कहानी: खिलौने

अंजना वर्मा
- अंजना वर्मा
अरविन्द जी अपनी गोद में खरगोश सी कोमल काया वाले नवासे को लिये घुमा रहे थे और भीतर ही भीतर वात्सल्य से नहा
रहे थे जिसकी नमी उनके चेहरे पर भी छा गई थी। आजकल उनके घर में बेटी-दामाद आये हुए थे। अतः उनके घर में पसरी रहने वाली स्थाई निर्जनता गायब हो गई थी और वातावरण में बातचीत और हँसी का संगीत गूँज रहा था।अरविन्द जी और उनकी पत्नी आशा इन दिनों को पूरी तरह जी लेना चाहते थे ; क्योंकि ऐसे ही हँसते-खिलखिलाते दिन एकाकी दिनों का पाथेय बनते थे। इन्हीं दिनों की ऊर्जा उनकी जिन्दगी की झील में  एकरसता के शैवाल को तोड़कर छिन्न-भिन्न कर देती थी। फिर भी कभी-कभी तीसरे पहर की यह धूप भरी-पूरी होती हुई भी खामोशी के रंग में डूब जाती।
           वैभव अपने नाना-नानी का लाडला था। जब वह आता तो उसके लिए चाकलेट, खिलौनों और कपड़ों का ढेर लग जाता। जब तक वह रहता, वे दोनों उसकी खुशी के लिए सारी चीजें जुटाने के लिए तैयार रहते। उसके मुँह से कोई बात निकली नहीं कि पूरी हुई।  वह भी जब ननिहाल आता तो अपने मम्मी-पापा को भूलकर नाना-नानी   के साथ ही लगा रहता। दोनों ओर से एक अटूट बंधन बँध चुका था।
                  अरविन्द जा उसे घुमाते-घुमाते थक गये तो उसे लेकर बैठक में आ गये जहाँ महँगे फर्नीचर लगे हुए थे। दीवारों पर कई पेंटिंग्स लगी थीं और शोकेस में तरह-तरह की कलाकृतियाँ, शोपीस तथा खिलौने सजे हुए थे। अरविन्द जी का शौक ही था तरह-तरह के शोपीस तथा खिलौने इकट्ठा करना और उन्होंने अपने बचपन के इस शौक को  हजार व्यस्तता के बावजूद बचाये रखा था।  इसे समय, पैसा और प्यार देकर बढ़ाया था। सुंदर चीजों के लिए उनके भीतर एक अजीब दीवानगी थी।कहीं कोई शोपीस, कलाकृति देखते तो उस पर मोहित हो जाते। उसे खरीदकर ले ही आते और अपने संग्रह में एक नया पन्ना जोड़ देते। ऐसा करते तो उनके भीतर से कोई कह उठता कि क्या अब उनकी उम्र है  ऐसा शौक पालने की? यह शौक तो अब वे अपनी तीसरी पीढ़ी के लिए छोड़ दें। पर तभी उनके दिल में बैठा उनका बचपन बड़ी मासूमियत से मुस्कुराता हुआ अपनी जि़द पर अड़ा रहता। तर्क देता कि आखिर इससे किसीका क्या बिगड़ता है? बस एक निश्छल सी ख्वाहिश ही तो है?
