व्यंग्य: नंबरों वाला मार्क्सवाद

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

कार्ल मार्क्स का मार्क्सवाद अब पुराना पड़ गया है, एक सौ सत्तर साल हो गए इसे। यह पूँजी की बात करता है। बेचारे स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे पूँजी के बारे में क्या जानें? पूँजी कोई लड़की होती तो लड़कों को मालूम होता कि वह कहाँ रहती है, उसके पापा क्या करते हैं, उसके कितने भाई-बहन हैं, पूँजी की सहेलियाँ कौन-कौन हैं? इन आधारभूत प्रश्नों का उत्तर जाने बिना कोई छात्र पूँजी के छत्ते में हाथ नहीं डालता। महिलाओं के नि:शक्तिकरण के उस दौर में अर्थशास्त्रियों ने 'पूँजी' को किस डर से स्त्रीलिंग बनाया होगा, यह खोज का विषय है; यदि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इसके लिए ग्रांट दे सके। अर्थशास्त्रियों को भाषा की भी समझ नहीं है, उन्होंने पूँजी वालों को पूँजीपति कहा। सब्ज़ी वालों को कुंजड़ा कहते हैं, इन्हें पूंजड़ा कह देते! अरे, साहित्य के विद्वान किसी महिला के पति को जोरू का गुलाम कहते हैं, तो पूँजीपति का सही नामकरण पूँजी का गुलाम होना चाहिए था। पूँजीपति के सब काम ऐसे ही तो हैं। खैर, हम तो कार्ल मार्क्स के समूचे मार्क्सवाद को ख़ारिज करने के मूड में हैं। जब हम पाठ्यक्रम बदल ही रहे हैं तो क्यों न बच्चों को आधुनिक मार्क्सवाद पढ़ाया जाए।

आप पूछेंगे, आधुनिक मार्क्सवाद क्या है? आधुनिक मार्क्सवाद, असली मार्क्सवाद है, बेफिक्री से शानदार जीवन जीने का वाद। यह मार्क्स यानि नंबर न पाने की कला, और नंबर पाने का विज्ञान है। यह अर्थशास्त्र नहीं है, और न पूँजी से जुड़ा है। यह कुंजी से जुड़ा है, विविध प्रकार की कुंजियों से जुड़ा है। ऐसी कुंजियाँ जो छात्रों को उनके भावी जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराएं। जहाँ यह अच्छे मार्क्स लाने के गोरखधंधे सिखाता है, वहीं कम मार्क्स आने पर उज्जवल भविष्य बनाने के गुर सिखाता है। आधुनिक मार्क्सवाद स्थापित करता है कि किताबी शिक्षा में कम मार्क्स पाने वाले छात्रों के लिए आगे अधिक चुनौतीपूर्ण अवसर हैं। आप चाय बेच-बेच कर सफलतम पीएम बन सकते हो, और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट पा कर भी चालीस चोरों के अलीबाबा ही बन सकते हो। आप साधू-योगी बन कर सफल सीएम हो सकते हो और आयआयटी पास हो कर भी निठल्ले सीएम बन सकते हो। इसलिए आधुनिक मार्क्सवाद में मार्क्स की कोई अहमियत नहीं है। उल्टे ज़्यादा मार्क्स लाना आपको किताबे कीड़े जैसी उपमा से नवाज़ सकता है। मार्क्स आएँ या न आएँ, वाद करना आना चाहिए, विवाद करना आना चाहिए, प्रतिवाद करना आना चाहिए, देश को बर्बाद करना आना चाहिए।

