डायरी: अनराइ

आर बी भण्डारकर

आर बी भण्डारकर

निज आवास - शाम के भोजन के बाद

परिवार के लगभग सदस्य एक खास मकसद से डाइनिंग टेबल पर उपस्थित हैं। चिंतन का विषय है, अनराइ। बोलचाल में कुछ लोग इसे अनराव भी कहते हैं।

पत्नी ने स्मरण कराया कि बहू के बाबा दिवंगत हो गए हैं सो वहाँ सावन (श्रावणी /रक्षा बंधन) का अनराव है। इधर कुछ ही समय पूर्व बहू के छोटे मामा भी स्वर्गवासी हुए हैं, इसलिए वहाँ भी इस वर्ष अनराव का रक्षाबन्धन है। अभी हाल ही में उनके मँझले भाई की पोती का निधन हुआ है लिहाजा वहाँ भी अनराव है और सभी जगह किसी न किसी को जाना ही पड़ेगा।

कौन कहाँ, कब, कैसे जाएगा और कब लौटना होगा यह सब चर्चा और विचार के मुद्दे हैं। छोटी बेटी की जिज्ञासा है कि यह अनराव क्या होता है?

   बिटिया, भारतीय संस्कृति में परंपराओं, रीति-रिवाजों, लोक मान्यताओं, लोक में प्रचलित आचार और व्यवहारों की समीचीन प्रतिष्ठा है क्योंकि इनके मूल में लोक कल्याण का ठोस आधार होता है।

सुख-दुःख जीवन चक्र के क्रम कहे जाते है। इसे जीवन-सत्य समझना चाहिए। हमारे यहाँ सुख का उपभोग मिलकर करने की बात कही गयी है। कहा गया है कि खुशियाँ मिल जुल कर मनाने से वह द्विगुणित हो जाती हैं। "ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।" कहकर यही प्रेरणा दी गयी है। इसी के समरूप दुख को बाँट लेने का भी लोक व्यवहार रहा है। इससे किसी का दुख कम तो नहीं होता है पर दुख की तीव्रता कम लगने लगती है। समूह में समन्वय के साथ बैठने से मन बहल जाता है, जो मन दुख में केंद्रित होता है वह अन्य बातों, चर्चाओं में विस्तीर्ण हो जाता है।

जब किसी आत्मीय जन का स्वर्गवास हो जाता है, तो वह अपनों से दूर अनंत में चला जाता है; तब उसके वियोग के बाद जो त्यौहार आता है वह खुशी के स्थान पर दुखकारक लगता है क्योंकि हमें दिवंगत का अभाव खटकता है। यही अनराइ है। राइ का आशय अच्छे व शुभ से होता है न; तो उसी का नकारात्मक भाव बोध है यह।

अनराइ की ऐसी स्थिति में यदि  हमारे प्रिय उपस्थित हो जाते हैं तो हमें ढाढस मिलता है। स्वजन और मित्रगण हमारे संबल बन जाते हैं। ये सब दुख के समाधान खोजने में सहायता करते हैं तो राहत मिलती है।

 बिटिया अनराव में दो बातें ध्यातव्य हैं। एक तो यह कि अनराव में वही त्यौहार शामिल हैं जो परम्परा से ही समूह में मनाए जाते हैं। सावन और होली ऐसे ही त्यौहार हैं। दूसरी बात यह कि इनमें प्रायः बहन, बेटियों  के ही उपस्थित होने का रिवाज़ है। ऐसा इसलिए क्योंकि उस परिवार से इनका जुड़ाव सर्वाधिक होता है, अस्तु इनकी संवेदना सर्वाधिक वास्तविक होती है और उस परिवार के कल्याण के लिए इनकी भावनाएँ सर्वाधिक पवित्र, निर्मल और निस्पृह होती हैं।

कभी परिवार का अभिन्न अंग रही ये बेटियाँ जब आती हैं तो घर के छोटे बच्चों को मिठाई, खिलौने और कपड़े आदि लाती हैं। उद्देश्य होता है कि सम्भव है कि दुखातिरेक में डूबा, शोक संतप्त परिवार त्यौहार के शुभ अवसर पर शायद इन सबकी व्यवस्था न कर पाया हो और यह भी कि इन्हें पाकर बच्चे दुख भूल जाएँ।

बिटिया, "अच्छा, ऐसा है!"

जिन मुद्दों पर चर्चा होनी थी, हो गयी। तदनुसार कार्य नीति भी बना ली गयी। रात भी बढ़ने लगी है। अब सबके सोने की बारी है।

1 comment :

  1. इस समाजोपयोगी प्रथा के रूप और उद्देश्य से परिचित कराने के लिये आभार!
    इस आपाधापी के युग में इस प्रकार सहयोग और सहानुभूति की भावनाओं का महत्व घटता जा रहा है- कितना अच्छा हो लोग सचेत होकर सद्भावपूर्वक विषम स्थितियों मे एक-दूजे का संबल बन सकें.
    - प्रतिभा सक्सेना.

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