समकालीन हिन्दी कविता और मुक्तिबोध

संदीप तानाजी कदम

भवानीनगर, तहसील-वालवा, जिला-सांगली, पिन-415302 (महाराष्ट्र)


      कविता मूलत: युग संदर्भों की देन होती है।  उसमें अतीत के चित्रण और भविष्य के संकेत भी युग संदर्भ से जुड़कर ही आते हैं। इसलिए यह कहना उचित होगा कि प्रत्येक रचना समकालीन होती है। किंतु युग संदर्भों के साथ काव्य प्रवॄत्तियों में निरंतर परिवर्तन होता चला आया, इसलिए अपनी व्यापकता में प्रत्येक रचना समकालीन है। उसके पीछे कुछ अन्य कारण भी है।  वास्तव में समकालीन का अर्थ है-अपने समय का। स्वतंत्रता के बाद साहित्य सॄजन के जो नए आयाम विकसित हुए उन्हें विभिन्न दशकों में विभिन्न नामों से जाना जाता हैं। कविता के बारे में हम विचार करे तो समकालीन कविता के लिए समसामायिक, युगीन एवं अद्यतन आदि नामों से जाना जाता हैं।

       समकालीन में वर्तमान बोध ही अतीत और भविष्य का विवेक सम्मत बोध होता है। यह विशिष्ट वर्तमान बोध ही समकालीनता को अभिव्यक्ति देता है।  सन 1960 के बाद ऐसी अनेक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक घटनाएँ घटित हुर्इ जिनके कारण आदमी, नवस्वतंत्रता, उससे मिलने वाले काल्पनिक आश्वासनों की स्थिति से ऊबकर एक नर्इ सोच के लिए प्रयत्नशील हुआ। आम आदमी में जब यह सोच आयी तब उसने सत्ता के विरोध में अपने आप को खडा कर लिया। क्योंकि आम आदमी का तत्कालीन राजनीति से मोहभंग होने लगा। आम आदमी राजनीति, समाज, धर्म, शिक्षा, भ्रष्टाचार, शोषण, भेदभाव, जातिव्यवस्था, वर्णसंघर्ष एवं मूल्यों का विनाश जैसी समस्याओं से ग्रस्त था। जो अधिकतर स्वाधीनता के पश्चात् की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित थी। जिससे समकालीन विचारधारा का अविर्भाव कविता में परिलक्षित होने लगा। वास्तव में समकालीनता का सीधा आशय है-अपने समय के प्रति सच्चा होना। अपने समय के प्रति व्यक्ति तभी सच्चा होता है जब वह संकटों की परवाह किये बिना समय के क्रूर यथार्थ की ज्वाला में जलता हुआ अदभुत साहस के साथ समय को चुनौती भी देता है। जैसा कि कबीर ने लिखा है -
“हौं घर जाल्यौ आपना लिये लुकाठी हाथ
जो घर जालै आपना चलै हमारे साथ।”1

       समकालीनता के बारे में कबीर की यह परिभाषा सार्वकालिक एवं सार्थक है। क्योंकि यहाँ जलना क्रूर यथार्थ की ज्वाला से जुझने का पर्याय है। व्यवस्था के प्रति विद्रोह है। विजेन्द्र भी लिखते है-“समकालीनता का अर्थ भौतिक रूप से जो घटित हो रहा है, मात्र उतना नहीं है बल्कि जो कुछ क्षतिग्रस्त है। उनकी पुनर्रचना की सॄजनशील चेष्टाएँ और जीवन की समोन्नत तथा सुंदर एवं मनोहारी बनाने की परिकल्पना ही उसी समकालीनता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।”2

