मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर रिश्तों के नए क्षितिज की तलाश

- राजेन्द्र चौधरी

"बंद मुट्ठी" - पुस्तक समीक्षा
पुस्तक: बंद मुट्ठी (उपन्यास)
लेखक: डॉ. हंसा दीप
पृष्ठ: 208, पेपरबैक
मूल्य: ₹ 275 रुपये
ISBN: 978-93-81520-51-2
प्रकाशक: शिवना पेपरबैक्स, भारत



कहानी लेखन और उपन्यास लेखन दोनों अलग विधाएँ हैं। मन में उपजे किसी विचार को या किसी दृष्टांत को अपनी लेखन प्रतिभा से कहानी का रूप दे देना नि:संदेह एक प्रशंसनीय रचनात्मक कार्य है, लेकिन कथानक के पात्रों, उनकी सोच, उनके लगाव, अलगाव के भावात्मक पक्षों, उनकी जीवन-यात्रा के सहज और असहज क्षणों को जीवंत कर देने वाले, रिश्तों की ऊष्मा में पगे शब्दों से दो सौ पृष्ठों का एक उपन्यास रच देना निश्चय ही एक असाधारण रचना कौशल है। मेरे विचार से यह एक दुरूह कार्य है और इस दुरूह कार्य को इतनी सहजता से शुरू से अंत तक डॉ. हंसा दीप ने किया ही नहीं बल्कि जिया है, इस तरह कि पाठक कथानक के पात्रों के साथ जुड़ जाता है। आयु और स्थिति के अनुरूप शब्द-चयन का कौशल और कथानक को आगे बढ़ाने के लिए बीच-बीच में उनकी सूत्रधार की भूमिका इसे असाधारण बना देते हैं। 

"बंद मुट्ठी" उपन्यास भावनाओं का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो पाठक के मन को मोह लेता है। उपन्यास के सभी पात्र इतने सजीव रचे गए हैं कि पाठक अनायास ही खुद को उनसे जोड़ लेता है। इसके अलावा एक अत्यंत उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि चाहे बचपन की अठखेलियाँ हों, या युवावस्था के सपने और चुहलबाजियाँ हों, या प्रौढ़ावस्था में सामान्यतया अपने बच्चों से रखी जाने वाली अपेक्षाएँ हों, उनको व्यक्त करने के लिए इस उपन्यास में शब्दों का जो सटीक और प्रभावी चयन किया गया है, वह बताता है कि लेखिका ने अपना बाल-मन, युवा-मन और प्रौढ़-मन कितना सहेज कर रखा है। यह निश्चय ही एक कुशल लेखिका की विशेषता है।

मैं उनकी कहानी-लेखन प्रतिभा का कायल हूँ। उनके कहानी संग्रह "चश्मे अपने-अपने" ने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया। दिल को छू लेने वाले सरल, बोलचाल की भाषा के शब्दों में भावात्मक और व्यावहारिक दोनों पक्षों पर संतुलित अधिकार उनकी विशेषता है। पर इस उपन्यास का एक अनूठापन यह भी है कि इसके कथानक की पृष्ठभूमि में सिंगापुर और टोरंटो (कनाडा) है और थोड़ा-सा पोलैंड व चीन है। बहु-देशीय पृष्ठभूमि वाले पात्रों में हिंदुस्तान और हिन्दी भाषा दोनों ही जितने स्वस्थ रूप से ज़िंदा हैं, काश इनसे उतना लगाव भारत में रह रहे सभी हिन्दी भाषी लोगों के मन में होता। अमेरिका और कनाडा में सपरिवार उम्र का एक लंबा हिस्सा गुजार चुकी इस आप्रवासी भारतीय कथाकार के मन में भारत, भारतीयता और हिन्दी भाषा के प्रति नेह उनके सरल और हृदयस्पर्शी शब्द-चयन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। यह उनके शब्दों का जादू है कि वे आयु और स्थिति के अनुसार आकार ले लेते हैं। इसी उपन्यास से कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं:  


