ग़ज़लें: आदिल सरफ़रोश

आदिल सरफ़रोश
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मेरे जिस्म में ज़रा सी जान रहने दो
अपने होठों पे एक मुस्कान रहने दो

तेरी यादों में मिलता है सुकून बेहद--
अपनी यादों में मुझे परेशान रहने दो

इसमें बसी हैं मेरे बड़े-बुज़ुर्गों की यादें
मुझे मार दो मेरा कब्रिस्तान रहने दो

सियासत के मुद्दे हैं यहाँ और भी बहुत
छोडो यार ये हिन्दू-मुसलमान रहने दो

इधर भी अपने हैं और उधर भी अपने
बस भी करो ये क़त्ल-ए-आम रहने दो

मुझे डर है कहीं निशाना चूक न जाए
न चलाओ ये तीर-ओ-कमान रहने दो

इससे पलता है पेट मेरे बच्चों का-
न तोड़ो ये चाय की दुकान रहने दो

अपना मुल्क है अमन का गुलिस्तान-
अरे न बनाओ इसे पाकिस्तान रहने दो

और कब तलक दुआएँ दोगी मुझको
बस भी करो मेरी अम्मी जान रहने दो

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भूली यादों को जगा देते क्यूँ हो
मेरे ज़ख्मों को हवा देते क्यूँ हो

मेरे ख्वाबों में आकर चले जाते हो
मेरी रातों को सज़ा देते क्यूँ हो

तुम भी रोते हो मेरे लिए छुपकर
अपनी आँखों से बता देते क्यूँ हो

तुम्हें याद है बस इक गलती मेरे
और बातों को भुला देते क्यूँ हो

मेरे मरने की करके आरज़ू ‘आदिल’
मुझे जीने की दुआ देते क्यूँ हो

---------------3 ----------------------

अभी बदल दो, आज बदल दो
झूठे तख़्त-ओ-ताज बदल दो

जिनकी फितरत में उत्पीड़न
उनका गुंडा-राज बदल दो

औरत को जो जूती समझें
वो रस्म-ओ-रिवाज़ बदल दो

शोषण जो सहते हैं अक्सर
ऐसा बुज़दिल समाज बदल दो

बहुत हुआ सम्मान ज़ुल्म का
अब अपनी आवाज़ बदल दो

------------4 --------------

तन्हा-तन्हा यूँ दूर रहोगे
मेरी तरह मजबूर रहोगे

याद सताएगी जब मेरी
मिलने को मग़रूर रहोगे

नींद मिले न चैन मिले
करवटें लेते ज़रूर रहोगे

पास आकर कुछ तो बोलो
कब तक रूठे हुज़ूर रहोगे

मेरे दिल की बात सुनो
आँखों के मेरे नूर रहोगे

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बेख़ौफ़ हो रही हैं पुतलियाँ किसलिए
दम तोड़ रही हैं सिसकियाँ किसलिए

जब हिन्दू भी अपने हैं, मुसलमां भी अपने
खामों ख़्वाह जल रही हैं बस्तियाँ किसलिए

इस फ़िज़ा में मिलाया हैं ज़हर किसने
बेमौत मर रही हैं तितलियाँ किसलिए

इंसान तैरता पानी में, पंछी रेंगते ज़मीं पे
हवा में उड़ रही हैं मछलियाँ किसलिए

आसमान से गरजकर इंसान पर गिरती हैं
ख़ूनी सी हो गयी हैं बिजलियाँ किसलिए

रात में कर देते हैं क़त्ल इंसानियत का
दिन में लहरा रही हैं तख्तियाँ किसलिए

इधर बिगड़ रहे हैं हालात दिन-ब-दिन
और उधर हो रही हैं मस्तियाँ किसलिए

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