हिन्दी दलित कविता के अभ्युदय की पृष्ठभूमि

संदीप कुमार

हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद से दलित साहित्य में शोधरत
चलभाष: +91 936 948 5212, +91 807 442 5417


वर्तमान समाज का रूप जिस गति से बदला है साहित्य भी उतनी ही गति से परिवर्तित हुआ है। ये दोनों समय और परिस्थितियों के साथ-साथ हमेशा बदलते रहे हैं। क्योंकि ये एक दूसरे के पूरक हैं। अब हम इक्कीसवीं सदी के उस दौर में रह रहे हैं जिसमें ज्ञान-विज्ञान कला, संस्कृति, परम्परा, इतिहास सब बदल चुके हैं। यहाँ तक की इतिहास की पुनर्व्याख्या की मांग होने लगी है। वह सब कुछ जिसका उपयोग देश और समाज निर्माण में होता रहा है, वे सब मिथक पाखंड से लगने लगे हैं। साथ ही अविश्वास और अधूरापन का एहसास करा रहे हैं। यह सब क्यों हो रहा है? इसे जानने के लिए हाशिये पर पड़े भूखे, अधनंगे, शोषित, पीड़ित जीवन जी रहे समाज के भुक्तभोगी बहुत बड़े हिस्से को देखना होगा। जिसको आज भी चमचमाती लक्जरी गाड़ियाँ, गगनचुम्बी इमारतें, स्मार्ट शहर, काले सफ़ेद हो चुके धन से नहीं बल्कि भूखे पेट को भरने और सम्मानित जीवित रहने के साधन की जरूरत है। ऐसे ही पीड़ितजनों की आवाज़ को दलित कवियों ने उठाया। जिससे समाज के हर वर्ग के सामने सवाल खड़ा हुआ कि उसका दोषी कौन है? जिसको आज भी सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता, अधिकार मिलना तो दूर की बात है। आखिर ऐसे कौन से तत्व हैं? जिनके चलते हिन्दी साहित्य के इतने समृद्ध होने के बावजूद अलग-अलग कुछ जातिगत विमर्श बन चुके हैं और कुछ बन रहे हैं।
समाज में असमानता के बीज कैसे पनपे और फिर आज तक कैसे फल-फूल रहे हैं? इन सब को समझने के लिए दलित कविता की पृष्ठभूमि क्या है? इसका विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है। चूंकि दलित कविता समाज में हो रहे भेदभाव, उत्पीड़न, शोषण, धार्मिक पाखंड आदि मुद्दों को लेकर चलती है। इसलिए दलित समाज की सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना होगा। इस समाज को लेकर प्राचीन काल से अब तक के इतिहास में अनेक प्रकार का द्वंद्वात्मक रूप दिखाई देता है जिसका उल्लेख दलित चिन्तक माता प्रसाद ने ‘हिंदी काव्य में दलित काव्य धारा’ नामक पुस्तक में लिखा है “वैदिक-काल एवं स्मृति-काल की वर्ण-व्यवस्था और जाति व्यवस्था से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। वर्ण-व्यवस्था से शूद्र, जातियों, उपजातियों का विकास होता रहा, फिर इनको ‘चांडाल’, ‘अस्पृश्य’, ‘अछूत’, ‘हरिजन’ आदि अनेक नामों से इनको पुकारा जाता रहा है। इनके साथ समाज और राज्य सत्ता ने जो दु:खद व्यवहार किये वे दर्दनाक है।”1 माता प्रसाद का यह मत उस ऐतिहासिक घटना की ओर ले जाता है। जिसमें दलितों को कमजोर, बेबस, बेजुवान बनाये रखने के लिए साजिश बनती रही। समाज को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए वर्ण-व्यवस्था जैसी सामाजिक व्यवस्था की गयी थी। लेकिन उसके परिणाम अलग ही रहे, क्योंकि उसी से समाज में जातिवाद, संप्रदाय, रूढ़िवाद जैसे समाज विरोधी जहर फैलते रहे। लोगों के अन्दर मानव मात्र के लिए प्रेम नहीं बल्कि नफरत और घृणा जैसे विचार उत्पन्न हुए। वर्ण व्यवस्था के विषय में इंतिजार नईम खां ने इस प्रकार लिखा है कि “हिन्दू समाज की लोकोत्तर विशेषता उसमें प्रचलित वर्ण-व्यवस्था तथा जाति-प्रथा है, जिन्हें संसार का आठवाँ आश्चर्य कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। हिन्दू समाज की कमर तोड़ने वाली यह वर्ण -व्यवस्था हिन्दू जाति के लिए दुर्भाग्यवश उसमें क्यों प्रचलित हो गई, इसका संक्षिप्त इतिहास पाठकों को देना परमावश्यक है।”2
