प्रेमचन्द साहित्य में भारतीय किसान

गीता कपिल

गीता कपिल

 भारत की पहचान एक कृषि प्रधान राष्ट्र के रूप में रही है। स्वाधीनता पूर्व यहाँ की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में निवास करती थी, आज यह आँकड़ा कम तो हो गया है, परन्तु अभी भी हमारे देश में गाँव बहुतायत में हैं। जहाँ स्वाधीनता के 70 वर्षों बाद भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ग्रामीण समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि व कृषि आधारित है, परन्तु दुर्भाग्य आज भी हमारे किसानों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। आज भी वे ऋण के बोझ तले दबा हुआ आत्महत्या करने को विवश है। आज प्रत्येक वस्तु की कीमत आसमान पर है, परन्तु किसान इन बढ़ती कीमतों का सांझीदार कभी नहीं बन पाता, बिचैलिये और व्यापारी उसकी मेहनत का भरपूर फायदा उठाते हैं और किसान उसी गरीबी और बदहाली में अपने दिन काटता है।

 प्रेमचन्द ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने भारतीय किसान की दयनीय स्थिति के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति ही नहीं बेचैनी और चिन्ता भी व्यक्त की। उनका स्पष्ट मत था कि किसान की आर्थिक मुक्ति के बिना पूर्ण स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे किसानों के महत्त्व व उनकी दयनीय दशा के सम्बन्ध में लिखते हैं, "भारत के अस्सी फीसदी आदमी खेती करते हैं। कई फीसदी वह हैं, जो अपनी जीविका के लिए किसानों के मुहताज हैं, जैसे गाँव के बढ़ई, लुहार आदि। राष्ट्र के हाथ में जो कुछ विभूति है, वह इन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत का सदका है। हमारे स्कूल और विद्यालय, हमारी पुलिस और फौज, हमारी अदालतें और कचहरिया सब उन्हीं की कमायी के बल पर चलती हैं, लेकिन वही जो राष्ट्र के अन्न और वस्त्रदाता हैं, भरपेट अन्त को तरसते हैं, जाड़े-पाले में ठिठुरते हैं, और मक्खियों की तरह मरते हैं।" 

 वस्तुतः भारतीय किसान और उसकी समस्याओं को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने का प्रथम प्रयास प्रेमचन्द ने ही किया। उनका ‘प्रेमाश्रम’ हिन्दी का पहला उपन्यास है, जिसमें किसानों के संघर्ष व समस्याओं की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। इसके पश्चात् ‘कर्मभूमि’ ‘गोदान’ जैसे उपन्यासों और ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूँ’ तथा ‘मुक्ति मार्ग’ जैसी कहानियाँ विशुद्ध किसानी जीवन पर केन्द्रित हैं। इसके अतिरिक्त भी किसानों के शोषण, बदहाली और संघर्ष के प्रामाणिक व यथार्थ चित्र उनके साहित्य में यत्र-यत्र देखे जा सकते हैं।

 प्रेमचन्द मानो भारतीय किसान के जीवन का कोना-कोना झाँक आये हैं। उन्होंने बड़ी शिद्दत से यह अनुभव किया कि भारतीय किसान घोर परिश्रमी है, किन्तु अपने कठिन परिश्रम का फल उसे नहीं मिल पाता है, फलस्वरूप वह गरीबी और बदहाली में सम्पूर्ण जीवन बिता देता है। इसके अतिरिक्त वह अशिक्षित व अज्ञनी है, इस कारण वह निरन्तर शोषण के चक्र में पिसता है। प्रेमचन्द की मुख्य चिन्ता "किसान का शोषण है। उन्होंने किसान के शोषकों की एक कड़ी के रूप में अंग्रेजी साम्राज्यवाद को देखा। उन्होंने यह भी दिखाया है कि किसान के शोषण का कारण ब्रिटिश साम्राज्यवादी ही हैं, उन्हीं के कारण जमींदार, सूदखोर तथा इनकी नौकरशाही शोषण कर रही है।"  ये शोषक शक्तियाँ चहुँ ओर से किसान को नोच-खसोट रही है। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए सभी एकजुट हैं और एकजुट होकर शोषण करती हैं। किन्तु भोला-भाला अशिक्षित किसान उनके इस षड़यन्त्र को समझ नहीं पाता। उसमें एकता नहीं है आपसी फूट और बैर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। ‘गोदान’ का होरी अपने भाइयों के अलग्योझे से टूट जाता है तो ‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी का शंकर भी भाई के अलग हो जाने से किसान से बंधुवा मजदूर बन जाता है।

