कृष्णा सोबती के रचना संसार में स्त्री

पुनीता जैन
साहित्य में स्त्री विविध रूपों में अवतरित होती रही है। यह रूप परम्परागत रहा है तो उन्मुक्त भी। अबला, विरहिनी, व्यथित, पीड़ित के साथ ही उसका विद्रोहिणी रूप भी सहज ही देखा जा सकता है। इस उपस्थिति में कई बार स्त्री एक सहज स्वाभाविक मनुष्य की तरह नहीं बल्कि आरोपित रूपों को ओढ़े दिखाई दे जाती है। अति व्यथित, अति विद्रोही या वर्तमान में अति उन्मुक्त - प्रत्येक रूप में। किन्तु इन चरम रूपों से अलग भी वह है अपने वास्तविक रूप में, अपनी सामान्य आकांक्षाओं, दुर्बलताओं, संवेदनशीलता, करूणा के साथ और स्वतंत्रमना। यहाँ वह अपने उसी सहज, प्रकृत रूप में रहना चाहती है जैसी वह यथार्थ में है और जिसे स्वीकार करने का वह साहस रखती है। कृष्णा सोबती के अधिकांश उपन्यासों में वर्णित स्त्री-चरित्र अपनी व्यथा से लेकर यौन इच्छाओं तक सहज-स्वाभाविक रूप में उपस्थित है। उस पर न उन्मुक्तता आरोपित है न ही अश्रु, अवसाद और न ही उसकी संघर्ष क्षमता। वे सब हैं अपने स्वाभाविक रूप में, मौलिक रूप में। इसी से वर्तमान स्त्री विमर्श में आजादी की छलांगे लगाती स्त्री से ज्यादा विश्‍वसनीय है कृष्णा सोबती के स्त्री-चरित्र। हमें अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है अपने आस-पास उपस्थित स्त्री को भी देखा जाए तो वह परम्परा या उन्मुक्तता दोनों के चरम सिरों से अलग भी है और परम्परागत मानव मूल्यों या स्वतंत्र विचारों को आत्मसम्मान और आत्म विश्‍वास के साथ साधने हेतु प्रयासरत भी है। ग्रामीण या धुर महानगरीय स्त्री का अस्तित्व संघर्ष निश्चित ही भिन्न तरह का है। आज के कथा लेखन में महानगर की स्त्री अपने अलग रूप में मौजूद है। किन्तु इन तमाम उपस्थितियों के बरअक्स कृष्णा सोबती की स्त्री एक ‘मनुष्य’ के नाते, उसके वैशिष्‍ट्य, दोषों के साथ उपस्थित रही है। इन स्त्री पात्रों के संघर्ष, इच्छाएँ, अपेक्षाएँ स्वाभाविक हैं, स्त्री विमर्श के तहत गढ़े गए नहीं।

कृष्णा सोबती के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में स्त्री चरित्र कई रंगों में सम्मुख आते हैं। यहाँ ‘तिन पहाड़’ की जया है जो प्रेमाकांक्षी हैं किन्तु पूरे आत्मसम्मान के साथ, अन्यथा मृत्यु से उसे परहेज नहीं। ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास की देह शोषण की शिकार रतिका (रत्ती) है जो खंडित बचपन के कारण पथराती संवेदनाओं हेतु स्नेह का ताप चाहती है। यौन हिंसा के वर्तमान परिदृश्‍य में यह चरित्र स्त्री मनोविज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ‘ऐ लड़की’ उपन्यास में मृत्यु के द्वार पर एक जीवट वृद्धा है, जो जिजीविषा से आपूरित है और मृत्यु के निडर स्वागत हेतु तैयार भी। मृत्यु के शाश्‍वत और जटिल प्रश्‍न से कवियों ने प्रायः मुठभेड़ की है। कृष्णा सोबती के गद्य में यह एक स्त्री की मृत्यु से जीवट और दुर्लभ मुठभेड़ है। मृत्यु से ऐसा जीवंत साक्षात्कार और तत्क्षण जीवन का ऐसा विहंगावलोकन एक अनूठे संभाषण द्वारा प्रस्तुत हुआ है। निस्पृहता, जीवंतता और सकारात्मकता का अनोखा मेल तथा अस्मिता बोध की गहन चिंता जो इस वृद्धा में दिखाई देती है उसमें स्वयं तिरानवे वर्षीया रचनाकार की जीवटता