कहानी: प्रोफेसर साब

डॉ. हंसा दीप

हंसा दीप


“दादाजी इस प्रश्न का उत्तर लिखवा दीजिए।”

“क्यों, आपकी मिस ने नहीं लिखवाया?” दादाजी अपनी किताबों में उलझे किसी एक बिन्दु पर भिन्न-भिन्न विद्वानों की राय को कलमबद्ध कर रहे थे। वे जानते थे कि बच्ची अनामिका बिना वजह तो उनके पास आती नहीं है होमवर्क के लिए। फिर भी पूछ कर अपनी ओर से तसल्ली कर लेना चाहते थे।

“मिस ने तो लिखवाया था पर हम टॉफी बाँटने गए थे, मैं और पूजा दोनों। आज उसका बर्थ-डे था न इसीलिए।” बच्ची ने अपनी मजबूरी का बयान कर दिया कि इस प्रश्न का उत्तर उसकी दोस्त पूजा ने भी नहीं लिखा है वरना वह पूजा की कापी से कॉपी कर लेती। 

“अच्छा मेरी राजकुमारी, बताइए। कौनसा प्रश्न है आपका। एक ही है या फिर बहुत सारे हैं?”

“एक ही है दादाजी, यह वाला। डिफरेंस बिटवीन राइट्स एंड ड्यूटीज़....”

“हूँ, अधिकार और कर्तव्य में अंतर। बिटिया, ज़रा हाथ का काम पूरा कर लें फिर आपको लिखवा देते हैं इसका उत्तर। आधे घंटे बाद आइए आप। ठीक है?”

“जी दादाजी, ये बुक और कापी यहीं छोड़ दी आपकी मेज़ पर।”

हाथ का काम बहुत कुछ था उनके पास। पूरी मेज किताबों से भरी पड़ी थी। ढेर सारी किताबें फैला कर पढ़ना, उचित शब्दों का चयन करना और एक नयी किताब का खाका बना लेना उनके बाएँ हाथ का खेल था। राजनीतिशास्त्र पढ़ते-पढ़ाते शब्दों की तनिक हेरा-फेरी करने की कला में माहिर हो गए थे वे। अब तक उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं। सरकारी अनुदान का भी भरपूर फायदा मिल जाता था उन्हें। अपने महाविद्यालय का नाम तो रोशन किया ही साथ ही अपने राज्य को भी दुनिया की नज़रों में लाए। अपने प्राध्यापकीय जीवन में खूब लिखा है उन्होंने, खूब तरक्की की है।

व्यस्ततम विद्वान प्रोफेसर रविकांत। कांत सर के नाम से मशहूर हैं। अपने महाविद्यालय में तो सीनियर हैं ही अनेक विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग प्रोफेसर हैं, भारत में और विदेशों में भी। अनामिका बचपन से देखती आयी है अपने दादाजी को जो हमेशा किताबों में उलझे रहते हैं इसीलिए दादाजी को घर में सबसे अधिक पढ़ाकू समझकर अनामिका जब-तब उन्हीं के पास आती है अपने होमवर्क में मदद के लिए। हर बार वे बच्ची से आधे घंटे का समय लेते हैं। पहले खुद होमवर्क की तैयारी करते हैं और फिर बच्ची को बुलाते हैं।