आधुनिक मार्क्सवाद, पढ़-पढ़ कर आँखें फोड़ने के ख़िलाफ़ है, नब्बे प्रतिशत या ऊपर अंक लाने के तो एकदम ख़िलाफ़ है। यह पाया गया है कि जिन लोगों के पास जितने ज़्यादा मार्क्स होते हैं, उनमें सांसारिक बुद्धि उतनी ही कम होती है। मार्क्स और व्यावहारिक बुद्धि में विलोम सम्बन्ध है। भारत में पकौड़ों की दुकानों जैसे ढेरों विश्वविद्यालय हैं, जो खोटे सिक्के ढालते हैं और नकली नोट छापते हैं। धुप्पल में चल गए तो चल गए। इसलिए अब तक लाखों डॉक्टरेट लुटाने के बाद भी भारत के खाते में सात नोबेल पुरस्कार हैं।  इनकी तुलना में समकक्ष खेलकूद संस्थान बहुत थोड़े हैं, पर ओलंपिक गोल्ड मैडल नौ मिले हैं। आधुनिक मार्क्सवाद कहता है मार्क्स के पीछे क्यों भागते हो भाई! कुछ ऐसा करो कि सरकारें तुम्हारे पीछे गोल-गोल भागती फिरें; तुम ठप्पे से अहिंसात्मक काम कर के माल्या जैसे ब्रिटेन तथा नीरव जैसे अमेरिका में रह सकते हो और हिंसात्मक काम करके डॉन बन कर पड़ोसी देश में बस सकते हो। यदि तुम सिर्फ स्कूली या उच्च शिक्षा में अच्छे मार्क्स लाने के बारे में सोचते हो, तो बेवकूफी करते हो। तुमने कभी सोचा है, राजनैतिक पार्टियाँ टिकट देने के पहले इंटरव्यू लेती हैं। इन परीक्षाओं में पास हो कर और चुनाव जीत कर जो लोग लोकसभा और विधानसभाओं में पहुँचे हैं उनमें से करीब सोलह सौ लोग आपराधिक प्रकरणों में आरोपी हैं। ये लोग संदिग्ध आपराधिक प्रवृत्ति के हैं इसलिए हमारे कानून निर्माता; सांसद और विधायक बने बैठे हैं। आधुनिक मार्क्सवाद कहता है कि कुछ बनना हो तो शिक्षा के अलावा अन्य कौशल में भी अच्छे मार्क्स आना चाहिए। आधुनिक मार्क्सवाद बुद्धिमान बनने पर ज़ोर नहीं देता। लोग च्यवनप्राश खा-खा कर बुद्धि बढ़ाने के चक्कर में फँस सकते हैं। वे बादाम का हलवा खा-खा कर तोंद बढ़ा सकते हैं, कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकते हैं; पर बुद्धि नहीं बढ़ा सकते। बुद्धि का कारक डीएनए है, जो माता-पिता का अधिकार क्षेत्र है। बजाय स्वयं की बुद्धि बढ़ाने के लोगों को मूर्ख बनाना आसान है। राजनेता इस कला में अति निपुण हैं। इसलिए आधुनिक मार्क्सवाद लोगों को मूर्ख बनाने की कला में पारंगत होने की सीख देता है।

आगामी समय कृत्रिम बुद्धि का है, कम्प्यूटर की बुद्धि का है। कुछ दशकों के बाद आदमी की ज़रूरत संभवतः बच्चे पैदा करने और कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए ही होगी। बाकी सब काम तो रोबॉट कर दिया करेंगे।

अमेरिका की सड़कों पर बिना ड्राइवर की कारें और ट्रक चल रहे हैं। जापान की होटलों में रोबॉट वेटर दौड़ रहे हैं। एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन को भिड़ा देने में सिद्धहस्त आदमी से डर कर कई देशों में बिना ड्राइवर के ट्रेनें दौड़ रही हैं। और तो और, हाथ की बारीकी और चंट दिमाग़ की माँग करने वाले ऑपरेशन डॉ. रोबॉट करने लगे हैं। अभी तक तो मशीनों ने कपड़े-बर्तन वाली बाई की ही छुट्टी की थी, अब झाड़ू-पौंछे का काम भी छोटे-छोटे रोबॉट करने लगे हैं। आदमी को बटन दबाना और चैनल बदलना भी कठिन लगे तो उसके ध्वनि आदेश से ये काम भी सिरी या रिमोट कर देंगे। कॉलेज से बिल गेट्स ड्राप-आउट क्या हुआ; उसने सब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का बैंड बजा दिया। अब विश्वविद्यालय उसका और उसके हम-दिमागियों का किया-कराया पूरी दुनिया को सिखा रहे हैं। बहुत जल्दी ही आम-आदमी का काम मोबाइल चार्ज करने और उसके बटन दबाने तक सीमित होने वाला है। इसलिए पढ़-लिख कर मार्क्स बटोरने वालों को लानत है; आप बिना पढ़े-लिखे भी बहुत अच्छी डिग्रियाँ पा सकते हैं। आधुनिक मार्क्सवाद अपनाओ, मार्क्स से पिंड छुड़ाओ, बेफिक्री से बैठे-बैठे शानदार जीवन जीओ।
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