 ‘सवा सेर गेहूँ’ शोषक शक्तियाँ विविध रूपों में किसानों का शोषण करती हैं। इनमें एक ओर जमींदार और उसके करिन्दे हैं, दूसरी ओर गाँव के महाजन व सूदखोर पंडे-पुरोहित व दौरों पर आने वाले कर्मचारी हैं, जिनका पेट भरते-भरते किसान दम तोड़ देता है। ‘गोदान’ में रामसवेक मेहतो किसान के इस शोषण के सम्बन्ध में कहता है- "यहाँ तो जो किसान है, वह सबका नरम चारा है। पटवारी को नजराना और दस्तूरी न दे तो गाँव में रहना मुश्किल। जमींदार के चपरासी और कारिन्दों का पेट न भरे तो निबाह न हों। थानेदार और कानिसिटबिल तो जैसे उसके दामाद हैं, जब उनका दौरा गावँ में हो जाये, किसानों का धरम है, वह उनका आदर सत्कार करे, नगर-नियाज दे, नहीं एक रिपोर्ट में गाँव का गाँव बंध जाये।"

 धर्म भारतीय जन-जीवन का अहम् हिस्सा है। प्रेमचन्द किसान की बदहाली का दूसरा प्रमुख कारण धर्म व धर्म की आड़ में किए जाने वाले शोषण को मानते हैं, फलतः अपनी रचनाओं में उन्होंने अनेकत्र धार्मिक पाखण्डों की पोल ही नहीं खोली है, वरन् उनके शोषण का यथार्थ रूप भी सामने रखा है। किसान मूलतः धर्मभीरू और भाग्यवादी होता है, अतः धर्म के ठेकेदारों द्वारा बार-बार ठगा जाता है। ‘गोदान’ का होरी अपनी मर्यादा बचाने के लिए आजीवन संघर्ष करता है, किन्तु उसकी मर्यादा अन्त में तार-तार हो उसे ग्लानिबोध से पीडि़त करती है। उसके गाँव का पुरोहित दातादीन बहुत धूर्त और चालाक है। किसान को ठगने के सारे हथकण्डों से वह परिचित है। अतः "वह चोरी तो न करते थे, उसमें जान जोखिम था, पर चोरी के माल में हिस्सा बँटाने अवश्य पहुँच जाते थे। कहीं पीठ में धूल न लगने देते थे।"  इसी प्रकार लाला पटेश्वरी भी प्रत्येक पूर्णिमा को सत्यनारायण की कथा सुनते दूसरी ओर असामियों को आपस में लड़ा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते। यही धार्मिक अलम्बरदार समाज के नियामक हैं तथा होरी जैसे भोले-भाले किसान इनके षड़यन्त्रों में फँसकर पिसते जाते हैं। गोबर द्वारा विधवा झुनिया से विवाह कर लेने पर ये बिरादरी के दण्ड के रूप में होरी को लूट लेते हैं। होरी यह सब जानता है, किन्तु बिरादरी का भय उस पर इस कदर हावी है "हम सब बिरादरी के चाकर हैं, उससे बाहर नहीं जा सकते... आज मर जाये तो बिरादरी ही तो इस मिट्टी को पार लगायेगी।"  प्रेमचन्द की रचनाओं में धार्मिक शोषण के ये चित्र यह सोचने को विवश करते हैं कि किसान को उस शोषण से बचाने के लिए शिक्षित वर्ग को भी आगे आना होगा।
 अपनी आर्थिक जरूरतों को किसान अपनी उपज से पूरा नहीं कर पाता है। अतः कभी लगान चुकाने, कभी बिरादरी का दण्ड चुकाने और कभी अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए शोषकों से कर्ज लेता है। एक बार कर्ज लेकर वह शोषकों के मकड़ जाल में ऐसा फँसता है कि जीवनभर मुक्ति का कोई मार्ग उसे नहीं मिल पाता। प्रेमचन्द साहित्य में ऋणग्रस्त किसान के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त हुई है। वे महसूस करते हैं कि सूदखोरों के चंगुल से किसान को बचाने के लिए सरकार को उन्हें समुचित ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी होगी। "ऐसे साधन भी होने चाहिए, जिनसे किसानों को थोड़े सूद पर रूपये मिल सके। इसके लिए कृषि सहायक बैंकर खोले जाने चाहिए।"  इसके अलावा वे लघु व कुटीर उद्योगों की आवश्यकता पर भी बल देते हैं, जिससे किसान अपने खाली समय का सदुपयोग अर्थाजन हेतु कर सकें।