आज के प्रश्न के जवाब के लिए कोई खास तैयारी की आवश्यकता नहीं थी उन्हें। इस पर तो वे कई लेक्चर दे चुके हैं। अधिकार और कर्त्तव्य की पाश्चात्य और भारतीय विचारकों की कई परिभाषाएँ उनके दिमाग में उछलकूद करने लगीं। तलाश थी तो बच्ची को लिखवाने के लिए सरल शब्दों की जो मिल नहीं रहे थे। बच्चों को सरल और सहज शब्दों में समझाना कितना मुश्किल होता है इस पीड़ा को वे कई बार झेल चुके थे। एकाएक स्नातकोत्तर की कक्षाओं को प्राथमिक स्कूल की कक्षाओं में तब्दील करने में भाषा और विचारों को बहुत नीचे उतारना पड़ जाता है। मूल को चोट पहुँचाए बगैर ऐसा करना टेढ़ी खीर हो जाता है उनके लिए। अनामिका के होमवर्क को कराने में उनका तिकड़मबाज दिमाग कई बार दगा दे जाता है। बहुत सोच-समझ कर लिखवाते हैं उसे। ज़रा भी चूके तो बच्ची अपनी टीचर को बता देगी कि उसके दादाजी ने करवाया है होमवर्क उसे। हालांकि टीचर की तो हिम्मत नहीं होगी कुछ कहने की मगर एक से दूसरे टीचर में बात जाएगी और ख़्वाह-मख़्वाह शहर के प्राथमिक स्कूल में उनके नाम पर हँसने का मौका मिलेगा लोगों को।

कैसे समझायें बच्ची को, पहले परिभाषा दे कर समझा दें और फिर किसी उदाहरण से समझाने की कोशिश करें। कौनसा उदाहरण अच्छा रहेगा। मन की ऊहापोह से बाहर निकलने का प्रयास करते हुए वे मेज पर रखी किताब को एकटक देखने लगते हैं। अनामिका की किताब और कॉपी को उलटते-पलटते महाविद्यालय का आज सुबह का दृश्य किसी फिल्म की तरह उनके सामने घूमने लगता है। अपने साथियों के जाने-पहचाने चेहरे समझाने लगे उन्हें अधिकार और कर्तव्य की परिभाषा। मन की दौड़ महाविद्यालय के प्रांगण में चक्कर लगा लेती है।   

पच्चीस दिन हो चुके थे नया सत्र शुरू हुए। एडमीशन का काम लगभग पूरा हो चुका था। कक्षाएँ शुरू करने का नोटिस आए भी काफी समय हो गया था। कक्षाएँ खाली पड़ी थीं। दिन भर में एकाध घंटे स्टाफ रूम चहकता फिर खामोश हो जाता। वह एक घंटा नोटबंदी से लेकर मंहगाई तक और ट्रम्प से लेकर प्राचार्य के किचन तक की खबरों का ब्रॉडकास्टिंग समय होता। महिला प्रोफेसर और पुरुष प्रोफेसरों के समूह चाय के साथ अपना मंतव्य देते। एक बार हाजिरी लग गयी सबके सामने फिर तो ये रंग-बिरंगी पोशाकें कभी ऑफिस में, तो कभी गार्डन में, कभी दालान में, तो कभी चाय की दुकान के पास दिखाई देतीं। मौलसिरी के पेड़ तले बने चबूतरे पर बैठे कुछ प्रोफेसर चाय के बाद तंबाखू खाते, पीक थूकते, बतियाते, “अरे गोले साब, कल आप दिखे नहीं?”

“कल जल्दी चला गया था सर।” उन्होंने अपनी कल की कॉलेज ट्रिप को याद किया जो सिर्फ पिंडोल करके जाने वाली थी। गोले साब आए तो जरूर थे कल, स्कूटर लेकर एक चक्कर लगा लिया था। दो-चार ऑफिस के लोगों से हाय-हलो हो गयी थी तो दिन को सुरक्षित मानकर भाई की प्रेस पर जरूरी काम आने से मदद के लिए चले गए थे वे।

“अमाँ यार, कभी तो हमारे साथ भी बैठा करो, आजकल तो आपके विभागीय साथी तलपड़े जी भी दिखाई नहीं दे रहे?”

