तन की सारी सुख-सुविधा में, मेरा मन वनवास दिया सा - अशोक प्रियदर्शी

सच कुछ और था ... (कहानियाँ)
संस्करण - प्रथम, 2017

सुधा ओम ढींगरा

मूल्य - ₹ 250 रुपये
सज़िल्द डिमाई, 120 पृष्ठ
ISBN: 9789381520611
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर (म.प्र.) 466001


समीक्षक: अशोक प्रियदर्शी

    सुधा ओम ढींगरा की ग्यारह कहानियाँ वाले नए संकलन ‘सच कुछ और था’ को पढ़ कर पूरा किया, तो जाने क्यों एक गीत की पंक्ति मेरे ज़ेहन में तैरने लगी, और जब इस संकलन पर लिखने का मन बना, तो उसी गीत-पंक्ति को मैंने शीर्षक बना दिया।

    सुधा जी का एक कहानी-संकलन इसके पहले भी पढ़ा था, दूर परदेस में बसे होकर भी, सारी सुख-सुविधाओं में संपन्न होने के बावजूद अपने देश, अपने गाँव, अपने पूर्व परिवेश की भली-बुरी यादों को सहेजती कहानियाँ- जैसी कि उनकी अनुगूँज मेरे कानों में बनी बची रह गई है। और अब यह संकलन। अमेरिकी जीवन का कलाइडोस्कोप, ज़ाहिर इन चित्रों को पुनः उकेरते हुए जब-तब पृष्ठभूमि के रूप में अपना घर-गाँव भी आ जाता है- ‘हम तो हैं परदेस में...’!

     सुधा जी प्रायः कहानियाँ सिरजते समय अतिरिक्त विन्यास का सहारा नहीं लेतीं, मानव-मन को पकड़ती हैं। इन्हें ‘स्पेड’ को ‘स्पेड’ कहना आता है, इसीलिए अपने मूल देश के बर-अक्स नए देश-परदेस में जो श्लाघ्य है उसे सराहती हैं ये और जो विसंगतियाँ हैं उनको बिना लाग-लपेट के ग़लत कहने का साहस रखती हैं। महिला हैं, तो नारी मनोविज्ञान की बेहतर समझ होनी ही ठहरी, उचित ही है कि वे औरत के दर्द को बारग स्वर देती हैं, गो किसी ऐक्टिविस्ट की तरह वे महिला-मुक्ति के बैनर-पोस्टर नहीं उठातीं। चुप-चुप, हौले-हौले वह सब कह जाती हैं जो प्रायः पाठकों के मन को मथता है और आँखों को नम करता है। यह भी ये फकत प्रश्न ही नहीं उठातीं, अपने ढंग से उनके समाधान के संकेत भी देती हैं। ये कहानियाँ ‘प्रॉक्सी’ से पढ़े जाने के लिए नहीं हैं, सो कहानियाँ मैं फिर से सुनाऊँगा नहीं, सिर्फ़ यह देखने-दिखाने की कोशिश करूँगा कि आख़िर ये कहानियाँ कह क्या रही हैं। ओ.के.?

सुधा ओम ढींगरा
    अरे हाँ, ऐसा शीर्षक लगा दिया है तो उसका औचित्य तो प्रतिपादित कर दूँ। मेरी विनम्र दृष्टि में, लेखक, मुख्यतः कथाकार जब सृजनरत होता है तो वह अपनी काया से निकलकर पर-काया में प्रवेश कर जाता है। स्व उसको तब भूल जाता है, स्मृति उस पर सी ही रह जाती है जिसकी छवि वह खड़ा कर रहा है। तन से परे, रचनाकार का मन वनवासी-सा हो जाता है। वनवासी राम को वनवासी ऋषि-मुनियों की रक्षा की चिन्ता सताती रहती है, अयोध्या उस क्षण विस्मृत होता है। -तो अब सीधे-सीधे संकलन की कहानियों की बात।

    पहली ही कहानी ‘अनुगूँज’ हमारे ज़ेहन में गूँजती रहती है। पुरुष प्रेमांध हो जाए, यहाँ तक भी समझ में आता है, किन्तु वह इतना क्रूर और हिंसक कैसे हो जाता है? किन्तु एक महिला तो है जो अपनी जेठानी की मौत नहीं मरेगी, पम्मी के झूठ को ठेंगा दिखा कर जिस की हो लेती है। प्रेम की दो तसवीरें एक साथ! मनप्रीत का चित्र गढ़ने में सुधा जी का कौशल मन को छूता है।