 यह व्यवस्था जिसे नईम खां ने हिन्दू जाति का कमर तोड़ माना है। वास्तव में यह गंभीर विचारणीय मुद्दा है। क्योंकि इससे केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि पूरी मानवीय गरिमा तार-तार हुई है। दिनों-दिन यह अलग-अलग रूप में बदलती रही। जिसकी शुरूआत कर्मों को संचालित करने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में हुई। वह जातिवाद के रूप में फैल गया। जिसने समाज का बखूबी विखंडन किया। इससे समाज की कितनी छवि दूषित हुई इसे बताने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि आज तक समाज इस खाईं को नहीं पाट पाया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भारतीय समाज का उल्लेख इस प्रकार किया है कि “भारतीय समाज-व्यवस्था ने वर्ण-व्यवस्था का एक ऐसा जिरहबख्तर पहन रखा है, जिस पर लगातार हमले होते रहे हैं फिर भी वह टूट नहीं पाई। बीसवीं सदी में सबसे बड़ा हमला डॉ. अम्बेडकर ने किया और बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित किया। वर्ण-व्यवस्था के स्वरूप में बदलाव दिखाई पड़ा। इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए जाति-व्यवस्था का टूटना जरूरी है, तभी समाज में समरसता उत्पन्न हो सकती है और साहित्य में उपजी विभ्रम स्थिति से मुक्त हो सकते हैं।”3 परम्परागत रूप से यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। इतनी अव्यवहारिक और घातक होते हुए भी यह जीवित कैसे है? इन मुद्दों पर सोचना आवश्यक ही नहीं बल्कि एकजुट होकर इसको ध्वस्त किया जाना चाहिए। लेकिन सत्ता के लोभी लोग किसी भी तरह इसको जीवित बनाए रखना चाहते हैं। समानता भाईचारा के लिए बड़े-बड़े ग्रन्थ, बड़े-बड़े संतों के व्याख्यान, सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्, वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रखने वाले भी असफल दिखे। या तो यह कहे की उनका चोला वही है। सदियों से जो चला आ रहा है, ‘मन में राम बगल में छूरी’। सच बात तो यह है कि अब झूठ और वेबुनियादी स्तर पर यह बहुत दिनों तक टिका नहीं रह सकता।
डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है कि “मेरी राय में इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब तक आप अपनी सामाजिक व्यवस्था नहीं बदलेंगे, तब तक कोई प्रगति नहीं होगी। आप समाज को रक्षा या अपराध के लिए प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन जाति-व्यवस्था के नींव पर आप कोई निर्माण नहीं कर सकते: आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते, आप नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकते। जाति-व्यवस्था की नींव पर आप कोई भी निर्माण करेंगे, वे चटक जायगा और कभी पूरा नहीं होगा।”