“वे तो छुट्टी पर हैं सर।” एक दूसरे के विभागीय मसलों को चर्चा का विषय बनाना और एक-दूसरे के विभाग की जानकारी रखना हर प्रोफेसर के रुटीन का हिस्सा था। सब हेड आफ दि डिपार्टमेंट बनने की ख़्वाहिश तो रखते हैं पर जब नहीं बन पाते तो हेड की खिंचाई करके अच्छा लगता है। दिल को तसल्ली मिल जाती है। मैडम मिश्रा पिछले चार साल से हेड की कुर्सी के लिए तरस रही थीं पर उनका चांस ही नहीं लग रहा था। मैडम मिश्रा की खुंदक इस बहाने बाहर आ ही जाती है, “अच्छा तभी, इसका मतलब है कि आप हैं हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट। तभी मैं कहूँ कि आपके दर्शन दुर्लभ क्यों हो गए।”

विनम्रता को अपनी जबान पर बैठा कर बोले गोले साब, “अरे नहीं मैडम, ऐसी बात नहीं है। कल ज़रा कुछ काम आ गया था।” सच तो यही था कि हेड का चार्ज लेकर वे इस चार दिन की चाँदनी का आनंद उठाने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते थे। मुँह में चाशनी तभी होती है जब कुछ कड़वा निगलवाना हो।

सामने से इतिहास विभाग चला आ रहा था। उनकी ही कमी थी। उन्हें मुस्कुराते हुए आते देख स्वागत हुआ, “आइए आइए, इतिहास विभाग की हेड का स्वागत। आपके तो दीदार ही नहीं होते मैडम!”

“क्लासेज़ शुरू हो गयी हैं सर फर्स्ट इयर की।” उनकी आवाज़ का विश्वास इस बात का सबूत था कि ‘वे ही पढ़ा रही हैं बाकी तो सारे इधर-उधर टाइम पास कर रहे हैं।’

“अरे छोड़ो मैडम अभी क्या क्लासेज़ की झंझट पालना, मूड जमाने के लिए समय तो चाहिए न।”

“क्यों सर छुट्टियों में मूड नहीं जमा?”

“छुट्टियाँ तो परीक्षा की थकान उतारने के लिए होती हैं। महीना भर महाविद्यालय आएंगे-जाएंगे तब कहीं जाकर मूड जमेगा पढ़ाने का।

“महाविद्यालय में तो झंडे से झंडा पढ़ाई होती है, पंद्रह अगस्त से छब्बीस जनवरी तक।”

बहुमत न पढ़ाने वालों का था तो उन्हें लगा कि वे बेवकूफ करार दी जाएँ उसके पहले अपना बचाव पक्ष रख दें तो अच्छा है, “क्या बताऊँ सर, आपको तो पता है न सबसे ज़्यादा भीड़ तो मेरी कक्षाओं में ही होती है। अगर कक्षा में नहीं गयी तो बाहर खड़ी भीड़ सबको नज़र आएगी और प्रेमपत्र मिल जाएगा।” प्राचार्य के ऑफिस से जब भी किसी को नोटिस मिलता था तो उसे प्रेमपत्र कहा जाता था।

“वैसे कभी-कभी प्रेम पत्र मिल जाए तो जीवन में रोमांस बना रहता है।” कांत सर को देखते हुए अखिल सर बोले।
इतिहास वाली मैडम को जवाब देने के लिए गोले साब की मक्खन बाजी फिर से शुरू हुई, “गलती तो आपकी है न मैडम। सारे मरे हुए लोगों को आप इतनी ज़िन्दादिली से पढ़ाती हैं कि कोई छात्र कभी तड़ी नहीं मारता।”

“सर से सीखो मैडम, ज़िन्दा लोगों को भी मार कर पढ़ाते हैं।” पीछे से आवाज़ आयी।

समवेत ठहाका लगता है तो मैडम भी पीछे नहीं हटतीं, “वाह-वाह सर। कान तरस गए थे ऐसी लच्छेदार भाषा सुनने के लिए।”

