सूर्यबाला की कहानियों में चित्रित अकेलापन

शैलेशकुमार दुबे

- शैलेशकुमार दुबे

समकालीन कथा-साहित्य में सूर्यबाला का लेखन विशिष्ट महत्व रखता है। उन्होंने अपनी कहनियों में आज की प्रमुख समस्या अकेलापन का चित्रण बहुत ही संजीदगी के साथ किया है। समाज, जीवन, परंपरा, आधुनिकता एवं उससे जुड़ी समस्याओं को सूर्यबाला एकदम खुली, मुक्त एवं नितांत निजी दृष्टि से देखने की कोशिश करती हैं। उनमें किसी विचारधारा के प्रति न अंध श्रद्धा देखने को मिलती है और न ही एकांगी विद्रोह। साहित्यकार और संवेदना एक दूसरे के पुरक हैं। जिसमें संवेदना नहीं वह साहित्यकार नहीं हो सकता। सूर्यबाला भी संवेदनशील कहानीकार है। वे वाराणसी, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से परिचित हैं। वहाँ की समस्याओं पर उनकी पैनी नज़र रही है, जिनका खाका वे अपनी कहानियों में प्रस्तुत करती हैं।

वर्तमान मनुष्य के पास समृद्धि हैं किन्तु शांति नहीं। रुपया-पैसा साधन है, साध्य नहीं। इस पंक्ति का अर्थ हम समझे नहीं या समझना नहीं चाहते यह हमें विचार करना होगा। सूर्यबाला जी की कहानियों में समाज में व्याप्त समस्याओं का बहुत ही मार्मिक चित्रण प्राप्त होता है। जैसे ‘कहो ना ’ कहानी में उन्होंने अकेलेपन की पीड़ा का अंकन किया है। इस कहानी की नायिका मीता अकेलेपन से दुखी है। पति की कार्यालय चले जाने पर वह घर में अकेली रह जाती है, बेटा भी हॉस्टल में रहता है। अतः वह पति व बेटे के साथ में न रहने के कारण अकेलेपन से परेशान हो जाती है। (कहो ना (कहानी) -सूर्यबाला)

“मीता, उमा और तब दोनों एक में समा गए थे।
जैसे धीमे-धीमे उसमें प्राण संचारित हो रहे थे।
कहाँ थी तुम?
वह भौंचक देखे जा रहा था।” (कहो ना (कहानी) –सूर्यबाला – पृष्ठ क्रमांक – 151)

‘साँझवाती’ में बुजुर्ग दंपति के अकेलेपन की समस्या को उठाया गया है। वृद्ध पति –पत्नी में बहुत प्रेम है। वे दोनों बेटे-बहुओं के पास रहते हुए भी अकेलापन में जीवन व्यतीत करते हैं, क्योंकि पति अकेले एक बेटे के साथ रहते हैं तथा पत्नी अकेली एक बेटे के पास रहती है। वे दोनों जब भी मौका मिलने पर मिलते अपने अकेलेपन का दुख एक-दूसरे से साझा करते। दर्द को झेलते हैं। इस पीड़ा के बाद भी अपने बच्चों की चिंता करते रहते। (साँझवाती (कहानी) - सूर्यबाला)

“ बड़ा और बेटे-बहू नाराज होंगे...
वे अपने घरों, कमरों, दिवारों के बीच होते कहाँ हैं---
वे बेघर हैं और उनके बच्चे अनाथ ---
छि --- शुभ- शुभ बोलो। ” (साँझवाती (कहानी) – सूर्यबाला- पृष्ठ संख्या -86)

‘आखिरवी विदा’ रचना में माता-पिता अपने बेटे की वजह से त्रासदी में रहने को मजबूर होते हैं। बेटा विदेश चला जाता है। उसके माता-पिता उसकी राह देखते है अथवा आज के शब्दों में कहें तो उसे मिस करते हैं। अपने बेटे के लिए दोनों तड़पते और विवश रहते हैं। उन्हें जब भी पता चलें कि उनका बेटा आ रहा है तो वे उसे वेलकम करने की बहुत तैयारी करते है। उसे क्या-क्या खिलाना है वे इस पर चर्चा करते है, किन्तु बेटा बहुत कम खाना खाता है। उसे ज्यादा बात करना पसंद नहीं। अतः माता-पिता को दुख होता है। बेटे के चले जाने पर फिर उसके आने के इंतजार में स्थिति जस की तस हो जाती है। (आखिरवी विदा (कहानी) - सूर्यबाला)

“मगन, गदगद, रोमांच, विकल खुशी का अतिरेक,
जैसे सीना फाड़कर निकल जाने को आतुर।
और आप पापा।” (आखिरवी विदा (कहानी) – सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक -55)