 उनके सयाने बच्चे अपने पापा के इस शौक और संग्रह को समझते और उनकी कद्र करते थे। अरविन्द जी का अच्छा-खासा संग्रह किसीको भी अचंभित कर दे सकता था। कई देशों की कलाकृतियाँ थीं। छोटी से छोटी और महँगी से महँगी चीजें करीने सजी हुई थीं। पीतल, ताँबा, अष्टधातु, रोज़वुड, ब्रांज से लेकर प्लास्टिक, पत्ते और बाँस  की तीलियों से बनी हस्तकलाएँ अपनी-अपनी जगह पर प्यार और गरिमा के साथ रखी हुई थीं। यहाँ तक कि कई  जगहों से लाये गये चिकने पत्थर, सीपियाँ और मिट्टी के नमूने और शंख भी थे। अरविन्द जी उन लोगों में से थे जो धरती को सौंदर्य का पिटारा मानते हैं और कलाकर की कला का सम्मान करते हैं।
             उनके संग्रह में फ्रांस का एफिल टावर और नाव में बैठा प्रेमी जोड़ा, लंदन का लाल कपड़ों में सजा ऊँचा काला टोप पहने सिपाही, बाली का पीतल का गरूड़,  आस्ट्रेलिया का बूमरैंग, अबोरिजिन पेंटिंग, तिब्बत का गोम्पा, कश्मीर की रोज़वुड की कलाकृतियाँ, मैसूर के चंदन के शोपीस, काष्ठ पर हाथी दाँत की नक्काशी, नक्काशीदार तिपाई, स्विट्जरलैंड की दीवाल घड़ी, पीतल-ताँबे की सुंदर मूर्तियाँ, चाँदी और क्रिस्टल के कई शोपीस और इनके अलावा न जाने कितनी अन्य महँगी दुर्लभ चीजें थीं! और इनके साथ-साथ शान्ति निकेतन की बनी मिट्टी की मूर्तियाँ भी थीं,  जिन्हें अरविन्द जी ने उन पर रीझकर ही खरीदी थीं। बाँस की खपच्चियों से बना, हस्तकला का अद्भुत नमूना एक जहाज भी अपना परचम लहराता लंबे समय से सुरक्षित रखा हुआ था। चीनी मिट्टी और पीतल के कई छोटे-बड़े गुलदान भी थे और भी कितनी चीजें जिनकी फेहरिस्त बनाई जाती तो वह बड़ी लंबी हो जाती।
               अरविन्द जी जब बैठक में चाय पीते होते तो बड़ी-बड़ी आँखों से अपने संग्रह को निहारते रहते। उनके संग्रह मेंं सबसे पुराने थे एक पीतल के कृष्ण जी,  जिन्हें सभी शोपीसों का पूर्वज ही माना जाएगा। उन पर नजर पड़ते ही उन्हें अपने बचपन का वह दिन याद आ जाता जब उन्होंने जिद  करके यह मूर्ति अपने नानाजी से खरीदवायी थी। वाराणसी के मंदिर की चमकती-दमकती गलियों से नाना-नानी के साथ गुजरते हुए इस मूर्ति से उनकी नजरें चार हुई थीं। फिर तो न जाने कैसे सम्मोहन जाल में वे बँध गये थे कि  उसे लेने की जिद करने लगे। नानी ने कहा था कि इसके बदले कोई खिलौना पसंद कर लो; क्योंकि यह खेलने की चीज नहीं। इनकी पूजा करनी पड़ती है।पर वे बिलखने लगे थे। उन्हें तो वही बाँसुरी वाला कृष्ण चाहिए था। हारकर वह मूर्ति खरीद देनी पड़ी।अब वही बाँसुरी वाला त्रिभंगी मुद्रा में एक आले मेंं खड़ा वंशी बजा रहा है। वे चाय का सिप लेते हुए देखते।
        बचपन में मिट्टी की मूर्तियाँ उन्हें सम्मोहित करती थीं। मिट्टी की मूर्तियाँ खरीदीं जातीं। वे टूटतीं। फिर खरीदी जातीं। आज भी  मिट्टी की मूर्तियाँ बहुत अपनी सी लगतीं उनको। वे जब अपने मन को खँगालते तो पाते कि कुम्हार की उन अनगढ मूर्तियों के प्रति अभी भी मन के किसी कोने में प्यार छुपा हुआ  है।
आजकल उनकी आँखों का तारा बना हुआ था छ: मिनी कारों का एक सेट। गहरी लाल, पीली, नीली, उजली, हरी, ब्राउन कारें एक के पीछे एक लगी हुई थीं। उनकी बनावट इतनी सूक्ष्म थी कि हू-ब-हू बड़ी कारों का लघु रूप थीं।कोई भी उनपर फिदा हो सकता था।
      अरविन्द जी सोफे पर आकर बैठ गये ओर अपनी बगल में वैभव को बैठा लिया। वैभव की आँखों के आगे   शोकेस था जिसमें उसे आकर्षित करने वाली हजार चीजें सजी  हुई थीं। वह सोफे से उतरकर  शोकेस के पास गया
और खड़ा होकर देखने लगा कि उसमें क्या-क्या रखा हुआ है? उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें हैरत  और खुशी से और भी काली हो उठीं। वह सोचने लगा कि इनमें से क्या ले लूँ?