4 समाज के विकास के लिए समानता होना आवश्यक है। बिना समानता के सम्पूर्ण विकास होना असम्भव है। प्रतिरोध और अपराध से न कभी कोई सार्थक मूल्य स्थापित हुआ है न कभी होने की उम्मीद की जा सकती है। इसलिए राष्ट्र निर्माण के लिए परम्परागत रूढ़िवादी मानसिकता को बदलना होगा। आपसी द्वेष को त्यागकर प्रेम और भाईचारा को अपनाना होगा। जिन्होंने तकलीफ़ें झेलीं, अपमान सहा, घुटन से भरा जीवन जिया। वह परिवर्तन की माँग करते हैं तो उनका साथ देना होगा। उन सारे कारणों को ढूंढना चाहिये जो इसके लिए जिम्मेदार है। आजकल साहित्य की भरमार है परन्तु उसमें वह नहीं है जो दलित साहित्य में है। सर्वेश कुमार मौर्य ने लिखा है कि “आज दलित साहित्य लेखन प्राचीन काल से चले आ रहे उसी दलित विरोधी साहित्य के प्रतिरोध का परिणाम है। वेद पुराण, महाभारत, गीता, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति, रामायण, रामचरित मानस, कुमारिल भट्ट का श्लोक्वार्तिका, तेजवार्तिका तथा शंकराचार्य का व्रह्म-सूत्र भाष्य आदि सभी दलित-विरोधी साहित्य, जिनका मूल्य आधार वर्ण-व्यवस्था है। यदि इस तरह के साहित्य की भरमार न होती तो दलित साहित्य की कभी आवश्यकता ही न पड़ती। यह एक ऐतिहासिक सत्य है।”5 अगर कोई क्रिया होगी तो उसकी प्रतिक्रिया भी होगी; यह वैज्ञानिक नियम सर्वथा सत्य है। क्योंकि भारतीय समाज में न हिन्दी साहित्य कि कमी है और न ही साहित्यकार की। लेकिन उनका आधार वर्ण-व्यवस्था को बनाएं रखने वाला रहा है। जिसमें मानव मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए सारे तत्व उपलब्ध हैं। परन्तु यही साहित्य मनुष्य-मनुष्य के बीच खाईं भी बनाता रहा है। जिसके परिणाम बहुत ही घातक सिद्ध हुए। क्योंकि समाज ने वही अपनाया जो इन साहित्यकारों ने लिखा। उतना ही सोचा जितना इन विद्वानों ने सोचा। अगर किसी ने कह दिया कि क्षत्रिय समाज में जन्म लेने वाला मनुष्य सबसे ताकतवर मनुष्य है, तो वही सही है। भले ही वह बेहद कायर और डरपोक ही क्यों न हो। ब्राह्मण के घर पैदा होने वाला ज्ञानी बना दिया गया और शूद्र के घर पैदा होने वाला अज्ञानी। इस प्रकार के विचारों ने समाज के बड़े वर्ग को एक लम्बी अवधि तक अशिक्षित और अस्पृश्य बनाये रखा। यहाँ तक की अगर कोई अपनी प्रतिभा के बल पर ज्ञान अर्जित भी कर लिया तो उसे रोकने की चाल चलने से बाज नहीं आए। माता प्रसाद ने लिखा है कि “रामायण-काल में शम्बूक ऋषि के शूद्र होने पर भी तपस्या करने पर, राजा राम चन्द्र द्वारा उसका वध किया गया।” महाभारत-काल में एकलव्य की कथा शूद्रों पर शिक्षा-प्राप्ति में प्रतिबंध पर अच्छा उदाहरण है। गुरू द्रोणाचार्य द्वारा शिक्षा न देने पर भी ‘एकलव्य’ का दायाँ अँगूठा कटवा लेना शूद्रों के साथ छल-प्रपंच करके उनको आगे बढ़ने से रोकना ही था।”6 इस तरह की घोर समाज विरोधी गतिविधियों के चलते ही हिन्दी कविता होने के बावजूद भी दलित कविता की उत्पत्ति हुई जिसने अपनी अलग पृष्ठभूमि का निर्माण किया। जिसके केंद्र में बुद्ध, कबीर, रैदास, नाथ सिद्ध, आंबेडकरवादी और मार्क्सवादी विचारधारा की मुख्य भूमिका रही। इन महापुरुषों ने बड़ी गहराई से सोच-विचार कर जड़ता को तोड़ने का प्रयास किया। उन सारी मान्यताओं को ख़ारिज कर दिया जिसके आधार पर हिन्दी साहित्य टिका था। प्रतिरोध का इतिहास कोई एक दो दिन में नहीं निर्मित हुआ बल्कि सौ साल से भी ज्यादा का है। कँवल भारती ने लिखा है कि “हिन्दी दलित कविता का इतिहास सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। इसे हम और पीछे ले जा सकते हैं, मध्यकाल से वैदिक काल तक दलित ने अपनी