का भी अक्स प्रतिबिंबित है। इसी क्रम में मित्रो है, कृष्णा सोबती की सर्वाधिक चर्चित स्त्री पात्र, जो अपनी देह कामनाओं को लेकर सहज है। अपनी दैहिक पहचान और इच्छाओं के साथ वह एक औरत, एक इंसान है और एक माँ होना चाहती है बिना किसी परम्परागत, मूल्यगत दबाव के। ‘दिलो दानिश’ की महक बानो, कुटुंबप्यारी, धुन्ना बुआ तमाम रूढ़ियों के बीच आत्मसम्मान हेतु छटपटाती दिखती है तो ‘डार से बिछुड़ी’ की पाशो ‘आजादी’ के लिए। ये स्त्री पात्र समाज की दी गई भूमिका का अतिक्रमण करते हैं, उससे जूझते हैं तथा उसके भीतर से राह तलाशते हैं। कृष्णा सोबती का रचना लोक इसीलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ औरत किसी वैचारिक ढाँचे के दायरे में बंधकर अवतरित नहीं होती। उसके विविध रूप हैं, जिसके साथ वह स्वाभाविक रूप से उपस्थित है। उसकी दुर्बलता, असमंजस, आत्मबोध मूलरूप में ज्यों के त्यों यहाँ हैं। जड़ता और वर्जनाओं के प्रति कृष्णा सोबती की स्त्री आक्रामक और उग्र नहीं है उसका जीवन कर्म और जीवन सत्य स्वाभाविक रूप से अपनी आवश्‍यकता, इच्छानुरूप परम्परागत रूढ़ियों को उलांघता है। ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास की रतिका ‘गंदी लड़की’ शब्द पर बचपन से ही लड़कियों को पीट देती है। वह उदास है, परेशान है किन्तु आत्मविश्‍वास, आत्मसम्मान की कोई कमी उसमें नहीं। सोबती के स्त्री चरित्र दृढ़ हैं, भावुक और दीन नहीं। इसलिए रतिका ‘काठ’ होकर भी जुझारू है। ‘ऐ लड़की’ की वृद्धा मृत्यु की प्रतीक्षा में भी संघर्षशील और जीवट है। मृत्यु का वरण करती, जया’ भी जीवन संघर्ष में दया की आकांक्षी नहीं है। स्वाभिमान और विश्‍वास से भरी ये स्त्रियाँ वे वास्तविक स्त्रियाँ हैं, जो स्त्री जीवन को नया विस्तार देती हैं।

अपनी दैहिक कामनाओं को लेकर ‘मित्रो मरजानी’ की नायिका ‘मित्रो’ में कोई झिझक नहीं, तमाम पारिवारिक मर्यादाएँ उसके किसी काम की नहीं है। इनकी आड़ में वह अपनी इच्छाओं को झुठलाती नहीं। यह साहस आज भी ऐसे प्रकृत रूप में कम देखने का मिलेगा। विमर्श प्रेरित चित्रण में देह तो केन्द्र में है किन्तु सच्चाई का यह वास्तविक रूप व साहस नहीं। तमाम खुलेपन के बीच भी मित्रो की पहचान विशिष्ट है। नटखट, मुँहफट, बेबाक, वर्जनामुक्त, विद्रोही मित्रो कृष्णा सोबती की सशक्त स्त्री पात्र है। जो अपनी यौनिकता को लेकर स्पष्ट है। सच को सच की तरह स्वीकार करने का यह माद्दा इस चरित्र-रचना को विशिष्ट आभा प्रदान करता है। अपनी देह इच्छाओं को लेकर यह साहसी पात्र मुखर है, गोपन भाव से पूर्णतः मुक्त। किन्तु उसके साहस का एक रूप यह है कि जितने साहस से वह देह कामनाओं की तृप्ति चाहती है उतने ही साहस से अपनी माँ को लताड़ कर अपने पति व परिवार की ओर लौटती है। एक स्वतंत्रचेता स्त्री की वास्तविक इच्छा के अनुरूप है देह कामनाओं, मातृत्व, घर और परिवार का यह मेल। मित्रो की मुखरता आक्रामक और विघटनकारी नहीं प्रकृत है। ऐसे चरित्र को बड़ी कलम ही रच सकती है। यह चरित्र जितना उन्मुक्त व क्रांतिकारी है, सामाजिक मूल्यों की ओर उसका प्रत्यावर्तन भी उतना ही अचरज से भरा है। मित्रो का परिवार व विवाह संस्कार की ओर झुकना अपनी यौनिक मुक्ति से सुरक्षित कवच में लौटना है। मुक्ति का ऐसा प्रत्यावर्तन ही संस्कार या मूल्य नाम से समाज में सुशोभित रहा है। कृष्णा सोबती के स्त्री पात्रों का संघर्ष इसी मूल्य चेतना से है।

