दो कविताएँ: राजगोपाल सिंह वर्मा

राजगोपाल सिंह वर्मा

स्त्रियोचित होना नैसर्गिक है क्या?

एक महान विचारक ने कहा था,
'स्त्री पैदा होती नहीं...
बनाई जाती है'.
उसमें डाले जाते हैं कुछ तत्त्व,
जो करते हैं उसे पुरुषों से भिन्न
जैसे स्नेहिल प्रकृति,
प्रफुल्लता का आवरण,
करुणा की देवी,
शिशुवत सहजता,
संवेदनाओं की अनुभूतियाँ,
मधुरभाषिणी,
सदैव ऊष्मित व ऊर्जित,
नैसर्गिक रूप,
समझदार भी हो वह स्वयं,
दूसरों का समझे मन,
सहज़विश्वासी हो,
और हो दयालु,
कर सके निःस्वार्थ समर्पण,
देकर तिलांजलि
स्वयं की भावनाओं की!

और कैसे होते हैं हम पुरूष...
आक्रामकता होता पहला लक्षण,
महत्त्वाकांक्षी भी होते,
विश्लेषण करते पहले,
फिर पत्ते अपने खोलते,
प्रतिस्पर्धा में खो देते,
न जाने कितनी दिन-रातें,
आत्मनिर्भर खुद को समझते,
शासक भी स्वयं बन जाते,
करते निर्धारित दायरे,
खुद ही मानक बना डालते!

दैहिक विविधता से प्रबल है स्त्री
सांस्कृतिक अस्मिता भी है
अर्थपूर्ण उसके लिए,
स्त्रीत्व का पुनर्जीवन
कहीं बदल न दे
स्त्रियोचित होने की
कुछ परिभाषाएँ,
बहुत संभव है
कि पुरुषोचित गुण
हों जाएँ निषेचित
उसकी भी कोख में,
फिर देखना तुम कि
अस्तित्व का संकट
किस पर आता है,
सिर्फ मुख्यधारा में
चाहती है आना वह भी
हक़ है जो उसका,
न घर का अलंकार है
और न प्राण प्रतिष्ठित देवी,
गर होती वह ऐसी ही
तो क्यूँ नहीं बन सकी
एक पहचान उसकी,
कब तक सहती रहे वह
एक पुराना... अनकहा दर्द
और जिये सिर्फ तुम्हारा मन,
स्त्री है वह… तभी कारण हैं
गर्वित होने के उसके पास!

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स्त्री होना…

स्त्री होना सरल है…
भ्रूण में निर्धारित होता है
उसका जन्मना…
जैसे गणित के किसी
प्रश्न का उत्तर होता है
उतना ही सटीक।

कोई देश हो,
हो चाहे कोई दरवेश,
स्त्रीगत मजबूरियाँ,
एक सी ही होती हैं,
कुछ जाना-पहचाना सा
परिस्थिगत आवरण
पहनती है वह,
मुखरता कम भाती है उसे,
पितृसत्तात्मक संरचना में,
कुछ भय, कुछ संशय भी है
छिपा हुआ कहीं गहन,
कि उसकी भावनाओं का
हो न रहा हो दोहन,
अनजाने में ही,
इसलिए,
वह सतर्क होती है,
हर क्षण, हमेशा।

गहन नींद में भी,
कब हुई अलग वह
देह की विडम्बनाओं से,
एक परिधि में,
रहना ही है उसे
और उस परिवेश के भीतर
एक और खिंचा है घेरा...
लक्ष्मण रेखाओं का,
न जाने कितनी रेखाएँ,
रेखाओं के भीतर रेखाएँ,
जंजाल उनका,
जो काटती हैं कभी-कभी
एक दूसरे को भी,
कब तब होगा,
दोहन उसकी भावनाओं का
कौन जाने।

यह जानना पर्याप्त है कि,
सत्य का दर्पण है वह,
नैसर्गिक सम्बन्धों की
बानगी है वह,
सामाजिक विकृतियों से परे,
अनुपम संरचना है...
यह जिन्दगी नहीं चुनी,
उसने स्वयं,
परन्तु उस पथ को,
आलोकित किया है
अपनी रौशनियों से ही
उसने शिद्दत से।

हर दिन… हर सवेरे
फिर से ऊर्जित होती है वह,
दिन भर की
अंतहीन यात्राओं के लिए,
अपने पड़ाव से
गंतव्य की ओर,
चलते ही जाना है उसे
इस अनंत यात्रा में!

2 comments :

  1. स्त्री की स्तिथि को इतनी गहराई से वर्णित करने के लिए आप की ये कविताएं काबिले तारीफ है। गहन चिंतन और सुंदर लेखन ।

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  2. गहन चिंतन और सुंदर लेखन।

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