कांत सर की काम करने की शैली से सभी परिचित थे। दफ़्तर के बाबू भी उनकी किसी बात को टाल नहीं सकते थे। शहर की राजनीति में भी उनका हस्तक्षेप हुआ करता था जिसकी वजह से प्राचार्य उनके कद्रदान थे। एक बार जब शहर के टटपूँजिए नेताओं की टोली ने प्राचार्य चेम्बर में बवाल मचाया था तो सब नेताओं के पैरों से चप्पलें निकल कर हाथों में आ गयी थीं। ऐसे में कांत सर ने ही समझौता करवा कर मामला रफ़ा-दफ़ा करवाया था। अब बाहर बोर्ड लगा था, “कृपया जूते-चप्पल बाहर निकाल कर अंदर आएँ।”

उसके बाद से हर कोई चेम्बर में जाता तो एक मंदिर की मानिंद जूते बाहर निकाल कर जाता। वह दिन था और आज का दिन कांत सर की हर लापरवाही को बर्दाश्त करना प्राचार्य जी की मजबूरी थी। कभी-कभी यही मजबूरी औरों पर कहर बन कर टूट पड़ती थी। कांत सर इतने सीनियर थे कि सालों पहले प्राचार्य बन जाते पर इससे उनके विदेश दौरों पर असर पड़ता इसलिए वे बगैर पोस्ट के पोस्ट पर रहने का लुत्फ़ उठा रहे थे। ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ के अंदाज़ में। 

“लो पाराशर सर भी आ गए। क्यों भाई ऐसे मरे-मरे से अंदाज़ में चल रहे हो, अदालत में पेशी थी क्या?”

“नहीं सर, भगवान दुश्मनों को भी ऐसे दिन न दिखाए। अरे मैडम, आपकी क्लास है क्या वे बालक पूछ रहे हैं।”

“आज मेरी क्लास! आज तो सोमवार है। आज अखिल सर की क्लास है मेरी नहीं है।”

अखिल सर भौंचक्के से देखने लगे, “मेरी क्लास!” गोया क्लास का नाम लेना ही उनके लिए एक अजूबा था। प्रोफेसर कहलाना तो कानों में रस उड़ेलता है पर क्लास शब्द कानों को बेहद कर्कश लगता है। पास आते लड़कों के एक समूह को घूरते हुए उन्हें लगा कि ये चेहरे जाने-पहचाने हैं, “हो सकता है, मेरी ही क्लास हो। देखिए तो इन लोगों को, कुछ अकल ही नहीं है। इतनी बारिश में चले आते हैं।” इस काम से जी चुराने की जंग में उन्हें पूरा समर्थन मिलता है अपने साथियों से।

“इनके माता-पिता भी रोकते नहीं इन्हें... !”

“अरे मैडम, माता-पिता को लगता है कि लड़का कॉलेज में गया और अफ़सर बन कर निकला। अरे सुनो, कितने हो तुम?” रोब से पूछा उन्होंने अपनी ओर आते हुए उन लड़कों से।

“सात-आठ लड़के हैं सर” उनमें से एक ने जवाब दिया।

“देखो भई, तुम्हारी क्लास में सौ लड़कों की एडमीशन लिस्ट निकल चुकी है। सात-आठ को पढ़ाएँगे तो नब्बे-बानवे का नुकसान हो जाएगा। समझे कि नहीं, जाओ जब सब आएँ तब आना, हैं?”
एक जो पढ़ने के लिए कमर कसे हुए था बोला, “सर, हम बहुत दूर के गाँव से चल कर आते हैं।”

“इसीलिए तो कह रहे हैं तुम्हें, जल्दी चले जाओ वरना बारिश में फँस जाओगे।”

“क्यों भई, मानसून तो आ गया। बोवनी का काम शुरू नहीं हुआ अभी?”

“शुरू हो गया मैडम”

“अरे तो अपने माता-पिता की मदद करनी चाहिए न, चले आतो हो कॉलेज में घूमने-फिरने। एक बात ध्यान रखना...”

“जी मैडम?”