व्यथा को हर युग और काल में व्यक्त किया। वह अत्याचार और अन्यायों के खिलाफ सदैव मुखर रहा है। उसने अपने व्यवस्था के विरूद्ध व्यवस्था के प्रतिबंधों को कभी स्वीकार नहीं किया और न सहन किया। आर्यों के वैदिक दर्शन (परलोकवादी) के विरुद्ध अनार्यों (मूलनिवासी) की अजीवक दर्शन-धारा (लोकवादी) ने व्यापक जन-जागरण किया। मनुस्मृति से पता चलता है कि शूद्रों ने ब्राह्मण की सत्ता को स्वीकार नहीं किया और सदैव समानता के स्तर पर ही उससे व्यवहार किया।”7 संकट की घड़ी में कौन चैन की वंशी बजाता है । सभी उससे निदान ही चाहतें हैं। अपनी सुरक्षा के लिए तो जानवर भी दुश्मन को देखकर हुंकार भरता है। यहाँ तो पूरी-पूरी मानवीय अस्मिता ही दाँव पर लगी हुई है। जातिवाद, अन्धविश्वास, पाखंड, अस्पृश्यता के चलते घुटन से भरी जिन्दगी जीने वाला कैसे शांत बैठेगा।
अपने-अपने ढंग से सब आवाज उठाते रहे हैं। इसके कुछ उदाहरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘हिंदी साहित्य की भूमिका में’ मिल जाते हैं जिसमें सरहपा नामक सिद्ध कवि ने कहा है कि “फिर भी उच्च वर्ग के लोगों ने तटस्थता का ही आलंबन नहीं किया। कभी उन्होंने भी उग्रतम आक्रमण किया है। अश्वघोष (कालिदास के पूर्ववर्ती कवि ) की लिखी हुई वज्रसूचि एक ऐसी ही पुस्तक है। सरोरूह्पाद (सरहपा) नामक सहजयानी सिद्ध जाति व्यवस्था के भयंकर विरोधी थे। वे कहते हैं ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, जब हुए थे तब हुए थे। इस समय तो वे भी दूसरे लोग जिस प्रकार पैदा हुए होते हैं वैसे ही पैदा हो रहे हैं तो फिर ब्रह्मत्व कहाँ।”8 कहने का मतलब यह है कि ब्राह्मणवाद का विरोध विद्वानों द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है।
साहित्य अपने समय का दस्तावेज होता है। वह तात्कालिक समाज की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थिति का हूबहू चित्रण करता है। जिसका प्रमाण सर्वदा साहित्य में मौजूद रहता है। इसलिए कविता में, गीत में तत्कालीन समाज की स्थिति खोजने का प्रयास किया जाता है क्योंकि उसमें समाज की वास्तविक छवि मिलती है। समाज में समानता और भाईचारा के लिए नाथों, सिद्धों और भक्तिकाल के संत साहित्य के अंतर्गत आने वाले निर्गुणधारा के कवियों ने जो प्रयास किया वह तात्कालिक समाज के यथार्थ से रूबरू कराता है। कबीरदास, रैदास, नानक, सेना, पीपा, धन्ना आदि निम्न जाति के कवि थे। जिनके यहाँ पाखंड, आडम्बर, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि का खुलकर विरोध मिलता है। कबीरदास और रैदास जैसे संत कवि हुए जिन्होंने जाति-पांति का खंडन किया। रजत रानी मीनू ने उल्लेख किया है कि “कबीरदास जात-पात व साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलने वाले कदाचित अपने समय के प्रखर तेजस्वी और सशक्त कवि रहे। उनकी रचनाओं की सम्प्रेषणीयता बेजोड़ थी। कबीर का रचना कर्म स्वयं इसका साक्षी है: -
“संतन जात न पूछो निरगुनियां
साध ब्राह्मण साध छत्तरी
साध जाती बनियां
साधन मां छतीस कौम है टेड़ी तोर पुछानियां।
हिन्दू तुर्क दुई दीन बने हैं कछू नहीं पह्चानियां।

कबीर के समकक्ष ‘रैदास’ भी हिन्दी साहित्य में बहुचर्चित कवि हैं। पर उतने निडर शायद नहीं। हम यहाँ उनकी प्रतिनिधि पंक्तियों उद्धत करेंगे –
“रैदास वामन मत पूजिये, जऊ होवे गुण हीन,