इतनी चीजों में से कुछ चुन लेना भी इतना आसान नह़ीं था।
          बच्चे को ऐन्टिक चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कलाकृतियाँ उसे लुभा नह़ीं पा रही थीं। लाल सिपाही भी अच्छा था। पर उसे तो सबसे अच्छा चुनना था। सबसे अच्छा क्या?
उसकी नजरें सभी शोपीसों पर से घूमती हुई चमकती हुई रंग-बिरंगी कारों पर जाकर ठहर
गई। उसे लगा कि दुनिया की सारी दौलत उसे मिल गई है। वह कारें माँग बैठा।
    अरविन्द जी ने खुशी-खुशी एक कार निकालकर उसे दे दी तो उसने कहा, "नहीं, मुझे सारी की सारी कारें चाहिए। "
   तब अरविन्द जी ने कुछ भारी मन से सभी कारें निकालकर बच्चे को दे दीं। वैभव के ओठों पर मुस्कुराहट आ गई। वह कालीन पर बैठकर उनसे खेलने लगा। अरविन्द जी उसे खेलते हुए देखते रही और सोचते रहे कि बच्चे को कोई खिलौना पसंद भी आया तो ये कारें! आखिर पसंद भी क्यों न आयें? ये हैं ही इतनी सुंदर? जब मैं इन पर मोहित हो गया तो यह बच्चा क्यों नहीं मोहित होगा? यह भाव मन में उठा और गया।
   वैभव कारों से खेल रहा था और अरविन्द जी उसे खेलते हुए देख रहे थे। तभी आशा और उनकी बेटी कृति वहाँ आयीं। कृति ने कहा, " ओह! तो इसे भी पापा की कारें पसंद आ गईं?"
"अरे! ये मेरी थोड़े ही हैं? ये तो वैभव के लिए ही खरीदकर रखी गई थीं। है न बेटू?" अरविन्द जी वैभव के माथे पर हाथ फेरते हुए बोले।
         बच्चे ने सिर हिला दिया। तब आशा ने पति को चिढाते हुए कहा, "ये तो हर बच्चे को पसंद आयेंगी। छोटे बच्चे से लेकर बूढ़े बच्चे तक को।" यह कहकर पति की ओर देखकर हँसने लगीं।
यह सुनकर कृति को भी हँसी आ गई। बोली, "ममा! तुम पापा को टीज़ करती रहती हो।"
         "ये इनकी पुरानी आदत है।" कहकर अरविन्द जी भी भीतर से पुलकित हो उठे। उन्हें याद आया आशा शुरू से ही हँसमुख थी।मजाक करते रहना उसका स्वभाव था
और आज भी वह वैसी ही थी कि अपनी हँसी से सारा माहौल खुशनुमा बनाये रखती थी।
           वैभव अपनी कारों में व्यस्त हो चुका था। कभी वह एक को दौडा़ता, तो कभी दूसरे को। कभी लाल वाली को आगे कर देता तो कभी नीली वाली को। कभी एक के पीछे एक को लगाकर शहर में लगने वाले जाम का दृश्य तैयार करता तो कभी अपनी कल्पना में एक-एक कर सभी कारों पर बैठकर घूमता। फिर खेलने से मन भर जाता तो उन्हें जहाँ का तहाँ छोड़कर चल भी देता। तब कृति उन कारों को उठाकर हिफाजत से रख देती। वह समझती थी कि ये उसके पिता को कितने प्रिय हैं। वह सोचती कि मम्मी ठीक कहती है पापा को बूढ़ा बच्चा। यह सोचकर वह मन  ही मन मुस्कुरा भी देती।
उस बार जब कृति लौटने लगी तो उसने सभी कारें शोकेस के निचले हिस्से में छुपा दीं। वह उन्हें साथ नहीं ले गई कि पापा के संग्रह में कमी हो जाएगी और उनकी पसंदीदा चीज ही न रहेगी। अपने घर पहुंचकर उसने वैसी ही कारें वैभव के लिए खरीद दीं। इत्तेफाक से वैसी ही मिल भी गई।
कृति ने घर पहुँचकर अपने सुरक्षित पहुँचने की सूचना पापा को दी तो उनका पहला सवाल था, "वैभव कारों से खेल रहा है न?"
