एक शिक्षक के रूप में मेरा कर्तव्य मेरे व्यक्तिगत मामलों से ऊपर होना चाहिए: सी.वी.रमन

मेहेर वान

- मेहेर वान

एक शिक्षक के रूप में मेरा कर्तव्य मेरे व्यक्तिगत मामलों से ऊपर होना चाहिए: सी.वी.रमन

15 अगस्त 1954 को पहली बार देश के पद्म और भारत रत्न पुरस्कारों की घोषणा की गई। तीन लोगों को भारत रत्न पुरस्कार की घोषणा की गई जिसमें सी राजगोपालाचारी, डॉ एस. राधाकृष्णन और सी.वी.रमन थे। सी.वी.रमन को “भारत रत्न” के लिए सबसे पहले बधाई देने वालों में इंदिरा गाँधी भी थीं। इंदिरा उस समय मात्र 37 वर्ष की थीं और सक्रिय राजनीति में नहीं उतरी थीं, वह उस समय अपने पिता नेहरु जी के साथ तीन मूर्ति हाउस में रह रहीं थीं। इंदिरा गाँधी ने रमन को लिखा था:

जैसा कि आप जानते हैं, मैं 1937 में इंग्लैण्ड यात्रा के समय से आपकी अतिशय प्रशंसक रही हूँ (जब आप जहाज पर मिले थे), आपको तब से ही भारत के एक रत्न को रूप में मानती चली आ रही हूँ। मैं यह जानकार अत्यंत खुश हूँ कि अब आप औपचारिक रूप से “भारत रत्न” हैं। यह ऐसी उपाधि है जिसके आप समृद्ध अधिकारी हैं।

            19 जनवरी 1955 में रमन को राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की ओर से एक टेलीग्राम मिला, जिसमें माननीय राष्ट्रपति ने कहा था:

            “जब आप भारत रत्न पुरस्कार लेने आयेंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप मेरे अतिथि के रूप में राष्ट्रपति भवन में ठहरेंगे। स्वागत के इंतज़ाम हेतु कृपया हमें अपने यात्रा के माध्यम और आगमन की तारीख के बारे में सूचित कीजिये।”

इस टेलीग्राम के मिलते ही रमन ने डॉ राजेंद्र प्रसाद को यह पत्र लिखा था:
20 जनवरी, 1955
मेरे प्रिय डॉ राजेन्द्र प्रसाद,

            राष्ट्रपति भवन में 27 जनवरी 1955 को होने वाले अधिष्ठापन समारोह में अतिथि के रूप में मुझे आमंत्रण हेतु कल रात आपका अत्यंत उदारतापूर्ण टेलीग्राम पाकर अत्यंत मुझे हृदयस्पर्शी प्रसन्नता हुई।

              अधिष्ठापन समारोह का औपचारिक आमंत्रण मिलने के तुरंत बाद मेरे उत्तर का इंतज़ार कर रहे सैन्य सचिव और ए.डी.सी. को स्पष्टीकरण देते हुए मैंने लिखा है कि मैं खुद को समारोह में शामिल हो पाने में असमर्थ पाता हूँ। सामान्य रूप से भी, यहाँ का मेरा काम मेरा पूरा ध्यान चाहता है और ऐसे किसी भी कार्य को स्वीकार्य करने से रोकता है, जो मुझे बंगलौर से बाहर जाने का संकेत करता हो। वर्तमान में मैं एक शिष्य का डॉक्टरेट शोध प्रबंध पूरा कराने में सहायता करते हुए अत्यंत बुरी तरह फंसा हूँ जो कि नियमानुसार उसे जनवरी के अंत के पहले ही विश्वविद्यालय में जमा कर देना चाहिए। अतः एक शिक्षक के रूप में मेरा कर्तव्य मेरे व्यक्तिगत मामलों से ऊपर होना चाहिए। मैं पूर्णतः विश्वस्त हूँ कि आप बाध्य करने वाली इन परिस्थितियों को समझेंगे जो मुझे आपका अत्यंत उदार और अनुग्रहपूर्ण आमंत्रण स्वीकार करने से रोक रहीं हैं।

भवदीय
सी. वी. रमन


इसके बाद प्रोफ़ेसर रमन ने बंगलोर में रहते हुए अपने शिष्य का शोध-प्रबंध पूर्ण कराया और उनका “भारत रत्न” का पदक और प्रमाणपत्र मैसूर सरकार के एक साधारण से अधिकारी द्वारा उनके घर पर पहुँचाया गया।  

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।