बलात्कार पीड़ित स्त्री की मनःस्थिति, उसके शेष जीवन में पुरुष की उपस्थिति, देह को लेकर उसकी प्रतिक्रिया की सूक्ष्म पड़ताल ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास की ‘स्त्री’ के चरित्रांकन में देखने को मिलता है। यह स्त्री चरित्र भी विशिष्‍ट है। बचपन की कुस्मृतियों से आक्रांत स्त्री मन के मनोविज्ञान को कृष्णा सोबती की लेखनी ने सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया है। स्त्री का सघन मनोजगत, आत्मसंघर्ष, स्वयं को पहचानने की चाह, अधूरापन आदि कई कोण से इस चरित्र की प्रस्तुति हुई है। यहाँ कृष्णा सोबती लेखिका के रूप में ही नहीं स्वयं पात्र द्वारा भी अपनी मनःस्थिति को पकड़ने का संघर्ष चित्रित करती है- ‘‘वह इस कहे गए से बाहर है। वह हर दरवाजे के बाहर है।’’1 खुद को थाहने का यह संघर्ष धुंधला और अस्पष्ट है। ऐसी मनःस्थिति व आत्मसंघर्ष में अवसाद, गहन उदासी स्वाभाविक है। इसी का परिणाम है रत्ती का यह कथन- ‘‘जिस सड़क का कोई किनारा नहीं-रत्ती वही है। वह आप ही अपनी सड़क का ‘डेड-एण्ड’ है। आखिरी छोर है।’’2 दरअसल मित्रो, रत्ती और‘ ऐ लड़की’ उपन्यास की वृद्धा कृष्णा सोबती के सर्वाधिक सशक्त स्त्री-चरित्र है। इनकी यौन कामनाओं, प्रेम, देह और मृत्यु का संघर्ष परिवार समाज और व्यक्ति का परस्पर संघर्ष, परम्परा और आधुनिकता का संघर्ष स्त्री चेतना को विस्तृत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है।

स्त्री मन के इस आत्मसंघर्ष के पीछे वह अतीत है जो उसके जीवन को आमूल चूल प्रभावित करता है। ‘तिन पहाड़’ की जया एक अनाथ स्त्री है जिसे जीवन की आशाएँ, स्वप्न ठग लेते हैं। जो गहरी ठोकर को सहेजने में असमर्थ हो जीवन से विदा ले लेती है। घनीभूत संवेदनशीलता स्त्री का मूल स्वभाव है। ‘तिन पहाड़’ की जया में भावनात्मकता का यह आवेग रूदन में भी प्रस्फुटित होता है और सघन दुख और निराशा में भी। कृष्णा सोबती स्त्री मन के कमजोर और दृढ़ सभी कोनों में झाँकती हैं। स्त्री का भरापूरा जीवन उसे मृत्यु शय्या पर भी साहसी और दृढ़ बनाए रखता है। ‘ऐ लड़की’ की वृद्धा इसका उदाहरण है, अन्यथा अवसाद ग्रस्त जया है जिसकी निराशा उसे आत्महंता बना देती है। इन दोनों चरित्रों से रतिका का चरित्र अधिक जटिल है। रत्ती की लड़ाई खुद से, अपने स्त्रीत्व, ममत्व से है। दरअसल रतिका का रौंदा हुआ बचपन उसके चारों ओर एक कँटीली बाड़ बना देता है। यहाँ स्नेह का एक स्रोत ‘असद भाई’ भी किशोरवस्था में हमेशा के लिए समय द्वारा छीन लिया जाता है। गठान दर गठान एक लड़की के जीवन को कितना जटिल बना देते हैं, रत्ती इसका उदाहरण है। क्रोध, अकेलापन, ज़िद उसकी संपत्ति बनने में देर नहीं लगाते। यही उसका साथ निभाते हैं। बचपन से ही एक बालिका को अपनी रौंद दी गयी देह को ढोते हुए जिस आत्मा से संघर्ष करना हो, जिस समाज में निर्वाह करना हो उसकी मनःस्थिति को अपनी भाषा में पकड़ने में कृष्णा सोबती ही सफल हो सकती हैं। एक लड़की जो ‘गंदी लड़की’ बना दी गयी हो उसकी मनोदशा और जीवट को सशक्त रूप से यहाँ उकेरते