काव्य: संतोष श्रीवास्तव

संतोष श्रीवास्तव

अंतहीन सूनापन
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करौंदे की झाड़ियों तक 
खिंची आती हूँ मैं 
सूना सन्नाटा और फुदकती गिलहरी
पैरों के नीचे लचीली दूब पर 
रेंगती हैं बीरबहूटियाँ
जाला बुना है मकड़ियों ने 
निबिड़ एकांत में 
दर्जी चिड़िया ने 
दो पत्तों को जोड़कर 
घर बनाया है 
यह एकांत सुख की लालसा 
यह घर बसाने की कामना 
मेरी पहुँच में नहीं 
मेरे हिस्से है तनहाई 
एकांत नहीं है, सूनापन है 
और मैं चल पड़ती हूँ 
निःशब्द टपकती 
ओस की बूंदों पर पाँव रखती 
जहाँ अंतहीन सूनापन
बाट जोह रहा है मेरी


अपनी शर्तों पे


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मेरा एकांत
अपनी जिंदगी से 
थोड़ा सा हिस्सा चुरा 
अपने हिसाब से 
अपनी दुनिया गढ़ लेता है 
एक ऐसा कोलाज रच लेता है 
जहाँ सब कुछ 
मर्जी के मुताबिक हो ...
फिर भी दिल में कसक क्यों
कि जिंदगी मुकम्मल नहीं 
मुकम्मल होती तो 
तलाश रुक जाती .....
कोलाज पूरा हो जाता ...
मैं ठहर जाती ...
और मै ठहरना
चाहती नहीं ....


आँच


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माथे पर देश की मिट्टी का 
तिलक कर 
तुम चले गए सरहद पर 
और मैंने निपट तनहाई में 
प्रेम की माटी में 
विरह का बिरवा रोप दिया
मौसम गुजरते रहे 
बिरवे में बर्दाश्त की कोंपलें
लहलहाई 
पीड़ा के फूल सुलगे
रंगों की काँपती खामोशी लिए 
तितलियाँ मंडराई 
पतझड़ में सब कुछ 
मिट्टी में समा गया 
तुम भी 
तुम्हारी स्मृति लिए 
मैं भी
अब बिरवा ठूँठ है 
और 
मेरे शीश पर 
शहीद की विधवा का सूरज है 
कौन देख रहा है 
उस सूरज की आँच से 
निरंतर झुलसता मुझे


आखिर क्यों?


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आदम से हव्वा तक 
सदियों का अंतराल लांघ
मेरा और तुम्हारा आज 
महज एक सवाल 
मेरा होना 
उम्र के अलाव में 
धीमे धीमे पकना 
दर्द को 
पाँव से दिल तक 
दिल से दिमाग तक 
चीरे जाते हुए सहना 
दर्द के न होने पर 
खुद को सम्हाल न पाना 
टूटना ... तन्हाइयों में सिमट जाना 
नींद को बाजू में सुला 
पलकों को उघाड़े रखना 
स्मृतियों की किताब खोल 
इन सारे सवालों के जवाब ढूँढना 
नचिकेता बन 
यम के द्वार तक पहुँच जाना 
जवाब न पा खंगाल डालना 
वेद, पुराण, उपनिषद, शास्त्र 
विराट को समझ पाने की भूल में
बूंद भर अस्तित्व को खोकर
तिरोहित हो जाना 
उस बड़े शून्य में 
जहाँ पहुँचकर कोई 

कभी नहीं लौटा 
आखिर क्यों?


आषाढ़ की बूंदें


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खिड़की के शीशों पर
अनवरत दस्तक देती हैं 
आषाढ़ की बूंदें
धारासार बारिश में 
दौड़ते शहर के पैरों में 
बेड़ियाँ पहना  
भय और रोमांच की जुगलबंदी 
कराती हैं 
आषाढ़ की बूंदें
लिखना चाहती हूँ
पर न भाव जुटते, न छंद 
निरर्थक शब्दों के इक्का-दुक्का 
पड़ाव आते हैं 
मेघ के टुकड़े बन 
फिर समा जाती हैं
अथाह मेरे अकेलेपन की मर्मर में 
आषाढ़ की बूंदें
विरही यक्ष विचलित है 
पहाड़ पर लोटते बादलों को देख 
ढूंढना चाहता है दूत
जो यक्षिणी तक पहुँचा सके 
विरह की वेदना 
मिलते ही यक्ष को मेघदूत
थिरक उठती हैं
आषाढ़ की बूंदें

घन घटाओं से लैस 
आषाढ़ का पहला दिन 
शहतूत की कोंपलों पर
वनचंपा के पराग पर 
मधुमालती की लचक पर 
तिरती हैं
आषाढ़ की बूंदें 
मेरी उंगलियों के बीच 
फंसी है कलम 
भावों की कुलबुलाहट में 
छिटक जाती हैं 
आषाढ़ की बूंदें 
कलम माँग बैठती है 
पानी नहीं, आग ... आग चाहिए 
ठिठक गई हैं जहाँ की तहाँ 
आषाढ़ की बूंदें

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