       आज समकालीन कविता के नाम से एक नयी परम्परा विकसित हो गयी है। यह नयी परम्परा सन 1960 के बाद विकसित हुर्इ। इस प्रकार आज जब हम समकालीन कविता शब्द का प्रयोग करते हैं तो इसका आशय एक विशेष युग की कविता से होता है। वास्तविकता तो यह है कि साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति में जो ‘साहित्य भाव’ कहा गया है उस साहित्य का समकालीन के साथ होना ही है। इस प्रकार बिना समकालीन बोध के साहित्य अपनी अर्थवत्ता ही सिद्ध नहीं कर सकता। इस दॄष्टि से कविता का इतिहास समकालीन बोध का ही इतिहास होता है। जिसे आज समकालीन कविता कहा जाता है। उसका प्रारंभ निराला से हो गया था। निराला मूलत: छायावादी कवि थे। लेकिन उनमें भावी कविता के बीज विद्यमान हैं। इसलिए अपने अस्फुट रूप में समकालीन कविता छठें दशक से ही लिखी जाने लगी थी। आज जब समकालीन कविता की बात की जाती है तो निश्चित रूप से इसका आशय प्रयोगवाद, नर्इ कविता, अकविता जैसी काव्य चेतनाओं से नहीं होता क्योंकि ये इतिहास के अंधेरे में गुम हो गयी काव्य प्रवॄत्तियाँ हैं। जबकि समकालीन कविता उसके बाद अपनी कुछ नयी मान्यताओं को लेकर उभरी काव्य-चेतना है।

समग्र रूप में यह कहा जा सकता है कि समकालीन कविता एक ऐसी काव्य-चेतना का नाम है जो छठें दशक के बाद उभर कर सामने आयी, जिस पर विचार तत्व का प्रभाव है। जो अपने परिवेश से प्रतिबध्द है, जिनमें मोहभंग से उत्पन्न दयनीयता नहीं है वरन् परिवेश से जुड़ाव है। इसलिए वर्तमान संदर्भ की जीती विसंगतियों से जूझती, और उसपर चोट करती हुर्इ आज की उस कविता को समकालीन कविता माना जाता है। समकालीन कविता के प्रमुख कवियों में रामदरश मिश्र, केदारनाथ सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, चंद्रकांत देवताले, धूमिल, अशोक वाजपेयी, विजेंद्र भागवत रावत, रमेशचंद्र शाह, मंगलेश डबराल, विनोदकुमार शुक्ल, शोभनाथ यादव, राजेश जोशी, लिलाधर जगूडी एवं विनय दुबे आदि कवियों के नाम आते हैं। इनमें से मुक्तिबोध की कविताओं में ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति आप हर स्थान पर देख सकते है जो क्रियाशील चिन्तन, प्रक्रिया से गुजरती कठिनाइयों का सामना करता हुआ उनसे जुझते हुए उनका अतिक्रमण कर जाने की इच्छा लिए खड़ा है। इस कारण हम कह सकते है कि मुक्तिबोध वस्तुत: एक ऐसे कवि है जिनके जीवन, परिवेश और सॄजन को परस्पर अलग करना असंभव है।

समकालीन हिन्दी काव्य में मुक्तिबोध एक ऐसे साहित्यकार है जिनका जीवन और काव्य एक दूसरे से समांतर है, परस्पर पूरक है। उनके काव्य में इसकारण ही युगीन अभिव्यक्ति सशक्त है। मानवीय जीवन के विविध आयाम उनकी लम्बी कविताओं में दिखार्इ देते हैं। यह आयाम मानवीय जीवन की टकराहट एवं संघर्ष को उद्घाटित करते है। इस कारण कवि मुक्तिबोध अपने युगीन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए दिखार्इ देते है। ऐसे महान कवि मुक्तिबोध जी का जन्म 13 नवम्बर 1917 र्इस्वी को ग्वालियर के एक कस्बे श्यौपुर में एक महाराष्ट्रीय परिवार में हुआ था। पिता माधव मुक्तिबोध पुलिस में थे और माता पार्वतीबार्इ शिक्षित एक धर्मपरायण महिला थी। मुक्तिबोध की आरंभिक शिक्षा उज्जैन, विदिशा, अमझरा, सरदारपुरा आदि स्थानों पर हुर्इ। वे बचपन से ही जिज्ञासु थे। राष्ट्र में व्याप्त अव्यवस्था एवं विसंगतियों से वे बेचैन थे। कॉलेज जीवन से ही उन्होंने साहित्य के अध्ययन में रस लेने का प्रयास किया था। परिणामत: उनकी रचनाएँ भी पत्रिकाओं में छपने लगी थी। किंतु पिता की चाह बेटा लेखक न बनकर कुछ और बनने की थी। इस बारे में शमशेर बहादुर सिंह का कथन है-“पिता चाहते थे कि बेटा वकील बने। बड़े-बड़े मुकदमे हाथ में ले। खूब कमाये और सामाजिक प्रतिष्ठा में उनसे भी ऊपर उठे।”3 पर बेटा वकील न बनकर साहित्यकार बन बैठा। मुक्तिबोध ने परिवार के विरोध के बावजूद शांताबार्इ से विवाह किया था। आखिर माता-पिता को भी यह विवाह स्वीकार करना पड़ा था। लेकिन इस विवाह के कारण मुक्तिबोध के जीवन में संघर्ष का सिलसिला प्रारंभ हुआ और अंतिम समय चलता रहा।