 भारतीय किसान अशिक्षित व परम्परावादी सोच में भी जकड़ा हुआ है, जिसके कारण वह शोषक वर्ग की नीतियों को समझ नहीं पाता, बल्कि उसे अपना भाग्य व नियति मानकर सहता रहता। ‘गोदान’ का होरी भी समझता है कि यह शोषण उसकी नियति है। ‘प्रेमाश्रम’ के किसान बेगार करने को विवश हैं, विरोध का कोई भाव भी उनमें नहीं है, "सब के सब सिर झुकाये चुपचाप घास छीलते रहे, यहाँ तक कि तीसरा पहर हो गया। सार मैदान साफ हो गया। सबने खुरपियाँ रख दी और कमर सीधी करने के लिए जरा लेट गये। बेचारे समझते थे कि गला छूट गया लेकिन इतने में तहसीलदार साहब ने आकर हुक्म दिया, गोबर लाकर इसे लीप दो, कोई कंकड, पत्थर न रहने पाये, कहाँ हैं, नाजिर जी, इन सबको डोल रस्सी दिलवा दीजिए।"

 शोषक के चक्र से बचने के लिए प्रेमचन्द किसान के संगठन पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं। वे मानते हैं कि शिक्षा से ज्यादा संगठन जरूरी है। 1930 में ‘स्वराज से किसका अहित होगा’ लेख में वे लिखते हैं, "मजदूरों के संगठन हैं, सरकारी नौकरों ने भी अपने-अपने दल संघटित कर लिये, जमींदारों और महाजनों का दल भी व्यवस्थित हैं, मगर किसानों का कोई संघ नहीं। उनकी शक्ति बिखरी हुई है। अगर उन्हें संघटित करने की कोशिश की जाती है तो, सरकार, जमींदार, सरकारी मुलाजिम और महाजन सभी भन्ना उठते हैं।"  इसके अतिरिक्त वे बुद्धिजीवी वर्ग से भी अपेक्षा करते हैं कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के बीच जाकर उन की समस्याओं को देखें समझे और उन्हें उनके अधिकारों व महत्त्व से परिचित करायें। वे स्वयं के लिए भी योजना बना चुके थे, शिवरानी से वे कहते हैं, "तब तक धुन्नू जो कुछ होना होगा सो हो जायेगा, उसी को सब काम सौंप करके हम और तुम दोनों देहात में किसानों का काम करेंगे क्योंकि जो हालत आजकल काश्तकारों की है, जब तक कोई उनके बीच में रहकर काम नहीं करेगा तब तक उनको सुधारना बहुत मुश्किल है। जरूरत है कि खुद उनके बीच रहकर उनके काम करें।"

 प्रेमचन्द इस बात से भी चिन्तित हैं कि भारतीय किसान के पास पर्याप्त जमीन नहीं है। उनके खेत बहुत छोटे और बिखरे हैं, जिनमें कार्य करने में उसका समय व शक्ति दोनों नष्ट होते ही हैं। वे लिखते हैं, "अधिकतर किसानों के पास दो ढाई बीघे से ज्यादा नहीं होता और उसमें भी पाँच बिस्वे उत्तर, तो पाँच बिस्वे दक्खिन। पाँच बिस्वे को जोतकर उसे हल बैल लिए मील भर चलना पड़ता है। तब कहीं दूसरा खेत मिलता है।"  इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारतीय भूमि व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किया। औपनिवेशिक शासन से पूर्व किसान का अपनी कृषि भूमि पर स्वामित्व था तथा वह सालाना कर के रूप में ‘राजा का भाग’ देता था, जो भूमि के अनुरूप कम या ज्यादा होता था, "अंग्रेजों ने इस पुरानी परम्परा को खत्म करके एक निश्चित नकद रकम के रूप में मालगुजारी लेना शुरू किया। यह रकम जमीन के हिसाब से तै की जाती थी और साल भर में पैदावार चाहे कम हुई हो या ज्यादा जो रकम पहले तै कर दी गयी थी वही वसूल की जाती थी।"..... इस परिवर्तन के द्वारा व्यवहार में अंग्रेज विजेताओं की हुकूमत का सारी जमीन पर अन्तिम अधिकार कायम हो गया और किसान महज दूसरे की जमीन पर लगान देकर खेती करने वाला न गया। लगान न देने पर उसे जमीन से बेदखल किया जा सकता था। या अंग्रेजी सरकार ने जमीनें में कुछ ऐसे लोगों को दे दी, जिनको उसने जमींदार नामजद करना पसन्द किया।"  यहीं जमींदार किसानों के सबसे बड़े शत्रु बने।