‘झील’ कहानी में सेवानिवृत्त व्यक्ति के अकेलेपन का वर्णन है। कहानी का नायक मिस्टर चढ्ढा रिटायर्ड हो चुके हैं। वे जब नौकरी करते थे, उनकी पत्नी उनका अकेले ही इंतजार करती थी। इसी कारण बात न करने की आदत उसे पड़ जाती है। लेकिन जब पति रिटायर्ड हो जाते है तो अपने पति से बातें कैसे की जाए उसे समझ नहीं आता। अपने घर-परिवार में पत्नी की ऐसी हालत देखकर उसे आश्चर्य होता है। इन बातों से मिस्टर चढ्ढा परेशान हो जाते हैं। वह अपने घर में अकेला महसूस करने लगते हैं, किन्तु उनकी पत्नी ने इस दर्द को वर्षों से झेला है। (झील (कहानी) - सूर्यबाला)

“चलता हूँ,
स्टडी में कागजों को छाटकर अलग कर लूँ।
मैं आ जाऊँ?
श्यामली ने उसी सहजता से पूछा।” (झील (कहानी) – सूर्यबाला- पृष्ठ क्रमांक -95)

सूर्यबाला की ‘झील’ कहानी और उषा प्रियवंदा की ‘वापसी’ में कितनी समानता है। मिस्टर चढ्ढा और गजाधर बाबू की तरह।

‘सलामत जागीरे’ नामक कहानी में माँ बेटे की स्वार्थलिप्सा के कारण अकेलेपन का शिकार होती है। बेटा माँ के दुख को नहीं समझता, लेकिन माँ माँ होती है। बेटा केवल छुट्टियों में ही अपने माँ से मिलने आता है। जिसका परिणाम यह होता है कि माँ अकेली रह जाती है। (सलामत जागीरे (कहानी) - सूर्यबाला)

“दो नन्हें,
पौधों की जोड़ी।
हलकी पीली आभा और रतनारी छुअन- दो नन्हें रेशमी फूल।
ओह लवली! कितने प्रिंटी फ्लावर्स।” (सलामत जागीरे (कहानी)–सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक- 101)

‘पड़ाव’ कहानी में बूढ़े दंपति के जीवन में फैला अकेलापन उनकी पीड़ा का मुख्य कारण है। परिवार में उनकी उपेक्षा होती है। वे अकेले रहते है। सालों से उनके पास न कोई आता है, न कोई मिलता है। वे जोड़ों के दर्द (arthritis) से परेशान हो जाते हैं। परिवार से कुछ लेना देना ही नहीं, उनसे रिश्ता नहीं के बराबर होता है। किसी से बातचीत भी नहीं होती। पैसा जीवन में सुख और दुख दोनों लाता है। ईश्वर की माया ईश्वर ही जाने। पैसा अपने से दूर करता है। यह उतना ही कड़वा सच है, जितना हम माने या न माने। बुजुर्ग दंपति के घर अचानक उनके भतीजे का आगमन होता है, सपरिवार। उसे देखकर बुजुर्ग दंपति खुश होते है। लेकिन उनके भतीजे का स्वार्थीपना सामने प्रकट हो जाता है। 70 रुपये लेकर वह उनकी सेवा अथवा खातिरदारी 8 दिनों तक करता है। जाते जाते वे ताने भी सुना जाता है। बुढ़ापे में इसे झेलना ही होता है। इसका दूसरा कोई उपाय नहीं। अकेलेपन का फायदा वे उठाते है। जब अपना बेटा अपना न हुआ तो दूसरे से क्या उम्मीद करना। (पड़ाव (कहानी) - सूर्यबाला)

“अरे–रे–कौन?
वह झलमली आँखों से अंदाजता हैं।
अरे पहचाना नहीं। मैं शैलेंद्र हूँ ताऊजी,
शैलेंद्र। फिर थोड़ा हिचकर- शै .... लू” (पड़ाव (कहानी) – सूर्यबाला- पृष्ठ क्रमांक- 82)

‘समापन’ कहानी में सूर्यबाला जी ने माँ की पीड़ा का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है। माँ की उपेक्षा परिवार में होने लगे तो उसके स्वभाव में परिवर्तन आना जायज़ है। उसकी बेटी या बहू उनके सेवा से तंग आ जाते है तो उन्हें गाँव भेज देते हैं। वह अपने बेटे से बहुत स्नेह करती है फिर भी अकेलेपन का शिकार हो जाती हैं। (समापन (कहानी) - सूर्यबाला)