हुए उसके स्वभाव की कठोरता या संवेदनशीलता को भी चित्रित किया गया है। जब एक लड़की का बचपन मर जाता है तब वह ‘पत्थर औरत’ के रूप में चीन्ही जाती है पुरुष समाज द्वारा। रत्ती का अतीत उसके भीतर एक ऐसे शीत पाषाण को जन्म देता है, जिसे प्रेम, समर्पण, संवेदनशीलता की गहन ऊर्जा के बिना पिघलाया जाना संभव नहीं है। रत्ती अपनी पाषाण होती चेतना से सतत युद्ध करती है- ‘‘एक लंबी लड़ाई। हर बार बाजी हार जाने वाली और हर बार हार न मानने वाली।’’3 इस लड़ाई की पृष्ठभूमि में है- ‘‘... वह एक काला जहरीला क्षण हर बार मुझे झपट लेता है और मैं काठ हो जाती हूँ।’’4 यह स्थिति एक ऐसे मनोजगत का निर्माण करती है जिसे निरंतर अन्‍तर्द्वन्‍द्व से गुजरना है- ‘‘...तुम जमे हुए अंधेरे की वह पर्त हो जो कभी -उजागर नहीं होगी।’’5

दरअसल रत्ती ऐसा चरित्र है, जिसके जीवन की एक अंधेरी सुरंग उस पर ऐसा आधिपत्य जमाती है जो हर बार हर रिश्‍ते में उभर कर सामने आ जाती है। व्यक्ति के जीवन का एक हादसा, उसके जीवन को पत्थर, काठ बना देता हैं। रत्ती इसी प्रकार के चरित्र का प्रतिनिधित्व करती है जिसके जटिल मनोजगत में कृष्णा सोबती प्रवेश करती हैं। इस चरित्र के मन की सुरंगों में प्रवेश के लिए सघन संवेदना की दरकार है। किन्तु पुरुष सत्ता के लिए स्त्री अन्ततः देह है, संवेदना या घनीभूत पीड़ा की मूर्ति नहीं। रत्ती जैसे जटिल चरित्र की निर्मिति तो वह कर सकता है, उसे झेल नहीं सकता। इस उपन्यास के ‘सुरंग’ खंड में पुरूषोचित दर्प के हिंसक, क्रूर रूप के कई उदाहरण हैं किंतु इनमें से एक भी चरित्र इस अहं से जुदा संवेदनशील मनुष्य का नहीं हैं। यही कारण है कि रत्ती जैसे विघटित चरित्र के जीवन में ऐसा सघन एकांत है और मौन है जो खोला नहीं गया। एक जटिल स्त्री चरित्र के मनोविज्ञान की कई परतें इस उपन्यास में खुलती हैं। यही कृष्णा सोबती की भाषा और शिल्‍प का सामर्थ्‍य है कि पारंपरिकता से इतर एक चरित्र के भीतर को खंगालने में उनकी भाषा कहीं अशक्त नहीं दिखती। दीर्घ एकांत, अकेलापन एक जटिल चरित्र को जटिलतर करता चला जाता है। रत्ती इसका उदाहरण हैं। दिवाकर जैसे पात्र के माध्यम से लेखिका इस चरित्र की परतें खोलने की चेष्टा करती हैं- ‘‘रतिका, तुमने अपने इर्द-गिर्द कंटीली तारें लगा रखी हैं। अंदर खड़े-खड़े बाहर वालों से कहा करती हो ....... संभलकर ...... इधर मत आना। काँटे हैं काँटे।’’6 इस अवसाद, अकेलेपन, उदासी में भी एक जीवट स्त्री अपनी अस्मिता को लेकर सजग है। वह स्वयं से जूझती है, लड़ती है और फिर बाहरी लड़ाई के लिए भी हरदम तैयार रहती है। आत्मसम्मान पूर्वक अपनी लड़ाई को मजबूती से लड़ने वाली स्त्री है रत्ती। स्त्री का यह आत्मसंघर्ष उसकी अस्मिता को नया आकार देता है। यहाँ तक कि ‘दिलो दानिश’ उपन्यास में विन्यस्त परम्परागत समाज की रूढ़िबद्ध कुटुंबप्यारी और महक बानो तक अपने अधिकारों के प्रति जुझारू व आत्मचेतस हैं। कृष्णा सोबती के स्त्री पात्र हताश नहीं होते। हालांकि ‘तिन पहाड़’ की जया जीवन से विमुख होती है क्योंकि उसका आत्मसम्मान दयनीय स्थिति में जाने को तैयार नहीं। वह तपन जैसे आकस्मिक साथी में जीवन नहीं तलाशती। साहसपूर्वक घर त्याग, जीवन की तलाश, दुर्बलता नहीं आत्म सम्मान का