कृति ने कहा, "कहाँ पापा? मैं वो सारी कारें वहीं छोड़ आई ।" सुनकर अरविन्द जी आहत हो गये। बोले, "छोड़ गयी? क्यों? ये तो तुमने ठीक नहीं किया। उसे  कितनी पसंद थीं वे  कारें! खिलौने तो बच्चों के लिए ही होते हैं न? वो तो मैं यूँ ही चीजें इकट्ठी करता रहता हूँ। यदि बच्चे को पसंद आ गई तो वह चीज उसीके लिए है ।"
कृति ने कहा, "पापा! वैसी कारें मुझे मिल गईं। बिल्कुल वैसी ही कारें वैभव के पास भी हो गई हैं।आप चिंता न रें। "
        यह सुनकर आश्वस्त हुए अरविन्द जी। बोले, "चलो, तब तो अच्छा हुआ।"  यह कहने के बाद उन्होंने फोन पत्नी के हाथ में दे दिया।
               बच्चों से फोन पर बातें करना उनके मनबहलाव का बहुत बड़ा हिस्सा था। माँ-बेटी जब बातें करने लगतींं तो बात घंटे-भर से कम न चलती। कृति किस पार्टी में गई? खाने में क्या बना? फलाँ पकवान की रेसिपी क्या है? कौन-से नये कपड़े खरीदे गये? कृति के पति टूअर पर कहाँ गये हैऔ?वैभव क्या-क्या करता है? वगैरह-वगैरह।छोटी-बड़ी सारी बातों का जरिया फोन ही था। दोनों अपनी-अपनी बात कहकर संतुष्ट हो जातीं ।
                     अरविन्द और आशा ने अपने तीनों बच्चों को योग्य जीवन साथी ढूंढ़कर उन्हें बसेरे दे  दिये थे जिसके कारण उनका अपना बसेरा खाली हो गया था। एक-एक कर सब बस गये तो ये दोनों अकेले हो गये थे। यह अकेलापन तब टूटता जब बेटा या बेटी का परिवार चंद दिनों के लिए उनके पास आता। इसीलिए उन्हें इंतजार रहता कि वे कब आयेंं कि उनके कलरव से सन्नाटा टूटे। आशा का स्त्री हृदय हमेशा बच्चों के साहचर्य के लिए बेचैन रहता।
   सुख के महल में दुख कहीं से सेंध लगा रहा था। सब मजे में थे कि अचानक आशा बीमार पड़ीं और अच्छी न हो सकीं। हल्की-सी अस्वस्थता में चल बसीं। अरविन्द जी या उनके बच्चों के लिए यह बड़ा अप्रत्याशित था। पत्नी के गुजर जाने से अरविन्द जी बिल्कुल स्तब्ध रह गये। बच्चों के जीवन में जो हलचल उठी, वह शांत हो गई; क्योंकि उन्हें जिन्दगी में आगे कितने मील के पत्थर पार करने थे। परंतु सारे मील स्तंभों को पार कर चुके अरविन्द जी को अपना बचा हुआ जीवन निरर्थक लग रहा था। इस बचे हुए सफर का साथी खो गया था।