     ‘उसकी खुशबू’ पर कमल किशोर गोयनका जी की प्रतिक्रिया के साथ हूँ मैं। जूली हिंसक क्यों हो गई है? इस बारीक अपराध-मनोविज्ञान को सुधा जी ने पकड़ा है। जूली के शरीर से निकलती तीखी खुशबू का तीखापन लाक्षणिक है। कहीं पढ़ा था, शायद प्रेमचंद को, स्त्री देवी है किन्तु ...

प्रयोग का आकर्षण अपनी जगह, यह कहानी झूठे आकर्षण, आरस प्रदर्शन के खोखलेपन, जो हैं और जो आपको चाहिए उससे बेखबरी और व्यर्थ के अहं का टकाराव और अंततः लिंडा का घुटकर आत्मघात कर लेना। आश्चर्य होता है, मन के किन-किन अतल कोनों की टोह ले लेने की सामर्थ्य रखती हैं सुधा जी! यह भी कि दुःख बाँटने से हल्का होता है, काश! लिंडा ने अपना दर्द शेयर किया होता। अमेरिकी पृष्ठभूमि में रचित नकारात्मक-सकारात्मक प्रेम के ये रंग स्तब्ध कर देते हैं, चौकाते तो हैं ही।

     ‘पासवर्ड’ फिर से अमेरिकी परिवेश में बनी-बुनी कहानी है। कहानी को समझने के लिए सुधा जी की यह पंक्ति पढ़ें - ‘साकेत ने तो अपनी ज़िन्दगी का पासवर्ड तन्वी को दे दिया था पर तन्वी के जीवन का पासवर्ड कहीं हो गया था।’ हिन्दी में एक कहावत चलती है - तुम डाल-डाल, हम पात-पात! तन्वी अपने प्रेमी मनु के साथ डाल-डाल फुदक रही है और साकेत पात-पात पकड़ता हुआ उसकी शातिराना चाल को नाकाम कर देता है। वीजा, ग्रीन कार्ड, पासवर्ड की अहमियत अमेरिका जाकर ही समझी जा सकती हैं। कहानी किस क़दर थ्रिलर का आनंद देती है।

     ‘तलाश जारी है’ शीर्षक कहानी अत्यंत सकारात्मक सोच वाली है। अपनी कमियों को देखने के लिए आंतरिक साहस की दरकार होती है। अमेरिका में इन दिनों भारतीय प्रवासियों को लेकर जो अनमनेपन का भाव है उसके अन्य कारण जो हों, एक कारण संभवतः यह भी है कि वहाँ के नियम, कानून-क़ायदे को ठेंगा दिखलाने की होशियारी दिखलाते हैं। यों भी कहते हैं कि जब आप रोम में हैं, तो रोमनों की तरह बरतिए। यह महत्त्वपूर्ण है कि सकारात्मक विचारों से हमें सावधान करती इस कहानी का कहानीपन बचा रहता है और रोचकता भी बनी रहती है।

     हमारे यहाँ शास्त्रों में नियोग-पद्धति की चर्चा है। ‘विकल्प’ में वैसे ही विकल्प की बात है? कहते हैं, अपने गर्भ से संतान को जन्म देकर औरत पूरी होती है। ठीक है कि ‘आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन’ जैसी तरकीबें भी चिकित्सा विज्ञान ने खोज निकाली हैं, किन्तु ‘डोनर’ के स्पर्म में वह ताक़त तो हो! फिर? नियोग जैसी तटस्थता के साथ देवर के साथ सहवास करे कोई औरत तो? तो संशय तो स्वाभाविक है कि औरत अपने तन की भूख मिटा रही है कि माँ बन पाने की विकल्पता में ‘निगेटिविटी’ के साथ यह विकल्प चुना है? और देवर की अमेरिकी मँगेतर को आपत्ति न हो, तो किसी और को आपत्ति क्यों हो? सुधा जी ने इस साहसिक कहानी के साथ एक प्रश्न भी उछाल दिया है जैसे। इस साहसिक, विरल कथा-प्रसंग वाली कहानी के लिए लेखिका को बधाई तो दी ही जानी चाहिए।