पूजहि चरण चांडाल के,जऊ होवे गुन प्रवीन।”9

इन संतों के पास दलित चिंतन के वे सारे तत्व मौजूद थे। जिससे दलित चेतना का विकास होता है। जातिवाद, ब्राह्मणवाद, वर्ण-व्यवस्था आदि का खंडन इनका प्रमुख विषय रहा है। इन्होंने भेदभाव को भुलाकर आपस में समानता का पाठ सदैव पढ़ाया। इन संतों के बीच कबीरदास एक ऐसे संत कवि थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों का पूरे तेवर के साथ विरोध किया है। इतना ही नहीं बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों, दकियानूसी मान्यताओं और रूढ़ियों में लिप्त लोगों को जमकर फटकार लगाई है। संतों ने वास्तव में इतिहास को एक नया मोड़ दिया। लेकिन भक्ति कवि के भांति उस भावना को नहीं त्याग पाए जिनका दलित कवि प्रतिकार करते हैं।
ओम प्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में “हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल में रैदास और कबीर जहाँ एक ओर वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध खड़े दिखाई पड़ते हैं और सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं वे आध्यात्मिक दलदल में फँसकर उसी सामंती व्यवस्था में विलीन हो जाते हैं। जिसने वर्ण व्यवस्था को पुख्ता किया है। उनकी क्रांतिकारिता सामाजिक स्तर पर गहन अभिप्रेरणा उत्पन्न करती है, हिन्दी साहित्य में विरोध के स्वर को ऊँचा करतीं है और प्रासंगिक बनकर दलित चेतना के लिए प्रेरणा बनती हैं। लेकिन रहस्यवाद, भक्तिवाद, निर्गुणवाद आदि उन्हें उसी परम्परा से जोड़ देते हैं। जिसके विरुद्ध दलित साहित्य खड़ा है।”10 सगुण-निर्गुण भक्ति, प्रेम आदि दलित रचनाकारों के विषय नहीं हैं। जबकि कबीरदास सगुन-निर्गुण के रहस्य में उलझे रहे। उनका ईश्वर निर्गुण निराकार है जबकि दलित साहित्य में ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है। परन्तु कबीरदास के पास जो आक्रामकता और तेवर है। वहीं दलित साहित्य के पास है। उनका चिंतन दलित साहित्य के लिए प्रेरणा प्रदान करता है। निश्चित ही दलित साहित्य की जो नींव संतों ने रखी थी। वह दिनों-दिन अपने मुकाम हासिल करने में सफल दिख रही है। कबीरदास का सामाजिक चिंतन मानव कल्याण के लिया था। जिस प्रकार का आत्मबल इनके पास था। वह बहुत कम लोगों के पास होता है। उन्होंने अकेले ही पाखंडियों को धूल चटाया है। आज कोई कुछ भी कहें लेकिन कबीर के बिन दलित साहित्य अधूरा है। खैर वैदिक काल में निर्मित वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था पर जिस प्रकार प्रहार किया उसी का परिणाम है कि अब दलित कविता अपनी पहचान बना सकी।
आधुनिक हिन्दी दलित कविता की शुरुआत नाथ, सिद्ध, कबीर, रैदास की ही देन है। जिसकी शुरुआत ‘हीरा डोम’ की कविता ‘अछूत की शिकायत’ से मानी जाती है। जिसका उल्लेख हरिनारायण ठाकुर ने इस प्रकार किया है कि “भला हो महावीर प्रसाद द्विवेदी का, जिन्होंने चाहे जैसे छापी यह कविता सितम्बर 1914 की ‘सरस्वती’ में छपी थी फिर यह कविता ही हीरा डोम का इतिहास बन गयी। इसमें जाहिर है की भारतीय समाज खासकर हिन्दू समाज से हीरा डोम अछूतों की दुर्दशा की शिकायत की है। बड़े ही कातर स्वर में हीरा डोम ने दलितों के दीन हीन दशा का हाल सुनाया है। इसमें वर्णित यथार्थ भारतीय समाज में दलित जीवन का नंगा यथार्थ है।”