“माँ ही मुझे निचली सीढ़ियों से आवाज़ दे रहीं हो-
चुक्की। ज़रा मुझे
बरामदे की सीढ़ियों से उठंगा दे बेटा।” (समापन (कहानी) – सूर्यबाला- पृष्ठ क्रमांक- 73)

‘दूज का टीका’ कहानी में बुआ जी के अकेलेपन वर्णन है। इसमें बुआ जी कमर दर्द से परेशान हैं। अतः उन्हें दूसरे का सहारा लेना पड़ता है। उनकी बहू और बेटा नौकरी में हैं। उन्हें खुद के बेटे के लिए समय नहीं है क्योंकि वे बीजी रहते हैं। नौकरी पेशा दंपति ने बुआ के लिए एक नौकरानी रखा है। खुद के घर में बहू उनका सम्मान नहीं करती। घर के नियम टूटते देखकर बुआ चुप होकर या कहें शांत हो बैठ जाती है। घर के कोने में पड़ी रहती है। (दूज का टीका (कहानी) - सूर्यबाला)

“बुआ ने बलैया ली,
अरे बिन्नी को देने के लिए पैसे जुटा के रखे हैं कि नहीं?
कैसे पैसे?
लो, ले --- वह टीका करेगी न तुझे आज।
बुआ निहाल।” (दूज का टीका (कहानी) – सूर्यबाला- पृष्ठ क्रमांक - 126)

स्वार्थ मानव का ही एक गुण है, लेकिन किसी भी गुण का अति मानव के लिए खतरे से ज़्यादा कुछ नहीं। यह हम जानते हुए भी अंजान बनते है। सूर्यबाला जी ने अपनी कहानियों में इसे वास्तविक रूप में वर्णित किया है। ‘बाऊजी और बंदर’ कहानी में बहू स्वार्थी है। उसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कोई परहेज नहीं। बहू अपने ससूर बाऊजी से परेशान हैं। इस कारण वह उन्हें गाँव भेज देती है, लेकिन वे फिर लौटकर आ जाते है। अतः बहू परेशान होने पर उन्हें बंदर हटाने के कार्य पर लगा देती है। ससूर की कितनी इज्जत है घर में। यह विचार करने का प्रश्न है। (बाऊजी और बंदर (कहानी) - सूर्यबाला)

“पता नहीं ये बूढ़े लोग-मोह माया का इतना ओवर स्टॉक क्यों भरे रहते हैं,
अपने दिल में।
जब देखो तब उलीचने को तैयार।” (बाऊजी और बंदर (कहानी) – सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक -10)

‘मटियाला तीतर’ में स्वार्थी स्त्री का चित्रण है। इसमें ठकुराईन देवा को बंबई (मुंबई) घुमाने के नाम पर भेजती है, किन्तु वह उसे अपने घर में नौकर की तरह रखती है। जब देवा अपने गाँव जाना चाहता है वे उसे किसी न किसी बहाने उसे नहीं जाने देती। वह उसे अपने स्वार्थ के कारण उसे नहीं भेजती। नौकर को नौकर न कहकर उसे किसी बहाने घर में रखना और घर के सारे काम करा लेना। इसे चालाकी कहें या स्वार्थ। सपना दिखाना किन्तु उसे पूरा नहीं करना। (मटियाला तीतर (कहानी) - सूर्यबाला)

‘गीता चौधरी का आखिरी सवाल’ कहानी में परिवार के स्वार्थ को उजागर किया गया है। गीता पढ़ाई में होशियार है। परिवार में उसकी उपेक्षा होती है। गीता की पढ़ाई और बुद्धिमता का उसके परिवार से कुछ लेना-देना नहीं। अतः घर में उसकी कोई क़द्र नहीं। उसे घर में भाभी के बच्चों को संभालना, भाई के मित्रों के लिए पकौड़े तलकर खिलाना इत्यादि कार्यों में लगाया जाता है। उसकी पढ़ाई की बात सामने आने पर, भाभी के भाई से फर्जी प्रमाण पत्र बनाने की बात कही जाती है। परिवार में उसकी पढ़ाई पर कोई ध्यान नहीं देता। गीता भी स्कूल में पढ़ाई पर ध्यान न देकर, वह अपनी सहेली सोना जैसी हो जाती है। जिसका मन किसी न किसी हरकत में लगा रहता है। अतः उसके टीचर परेशान हो जाते हैं। (गीता चौधरी का आखिरी सवाल (कहानी) - सूर्यबाला)

“तुम्हें मेरे सवालों का ठीक-ठीक जवाब देना होगा,
गीता।
**************************************
मैं तुमसे ही कह रही हूँ।
इस क्लास की कुर्सियों और बेंचों से नहीं।” (गीता चौधरी का आखिरी सवाल(कहानी) – सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक -52)