प्रतीक है। दीनता कृष्णा सोबती के किसी स्त्री चरित्र में कतई नहीं दिखती। वे समस्त चरित्र संघर्षशील, स्वाभिमानी, साहसी और दृढ़ हैं जो अपनी शर्तों पर जीवन जीने के हिमायती हैं। वे दी गयी जिंदगी जीने के लिए तैयार नहीं, यह वैशिष्ट्य उनकी सबसे बड़ी पहचान है। आरोपित जीवन से विद्रोह उनके अधिकांश स्त्री पात्रों में स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ेगा। वे टूट कर भी बार-बार, हर बार खड़ी होती हैं और पराजित होने से इंकार करती है। यह प्रवृत्ति ही व्यक्ति को अपनी शर्तों पर जीवन जीने की राह मुहैया कराती है। ये स्त्री चरित्र उदार भी है। अन्य स्त्री के अधिकार क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश की चेष्टा यहाँ नहीं हैं। स्त्री के सम्मान की रक्षा की चिंता इसमें व्याप्त है। तभी ‘सूजरमुखी अंधेरे के’ की रतिका दिवाकर से स्पष्ट कहती है- ‘‘नहीं दिवाकर, कुछ भी हथियाना नहीं है।’’ या ‘‘मैं जुड़े हुए को नहीं तोडूंगी। विभाजन नहीं करूंगी।’’7 खंडित बचपन को ढोती एक स्त्री को अपना आकाश यदि मिल भी जाए तब भी उसे यह बोध है- ‘‘आकाश में घरोंदे नहीं बनते। आकाश में धरती के फूल नहीं खिलते।’’ यह घोषणा इस बात का प्रमाण है कि ये स्त्री पात्र कितने आत्मसजग है। यहाँ अपूर्णता का स्वीकार्य है। आत्मसम्मान के साथ अनंत संघर्ष की यात्रा भी उसे मान्य है। कृष्णा सोबती स्वयं एक दृढ़, जीवट महिला है। फलतः उनकी लेखनी से दयनीय स्त्री पात्र का जन्म नहीं होता। समस्त स्त्रीपात्र जुझारू, संघर्षशील योद्धा प्रकृति के हैं, जिनमें नकारात्कता नहीं जीवन का उत्सव है। लेखिका का अक्स उसकी लेखनी में उतरना उनके जीवन और रचनाकर्म के गहरे अंर्तसंबंध का द्योतक है। उनके अधिकांश स्त्री पात्र समाज, परम्परा द्वारा तय ढाँचों का अतिक्रमण करते हैं किन्तु इस अतिक्रमण में कृत्रिमता नहीं है। उनकी स्वातंत्र्य चेतना जीवन में प्रकृत रूप से बहकर आती है, जो अटूट जिजीविषा का प्रमाण है। यहाँ तक कि ‘डार से बिछुड़ी’ की पाशों तक अपनी दुरवस्था के प्रत्येक पड़ाव में जीवन तलाशती है। मुक्ति की ऐसी तीक्ष्ण एषणा और संघर्ष दुर्धर्ष भटकाव में भी बनी रहे - यह शक्ति कृष्णा सोबती के स्त्री चरित्रों में ही दिखती है। दीनता के स्थान पर पुरुष भाव की सख्ती भी इस स्त्री पात्रों में मिल जाएगी। ये स्त्रियाँ नहीं मनुष्य होकर कर्म में डूबी दिखती हैं जिनमें स्त्री भाव के बराबर ही पुरुष भाव भी मिलेगा। इस वैशिष्ट्य को स्वयं कृष्णा सोबती की चेतना का ही अवतरण कहा जा सकता है।

परम्परागत समाज के परिवारों में स्त्री को जो प्राप्त है उसे पर्याप्त मान उसे सहनशीलता, सब्र के पाठ पढ़ाए जाते हैं। ‘दिलो दानिश’ की कुटुंब प्यारी के विद्रोह, डाह, द्वेष को परम्परा और चलन के नाम पर ठंडा करने का प्रयास घर की बुजुर्ग महिला भी करती हैं। मर्द द्वारा बाहर औरत रखना तय मान लिया जाता है जबकि विधवा बहन छुन्ना बुआ के हँसने, बोलने को आपत्तिजनक माना जाता है। दरअसल ‘डार से बिछुड़ी’ और ‘दिलो दानिश’ इन दो उपन्यासों के स्त्री चरित्र परम्परागत रूढ़िग्रस्त समाज की बंधी बंधाई लीक से निकले हैं, जहाँ स्त्री के लिए परिवार, बाल बच्चे, व्रत-त्योहार, और अधिक हुआ तो गहने नियत कर दिए