         उन्हें बारी-बारी से तीनों बच्चों ने अपने पास बुलाया। कुछ समय तक तो वे इसी तरह सबके पास जाते रहे, परंतु उनका कहीं मन न लगा। जीवन में जो खालीपन पसर गया था, वह कहीं जाकर दूर नहीं होता था। अंततः वे अपने घर में ही लौट आये थे। वे अपने को बहुत समझाने की कोशिश करते रहे। अपने दु:ख को ज्ञान की नदी में प्रवाहित करने में लगे रहे, पर संभव नहीं हो पाया। किसी और को ज्ञान की राह दिखाना सहज है, पर उस पर स्वयं चलना मुश्किल। आशा की जो जगह खाली हो गई थी, उसे भरना संभव नहीं था। बुढ़ापा भी उन पर हावी हो रहा था।जीवन संगिनी का साथ छूटते  ही उसने अपना शिकंजा कस दिया। स्वास्थ्य कमजोर हो गया। अरविन्द जी अपने को शांत बनाए रखने की जद्दोजहद में लगे रहे, पर भीतर-ही-भीतर न जाने कहाँ से टूटे कि एक दिन सारस के जोड़े की तरह मूर्च्छित होकर गिरे तो अटूट नींद में सो गये।
   खबर मिलते ही आनन-फानन में तीनों संतानें जुट गईं। यह पिता के जीवन का अंतिम यज्ञ था जिसमें वे किसी तरह की कमी नह़ीं होने देना चाहते थे। एक पैर से खड़े होकर और खुले दिल से खर्च कर बच्चों ने अपनी भूमिकाएँ अदा कीं। दिवंगत आत्मा की शांति के लिए सारे अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक पूरे किये गये। सभी आमंत्रित इस आयोजन को झदेखकर अरविन्द जी के भाग्य को सराह रहे थे और संतानों की योग्यता पर अपनी मुहर लगा रहे थे।
 पिता की अंतिम विदाई का आयोजन खत्म होते ही तीनों बच्चे साँझ में अपने नीड़ों की ओर लौटने वाले पंछियों की तरह वापसी की तैयारी में जुट गये। सभी के सूटकेसों के मुँह खुल गये और पैकिंग शुरू हो गई। कमरों में धरे-बिखरे सामान सफर केए लिए एक-एक कर सूटकेसों में अपनी जगह बनाने लगे। विकर्षण का तीखा धुँआ भी बड़ी सहजता से न जाने कैसे पसरने लगा था। जिस घर में सब पलकर बड़े हुए थे, वह अब किसी का नहीं था और किसीके काम का भी नहीं रह गया था। घर अचानक सबको होटल के रैन बसेरे-सा लगने लगा था। भागने की हलतलबी सबके भीतर समा गई थी।
           इस नगर से दूर सभी बच्चों के अपने-अपने विला थे। अब पुराने फर्नीचरों एवं महँगी चीजों से भरे-सजे इस घर को गत्ते के डब्बे की तरह खाली कर देना था। फर्नीचरों को बेच देने की खबर आग की तरह फैल गई। पलंग, अल्मारियाँ, बुक शेल्फ, मेज, कुर्सियाँ-सब नाम मात्र की कीमतों में बेच दी गईं। लेकिन सुंदर, महँगे शोपीस, ऐन्टिक मूर्तियाँ, पीतल-ताँबे-चाँदी के सामान आपस मे बाँट लिये गये। दो दिनों के भीतर ही सजा-सँवरा घर उठते हुए मेले के उखड़ते खेमे-तंबुओं-सा उजाड़ दिखता हुआ वीरान हो गया। बच गये तो कुछ सस्ते शोपीस, जो बच्चों के सुंदर बसेरों के लिए कबाड़ ही बन जाते। दीवार पर टँगी रंगीन पर फैलाये कुछ तितलियाँ बच गईं। अरविन्द जी की प्यारी मिट्टी की कलाकृतियाँ बच गयीं और कुछ बाँस-काठ के शोपीस बच गये। निर्जन घर भाँय-भाँय कर रहा था।