 प्रेमचन्द साहित्य में चित्रित किसान अशिक्षित है, अंध विश्वासी, घोर भाग्यवादी और रीतियेां व परम्पराओं में जकड़ा किसान है, जो परिस्थितियों से समझौता कर लेता है। वह मानता है कि जब "हमारी गरदन दूसरों के पैरों के नीचे दबी हुई है अकड़कर निबाह नहीं हो सकता।"  अतः जब नवीन चेतना सम्पन्न गोबर उससे शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने की बात कहता है तो वह गोबर से कहता है, "बेटा जब तक मैं जीता हूँ मुझे अपने रास्ते चलने दो। जब मैं मर जाऊँ तो तुम्हारी जो इच्छा हो करना।"  इसके विपरीत वे नवीन चेतना सम्पन्न किसान के चित्र भी उकेरते हैं। उनका यह किसान नये युग की हवा से परिचित है। ‘प्रेमाश्रम’ के मनोहर व बलराज ऐसे ही किसान हैं। बलराज को अपनी जमीन की चिन्ता नहीं है, न वह अपनी मर्यादा की कीमत पर अपनी जमीन बचाना चाहता है। वह अखबार पढ़ता है और देश विदेश की खबरों से परिचित है, वह गाँव वालों को किसान की शक्ति से परिचित कराते हुए कहता है, "तुम लोग तो ऐसी हँसी उड़ाते हो, मानो कास्तकार कुछ होता ही नहीं। वह जमींदार की बेगार ही भरने के लिए बनाया गया है, लेकिन मेरे पास जो पत्र आता है, उसमें लिखा है कि रूस देश में कास्तकारों का राज है, वह जो चाहते हैं, करते हैं। उसी के पास कोई और देश बलगारी है। वहाँ अभी हाल की बात है, कास्तकारों ने राजा को गद्दी से उतार दिया है और अब किसानों और मजदूरों की पंचायत राज करती है।" 

 भारतीय किसान पक्का गृहस्थ होता है। उसकी गृहस्थी ही उसकी शक्ति होती है। उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा मरजाद पालने की है। मजदूर या खेत मजूर बनने में वह अपना अपमान समझता है। इस मरजाद को बचाने के लिए वह हाड़तोड़ परिश्रम करता है क्योंकि भारत जैसे "कृषि प्रधान देश में खेती केवल जीविका का साधन नहीं है, सम्मान की वस्तु भी है।"  गोदान का होरी अपने तीन बीघे खेतों को बचाने के लिए तमाम ऐसे कार्य करता है, जो उसकी मर्यादा प्रतिकूल हैं। उसका भी विश्वास है, "खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है।"  रंगभूमि के अंधे सूरदास का भी यही मत है कि "भाई खेती सबसे उत्तम है, बान उससे मध्यम है, बस इतना ही फरक है।"  प्रेमचन्द की रचनाओं में किसान का जमीन के प्रति यह लगाव व जुड़ाव सर्वत्र पाया जाता है।
 प्रेमचन्द का किसान दीन-हीन है, दरिद्र है, निर्धन है, परन्तु मन से दरिद्र नहीं है, उसमें मानवीयता और आत्मबल कूट-कूट कर भरा है। इसीलिए गोदान का होरी पठान से मालती को बचाने के लिए सारे सपेदपोश धनिकों को पराजित कर देता है। विधवा झुनिया को अपने घर में शरण ही नहीं देता वरन् अपने कायर बेटे को धिक्कारते हुए उसे बहू रूप में स्वीकार करता हुआ अपनी मानवीयता व प्रगतिशीलता का परिचय देता है। वह समस्त अभावों के बाद भी कर्ज लेकर बिरादरी को भोज देता है और झुनिया को सान्तवना देता हुआ कहता है, "डर मत बेटी डर मत। तेरा घर है, तेरा द्वार है, तेरे हम हैं, आराम से रह। जैसी तू भोला की बेटी है, वैसी ही मेरी भी बेटी है। जब तक हम जीते हैं किसी बात की चिन्ता मत कर। हमारे रहते कोई तुझे तिरछी आँखों से न देख सकेगा। भोज भात जो लगेगा वह हम सब दे लेगें, तू खातिर जमा रख।"  होरी की यह उदारता और व्यापक सोच उसे किसानों में भी विशिष्ट बना देती है।