गए हैं। किन्तु कृष्णा सोबती के रूढ़िग्रस्त परिवार की स्त्री कुटुंब प्यारी भी असंतोष से कुलबुलाती हुई अपने अधिकार के लिए विचलित रहती है। दूसरी ओर महक बानो के हृदय में भी अपनी तमाम लिहाज़दारी के बावजूद प्रश्‍न कायम हैं। प्रेम इन स्त्रियों को कमजोर नहीं करता, बल देता है। अन्याय की परम्परा को बनाए रखने की हिदायत से इनका विरोध है। ‘दिलो दानिश’ और ‘डार से बिछुड़ी’ द्वारा लेखिका पितृसत्तात्मक समाज में रची बसी स्त्री द्वारा स्वीकारे गए अनुकूलन को उसके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करती हैं। इन्हीं पात्रों में पाशो मुक्ति के लिए संघर्ष करती है तो छुन्ना बुआ भी यथास्थिति को तोड़ अपनी राह स्वयं चुनती है। आजीवन समझौते करने वाली महक बानो को जब उनकी बेटी से ही विलग किया जाता है तब पूरे आत्म विश्‍वास के साथ वह विद्रोह कर उठती है। ‘दिलो दानिश’ इंसानी रिश्‍तों के उतार चढ़ाव और ताप की कहानी है जिसमें स्त्री पात्र नदी की तरह उपस्थित हैं कभी शांत, उदार, कभी उफनते, दहकते। नदी की गहराई, विस्तार, उफान, तरंगें कुटुंबप्यारी, महक बानो से लेकर छुन्ना बुआ और मासूमा तक में मौजूद है। एक बड़ी बात और, कुटुंब और महक बानो के बीच धर्म किसी भी तरह की कड़वाहट का सबब नहीं है। कृष्णा सोबती की स्त्री के वजूद के सम्मुख धर्म कोई मुद्दा ही नहीं है।

प्रेम, मातृत्व, यौनकामनाएँ, स्वतंत्रता के साथ मृत्यु का प्रश्‍न भी कृष्णा सोबती के स्त्री पात्रों की रचना के केन्द्र में हैं। मृत्यु के सम्मुख भी एक वृद्धा स्त्री - स्वतंत्रता और अस्मिता की चिंता से बरी नहीं है। यहाँ एक स्त्री का जीवन-दर्शन मृत्यु के सम्मुख पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ प्रस्फुटित हुआ है। यह कृष्णा सोबती के रचना विवेक का सामर्थ्‍य ही है कि अपनी सशक्‍त भाषा व रवानगी के साथ संवाद शिल्‍प में वे ‘ऐ लड़की’ उपन्यास में अद्भुत वाग्मिता युक्त वृद्ध स्त्री चरित्र को मृत्यु का सामना करती दिखाती हैं। रोग शय्या पर पड़ी वृद्धा के जीवन में स्मृति, पीड़ा, जिजीविषा, मृत्यु की प्रतीक्षा का अनोखा मेल यहाँ मिलेगा। मृत्यु के अंतिम छोर पर भी स्त्री-जाति की इयत्ता के प्रति ऐसी सजग चेतना को आकार देने में कृष्णा सोबती जैसी आत्मचेतस लेखिका ही सक्षम हो सकती हैं। वस्तुतः मृत्यु शय्या पर प्रतीक्षारत व्यक्ति का जीवन एक पुनरावलोकन से भी गुजरता है। अपने ही जीवन का गहन सिंहावलोकन! अनुभव सिद्ध दृष्टि जीवन को उसके समग्र में देख-समझकर एक दर्शन गढ़ने में सक्षम होती है। जो यह कह सकती है- ‘‘जो दिलों पर अर्गलाएँ चढ़ा लेते हैं, उनका आकाश उन्हीं तक रह जाता है।’’8 या फिर, ‘‘अनुभव, पढ़ने और मनन करने से बुद्धि तेज़ जरूर होती है। पर जीकर ही उसमें अर्थ उत्पन्न होते हैं।’’9 यही दृष्टि निस्पृहता से मृत्यु की प्रतीक्षा कर सकती है, जिसके लिए मृत्यु जीवन की तरह ही सहज है और सहज है अतीत की विशेष स्मृतियाँ- ‘‘जाने अभी कितना रास्ता बाकी है और कितनी देर है। यह तो पड़ाव ठहरा। नींद में जैसे कोई बारिश की आवाज़ सुनता है न, ऐसे ही कोई बीता वक्त सुन रही हूँ।’’10 जीवन के समस्त उच्चावचन को निस्पृह भाव से देखने की यह दृष्टि ही उसके जीवन दर्शन को सूक्ति में समाहित कर जाती है- ‘‘सबकी यात्रा इसी तरह घात-प्रतिघात में गुजरती है।’’11