   खाली घर की चाभी पुराने नौकर वसंत को दे दी गई थी। सबके चले जाने के बाद वह भी सो रहा; क्योंकि इतने  दिनों तक दौड़-भाग करते-करते वह भी पूरी तरह थक चुका था। दूसरे दिन सवेरे वह चाभी लेकर चला कि खोलकर देख ले कि घर में क्या बचा हुआ है? उसे बाहर जाते देख उसके बेटे कुणाल ने पूछा, "पप्पा! कहाँ जा रहे हो? "
वसंत बोला, "घर के भीतर जा रहा हूँ। चलेगा तू भी? चल।"
       कुणाल भी मन में एक आशा  लिये उसके साथ लग गया। ताला खोलकर वसंत घर में प्रविष्ट हुआ, साथ में कुणाल भी। दोनों की आँखें खाली कमरों का मुआयना कर रही थीं। कुणाल की नजर हमेशा से शोकेसों पर रहती थी। जब से वह अरविन्द जी के घर में आने-जाने लगा था, तब से शोकेसों के खिलौनों में से कुछ पा जाने का स्वप्न उसके भीतर पलने लगा  था। निर्जन घर में वह सीधे शोकेस की ओर भागा। खाली शोकेस देखते ही उसका दिल बैठ गया कि उसके लिए तो कुछ बचा ही नहीं है। कुछ मिट्टी की मूर्तियाँ पड़ी थीं  जो उसे जरा भी अच्छी नह़ीं लगीं। दीवारों पर टँगी तस्वीरों,  तितलियों और काठ के उड़ते पंछियों  से उसे कोई मतलब नहीं था। वह अधीर-सा इधर-उधर नजरें दौड़ा रहा था। फिर उसे दिखाई पड़ा बाँस का बना जहाज जिसे टूटने के डर से कोई अपने साथ नहीं ले गया था। वह क्या समझता कि किस तरह बाँस से ही तेज हवा से उड़ते हुए पाल बनाये गये थे? हवा से संघर्ष करता जहाज! वह सोच रहा था कि काश वैभव का कोई खिलौना छूट गया हो ! जैसे-स्पाइडर मैन, गन या कार या ऐसा ही कुछ। पुराने खिलौने वाले शोकेस में दो-चार टूटे खिलौने पड़े थे। हताश होकर उसने कहा,
"पप्पा! हूँ...!" रोने के लिए उसकी ठुड्ढी बिचक गयी।
वसंत ने कहा, "क्या है कुणाल? तुझे अचानक क्या हुआ?"
वह न समझ सका कि कुणाल क्यों ठुनका? तभी रोने के लिए नीचे झुके उसके ओठ ऊपर उठकर मुस्कुराने की मुद्रा में आ गये। उसकी आँखें चमक गयीं। उसने आगे बढकर एक शोकेस का शीशा खिसकाया जैसे कह रहा हो,  "खुल जा सिमसिम! "
निचले खंदे में छुपी लाल-नीली-पीली कारों को उसकी खोजी आँखों ने देख लिया था। कुणाल ने अपने छोटे-छोटे  दुबले हाथों से सभी बेतरतीब पड़ी कारें खींच लीं।
"क्या है?" वसंत ने पूछा।
"पप्पा! ये कारें!"
आह्लाद से कुणाल का चेहरा खिल उठा था।
वसंत ने कहा, "देखूँ... देखूँ तो!"
वसंत की आँखें भी चमक उठीं।
कुणाल ने बड़े संतोष के साथ सभी कारों को अपनी गंदी निकर की जेब में डाल दिया। शोकेस में उमर खैयाम हाथ में जाम  लिये बैठे थे और मदहोश नजरों से न जाने  कहाँ  देख  रहे थे!

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