  • बीज तो बचपन में ही बोए जाते हैं, तभी तो फसल कटती है....., फल मिलता है....पापा के अंदर का दूरदर्शी पिता दार्शनिक बनने लगता। ---***---  
  • बधाइयों के सिलसिले के बीच मम्मी के आँसू बहने लगे। सपनों के साथ हकीकत का धरातल टकराने लगा।   ---***--- 
  • किसी अपने' के बगैर कितना बदल जाता है इंसान का जीवन! मम्मी और दीदी के पल्लू को पकड़ कर पली-बढ़ी लड़की आज एक नए देश में कितनी अकेली हो गयी है।  ---***---
  • घर में बड़े बच्चे होने का सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि सारी तमन्नाएं पूरी करने के लिए उसी बच्चे को केन्द्र बना लिया जाता है। ---***--
  • अमीरों की दुनिया में एक होड़-सी हो जाती है कि कौन, अपने बच्चों की शादी कितने ठाठ से करेगा! यहीं पर सारे पैसे वाले अपने पैसों को इस तरह उड़ाते हैं कि लगता है, आने वाले मेहमानों को अपनी रईसी का प्रदर्शन कर रहे हों। पैसों के बलबूते पर साख टिकी होने का जीता-जागता उदाहरण है, ये शादियाँ। ---***---                  
  • मासी तो माँ-सी होती है।  ---***---                                               
  • लंबी बहस के बाद तान्या ने कहा था - "जिस दिन झगड़ना बंद होगा, शायद हम एक-दूसरे से दूर होने लग जाएँगे।" ---***---
  उपन्यास पढ़ते हुए कई स्थानों पर मुझे लगा जैसे यह किसी मेरे अपने की ही कहानी है,
इसके संवाद मुझे अपने शब्द लगे। इस कारण मुझे विश्वास है कि यह उपन्यास पाठकों का मन मोह लेगा। इसके कथ्य में ऐसी रोचकता है कि पाठक उसके साथ जुड़ता चला जाता है।

विशेष उल्लेख के रूप में लेखिका द्वारा इस उपन्यास के अंत में रिया के सोलहवें जन्मदिन की अनूठी कल्पना, उसका दृश्यांकन, स्काइप के जरिये अलग-अलग स्थानों पर घनिष्ठ रिश्तों को उस आयोजन में सहभागी बनाना और प्रोजेक्टर के जरिये तान्या, सैम और रिया की पूरी जीवन-यात्रा का सहज स्मरण और प्रदर्शन करना बताता है कि उनका महिला मन कितना उर्वरक, कितना रचनात्मक है। भावनाओं का ऐसा उत्कर्ष नि:संदेह एक भावपूर्ण, सृजनशील लेखिका के मन में ही उपज सकता है।

इस उपन्यास के सारे पात्र अपने आप में बहुत ईमानदार हैं, एक-दूसरे की परवाह करते हैं, पारस्परिक स्नेह और लगाव स्पष्ट दिखता है। रिश्तों की इस प्रगाढ़ता और एक-दूसरे से अनकही अपेक्षाओं के बीच नायिका के 'स्व' की जीवन-यात्रा के भावपूर्ण खट्टे-मीठे अनुभव दिल को छू लेते हैं। भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं के बीच रिश्तों के प्रति उत्तरदायी बोध के साथ जीवन जीने की उसकी जिजीविषा यानि जीवटता सराहनीय है। अपनी बेटी के लिए सब कुछ जुटाने वाले, उसे आत्मनिर्भर बनने का पाठ पढ़ाने वाले स्नेहिल माता-पिता का अहं किस तरह नायिका के एक निर्णय से बुरी तरह आहत हो जाता है और रिश्तों की मिठास में अनचाहे ही एक कसैलापन आ जाता है। दो पीढ़ियों की सोच का यह अन्तर पाठक के मन से सीधे संवाद स्थापित करता है। सिमटती हुई आज की इस दुनिया में अपनी पारंपरिक सोच को विस्तार देकर ही आने वाले कल में रिश्तों के नए क्षितिज तलाशे जा सकते हैं। यह उपन्यास इस संदेश को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने में सफल रहा है।

अपनी संवेदनशीलता और सृजनात्मकता को नए आयाम देते हुए एक श्रेष्ठ उपन्यास लेखिका के रूप में अपना नाम दर्ज कराने पर डॉ. हंसा दीप को बहुत-बहुत बधाई और पाठकों को एक उत्कृष्ट, पठनीय उपन्यास उपलब्ध कराने के लिए आभार। उपन्यास की सफलता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
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ईमेल : rajendrapsingh@hotmail.com
पता : 'संस्कार',  29 राणाप्रताप एंकलेव, विक्टोरिया पार्क, मेरठ - 250001 (भारत)      

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