“यह स्कूल नहीं है समझे, अब तुम कॉलेज में आ गए हो।” यह सिद्धांत था कॉलेज के बारे में जिसकी व्याख्या हो रही थी कि यहाँ रोज़ पढ़ना-पढ़ाना नियमों के ख़िलाफ होता है।

“आज तो तगड़ा डोज़ पिला रही हैं मैडम” कनखियों से कहा गया वाक्य सबकी शरारती आँखों को चमका गया। मैडम ने भी सुन लिया था।

“हाँ सर ऐसे कीचड़ में तो आने का मन ही नहीं करता।” अपनी कलफ़ वाली साड़ी पर लगे कीचड़ को दिखाते बोलीं वे, “जयपुरी रजाई ओढ़कर सोते रहो बस।”

उनकी जयपुरी रजाई पर और भी चर्चा होती मगर सामने से आती मैडम पुरी दिख गयीं।

“अरे मैडम पुरी, जा रही हो क्या, इतनी जल्दी।”

“आज तो जाना ही पड़ेगा सर। स्वीटू का एडमीशन करवाया है नेशनल कान्वेंट में। उसकी टीचरों से मिलना है।” सभी जानते थे कि मैडम पुरी इसके लिए बहुत दिनों से प्रयास कर रही थीं। कई दिनों की दौड़-धूप के बाद उनकी बेटी स्वीटी की एडमीशन की प्रक्रिया पूरी हुई थी। कभी यह कागज़ तो कभी वह। कभी यह इंटरव्यू तो कभी वह।

“अरे वाह क्या बात है, एडमीशन हो गया। चलिए अब आपको थोड़ी राहत मिलेगी।”

“राहत तो क्या मिलेगी मैडम, जैसे-तैसे घंटे भर पीछे पड़ कर तैयार करो, टिफिन के लिए स्पेशल डिश बनाओ। ऐसी-वैसी खाने की चीज़ें तो पसंद ही नहीं आतीं उसे। फिर स्कूल बस के लिए खड़े रहो। रोज़ लेट आती है उसकी बस।”

इधर-उधर की कुछ और परेशानियों को गिनाए मैडम पुरी उसके पहले अखिल सर ने अपनी ओर से उन्हें समर्थन दिया, “ये लोग फीस तो झटक कर लेते हैं पर समय के पाबंद नहीं हो पाते।”
मैडम पुरी को सहारा मिला अपनी सोच को वजन देने का, “देखिए न तीन दिन हो गए उसे स्कूल जाते-जाते, न कोई होम वर्क दिया न ही कुछ सिखाया। सर, कांत सर, आप उधर ही जाते हैं न नेशनल कान्वेंट की ओर?”

“हाँ मैडम, मैं जा ही रहा हूँ। आइए आपको छोड़ दूँगा।”

“थैंक्यू सर”

लहराते पल्लू को कमर में खोंस कर एक हाथ से हैंडल पकड़ कर स्कूटर के पीछे वाली सीट पर बैठ जाती हैं वे। किताबों का बैग हाथ में था एक शो-पीस की तरह। उसे लाया ही इसलिए गया था कि देखने वाले कहें, “कितना काम होता है पढ़ाने का।”

स्कूटर की घड़-घड़, भड़-भड़ के बीच मैडम की परेशानियाँ बढ-चढ़ कर बाहर आ रही थीं।

“देखिए सर, पूरे पच्चीस हज़ार लगे हैं नर्सरी में एडमीशन के, हज़ार हर महीने और तिस पर कभी ग्रुप फोटो के तो कभी फील्ड ट्रिप के।”

“जानता हूँ मैडम, मेरी पोती भी वहीं पढ़ रही है। जितने रुपयों में हम एम.ए. कर गए उतने में आज के बच्चे नर्सरी-केजी पास कर जाएँ तो बहुत है।”