‘विजेता’ कहानी धनी परिवार के स्वार्थ पर केन्द्रित है। इसमें अमीर परिवार का सेठ बहुत ही स्वार्थी होता है। एक दिन सेठ का बटुआ चोर लेकर भाग जाता है, जिसके कारण सेठ दुखी हो जाता है। उसे परेशानी होती है। इस कहानी का नायक एक अनाथ बच्चा है। जो अपनी जिंदगी में भागता ही रहता है। एक दिन चलती बस में वह एक स्त्री को चांटा मारता है, फिर उसे मर्द होने का एहसास होता है। ‘क्या-क्या कर डाला! ---- चलती बस में एक औरत को चांटा मार आया...’ (विजेता (कहानी) – सूर्यबाला – पृष्ठ संख्या – 22) डॉ. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के अनुसार –“कहानी का गद्य रचना का कथा- संपृक्त वह स्वरूप हैं, जिसमें समान्यतः लघु विस्तार के साथ किसी एक ही विषय अथवा तथ्य का उत्कट संवेदन इस प्रकार किया गया हो, उसके विभिन्न तत्व एकोन्मुख होकर प्रभावन्वीति उत्पन्न करने में पूर्ण योग देते हो।” (कहानी की परिभाषा– डॉ. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा – पृष्ठ संख्या – 31) अतः इस कहानी का प्रभाव पाठक को सोचने पर विवश करता है। सेठ का बटुआ अनाथ बच्चा ही अपने साहस के बलबूते लाकर देता है। सेठ प्रसन्न होता है, किन्तु उसकी स्थिति और परिस्थिति देखकर उसे अपने यहाँ नौकर रखता है। सेठ की तो आदत ही होती है झूठे वादे करने की। इसलिए बच्चे को सही समय पर पगार नहीं मिलती। सेठ उसका शोषण (exploitation) करता है। (विजेता (कहानी) – सूर्यबाला)

‘गुफ़्तगू’ कहानी में मानव जाति की स्वार्थ प्रवृत्ति पर बहुत ही करारा प्रहार लेखिका ने किया है। कैंसर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का परिवार बहुत दुखी होता है। कहानी का नायक अपने मित्र के. के. के किए गए उपकार को याद करता है, लेकिन मिलना नहीं चाहता। के. के. की बेटी अपने पिता के दोस्त को पत्र द्वारा बीमारी के बारे में बताती है। उसकी पत्नी, पति के साथ के. के. को देखना चाहती है, किन्तु पति हमेशा बात को टरकाता रहता है। कभी टिकट न मिलने के कारण तो कभी कार्यालय के काम के नाम पर नाटक। उसे पैसे खर्च होने पर भी चिंता होती है कि इतनी दूर क्यों जाना। अंत में के. के. की बेटी नेहा द्वारा भेजे गए पत्र को फाड़कर फेंक दिया जाता है। (गुफ़्तगू (कहानी) – सूर्यबाला)

 “ओह–हाँ ठीक है।
और चुन्नू को तो अभी बनाया नहीं न?
नहीं,
कहाँ बनाया? ”(गुफ़्तगू (कहानी) – सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक -85)

‘संताप’ कहानी में मानव जीवन की क्षणभंगूरता का अंकन किया गया है। मीनू और रेशम की मृत्यु के बाद मुहल्ला और शहर में जो चर्चा होती है लेखिका ने उसे समाज के समक्ष लाने का प्रयास किया है। इस कहानी में पति को केवल अपने प्रमोशन की चिंता है। उसके दोनों बच्चे मर जाते हैं। पति के पास इतना भी समय नहीं कि वह अपनी पत्नी को दिलाशा दिला सके। पत्नी बच्चों के लिए चीख-चीखकर बेहोश हो जाती है, पति उसे होश में लाना चाहता है क्योंकि बड़े साहब उसके घर आ रहे हैं। अपनी पत्नी की भावनाओं के लिए उसे समय नहीं क्योंकि उसे केवल अपना प्रमोशन चाहिए। (‘संताप’ (कहानी) – सूर्यबाला)

‘अरे पानी लाओ! पानी!’ (‘संताप’ (कहानी) – सूर्यबाला - पृष्ठ क्रमांक -58)

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सूर्यबाला जी ने अपनी कहानियों में जीवन के विविध पक्षों को सहज और सरल भाषा में अंकित किया है। पात्रों के माध्यम से जीवन का यथार्थ उजागर होता है। यही लेखिका की शक्ति है।

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