काव्य: त्रिपदी

डॉ. वेद व्यथित

- वेद व्यथित 


यह कैसा मेला है             
यहाँ भीड़ है लाखों की
हर एक अकेला है।

कुछ फूल निराले हैं
जंगल में खिलें चाहें
वे सब को प्यारे हैं।

होंठों को सुख देगी
यह इश्क की मदिरा है
यह आग लगा देगी।

ये रंग गुलाबी है
मौसम  से  ज़रा डरना
यह सब पर हावी है।

फूलों से यही कहना
तुम सुंदर लगते हो
तुम सब का हो गहना।

यादें क्यों आती हैं
जो बीत गईं बातें
वे फिर क्यों सताती हैं।

यादों का सहारा है
यह उम्र की नदिया का
एक अहम सहारा है।

यह धूप है जाड़ों की
इसे ज्यादा नहीं रुकना
लाली है गालों  की। 

कुछ बात निराली है
आँखों में चमक छाई
ये मन की दीवाली है।

बचपन की बातें हैं
हमजोली थे दोनों
अब केवल यादें हैं।

जो सब की सुनते हैं
रख लेते हैं मन में
विषपायी बनते हैं।

दीवार से मत कहना
वो सब को बता देगी
बूढ़ों का है कहना।

दिल खोल के मत
रखना वे राज चुरा लेंगे
कुछ पास नही बचना।

जब हाथ ठिठुरते हैं
तब  मन के अलावों में
दिल भी तो जलते हैं।

ये आग तो धीमी है
दिल और जलाओ तो
ये धूप ही सीली है।

वो महल अटारी से
क्यों नीचे नहीं  आती
सूरज की थाली से।

रिश्ते न  जम जाएँ
दिल को कुछ जलने दो
 वे गर्माहट पाएं।

नदियों के किनारे हैं
वे मिल तो नहीं  सकते
पर साथी प्यारे हैं।

जो भूल हुई होगी
कारण कुछ भी होंगे
वह याद रही होगी।

यादें फिर आती हैं
आखिर कश्ती वापिस
साहिल पर आती है।

कोई मजबूरी होगी
वरना उन फूलों से
नही भूल हुई होगी।

दिल को मत जलने दो
ये सीप का मोती  है
इसे यूँ ही चमकने दो।

फूलों का अर्थ नहीं
वे फूल से ही होंगे
पर फूल का अर्थ यही।

बातों का खेल नहीं
दिल की दिल में रखना
ये सब की बात नहीं।

दिल की क्यों सुनते हो
ये बहुत सताता है
इस की क्यों सुनते हो।

सपने तो सपने हैं
वे सच कहाँ होते
पर फिर भी अपने हैं।

किस किस के सताये हैं
शिकवा किस से करते
सब अपने पराये हैं।

रस्ते तो वहीं रहते
ये दोष है पैरों का
क्यों सीधे नही चलते।

दो राहें जाती  हैं
मैं किस पर पैर रखूँ
वे दोनों बुलाती  हैं।

बे असर दवाएँ हैं
क्यों चैन नहीं  मिलता
अब आस दुआएँ हैं।

ये आग ही तो मैं हूँ
यदि आग नहीं  होगी
तो खाक ही तो मैं हूँ।

सब आग से जलते हैं
कुछ को वो जलती है
कुछ खुद ही जलते हैं।

पता: अनुकम्पा -1577, सेक्टर 3, फरीदाबाद - 121004
चलभाष: +91 986 884 2688
ईमेल: dr.vedvyathit@gmail.com

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