कृष्णा सोबती की स्त्री में गहरी सजगता है। मृत्यु शय्या पर भी वह स्त्री-पुरुष की सामाजिक अवस्थिति पर विचार व्यक्त करती है। उसे सामाजिक अधिकार तभी प्राप्त हो सकते हैं, जब वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो। आर्थिक स्वतंत्रता उसकी अस्मिता का आधार है। यद्यपि यह सही है कि आर्थिक आजादी के बाद भी स्त्री की सामाजिक स्थिति में बहुत बड़ा हेर-फेर नहीं हुआ है। बल्कि दोहरी जिम्मेदारियाँ, दोहरे दबाव ने उन्हें अधिक संघर्ष की ओर भी धकेला है। फिर भी कृष्णा सोबती की स्त्री अपने विषय में बिना किसी आक्रोश और झंडाबरदारी के सोचने की ताकत खुद संजोती है- ‘‘सोचने की बात है- मर्द काम करता है तो उसे एवज में अर्थ-धन प्राप्त होता है। औरत दिन-रात जो खटती है, वह बेगार के खाते में ही न ! भूली रहती है अपने को मोह- ममता में। अनजान। बेध्यान। वह अपनी खोज-खबर न लेगी तो कौन उसे पूछने वाला है।’’12 इस भाषा पर ध्यान दिया जाना चाहिए यहाँ किसी तरह की स्त्रीवादी आक्रामकता नहीं हैं यह जीवनानुभव से उत्पन्न दृष्टि है, किसी भी तरह से प्रत्यारोपित नहीं। यही कृष्णा सोबती के स्त्री पात्रों का वैशिष्‍ट्य है। वे जीवन में है और जीवन से निकलकर, पक कर अपनी बात कहती हैं इसलिए यह स्वर विश्‍वसनीय है और स्थायी प्रभाव को उत्पन्न करने में सक्षम है। ‘‘यह भारी परदे बदल दो। ताजी हवा अंदर आने दो।’’13 यहाँ भी इस पंक्ति के वाच्यार्थ में नहीं इसकी गहन व्यंजना में जाना होगा। क्योंकि जीवन के आखिरी छोर पर स्त्री मन की सभी गठरियाँ धीरे-धीरे खुलने लगती हैं। जीवन भर की व्यस्तता में स्वयं को भूली रहने वाली स्त्री का अंतिम पड़ाव में यह आत्मावलोकन वास्तव में स्त्रीत्व का बेबाक बयान है। रिश्‍तों और संबंधों की संज्ञाएँ ढोती स्त्री वस्तुतः ‘नाम की ही महारानी’ होती है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर वह यह स्वीकार करती है कि ‘‘अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है।’’14 और यह तभी संभव है जब ‘‘एक बात याद रहे कि अपने से भी आजादी चाहिए होती है। देती हो कभी अपने को?’’15 यहाँ अपने से भी आजादी को एक बड़े कथन के रूप में समझा जाना चाहिए। स्त्री पर जो स्त्री बोध लादा गया है उससे स्वयं उसने भी अनुकूलन कर लिया है सही बात है कि वह खुद को खुद से ही आजाद नहीं करती। जिस दिन उसका ‘आत्म’ स्वतंत्र उड़ान लेना आरंभ करता है उस दिन वह जीवन और मृत्यु दोनों को निस्पृह भाव से ग्रहण कर लेती है। एक व्यक्ति के तौर पर अपने निज को जिए बिना गृहस्थी में घड़ी बनकर जीना उस व्यक्ति की आत्मा को शून्य से भर देता है। एक वृद्धा इस अनुभूति को तल्ख रूप से अनुभूत करा देती हैं कि संतान और परिवार उसके हिस्से का पूरा वक्त ले लेते हैं। हालांकि अपनी पहचान के लिए परिवार और रिश्‍तों को वे त्याज्य नहीं बतातीं है- ‘‘संग-संग जीने में कुछ रह जाता है, कुछ बह जाता है। अकेले में न कुछ रहता है और न बहता है। XXX परिवार के बीचों-बीच छोटी-मोटी कर्मभूमि बिछी रहती है। यही से स्त्री को अपनी और दूसरों की प्रतीति होती है।’’