कविताएँ: चित्रलेखा अंशु

चित्रलेखा अंशु
वजूद

तुम्हारा मेरे वजूद के समक्ष रुकना
सिर्फ रुकना नहीं एक सोच का बदलना भी है।
जो सदियों से स्त्रैण समझा जाता रहा है।
कोई चुनौती नहीं अस्तित्व पर तुम्हारे क्योंकि
यह बदलाव भी है एक कुंद विचारधारा की।
जिसमें रुकने का काम करती रही हैं स्त्रियाँ
हम मानते हैं कि कोई घर,जात और समाज नहीं उनका।
संपत्ति, घर और संस्कृति पर तुम्हारा पीढी दर पीढ़ी
पुश्तैनी एकाधिकार रहा है लेकिन
तुम्हारा मेरे वजूद के समक्ष रुकना
ठुकराना भी है सत्ता के उन संकीर्ण विचारों का।
बातों के क्रम में तुम कह गए एक बात कि
तुम्हारा बार-बार रुकना नहीं है व्यवहारिक
तुम भी उस पौरुषीय दम्भ द्वारा हुए दग्धीकृत
जिसे कभी धारण ही नहीं किया था तुमने।
तुम्हारा रुकना समतामूलक संबंधों की नींव है।
तुम्हारा रुकना है बराबरी स्त्री-पुरुष की।
तुम्हारा रुकना एक स्त्री के हृदय पाने जैसा है।
तुम्हारा रुकना आत्मसम्मानहीनता नहीं बल्कि
कुठाराघात है संरचित मान्यताओं पर क्योंकि
बोए गए वंशबीज एक मनुष्य को स्त्री-पुरुष में बाँटकर।
तुम्हारा रुकना मेरी गरिमा को ऊँचा उठाना भी है।
मेरी तन्द्रा भंग मत करो तुम अपने जाने से!
ठहरे रहो, मैं अभी प्रेम में हूँ तुम्हारे रुकने से।


दौड़

जीवन के सम्पूर्ण काल में एक बार
धावक बनता है एक मुसाफिर क्योंकि
यह लक्षित है समर्पण के लिए
जिसे भेदा जाना है
चंद घंटों के अथक मैराथन से
जो किसी चैरिटी का नहीं
न ही किसी ओलम्पिक के लिए है
यह मैराथन जीवन के लक्ष्य की
प्रतिपूर्ती के लिए दौड़ा जाना है।
जीवन के इस एकमात्र दौड़ में
दो धावक प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि
धाराएं हैं दो दिशाओं की
जिन्हें मिलना है अक्ष के केंद्र पर
साथ ही एक धावक दौड़ता है
पाने के लिए दूसरे धावक का हाथ।
यह दौड़ प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं,
दौड़ा गया है साथ के लिए
अनंत सदियों तक।


तुम्हारा दम्भ

यही होता है हर बार मेरे साथ
कुछ अनकहा अनचाहा भी
तुम्हारे लिए आम है मेरे लिए पेचीदा
ये नजरिए की बात है।
तुम भी समझो जरूरी नहीं।
यही तो होता है हर बार
जो बातें लगती मुझे बेमानी सी
वही बातें मतलब की नहीं तुम्हारे लिए।
हर बार तुम्हारे पास होते हैं कितने फितूर
समझाने और बहकाने के लिए मुझे कि
कुछ बहुत अजीब और लिजलिजा भी
कितना खास है तुम्हारे लिए।
मेरी असाधारण प्रतिक्रिया भी
तुम्हारे सामने साधारण सी अधमरी हो जाती है।
तुम्हारा झूठ को जीने वाला यथार्थवादी रवैया
मेरे सच को अकाल मृत्यु दे देता है।
तुम्हें पता है मुझे कैसा लगता है!
कि कर दिया है उत्पीड़ित तुमने
मेरे स्त्रीवाद को फिर से पुरुषवाद द्वारा
केवल करने संतृप्त अपने दम्भ को।
लगा होगा कि ये जीत है लेकिन
जीता है अंदर का पुरुषत्व तुम्हारा
एक बार फिर से हत्या कर दी तुमने
उन उम्मीदों की भी जो प्रक्रिया में थी
तुम्हारे भीतर मानव रूप में जन्मने की।


