के बीच इतना अन्तराल था कि शासक वर्ग समाज या प्रजा की समस्यायों से कोई मतलब ही नहीं रखता था। ऐसे जटिल युग में भक्त कवियों ने अपनी काव्यमयी वाणी में उच्च सामाजिक आदर्शों की स्थापना का सफल प्रयास किया। उन्होंने अपने शान्त, सरल उपदेशों और वास्तविक तथ्यों के प्रतिपादन के माध्यम से विघटित समाज को सुधारने का प्रयत्न किया। सभी को एक ही परमपिता परमेश्वर की सन्तान बताकर जाति-भेद और वर्ग-भेद  की दरार को समाप्त किया। तुलसीदास ने शासक और शासित प्रजा के आदर्श रूप का निदर्शन ‘राम’ के चरित का प्रत्याख्यान, करके किया। महात्मा कबीर ने तथा अन्य भक्त- सन्तों ने छोटे और बड़े, ऊँच और नीच सभी को समाज में समान स्थान दिये जाने की बात की। हिन्दू और मुसलमान जातियों, उनके धर्मो और संस्कृतियों के समन्वय का प्रयास जायसी जैसे साधक कवि और उनके अनुयायियों के द्वारा सम्पन्न हुआ। कुल मिलाकर भक्त-कवियों ने एक ऐसे समाज का निर्माण किया जो पूर्ण रूप से ‘हरि’ की सत्ता से युक्त था। वहाँ भेदभाव जैसी कोई बात नहीं थी। कबीर ने कहा-
               “जाति-पाँति पूछै न कोई। हरि कहँ भजै सो हरि का होई।I” 3
      जायसी मूलत: प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं। यह संसार प्रेम और सौन्दर्य के कारण ही जीने योग्य है। इस संसार में जो कुछ ज्योतिर्मयहै, निर्मल है, दीप्त है, मधुर और रमणीय है,वह वस्तुत: परोक्ष रहस्यमयी सत्ता को ही प्रतिबिम्बित कर रहा है। जायसी की इसी रहस्यमयी जीवन-दृष्टि को और काव्यानुकूलता को आचार्य शुक्ल ने पहली बार पहचाना और घोषित किया- “जायसी कवि थे और भारतवर्ष के कवि थे। भारतीय पद्धति के कवियों की दृष्टि फारस वालों की अपेक्षा प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों पर कहीं अधिक विस्तृत तथा उनके मर्मस्पर्शी स्वरूपों को कहीं अधिक परखने वाली होती हैं। इससे उस रहस्यमयी सत्ता का आभास देने के लिए जायसी बहुत ही रमणीय और मर्मस्पर्शी दृश्य-संकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं।” 4  
      आचार्य शुक्ल ने स्पष्ट किया की जायसी द्वारा उपस्थित लौकिक दृश्य-संकेत परोक्ष-ज्योति और सौन्दर्य-सत्ता का आभास देने में पूर्णत: समर्थ हैं। प्रकृति के बीच दिखाई देने वाली सारी दीप्ति उसी परोक्ष सत्ता की है और उसका अस्तित्व उसी के कारण है-
                                             “रवि, ससि, नखत दिपहिं ओहि जोती।
                                             रतन, पदारथ, मानिक मोती।I
                                             जहँ-जहँ विहँसि सुभावहिं हँसी।
                                             तहँ-तहँ छिटकि जोति परगसी।I” 5  
      तुलसीदास ने भी सारे जगत् को ‘सियाराम मय’ देखा। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था न बड़ा। राम उच्चवंशी राजकुमार होते हुये भी निषादराज और शबरी के साथ समानता का व्यवहार करते हैं। जंगल में तो समता का ही प्रचार करते घूम रहे हैं। महात्मा सूर के कृष्ण भी केवल ‘प्रेम’ ही देखते हैं। जाति और वर्ग नहीं। शैवों के शिव तो औढ़रदानी हैं। वे पात्र अपात्र का विचार ही नहीं करते। उनके गुणों का स्वरुप भी देखने लायक है। इन सभी बातों के अतरिक्त कुछ भक्त-कवियों जैसे तुलसी का साहित्य तो आदर्श सामाजिक सम्बन्धों की संहिता कहा जा सकता है। उनके रामचरितमानस में निबद्ध स्वामी-सेवक सम्बन्ध, शासक और शासित सम्बन्ध इत्यादि सभी आदर्श सामाजिक सम्बन्ध हैं। समवेत रूप से यह कहा जा सकता है कि भक्त कवियों का साहित्य प्रत्येक दृष्टि से उच्च सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना और साथ ही अनेक उच्च आदर्शों के निरूपण का साहित्य है। इस दृष्टि से किसी भी युग का साहित्य भक्ति-युग के समकक्ष नहीं हैं।
      भक्तिकालीन साहित्य विशुद्ध रूप से धार्मिक साहित्य है। भारतीय वेदों की परम्परा में विकसित विविधात्मक धर्मों एवं दर्शनों का इस युग का साहित्य, एक संचित कोष कहा जा सकता है। केवल भारतीय आस्तिक और नास्तिक धर्मों का ही नहीं, विदेशी, ‘इस्लाम’ धर्म का भी श्रेष्ठ रूप, इस युग के साहित्य में देखा जा सकता है। संत-कवियों की धार्मिक साधना, परम्परा के सभी नास्तिक धर्मों (बौद्ध-जैन धर्मादि) को अपने चिन्तन की आधार-भूमि बनाती है। तुलसी और सूर परम्परागत वैष्णव धर्म का श्रेष्ठ रूप प्रतिपादित करते हैं। महाकवि जायसी ने अपने सिद्धान्तों द्वारा इस्लाम को जो अभिव्यक्ति दी, उससे आगे चलकर इस्लाम के विस्तार (दार्शनिकता) में पर्याप्त सहायता मिली। इन सभी अलग-अलग धर्मों की श्रेष्ठता का दर्शन तो होता ही है, इस युग की सबसे बड़ी विशेषता एक ऐसे धार्मिक मार्ग की स्थापना है जो प्रत्येक देश और जाति तथा धर्म के व्यक्तियों को मान्य है। सन्तों तथा भक्त-कवियों ने ईश्वर को ही एकमात्र व्यापक तत्व बताकर जिस सामान्य धर्म की स्थापना की वह हिन्दू-मुसलमान, छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, सभी को मान्य हुआ। इनके द्वारा स्थापित धर्म का प्रमुख उद्देश्य अनेकता में एकता स्थापित करना था। किसी भक्त-कवि में धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता नाम की कोई वस्तु नहीं है। लीला-बिहारी कृष्ण की भक्ति जितना सूरदास और नन्ददास को भाव-विभोर बना देती है, उतना ही रसखान को भी इसी तरह मीराबाई अपने राज्य-सुख और कुल-मर्यादा को छोड़कर कृष्ण को अपना पति मानती हैं, तो कवयित्री ‘ताज’ भी उनके लिए ‘तुरकानी’ से ‘हिंदुआनी’ बन जाना चाहती हैं। ये सभी उदाहरण यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हैं कि भक्त-कवियों ने जिस सामान्य धर्म की स्थापना की थी, वह जाति-पाँति के बंधन से परे, सामान्य मानवता के धरातल पर स्थिति था। उसमें जाति-भेद, वर्ग-भेद व धर्म-भेद जैसी दुर्भावना को स्थान नहीं था। हिन्दी के अन्य किसी युग में इस प्रकार के सार्वभौम धर्म की स्थापना हुई नहीं दिखायी पड़ती।
      भक्त-कालीन साहित्य का सारा ताना-बाना समन्वय की आधार भूमि पर बुना गया है। पीछे भक्तिकाल के विविध दार्शनिक सम्प्रदायों का विवेचन करते समय दिखाया जा चुका है कि भक्ति के सारे सिद्धान्त भारतीय-परम्परा के दो सशक्त मार्गों- ज्ञान-मार्ग और कर्म-योग के रूप में विकसित हुये हैं। परम्परा प्रचलित जितनी अलग-अलग विचारधाराएँ थी, सभी को भक्त कवियों ने समन्वित करने का प्रयास किया। इस युग के साहित्य में भक्त-कवियों द्वारा उपस्थित किये गये समन्वयों के विभिन्न रूप हैं, और सारा का सारा साहित्य समन्वय की भावना से ओत-प्रोत है।