मुक्तिबोध अध्यापक, पत्रकार, कवि, कथाकार और समीक्षक भी थे। इनकी कविता में संघर्ष, घुटन, टूटन, शोषण और खालीपन की अभिव्यक्ति है। मुक्तिबोध के लेखन कार्य की शुरूवात 1935 र्इ. से मानी जाती है। 1935 का काल छायावाद का उत्कर्षावस्था का समय था, किंतु दूसरी ओर इस काव्य के विरूद्ध प्रतिक्रियात्मक स्वर भी उठने लगे थे। इसके बीच मुक्तिबोध के रचना की शुरूआत संधिकाल से प्रारंभ होती है। उसके बाद उनकी कविताएँ दीर्घ से दीर्घोत्तर होती चली गर्इ। मुक्तिबोध मूलत: जनवादी कवि थे। उन्होंने अपने जीवन में अधिकांश रूप में कविताएँ ही लिखी हैं। जो तारसप्तक, चाँद का मुँह टेढा है और भूरी-भूरी खाक धूल जैसे काव्यसंग्रह में प्रकाशित की हैं। जिसमें से आत्मा के मित्र मेरे, दूर तारा, मॄत्यू और कवि, विहार, नाशदेवता, आत्म-संवाद, हे महान, ब्रह्मराक्षस, अंधेरे में, लकड़ी का बना रावण, चम्बल की घाटी में, ओ मसीहा, बारह बजे रात के, एक मित्र के प्रति, जिंदगी का रास्ता, उलट-पुलट शब्द आदि कविताएँ प्रसिद्ध भी हैं।
मुक्तिबोध का युग परिवेश-

       मानव समाज में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की परिस्थितियों और युग परिवेश से प्रभावित रहता है। मुक्तिबोध ने भी जागरूक और संचेतन साहित्यकार के रूप में जीवन की परिथितियों को चुनौतियों के रूप में स्वीकार किया है। उन्हें साहसी, संकल्पशील और जुझारू साहित्यकार के रूप में देखा जाता है। क्योंकि परिवेश और परिस्थितियों के आधारपर ही मुक्तिबोथ का साहित्य सृजन हुआ है। व्यक्ति की अवनति तथा उन्नति परिस्थितियों पर निर्भर करती है। कभी-कभी परिस्थितियाँ मनुष्य के जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल हुआ करती है। इसी कारण मुक्तिबोध के काव्य का विकास करने वाली सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कॄतिक परिस्थितियाँ उस समय विविध रूपों में परिवर्तित हो रही थी। इन्हीं परिस्थितियों को हम निम्नरूप से देख सकते है-

1. सामाजिक परिवेश -
       भारत की समाज व्यवस्था सुचारूपूर्ण और अनुशासित बनाने में जाति, ग्रामीण समुदाय और संयुक्त परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान था। संयुक्त परिवार की सत्ता के कारण मनुष्य को पूरे परिवार की चिन्ता नहीं रहती थी। भारतीय समाज में मनुष्य अनुशासित रहकर अपना विकास करता था। पर ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय समाज को उच्चवर्ग, मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग आदि तीन वर्गों में विभाजित कर दिया। इतना ही नहीं जनता को अनेक प्रकार की बुरार्इ एवं कुप्रथाओं का भी शिकार बनाया। बालविवाह, सतीप्रथा, छुआछूत, पर्दाप्रथा आदि बुरार्इयाँ भी समाज में व्याप्त थी। मुक्तिबोध ने समाज में फैले अवसरवाद और भ्रष्टाचार भलीभाँति पहचाना और जातिभेद, वर्णव्यवस्था, नारी शिक्षा, स्वतंत्रता और शोषण आदि समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया।