कैनवास के चित्र

कैनवास पर किसी अमृता शेरगिल
या हुसैन ने बना दी थी एक पेंटिंग
जिसमें नदी के किनारे से अधखुला
बना था एक लकड़ीनुमा रेम्प।
ये मेरी आँखों का तसव्वुर था कि
इंतज़ार किसी का अधखुली बाँहों से।
रोज़ शाम उसपर बैठती एक लड़की
निहारती थी नदी के उस पार अपलक
इंतज़ार था उसे किसी का,
वो कोई मनुष्य नहीं हो सकता।
वो तो यंत्रबद्ध होता है,
वादा भी तोड़ सकता है।
वो बसंत का कर रही थी इंतज़ार।
लोग कहते हैं कि बसंत के मौसम में
प्रकृति अर्धनारीश्वर बन जाती है।
जो खुद को ही करती है सुदीप्त।
स्खलित करती है नवांकुर।
पुरानी पत्तियाँ आत्महत्या कर
लेती हैं पुनर्जन्म नई बेल बनकर।
नहीं, धोखा हुआ है मेरे तसव्वुर को।
बसंत भी देता है धोखा,
एकबार आकर लौट जाने का।
क्या वह पिकासो की मोनालिसा थी?
फिर वो क्यों दिखा रही थी पीठ?
क्या वो नजरें नहीं मिलाना चाहती?
क्या किसी ने उसकी भावपूर्ण आँखों पर
कर डाला था शोध, मापी थी कोंपलों की चर्बी?
नाराज़ है मोनालिसा सबसे,
फेर ली है उसने अपनी पीठ
इंतज़ार में पिकासो की क्योंकि
वही देगा जवाब निरीक्षण करती आँखों का।


तुम प्रकृति: प्रकृति तुम

प्रकृति की मार क्या अलग है हरेक जीवन में!
फुटपाथ पर दर्ज करता अपनी उपस्थिति
वो पथिक भी ले चुका है शरण,
हवा के मार को झेलती अधखुले टेंट में।
कूँ कूँ रातभर रोता रहा वह कुत्ता टपकती ओस में।
रोशनी भी सिकुड़कर आत्ममुग्ध हो गई है।
दूर तक एक ही अनुपात में
दूधिया पहाड़ सा हो गया है समय।
बूढ़े और छोड़ दिए गए मवेशी भी
भूख और प्रकृति की मार से हो गए हैं बेशर्म।
किसी ने फेंक दी थी गर्म चाय की प्याली उस सांड पर
जो चर रहा था गोभी के महंगे फूल और मटर की छीमी।
कुछ लोगों की जानें ठिठुरते मौसम की राह ही देखती हैं।
मर रहे हैं लोग या लोगों में कुछ मर रहा है!
मेरे अंदर भी मरता है कुछ, हर रोज़।
अजीब सी टीस उठती है जानलेवा।
महसूस होती है प्रकृति, तुम, मैं, हम।
भाग-दौड़ भरे इस जीवन में,
जिन्दा रखती हूँ तुम्हें हर रोज़।
यह मौसम की मार वाली प्रकृति नहीं
यह प्रकृति कुछ और ही है।
जिसमें शरद, बसन्त और पतझड़
बदलते समय के आलोक में नहीं
तुम्हारे होने से बदलती है तो क्या,
तुम्हीं हो वह प्रकृति जिसकी मार से
कल वह बीमार बूढ़ा मर गया!
पनियल आँखों वाला वह बछड़ा मर गया!
कूँ कूँ करता रहा वह कुत्ता रात भर,
टपकती उस ओस में।
तो बदल क्यों नहीं देते अपनी प्रकृति,
जो हर रोज़ मारती है कुछ मेरे भीतर
और तुम मुझे फिर से कर देते हो ऊर्जस्वित
कि मैं फिर से लूँ जन्म फिर से मरने के लिए।


आधी रात की कविता

वो लिहाफ की सूखी रुई का गीलापन
सर्दियों की रात मेरी आँखों से निकले
गर्म आँसुओं के गोले ही तो थे।

ये किसी की बेगैरत के नतीजे थे
या फिर मेरे जुर्म का इन्साफ
जो हर हाल में मैंने नहीं किए थे।

जुर्म करनेवालों को इल्म गर होता
तो लोगों के लिहाफ यूँ गीले न होते!
सूख नहीं पाते जो दरख्तों से आती धूप में।

वो जुर्म जुर्म तो नहीं एक सीख ही तो थी
कारगुजारियों की जो कहकहों से निकली
कभी इस तो कभी उस फ़िराक में।

सन्नाटों के बीच सिसकियाँ भी सध नहीं पातीं
उनींदी आँखों में सपने के मानिंद निकलती है
किसी तक पहुँच जाने के लिए।

कोई सुन नहीं पाता इसे क्योंकि
अल्हड़ हाथों से लिखी आधी रातों की कविताएँ
लबरेज़ होती हैं खुद से की गई बेपनाह मुहब्बत से।

जो महरूम होती है छूकर गुज़रनेवाली सर्द हवाओं
कोहराम मचा लौट जानेवाली तूफ़ानी घटाओं और
किसी हमकदम के मिट जाने वाले पैरों के निशाँ से।

2 comments :

  1. The nature never evolved sorrow, pangs and pagans.nature create the human beings soul then society and then system it may patriarchal which abuse the the women a long time. your reflection in poetry is praisable but it does not mean that only man is responsible for it. some elements also revolve around the nature. the number of things gave by man to this material world therefore he didn't condemned its depends on his ability.

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  2. The nature never evolved sorrow, pangs and pagans.nature create the human beings soul then society and then system it may patriarchal which abuse the the women a long time. your reflection in poetry is praisable but it does not mean that only man is responsible for it. some elements also revolve around the nature. the number of things gave by man to this material world therefore he didn't condemned its depends on his ability.

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