 प्रेमचन्द किसानों के आर्थिक जीवन का चित्र ही अंकित नहीं करते वरन् उनके सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन के चित्र भी उनके साहित्य में मौजूद हैं। किसानों के पारिवारिक जीवन, पारिवारिक सम्बन्धों, तीज-त्यौहारों, मेले-ठेलों, खेत-खलिहानों, चैपालों आदि का यथार्थ अंकन प्रेमचन्द साहित्य में उपलब्ध है। वस्तुतः "प्रेमचन्द हमें ठेठ किसानों के बीच ले जाते हैं। उनके अलाव उनके खेत और ताल, उनके अखाड़े और लावनी ख्याल, उनके अंधविश्वास और नए जीवन के कसमसाते हुए भावांकुर-प्रेमाश्रम में यह सब कुछ सजीव हैं। उसके पृष्ठों में इतिहास जी रहा है। प्रेमचन्द किसानों की प्राचीन परम्परा दिखाते हैं तो यह भी कि कहाँ उनकी कडि़याँ टूट रही हैं। प्रेमचन्द की कला इस बात में है कि वे हिन्दुस्तान के बदलते हुए किसान का चित्र खींच सके है।"

 इस प्रकार प्रेमचन्द की रचनाओं में तद्युगीन किसान के जीवन की यथार्थ तस्वीर है। यद्यपि यह तो नहीं कहा जा सकता है कि उनका किसान सम्पूर्ण भारतीय किसान का प्रतिनिधि है, हाँ उत्तर भारतीय किसान व उसकी समस्याओं की झाँकी उसमें परिलक्षित होती है। आज के परिवर्तित परिवेश में भी किसान की समस्याएँ कम नहीं हुई है। निर्धनता, बदहाली, अशिक्षा, भाग्यवादिता, रूढि़वादिता, कर्ज, शोषण व आपसी फूट सब वैसी ही हैं। आज भी वह खेती की वैज्ञानिक तकनीकी से अनजान है। आज भी उसकी आँखे आकाश की ओर बादलों को ताकती हैं, ताकि सूखते खेत हरे हो सके। सरकारी मंचों से प्रत्येक वर्ग के उत्थान की बात बड़े जोर-शोर से की जाती हैं, किन्तु किसान आज भी आत्महत्या करने को विवश है। सवाल उठता है आखिर देश का अन्नदाता कब तक इन तकलीफों से जूझता रहेगा? प्रेमचन्द का साहित्य इस सम्बन्ध में हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है।

सन्दर्भ
1) प्रेमचन्द के विचार (भाग-1) प्रेमचन्द, प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, दिल्ली, सं. 2003, पृ. 474
2) प्रेमचन्द और भारतीय किसान - रामबक्ष, पृ. 178
3) गोदान-प्रेमचन्द, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, सं. 2005, पृ. 319
4) वही, पृ. 115
5) वही, पृ. 118
6) प्रेमचन्द के विचार (भाग 1), पृ. 485
7) प्रेमाश्रम - प्रेमचन्द, न्यू साधना पाकेट बुक्स, दिल्ली, सं. 2008, पृ. 167
8) प्रेमाश्रम - प्रेमचन्द, न्यू साधना पाकेट बुक्स, दिल्ली, सं. 2008, पृ. 167
9) प्रेमचन्द घर में - शिवरानी देवी प्रेमचन्द, आत्माराम एण्ड सन्स, सं. 2006, पृ. 197
10) प्रेमचन्द के विचार - प्रेमचन्द, (भाग 1), पृ. 473
11) भारत: वर्तमान और भावी, रजनी पामदत्त, अनु-ओमप्रकाश संगल पीपूल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रा. लि. दिल्ली, सं. 1976, पृ. 86
12) गोदान - प्रेमचन्द, पृ. 18
13) वही, पृ. 201
14) प्रेमाश्रम - प्रेमचन्द, पृ. 46
15) कर्मभूमि - प्रेमचन्द, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, सं. 2005, पृ. 184
16) गोदान - प्रेमचन्द, पृ. 19
17) रंगभूमि - प्रेमचन्द, प्रकाशन सं., दिल्ली, सं. 2004, पृ. 19
18) गोदान - प्रेमचन्द, पृ. 113
19) प्रेमचन्द और उनका युग - रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, सं. 1952, तीसरी आवृत्ति,  2002, पृ. 54

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