     मुक्तिबोध दुनिया को बदलना चाहते है, उसके लिए वे प्रयत्नशील है और शोषितों, पीडितों की मुक्ति के लिए उनका अन्तर्मन बेचैन है। इसलिए अपनी कविता में जीवन की विषमताओं, कुण्ठाओं एवं विसंगतियों का भरपूर चित्रण करते है। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ इस कविता में भी कवि ने समाज में व्याप्त विषमताएँ दूर होकर सुंदर जीवन का आलोक प्राप्त होने की बात की है। जैसे-
“सुबह होगी कब और मुश्किल होगी दूर कब।
समय का कण-कण गगन की कालिमा से।
बूंद-बूंद चू रहा। तड़ित उजाला बन।”4

       वर्तमान सामाजिक समस्याओं से जूझते हुए उन्हें ज्ञात हुआ कि जीवन के सभी क्षेत्रों में फैली हुर्इ विषमतापूर्ण वातावरण का कारण समाज व्यवस्था का दोषपूर्ण होना है। जिसे बदले बिना मनुष्य का विकास सम्भव नहीं है।

2. राजनीतिक परिवेश-
       साहित्य पर राजनीति का प्रभाव गहरे संदर्भ में पड़ता है। क्योंकि जनजीवन को राजनीति बहुत अधिक प्रभावित करती है। काँग्रेस की स्थापना के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में सरगर्मी फैलने लगी। क्रान्तिकारियों की सरगर्मीयाँ तेज हो गयी थी। काँग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता एक-दूसरे का कुप्रचार करने में लग गए थे। जनता इससे अलग होकर अंग्रेजी साम्राज्य से जूझ रही थी। भारत में सभी जगह व्यापक असंतोष, साम्प्रदायिक दंगे, भ्रष्टाचार, पूँजीपतियों के अधिकार, चुनाव, अवसरवाद, रिश्वतखोरी, स्वार्थ परायणता, झूठे आश्वासन से जनता निराश की परिस्थितियों से गुजरने लगी थी। चुनावों में जातिवाद का व्यापक उपयोग किया जाता है। नौकरी तथा अन्य क्षेत्रों में भी जातिवाद और भार्इ-भतीजावाद जोर पकड़ा रहा है।

मुक्तिबोध ने जब राजनीतिक स्थिति पर लिखना शुरू किया। तब देश में स्वतंत्रता आंदोलन का समय था। इसी कारण उनकी कविताओं में राजनीतिक स्वर की विशेष महत्ता है। राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त अवसरवाद, भ्रष्टाचार, पदलालसा, खोखली नारेबाजी के अनेक उदाहरण उनकी कविताओं में मिलते हैं। भ्रष्टाचार के बारे में वे कहते है-“जिस भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और अनाचार से आज हमारा समाज व्यथित है, उसका सूत्रपात बुजुर्गों ने किया। स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरान्त भारत में दिल्ली से लेकर प्रांतीय राजनीतियों तक भ्रष्टाचार और अवसरवादिता के जो भी दॄश्य दिखायी दिए उनमें बुजुर्गों का बहुत बडा हाथ हैं।”5 मुक्तिबोध की कविता में राजनीतिक चेतना वह महत्त्वपूर्ण पहलु है जो युगीन परिप्रेक्ष्य को अपनी सम्पूर्णता में व्यक्त करता है। मुक्तिबोध ने केवल विश्व की राजनीति और साम्राज्यवादी शक्तियों की क्रियाशीलता की ओर संकेत नहीं किया बल्कि भारत वर्ष में क्रियाशील राजनीति का जिक्र किया है। भारत में जो साम्राज्यवादी, पूँजीवादी और बुध्दिवादी लोगों की क्या भूमिका है, उसे निम्न पंक्तियों में प्रस्तुत किया है -
“साम्राज्यवादियों के / पैसों की संस्कॄति
भारतीय आकॄति में बँधकर / दिल्ली को
वाशिंग्टन व लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है !
भारतीय धनतन्त्री / जनतन्त्री बुध्दिवादी
स्वेछा से उसी का ही कुली है।”6