“जी हाँ, बिल्कुल सही कहा आपने। महंगाई के मारे कोई और हो न हो पर ये सारे प्रायवेट स्कूल जरूर हैं। अच्छी तरह निचोड़ लेते हैं माता-पिता को। और उसके पापा कहते हैं कि, “बारिश में मत भेजा करो बच्चे को।” बताइए तो इतनी फीस भरेंगे और स्कूल नहीं भेजेंगे तो बच्चे पढ़ेंगे क्या! ऐसी बारिश की झड़ी तो महीने भर तक रहेगी तो क्या रोज़ ही स्कूल नहीं जाएँगे। थोड़ा भीगेंगे, गिरेंगे, पड़ेंगे तभी तो बोल्ड होंगे। बस सर, यहीं उतार दीजिए। थैंक्यू सो मच सर।”

सर अपना स्कूटर पार्क करके ख़्यालों की दुनिया से अपनी मेज़ पर पहुँचते हैं जहाँ अनामिका आकर उन्हें ज़ोर से हिला रही थी। वे चौंक पड़े। अधिकार और कर्तव्य में अंतर समझाने को तैयार थे।

“दादाजी आधा घंटा हो गया।”

“हाँ बेटे आओ, पहले हम तुम्हें हिन्दी में समझा देते हैं फिर अंग्रेज़ी में लिखवा देंगे। ठीक है न?”

“ठीक है दादाजी”

“चलो, राइट्स यानि अधिकार। यानि जो हमारा हक है वह हमें मिलना ही चाहिए। यह एक बहुत सरल शब्द है। इसे किसी को समझाना नहीं पड़ता। इसका अर्थ सबको घुट्टी में ही पिला दिया जाता है जो ज़िंदगी भर रक्त की हर बूँद के साथ प्रवाहित होता रहता है। और ड्यूटीज़ यानि कर्तव्य जो हमें करना चाहिए। अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे के अपोज़िट हैं। एक साथ कभी रह नहीं सकते।”

बच्ची अपलक उनका मुँह ताक रही थी। उनके अंदर का प्रोफेसर जाग चुका था। वे तो अपनी धुन में बोले जा रहे थे, “आई थिंक बेटे, इस कर्तव्य शब्द को डिक्शनरी से हटा देना चाहिए क्योंकि भाषा विज्ञान कहता है कि यदि कोई शब्द लम्बी अवधि तक प्रचलन में नहीं रहता है तो उसका लोप हो जाता है। सच तो यह है कि शब्दों की भी फैशन चलती है। जैसे कपड़ों-जूतों की फैशन बदलती रहती है वैसे ही शब्दों के प्रचलन की भी फैशन बदलती रहती है। कभी मंदिर-मस्जिद की फैशन तो कभी आतंकवाद की फैशन। कभी विदेशी हाथ की फैशन तो कभी मोदी-ट्रंप की फैशन। कुछ ही महीनों में ये सब आउट ऑफ फैशन हो जाते हैं। कर्तव्य नामक शब्द बरसों से आउट ऑफ फैशन हो गया है। यदि तुम्हें ज़िंदगी सही ढंग से जीना है तो बड़े-बड़े विद्वानों का कहना मानो जिन्होंने कहा है कि कोई काम करते समय स्वयं को महामूर्ख घोषित कर दो। न काम करोगे, न गलती होगी, न डाँट पड़ेगी, न टेंशन रहेगा, न हार्ट अटैक होगा। आखिर जान है तो जहान है। यानि अधिकार समझते समय बुद्धिजीवी और कर्तव्य समझते समय बुद्धूजीवी बन जाओ।”

प्रोफेसर साब बोले जा रहे थे। वे भूल चुके थे कि सामने उनका पीएच.डी. छात्र नहीं है, नन्ही बालिका है जो हाथ में कॉपी कलम लिए कुर्सी के हत्थे से सिर टिकाकर अपना झपकी लेने का अधिकार पा चुकी है।
प्रोफेसर साब ने लंबी साँस ली, मानो उनका कर्तव्य पूरा हो चुका था।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।