      सन्त-कवियों तथा सूफियों ने विश्व के विशाल धर्मों- हिन्दू और इस्लाम धर्म का समन्वय उपस्थित किया। ये दोनों धर्म एक दूसरे के कट्टर विरोधी थे। सन्त कवियों और सूफ़ी सन्तों द्वारा स्थापित किये गये सामान्य भक्ति मार्ग ने इन दोनों धर्मों के विरोधों को दूर कर इन्हें एक एक धर्म की छाया के नीचे ला बिठाया। कबीर के मानने वालों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही थे। इस धार्मिक समन्वय के अतरिक्त इन दोनों कवियों ने विविध सम्प्रदायों के सिद्धान्तों का भी समन्वय उपस्थित किया। कबीर ने अद्वैत वेदान्त, योग तथा बौद्ध सिद्धों और नाथों के विभिन्न सिद्धान्तों को एक ही मत में समन्वित किया। इसी प्रकार जायसी ने इस्लामी साधना के सिद्धान्तों तथा भारतीय योग सिद्धान्तों का समन्वय उपस्थित किया। वैष्णव-कवि तुलसी ने ब्राह्मण धर्म में फैले हुये विविध सम्प्रदायों- वैष्णव, शैव और शाक्त सभी का समन्वय उपस्थित किया। निर्गुण और सगुण का समन्वय तो दर्शनीय है। कबीर निर्गुण के उपासक होते हुये भी सगुण की सराहना करते हैं। इसी प्रकार सगुण भक्तों के उपास्य राम और कृष्ण सगुण होते हुए भी, निराकार परब्रह्म के अवतार हैं। इस प्रकार भक्त-कवियों ने विभिन्न मतों और सिद्धान्तों में समन्वय उपस्थित किया।
      सभी भक्त कवियों ने ज्ञान को भक्ति का मूल माना। बिना ज्ञान के भक्ति हो ही नहीं सकती। पूरे भक्ति साहित्य में ज्ञान, कर्म और उपासना में समन्वय उपस्थित करने का प्रयास किया गया है। बिना इन तीनों के समन्वय के कोई भी धर्म सजीव हो ही नहीं सकता- “कर्म के बिना वह (धर्म) लूला-लँगड़ा, ज्ञान के बिना अन्धा और भक्ति के बिना हृदयविहीन क्या, निष्प्राण रहता है।” 6  
      सामाजिक समन्वय की जो उत्कट भावना भक्त कवियों में मिलती हैं, वह अन्य कवियों में दुर्लभ है। इसी भावना के कारण भक्तिकालीन कवियों को समाज-सुधारक तथा लोकनायक आदि उपाधियाँ भी दी गयी हैं।
      भक्तिकालीन-साहित्य श्रेष्ठ धार्मिक विचारधाराओं और भक्ति के कारण एक ओर तो मनुष्य के मन को संतृप्त करता है, दूसरी ओर उच्च- स्तरीय साहित्यक कृतियों के निर्माण द्वारा उसके मस्तिष्क को भी संतुष्ट करता है। इस प्रकार हिन्दी का भक्ति-साहित्य व्यक्ति के हृदय और बुद्धि, मन और मस्तिष्क दोनों ही को सन्तुष्ट करने वाला साहित्य है। इस युग के कवियों ने अपने धार्मिक सिद्धांतो से प्रेरित कृतियों के प्रणयन के साथ ही उन्हें उच्चकोटि की कलात्मकता से भी मण्डित किया है। तुलसी का रामचरितमानस, राम-भक्ति का प्रतिपादक ग्रन्थ होने के साथ ही एक श्रेष्ठ महाकाव्य भी है। संस्कृत आलोचकों ने एक श्रेष्ठ महाकाव्य के जितने लक्षण बताये हैं सबके सब ‘रामचरितमानस’ पर घटित हो जाते हैं। महाकवि सूरदास अपने ‘सूरसागर’ में वल्लभाचार्य द्वारा चलाये गये पुष्टि-मार्ग की स्थापनाओं का निबन्धन करने के साथ ही, इसे एक श्रेष्ठ गीतिकाव्य की महिमा से मण्डित करना नहीं भूलते। हिन्दी गीति-काव्य परम्परा का यह सर्वश्रेष्ठ काव्य-ग्रन्थ माना जाता है। महात्मा कबीर की ‘वाणी’ अटपटी होते हुये भी कई स्थलों पर भावात्मकता से युक्त है। प्रेम में गदगद होकर जब वे अपने निर्गुण राम का स्मरण करते हैं तो