काव्य: गंगा का गीत

सुरजीत मान जलईया सिंह

- सुरजीत मान जलईया सिंह

- एक -

गीत गंगा गा रही है
मन अधूरा है हमारा

हो गया घायल हृदय पर
पीर फिर भी ढो रही हूँ
मैं अभागे लाड़लों के
ही लिए अब रो रही हूँ
किस जगह जाऊँ बता दो
गंध का लेकर सहारा
गीत गंगा गा रही है
मन अधूरा है हमारा

ले लिया संकल्प लेकिन
फिर भी दूषित कर रहे हो
देश भर की गन्दगी
मुझ में प्रवाहित कर रहे हो
मैं अभागी सी यहाँ पर
धार का प्रवाह हारा
गीत गंगा गा रही है
मन अधूरा है हमारा

पूर्वज मानव तुम्हारे
स्वर्ग से लाये थे मुझको
कलयुगी इस आचरण ने
कर दिया क्या-क्या न मुझको
थोड़ा सा पाने की जिद में
खो गया सब कुछ तुम्हारा
गीत गंगा गा रही है
मन अधूरा है हमारा।

- दो -

देखिये विकराल होते रूप को
तोड़ कर तटबंध निकली है नदी

जिसने अपने दूध से सींचा तुम्हें
तुमने उसके वक्ष ही काटे संदा
जो समर्पित थी तुम्हारे ही लिये
तुमने उसके अक्ष ही छांटे संदा
अपने ही आंगन में बेसुध सी पड़ी
खुद को पाने आज निकली है नदी
देखिये विकराल होते रूप को
तोड़ के तटबंध निकली है नदी

जिसने अपना पुत्र ही माना तुम्हें
तुमने उस माँ को ही निर्वासित किया
छीन कर अस्तित्व उसका किस लिए
स्वयं को उस पर ही निर्वाचित किया
पाने अपना फिर वही अस्तित्व अब
नाचती गाती निकलती है नदी
देखिये विकराल होते रूप को
तोड़ के तटबंध निकली है नदी

नींद की चिरायु में लेटी हुई
सह रह थी जो प्रलय के भार को
आदमी ने ढाये थे उस पर सितम
कब तलक सहती वो इस व्यवहार को
आ गई यौवन पे अपने आज यूँ
लेके अब अंगडाई चलती है नदी
 देखिये विकराल होते रूप को
तोड़ के तटबंध निकली है नदी।

1 comment :

  1. Very nice, appreciable from Kavi Ardhendu Chakraborty Atirek YOGACHARYA

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