11 वास्तव में इस कविता में बहुत बड़ा सवाल उठाया गया। जिसे दुनिया प्रजापालक मानती है। जिसने द्रौपदी और प्रह्लाद को बचाने के लिए अवतार लिया। वह हमारा दर्द क्यों नहीं सुनता है। जबकि हम अपनी पसीने की कमाई खाते हैं, फिर भी सुकून नहीं पाते। कविता ने जातिवाद पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाया है और कहा कि डोम जानकर वह भी हमको छूने से डरता है। इसका उल्लेख रजत रानी मीनू ने इस प्रकार किया है। “सरस्वती’ पत्रिका में ‘हीरा डोम’ की दलित कविता प्रकाशित हुई। डॉ. मैनेजर पाण्डेय के मत से यह 1914 में छपी। एम. आर . विद्रोही के अनुसार यह 1916 में छपी। पाण्डेय जी इसे दलित चेतना की पहली कविता मानते हैं। इसी सन्दर्भ में वह एक मत कायम करते हैं कि ‘प्रमाणिक चेतना की अभिव्यक्ति दलित ही कर सकता हैं।”12 दलित समाज जैसा जीवन जीता है इनके कविताओं में वहीं आत्मानुभव दिखाई देता है। ऐसी व्यथा किसी एक की नहीं है बल्कि सम्पूर्ण दलित समाज की है। जिनका सुनने वाला भगवान भी नहीं है। कविता से स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी व्यवस्था स्वनिर्मित है। जिसे पढ़ने के बाद संवेदनशील व्यक्ति बेचैन हुए बिना नहीं रहता है। ‘अछूत की शिकायत’ कविता के विषय में मैनेजर पाण्डेय ने लिखा हैं कि “ ‘अछूत की शिकायत’ आधुनिक चेतना की कविता है क्योंकि इसमें मध्यकाल के संतों की तरह जाति व्यवस्था के शिकंजे से छुटकारा पाने के लिए न संत बनने की आकांक्षा है और न लोक के दुःख के बदले परलोक में सुख पाने की चिंता है।
यहाँ कवि हिन्दू धर्म और हिन्दू धर्म के भगवान से निराश ही नहीं नाराज भी है इसलिए वह कहता है-
हमनी के दुःख भगवनओ न देखताटे
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।”13

यह कविता इसीलिए दलित कविता की आधार स्तम्भ बनती है। क्योंकि इसमें जहाँ अपने समाज की पीड़ा है वहीं धर्म के रक्षकों को फटकार है। कवि ने भगवान से सवाल किया है कि तू भी मुझे छूने से डरता है। इस तरह के तार्किक प्रश्नों ने चले आ रहे परम्परागत हिंदी कविता के सामने चुनौती खड़ी की जिससे दलित कविता का आगाज हुआ। अपनी बात को अपनी भाषा और अपनी अनुभूति में कहकर सबको चौका दिया। वास्तव में हिंदू समाज में व्याप्त जातिवादी व्यवस्था पर गहरा प्रहार किया। ऐसे ही आक्रोश अछूतानन्द के कविताओं में दिखा है। जिसका उल्लेख हरिनारायण ठाकुर ने किया है कि “अछूतानन्द’ ने अपनी कविताओं में वर्ण-व्यवस्था की तीखी आलोचना की है। उन्होंने अपने गीत और गजलों द्वारा मनु और मनुवादी व्यवस्था की खिल्लियाँ उड़ायी है। अपनी कविताओं में दलितों के गौरव पूर्ण इतिहास की याद करते हुए स्वामी ने उन्हें सतर्क और सावधान किया है। आत्म-हीनता की भावना को त्यागकर दलितों को सीना तानकर जीने की प्रेरणा देते हैं। इन्हीं भावों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जागरण अन्य गीत भी गाये। हिन्दू-वंश का गौरव दिखाते हुए स्वामी जी ने ‘थियेटर ध्वनि’ कविता लिखी। इस कविता द्वारा स्वामी जी ने तत्कालीन समय और समाज का चित्रण करते हुए दलित जीवन का जो मार्मिक और यथार्थ चित्र खींचा है, वह स्वयं स्पष्ट है -
मनुजी तुमने वर्ण बना दिए चार।
जा दिन तुमने वर्ण बनाये, न्यारे रंग बनाये क्यों ना
गोरे ब्राह्मण लाल क्षत्री बनिया पीले बनाये क्यों ना
शूद्र बनाते काले वर्ण के, पीछे को पैर लगाये क्यों न?।”14