3. आर्थिक परिवेश-
आर्थिक परिस्थिति हर मनुष्य के जीवन में महत्त्वपुर्ण स्थान रखती है। भारत कॄषिप्रधान देश है। इसलिए सरकार ने भी कॄषि को विस्तॄत करने के लिए और सुधारने के लिए विभिन्न साधन और उपकरण उपलब्ध कराये। जमींदार और तालुकेदार की जमीन की जब्ती करके भूमि संबंध में परिवर्तन लाये। किसानों को साहूकारों के शोषण से बचने के लिए सहायता दी। फिर भी पूँजीपति अर्थव्यवस्था ने जनता में असंतोष और निराशा को जन्म दिया। भारत में आजादी के बाद जिस राज्य का उदय हुआ वह पूँजीवादी राज्य है, और पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। मुक्तिबोध देश की आर्थिक स्थिति और सरकारी अर्थनीतियों को सूक्ष्मता से देख रहे थे। ‘नया खून’ और ‘सारथी’ में लिखे अनेक लेखों में उन्होंने आर्थिक जगत में होने वाली गतिविधियों और परिणामों का उल्लेख किया है। जिसमें अकाल, कंगाली तथा महंगार्इ आदि का उल्लेख किया हैं। ग्रामों में जमींदार और शहरों में उद्योगपति या पूँजीपति आम जनता का शोषण करती है।

मुक्तिबोध जीवन में आयी यांत्रिकता का कारण मशीनीकरण को नहीं, बल्कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को मानते है। औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप समाज दो वर्गों में बँट गया-एक पूँजीपति और दूसरा मजदूर वर्ग। आर्थिक विषमता ने समाज में अवसरवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया। मुक्तिबोध ने इस अवसरवाद प्रवॄत्ति को पहचानकर स्वार्थपरता की भयावहता को निम्न पंक्तियों में दर्शाया है-
“सोचता हूँ विवाद में ग्रस्त कर्इ लोग / सत्य के बहाने
स्वयं को चाहते हैं प्रस्वावित करना / अहं को तथ्य के बहानेI
मेरी जीभ एकाएक तालु से चिपकती / अक्ल क्षारयुक्त सी होती है
और मेरी आँखें उन बहस करने वालो के / कपडों में छिपी हुर्इ
सघन रहस्यमयी लम्बी पूँछ देखती / और मैं सोचता हूँ
कैसे सत्य है ढाँक रखना चाहते हैं बडे-बडे नाखून
किसके लिए हैं वे बाघ नख / कौन अभागा वह।”7

4. धार्मिक परिवेश -
अंग्रेजी सभ्यता का प्रभाव इस काल में देखा गया। अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव धर्म के साथ साथ भारतीय सामाजिक जीवन में भी पड़ा। ज्ञान और विज्ञान का आलोक चारों ओर फैलने लगा। कर्मकाण्ड एवं रीतियों पर इसका व्यापक असर देखने को मिला। ढोंग, बाह्याचार, रूढियाँ एवं धार्मिक कुरीतियाँ बढती हुर्इ दिखार्इ देने लगी। स्वामी दयानन्द के ‘आर्य समाज’ द्वारा इसमें सुधार लाने का युगान्तकारी कार्य हुआ। पर वे उन्हें पूरी तरह से समाप्त नहीं कर पाये। भारतीय इतिहास में सुधारवादी आन्दोलन का बहुत बडा महत्त्व रहा है, क्योंकि इन्हीं के कारण देश में अशिक्षित जनता में एक नये प्रकार का जागरण देखा गया। भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ। मुक्तिबोध ने भी प्राचीन मूल्यों को छोडकर नवीन मूल्यों को अपना लिया। रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, अंधविश्वास को अपने से अलग कर देते है। र्इश्वर की सत्ता अध्यात्म के नाम पर चल रहा दिखावा, ढोंगीपन एवं आडम्बर पर करारा व्यंग्य किया है। पुरानी परम्परागत धार्मिक प्रवॄत्ति, संस्कॄति तथा र्इश्वर सत्ता के भय के आड़ में चल रहे अन्धविश्वासों, व धर्मांडबर पर भी व्यंग्य किया है। मुक्तिबोध र्इश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते है। उन्होंने र्इश्वरवादी दर्शन का मज़ाक उड़ाया है। जो र्इश्वर को मानते है, उनपर मुक्तिबोध व्यंग्य करते हुए कहते है -
“मात्र अनस्तित्व का इतना बडा अस्तित्व / ऐसे धुप्प अंधेरे का इतना तेज उजाला
लोग बाग /  अनाकार ब्रह्म के सीमाहीन शून्य के
बुलबुले में यात्रा करते हुए गोल-गोल / गोल-गोल
खोजते है जाने क्या बेछोर सिफर के अँधेरे में बिला बत्ती सफर / भी खूब है।”8