कवित्व अपने आप ही उनका अनुसरण करने लगता है। सूफी कवि जायसी का ‘पद्मावत’ तो हिन्दी का प्रथम प्रमाणिक महाकाव्य ही माना जाता है। इसमें फारसी और भारतीय काव्य- शैलियों और वर्णनों का जो गंगा-यमुनी-योग उपस्थित किया गया है, वह ग्रन्थ को अद्बभुत कलात्मकता से युक्त बना देता है। नन्ददास आदि कवियों ने ‘भँवरगीत’, ‘रासपंचाध्यायी’ जैसे सुन्दर खण्ड-काव्यों की रचना की है। इस प्रकार भक्तिकालीन साहित्य, श्रेष्ठ कहे जा सकने वाले अनेक महाकाव्यों, खण्ड-काव्यों, गीति-काव्यों तथा अद्भुत प्रभावकारी असंख्य फुटकर पदों या मुक्तक कविताओं से ओत-प्रोत है। रस-छंद, अलंकार, रीति, गुण जैसे काव्य के सभी अंगो से इन भक्तों का काव्य युक्त है। भाषा की दृष्टि से भी युग के साहित्य में दो श्रेष्ठ लोक-भाषाओं अवधी, ब्रज का प्रयोग हुआ है। तुलसीदास ने ‘अवधी’ को अपने चरम उत्कर्ष तक पहुचा दिया हैं।
      हिन्दी के उपर्युक्त रचनात्मक साहित्य के अतरिक्त यह युग दार्शनिक सिद्धांतो का प्रतिपादन करने वाले श्रेष्ठ ग्रंथो तथा काव्य की आलोचना से सम्बन्धित अनेक ग्रंथो, प्राचीन ग्रन्थों पर की गयी टीकाओं आदि से भी युक्त है। इस प्रकार के ग्रंथों की रचना प्रायः संस्कृत में हुई है। नाभादासकृत ‘भक्तमाल’ जैसे कृतियाँ काव्य के इतिहास का भी द्योतन करने वाली हैं। गणित, ज्योतिष एवं इतिहास से सम्बन्धित अनेक ग्रंथो की रचना भी इस युग में हुई, यह देखा जा सकता हैं।
      विश्व साहित्य के श्रेष्ठ कवियों, महाकवियों में एवं प्रतिभा-संपन्न साहित्यकारों में मध्यकाल के कवियों का स्थान सर्वोपरि है। इन कवियों ने सत्य की नींव पर जीवन, जगत और साहित्य की जिन भित्तियों का निर्माण किया, वे लोक कल्याणकारी और समन्वयकारी है और उसका वर्ण्य विषय अथवा प्रतिपाद्य मानव है। अस्तु, ऊपर बतायी गयी विशेषताओं को दृष्टि में रखकर ही डॉ. श्यामसुन्दर दास प्रभृति  इतिहासकारों ने हिन्दी- साहित्य के भक्तिकाल को ‘स्वर्ण युग’ कहा है।


सन्दर्भ:-
1.       काव्य-प्रकाश: आचार्य मम्मट, पृष्ठ- 37, भारतीय विद्या भवन, वाराणसी-1, द्वितीय संस्करण-1967
2.       रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ) : सम्पादक- श्री दुर्गाप्रसाद एवं श्री वासुदेव शर्मा, पृष्ठ- 4, निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, 1934 चतुर्थ संस्करण
3.       कबीर ग्रंथावली (डॉ. श्याम सुन्दर दास द्वारा सम्पादित) : टीकाकार डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी, पृष्ठ-293, प्रकाशन केन्द्र रेलवे क्रासिंग, सीतापुर रोड, लखनऊ- 226022, आठवाँ संस्करण
4.       त्रिवेणी (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल) : सम्पादक- डॉ. रामचन्द्र तिवारी, पृष्ठ-5, विश्वविद्यालय प्रकाशन,चौक, वाराणसी- 221001, संस्करण- 2002
5.       जायसी-ग्रन्थावली: सम्पादक- राजनाथ शर्मा, पृष्ठ-150, विनोद पुस्तक मन्दिर, रांगेय राघव मार्ग, आगरा- 2, पंचम संस्करण-1975
6.       हिन्दी साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ-61, प्रकाशन संस्थान, दयानन्द मार्ग, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, संस्करण-2007   

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