16 एक स्त्री की निज की खोज परिवार में रहकर परिवार से अलग अपनी पहचान की यात्रा है। भारतीय समाज की यह मूल्य चेतना कृष्णा सोबती के प्रत्येक मुखर स्त्री चरित्र को भी अपने में समेट लेती है। यहाँ तक कि मित्रो जैसा मुखर, बेबाक चरित्र भी अंततः परिवार, वैवाहिक जीवन की यथास्थिति में लौटता है। मुक्ति चेतना और मूल्य चेतना का यह अन्तर्विरोध ‘ऐ लड़की’ की वृद्धा में भी लक्षित है। पित्तृसत्ता की संस्थागत पहचान विवाह और परिवार में रहकर ‘आत्म’ को पाने की ललक कृष्णा सोबती की ‘स्त्री’ का आत्मसंघर्ष है। स्त्री का संघर्ष एक शरीर का उसमें रहकर उससे अलग होने का, उसमें रहकर आत्मा की मुक्ति का संघर्ष है। मृत्यु के पड़ाव पर एक अंतिम इच्छा देह और देह पर आरोपित आवरणों से मुक्ति की उत्कंठा भी उसका यथार्थ है- ‘‘जैसे मैंने यह ऊपर की चद्दर उतारी है, वैसे ही मेरा बदन उतार दो। मुझ पर से मेरा शरीर अलग कर दो। अब और नहीं सहा जाता।’’17

कृष्णा सोबती के उपन्यासों के स्त्री पात्र जीवन के कई ठौरों से गुजरते हुए अपनी ठोस उपस्थिति की मुनादी करते हैं। मृत्यु से साक्षात्कार वस्तुतः उसकी अस्मिता से साक्षात्कार भी है। एक स्त्री की ‘स्व’ से मुलाकात और जीवन अनुभवों को बेटी से बाँटते हुए खुद की तलाश का सबक वास्तव में एक मृत्यु का जीवन से संवाद है। अटूट जिजीविषा, स्त्री अस्मिता की चिंता के साथ मृत्यु का सहज आलिंगन करते जीवंत स्त्री चरित्र को प्रस्तुत करता उपन्यास ‘ऐ लड़की’ मृत्यु की कगार पर जीवन के प्रकृत सौन्दर्य को पाने का दर्शन भी प्रस्तुत करता है। बेशक आर्थिक स्वतंत्रता की तरह ही यौन स्वतंत्रता स्त्री के अस्मिता संघर्ष का एक ठोस पड़ाव है। मित्रो की देह मुखरता स्त्री अस्मिता का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। किन्तु इसके आगे जीवन की थाह लेता एक गहरा चरित्र गढ़ा गया है ‘ऐ लड़की’ उपन्यास में। इस उपन्यास के स्त्री-चरित्र को कृष्णा सोबती का एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्त्री-चरित्र कहा जाना अनुचित नहीं होगा क्योंकि यह मृत्यु का जीवन से जीवंत और सशक्‍त संभाषण है। यहाँ मृत्यु की अनिवार्यता अवसाद मुक्त हो जीवन में अंतिम क्षण तक मुखर रूप से स्पंदित होने की राह तलाशती है। यह राह उसे प्रत्येक तरह की आजादी की ओर ले जाती है। यह कहना भी उचित होगा कि कृष्णा सोबती का जीवन दर्शन उनके स्त्री-चरित्रों में रूपांतरित होकर, छनकर प्रस्तुत होता रहा है। उनकी ‘स्त्री’ का फलक स्त्री तक सीमित न होकर पुरुष की सीमा में भी प्रविष्ट होता है और ‘मनुष्य’ के रूप में वह मानव जाति के मूल प्रश्‍नों प्रेम, मृत्यु तक भी प्रसरित होकर अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है।

संदर्भः

(1) सूरजमुखी अंधेरे के - कृष्णा सोबती, राजकमल पेपर बैक्स पृष्ठ 14
(2) वही, पृष्ठ 9
(3) वही, पृष्ठ 93
(4) वही, पृष्ठ 96
(5) वही, पृष्ठ 103
(6) वही, पृष्ठ 109
(7) वही, पृष्ठ 133
(8) ऐ लड़की - कृष्णा सोबती, राजकमल पेपर बैक्‍स पृष्ठ 49
(9) वही, पृष्ठ 45
(10) वही, पृष्ठ 39
(11) वही, पृष्ठ 55
(12) वही, पृष्ठ 56
(13) वही, पृष्ठ 56
(14) वही, पृष्ठ 57
(15) वही, पृष्ठ 58
(16) वही, पृष्ठ 80
(17) वही, पृष्ठ 83

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