5. सांस्कॄतिक परिवेश -
मुक्तिबोध संस्कॄति को जड स्थिति नहीं, निरंतर प्रक्रिया मानते है। इसलिए जब वे सांस्कॄतिक परम्परा की बात करते है तो जड रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों और मिथ्या अंधविश्वासों को उससे अलग कर देते हैं। मुक्तिबोध के अनुसार सांस्कॄतिक, साहित्यिक क्षेत्र पर उच्चवर्ग का अधिपत्य होता है। अत: जनता के मनोभाव, उसके कष्ट, उसका संघर्ष, उसकी निर्माण क्षमता, साहित्य और कला में प्रकट नहीं हो पाती। वर्तमान समाज में आये परिवर्तन, बदले हुए परिवेश में सांस्कॄतिक विरासत की सार्थकता को निरंतर परखते रहे थे। मुक्तिबोध विदेशी स्रोतों से प्रेरणा लेने का विरोध नहीं करते। आज जब दुनिया छोटी होती जा रही है तो दूसरों के अनुभवों से शिक्षा और प्रेरणा लेना गलत नहीं है।

अपने देश के प्रति देश की संस्कॄति और परम्परा के प्रति मुक्तिबोध को लगाव है। वह उनकी कविताओं में व्यक्त हुआ है। देश के प्रति प्रेम की सशक्त भावना इस कवि में कूट-कूट कर भरी है। उनका मानना है बलिदानी, त्यागी देशभक्तों के सम्मान में हमे प्रेम तथा त्याग भावना की गंध फैलानी चाहिए। इसपर कवि अपने शब्दों में कहते है-
“जिनके स्वभाव के गंगाजल ने / युगों-युगों को तारा है।
जिनके कारण यह हिन्दुस्तान हमारा है।
कल्याण व्यथाओं में घुलकर / जिन लाखों हाथों पैरों ने यह दुनिया
पार लगायी है / जिनके की पूत पावन चरणों में
हुलसे मन / ये किये निछावर जा सकते सौ-सौ जीवन।”9

       मुक्तिबोध ने खुली आँखों से जीवन जगत् की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कॄतिक परिस्थितियों और परिवेश को देखा था। इन स्थितियों से उत्पन्न त्रासदी, दुख तथा शोषण के चक्र को भोगा था और घुट-घुटकर जिया भी था। जीवन जगत् के इस यथार्थ को उन्होंने चिन्तन के धरातल पर स्पष्ट रूप में प्रकट भी किया है। जिसमें किसी भी प्रकार की बनावटी नहीं है। मुक्तिबोध का काव्य संघर्ष का काव्य है, जनजागरण का काव्य है। उनके काव्य में आम आदमी की संवेदना महकती है। उनकी कविता आम आदमी के सत्य और यथार्थ का आईना है। मुक्तिबोध की कविता एक ऐसी सच्चायी है जो निरंतर सोचने के लिए प्रेरित करती है। यही कारण है कि उन्होंने अपना समस्त साहित्य एक मानववादी दॄष्टिकोण को अपनाकर अभिव्यक्त किया है।


संदर्भ ग्रंथ ­ 
1. कबीर, साखी, संपादक - जयदेव सिंह, पॄ. क्र-80
2. पहल, अंक-37, संपादक - ज्ञानरंजन, पॄ. क्र-17
3. चाँद का मुँह टेढा है मुक्तिबोध, पॄ. क्र-13
4. चाँद का मुँह टेढा है मुक्तिबोध, पॄ. क्र-68
5. मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड - 4 ­ संपादक - नेमिचंद्र जैन, पॄ. क्र-317
6. मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड - 2 ­ संपादक - नेमिचंद्र जैन, पॄ. क्र-77
7. मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड - 2 ­ संपादक - नेमिचंद्र जैन, पॄ. क्र-181
8. मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड - 2 ­ संपादक - नेमिचंद्र जैन, पॄ. क्र-189
9. चाँद का मुँह टेढा है मुक्तिबोध, पॄ. क्र-196
10. मुक्तिबोध: कवि और काव्य  डॉ. अय्युब पठाण

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