इसका मतलब यह है कि जिस ईश्वर की कल्पना की जाति है। उसने अलग-अलग नहीं किया। अगर उसे अलग करना होता तो पैदा करने से पहले ही रूप, रंग आकार आदि में भिन्नता करता। परन्तु उसने सबको सामान बनाया। लेकिन जड़ मानसिकता वाले आज भी इसको मानने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार अनेक संतों, लेखकों, प्रगतिशील लोगों ने वैज्ञानिक और तार्किक ढंग से अपनी बात रखी है। जिसका परिणाम यह हुआ की यह अब असमानता का विरोध पूरे तेवर के साथ दलित रचनाकार कर रहे हैं। परिवर्तन लाने का सबसे बड़ा श्रेय डॉ. अम्बेडकर को जाता है। जिन्होंने सुस्त पड़ चुकी नसों में जान डाला। दलित साहित्य में डॉ. अम्बेडकर के प्रभाव को समझने के लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि का यह कथन काफी है “दलित साहित्य का वैचारिक आधार डॉ. आंबेडकर का जीवन-संघर्ष एवं ज्योतिबा फुले का दर्शन उसकी दार्शनिकता का आधार है। सभी दलित रचनाकार इस बिन्दुओं पर एकमत है कि ज्योतिबा फुले ने स्वयं क्रियाशील रहकर सामंती मूल्यों और सामाजिक गुलामी के विरोध का स्वर तेज किया था। ब्राह्मणवादी सोच और वर्चस्व या प्रभुत्त्व के विरोध में उन्होंने आन्दोलन खड़ा किया था। यही कारण कि जहाँ रचना कारों ने ज्योतिबा फुले को अपना विशिष्ट प्रचारक माना है वहीं डॉ. आंबेडकर को अपना शक्तिपुंज स्वीकार किया है।”15 वास्तव में डॉ. आंबेडकर दलित समाज के लिए शक्ति बने। उनके द्वारा दिया गया मूलमंत्र शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो से लोगों के अन्दर जन चेतना का संचार हुआ। साथ ही वे अपनी अस्मिता की सुरक्षा और सम्मान के लिए तत्पर हुए। शताब्दियों से ज्ञान विहीन अंधकार में जी रहे लोगों के अन्दर अद्भुत क्षमता का विकास हुआ।
कविता का जो रूप नाथों, सिद्धों से मिला था। अम्बेडकरवाद के बाद उसमें आक्रोश, तेवर और आक्रामकता दिखने लगी। दलित कवि अपनी बातें स्वयं की जुबान से सुनाने लगे। लोगों ने तब विरोध भी किया। लेकिन कुछ लोगों ने समर्थन किया कि जिस समाज को सदियों से बोलने न दिया गया हो वह अगर बोले तो उसमें कोई बुराई नहीं। क्योंकि उसमें कल्पना नहीं है, बल्कि जीवन की वास्तविक सच्चाई है। अगर उनके पास आक्रोश है तो वह वाजिब है। क्योंकि इससे संवेदनशील व्यक्ति के रोंगटे खड़े हुए। स्वर्ग-नर्क की कल्पना छोड़कर जमीन पर खुशहाल रहने वाली आवाज की दुहाई देने वाले लोग दिखाई दिए। बदतर जीवन स्थितियों के खिलाफ बेहतर जिन्दगी के लिए संघर्षशील लोग एकजुट हुए। चारों तरफ हो हल्ला हुआ अभद्र कहा गया, जंगली कहा गया लेकिन इसकी परवाह किये बिना दलित साहित्यकर आंबेडकर के विचारों के साथ खड़े रहे।
इन साहित्यकारों के क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर का जीवन-दर्शन मुख्य भूमिका में होता है। जिसका उल्लेख ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इस प्रकार किया है कि “दलित चिंतन डॉ. आंबेडकर के जीवन-दर्शन से मुख्य ऊर्जा ग्रहण करती है। इस तथ्य से सभी दलित लेखक एकमत हैं। दलित चेतना के प्रमुख बिंदु हैं –
1. मुक्ति और स्वतंत्रता के सवालों पर डॉ. आंबेडकर के दर्शन को स्वीकार करना।
2. बुद्ध का अनीश्वरवाद, अनात्मवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पाखंड-कर्मकांड विरोध।
3. वर्ण- व्यवस्था का विरोध, जातिभेद-विरोध, साम्प्रदायिकता विरोध।