    और अब ‘विष-बीज’। मंटो की कहानी ‘ठंडा गोश्त’ अभी भी ज़ेहन में है। जिस नारी-शरीर को भोगने की विकलता हो और सहसा लगे कि यह शरीर तो निष्प्राण है, मुर्दा, तो सारी उत्तेजना क्षण में काफूर हो जानी ठहरी। और यदि वह समझ पड़ जाए कि सामने माँ पड़ी है, माँ जिसे आक्रांता चीन्हता नहीं, किन्तु संशय हो जाने के बाद? कुछ कड़वे उपचार भी इस कहानी में संकेलित हैं। ग़नीमत है, ‘क्रेज़ी मैन’ स्वयं अंग-भंग-दंड माँग रहा है। इस विरस प्रसंग वाली मनोवैज्ञानिक कहानी के लिए फिर से सुधा जी को बधाई।

     ‘काश! ऐसा होता’ बुढ़ापे में अकेलेपन से बचने की कोशिश की कथा। इस वयस में शरीर का ताप नहीं होता, एकाकीपन का संताप होता है। विधवा मिसिज़ हाइडी आंटी विधुर जॉर्ज को जीवन-साथ बना लेती है वार्द्धक्य के अकेलेपन से मुक्ति, भारत में ऐसा क्यों नहीं होता, तब और भी जब विधवा वृद्धा हो! पुरुष को तो खैर छूट है!

     शैली में कही गई कहानी बाँधती है, मन को भिंगोती है।

     और संकलन की 10वीं कहानी - ‘और आँसू टपकते रहे...’। ‘‘अगले जनम बिटिया न किए जाने की प्रार्थना प्रभु से क्यों करती है महिला, वह भी प्रबुद्ध महिला? औरत को कमज़ोर बनाने में पुरुष का ही हाथ है। गो मिसेज़ सोनी भी औरत ही हैं, लेकिन देखे तो उनके असंगत चरित्र के पीछे भी पुरुष ही है। औरत की जिस्मानी ज़रूरतें भी होती हैं, किन्तु सरेआम बिछ जाना उसकी मूल प्रकृति में नहीं होता। और कहते है कि औरत की दुश्मन औरत ही होती है। औरतें मुग़ल-काल में अपनी आबरू बचाने को जौहर का सहारा लेती थी। कहानी की लड़की ने मिनर्वा होटल की तीसरी मंज़िल से नीचे छलांग लगा दी। कोमल का अनिर्णय भी लड़की की आत्महत्या का कारण हो सकता है। यह कहानी आँखें गीली करती है और औरत की दो तलवीरें आजू-बाजू रखकर हमें झिंझोड़ती है।’’

     अंत में ‘बेघर सच’। लड़की का घर उसका मायका नहीं होता! ससुराल में भी उसे हाथ-पाँव फैलाने की जगह न मिले तो? तो? यदि औरत अपने पैरों पर खड़ी है, तो क्यों नहीं वह साहसिक निर्णय ले, अपना अलग घोंसला बनाए और अपने सपनों का संसार बसाए। यह एक संकल्प है तो, किन्तु कठिन विकल्प है। उचित तो यह है लड़की को मायके और ससुराल, दोनों जगह स्पेस मिले। उसका अधिकार दोनों जगहों में है, नहीं है तो होना चाहिए।

      दुहराऊँ, सुधा जी जिस विषय को कहानी में उठाती हैं उसे पूरी संजीदगी से बरतती है। पंजाबी छौंक वाली इनकी हिन्दी प्यारी लगती है, किन्तु खालिस पंजाबी शब्दों का अर्थ अनुमान से ही हिन्दी भाषी लगा पाएँगे। मसलन ‘टकोर करना’ का अर्थ मुझको नहीं पता। पर सुधा जी को पढ़ना सुख देता है, हाँ, ‘कहानियों पर कुछ प्रतिक्रियाएँ’ अनुक्रम में 12वें नंबर पर है, तो भ्रम होता है, यह भी किसी कहानी का शीर्षक है। इसे ‘परिशिष्ट’ में रखा जा सकता था। इतना और कि जिनकी कहानियों पर सूर्यबाला जी और डॉ. कमल किशोर गोयनका प्रीत हों उन्हें किसी और प्रमाण पत्र की ज़रूरत ही क्या है।

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