काव्य: वर्षा सरन

वर्षा सरन

          खंडहर

प्राचीन महलों, मन्दिरों के खंडहर
क्या कहते हैं!
एक इतिहास को दबाये अपने प्रस्तरों में
गुमसुम से, वीरान
कुछ दबे अंदाज़ में
फुसफुसाते हैं
जैसे बूढ़े, बीमार लोग
जो घर के आँगन में
चारपाई डाले
कुसमुसाते हैं
बहुत कुछ कहना चाहते हैं
दबी जुबान से
और मौका मिले तो
चटखारे ले ले कर
सुनाते जाते हैं अपना स्वर्णिम अतीत
बस कोई मिलना चाहिए
लेकिन यदा कदा ही कोई हत्थे चढ़ पाता है
वरना यूँ ही सूनी आँखों से
टुकुर टुकुर इधर उधर ताकते जाते हैं
ठीक वैसे ही, जब गाइड बताता होगा
इन जर्जर खंडहरों का मजबूत और खूबसूरत इतिहास
तो एक एक जर्रा
होंठ टेढ़े कर मुस्कुराता तो होगा!
कि मैं भी कुछ था
नहीं तो ये आवारा लैला मजनूँ
आई लव यू
दिल-विल की बातों से
इनकी दीवारों को बर्बाद किये जाते हैं
गोया, ये भी कोई बात है
न होते इसके राजा रानी
उस समय ये हिमाकत की होती तो
दीवारों में ही चिनवा दिए जाते
बदमाश, छिछोरे...
ये आज कल के छोरा छोरी
ये कह कर...
इन इमारतों की खिड़कियाँ दरवाज़े
चरमराते जाते हैं
बस महसूस तो करो
हर शय कुछ कहती है
ये टूटे फूटे पत्थर
ये सीली सीली ईंटों के
कमरे और कराहते रूह
जो दफन हैं
कैद हैं इनकी हवाओं में!
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      खोज

क्या खोजती हूँ मैं!
क्या चाहती हूँ!
खुद भी नहीं जानती!
भोर का उजियारा
समाया मेरे भीतर
चंदा की चांदनी
भिगोती मेरा अंतर्मन
स्वयं ही ये पागल मन!
करता है अपना अवमूल्यन!
अनमोल हूँ मैं
ये जानूंगी कब!
रात में ये अँधेरा डरा जाता है मुझे
सूरज की धूप जला देती है मुझे
सावन की बारिश भिगो देती है
मेरे रोम रोम को
डर जाती हूँ अकसर में
इन छोटी छोटी बातों से
पर बात जब हो
परिवार की
तो उसकी ढाल बन
जाती हूँ
चट्टान सी एक
प्रहरी भाँति खड़ी
हो जाती हूँ मैं
कोमलता भूल कर
कठोर बन जाती हूँ
यही तो मैं हूँ
हाँ! मैं हूँ
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          दबा हुआ मन

भारी भरकम कांजीवरम की साड़ी
और सोने के भारी गहनों के बीच
दबा सिकुड़ा मन
व्यथित है, इस चमक से
जैसे आँखें चुंधिया कर
कमज़ोर न हो जाएं
लेकिन पहनना तो पड़ेगा
समाज को अपना रुतबा जो दिखाना है
उपभोक्तावादी समाज का ताना बाना ही
कुछ इस तरह का है
यहाँ कोई मन के विचार
आँखों से नहीं समझता
यहाँ कविता तो एक मजाक है
कवि की बिसात रद्दी से टुकड़े सरीखी है
अगर किताबों के मायाजाल से
कुछ माया समेटी हो
तो कुछ औकात है
नहीं तो एक धेले की कीमत नहीं आपकी
तो फिर कीमती बनना है तो
ये सब अंगीकार करना भी जरूरी है
और सही मेकअप और हेयरस्टायल के साथ
एक मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए
कहना ही होगा
नमस्ते, आप कैसे हैं!!
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       शरीर से परे

तुम शरीर तक सीमित हो
मैं मन की अथाह अनंतता तक
असीमित हूँ
बहुत गूढ और अबूझ पहेली हूँ

तुम केवल मुस्कुराहट
स्निग्धता और रूप के पुजारी हो
मैं देह से विलग
आत्मा की सहेली हूँ

नदिया सी निश्चल
बादल सी असमंजस
वर्षा सी विह्वल
देवयोगनी, मुक्ता
प्राण दायनी, रचयिता
आशाओं की संगिनी

सब कुछ सौन्दर्य से परिभाषित
फिर भी तुम बिन अधूरी
क्योंकि, कुछ विशेष है मुझ में
जो प्रेम के जल से है सिंचित!

1 comment :

  1. ये खोज है खंडरों में.भंगुर शरीर और अति चंचल मन से परे अनन्त आत्म गहराईयों की जहां सदैव दिव्य कान्ति और असीम आनन्द की अनुभूति रहती है। अतुलनीय रचनाओं की सुन्दर लडी।

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