4. अलगाववाद का नहीं भाईचारा का समर्थन।
5. स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय की पक्षधरता।
6. सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्धता।
7. महाकाव्य की रामचन्द्र शुक्लीय परिभाषा से असहमति।
8. पारम्परिक सौन्दर्यशास्त्र का विरोध।
9. वर्णविहीन, वर्गविहीन समाज की पक्षधरता
10. भाषावाद, लिंगवाद का विरोध।”16
दलित कविता हो या अन्य साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियां इन्हीं अम्बेडकरवादी सिंद्धांतों पर चलती हैं। जिसके केंद्र में मानव मुक्ति, समानता और भाईचारा है। लेकिन पूंजीवाद, ब्राह्मणवाद, असमानता के प्रति आक्रोश है। दलित कविता की पृष्टभूमि का निर्माण अचानक नहीं हुआ। इसके निर्माण लिए बहुत दिनों से संघर्ष होता रहा है। डॉ. एन. सिंह ने लिखा है कि “हिन्दी दलित कविता की शुरूआत सही मायने में उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में हुई। इसकी प्रेरक डॉ. आंबेडकर की विचारधारा तो थी ही, महात्मा फुले का संघर्ष, मार्क्स की क्रांति दृष्टि और अश्वेतों द्वारा लिखा गया ब्लैक लिटरेचर भी था। इसके प्रारंभिक दौर में हम माता प्रसाद और डॉ. शिरोमणि होरिल जैसे कवियों के सृजन को देख सकते हैं।”17 इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिन्दी दलित कविता की पृष्ठभूमि के निर्माण का इतिहास बहुत पुराना है। इसमें प्रतिरोध है तो वह समानता के लिए है। परम्परागत सौन्दर्य का खंडन है तो पूरे तर्क के साथ है। जो भी हो इसके निर्माण का इतिहास हिन्दी साहित्य में मौजूद है। जिसने लम्बे समय तक राजमहलों और फूलों की वादियों का वर्णन तो किया है। लेकिन भूख, प्यास से जूझ रहे झोंपड़ियों की तरफ देखना अच्छा नहीं समझा। जिससे दलित कविता के स्वरूप का निर्माण हुआ ।

सन्दर्भ ग्रन्थ-
1. माता प्रसाद, हिंदी काव्य में दलित काव्य धारा, विश्व प्रकाशन, वाराणसी: 1
2. इंतिजार नईम, दलित समस्या जड़ में कौन? साहित्य सौरभ: 29
3. ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र, राधा कृष्ण प्रकाशन: 60
4. डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खंड 1: 89
5.सर्वश कुमार मौर्य, यथार्थवाद और दलित साहित्य, स्वराज प्रकाशन: 123
6. माता प्रसाद, हिंदी काव्य में दलित काव्य धारा, विश्व प्रकाशन, वाराणसी: 11
7. कँवल भारती,दलित कविता का संघर्ष, स्वराज प्रकाशन: 13
8. हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका: 42-43
9. रजत रानी मीनू, नब्बे के दशक में हिन्दी दलित कविता, दलित साहित्य प्रकाशन: 10
10. ओम प्रकाश बाल्मीकि, दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र: 73
11. हरिनारायण ठाकुर, दलित साहित्य का समाज शास्त्र: 403
12. रजत रानी मीनू, नब्बे के दशक में हिन्दी दलित कविता, दलित साहित्य प्रकाशन: 12
13. मैनेजर पाण्डेय, दलित साहित्य और दलित दृष्टि, संपा. सर्वश कुमार मौर्य: 158
14. हरिनारायण ठाकुर, दलित साहित्य का समाज शास्त्र: 405 -406
15. ओम प्रकाश बाल्मीकि, दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र: 31
16.ओम प्रकाश बाल्मीकि, दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र: 53
17. प्रणव कुमार बंदोपाध्याय, दलित प्रसंग: 64

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